आज की तारीक में #पटना_पुस्तक_मेला महज एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजन मात्र नहीं है। यह साहित्य का वह संगम है जहां हर कोई कम-से-कम एक बार डुबकी जरूर लगाना चाहता है। जहां उन्हें अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एक बड़ा-सा मंच मिलता है। अखबारों में कवरेज के साथ-साथ साहित्य और कला से जुड़े दिग्गजों से रूबरू होने का भी मौका मिलता है। हर बार मेला में कुछ-न-कुछ अलग करने की कोशिश की जाती है। लोगों की सुख-सुविधाओं का विशेष ख्याल किया जाता है। बाबजूद इसके रास्ते में काँटे कम नहीं मिलते हैं। आयोजन में होनेवाली कठिनाइयों को तो लोग खुशी-खुशी झेल लेते हैं। अलग-अलग तरीके से मिलनेवाले दबाब को भी लोग सहन कर लेते हैं। लेकिन अपने ही जब राजनीति पर उतर आते हैं तो दु:ख तो होता ही है। आयोजक पर अनावश्यक दबाब बनाना। उन्हें घुड़की और धमकी देना कम-से-कम किसी साहित्यकार को तो शोभा नहीं देता! आयोजक तो कार्यक्रम को सफल से सफलतम बनाने के लिए एड़ी-चोटी एक करते हैं किसके लिए? इस साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन से सिर्फ आयोजकों को ही फायदा होता है? क्या इसी के सहारे उनका घर-परिवार चलता है?
जी, नहीं हुजूर। पटना पुस्तक मेला, पटना की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यह बिहार को साहित्य के केंद्र में लाने की एक सार्थक और सफल मुहिम है। यदि आप अपने निजी स्वार्थवश इसे बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं तो आप आयोजक को नहीं बल्कि अपनी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। आपके लिए शिकायतों की झड़ी लगाना और काँटें बोना आसान हो सकता है लेकिन आपके लिए निर्माण करना बड़ा ही दुरूह कार्य होगा। आज पटना पुस्तक मेला जिस मुकाम और मजबूती पर है उसे और मजबूत किए जाने की जरूरत है। साहित्यकारों के साथ-साथ प्रकाशकों को भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। देश और विदेश का ध्यान पटना की ओर खींचनें की जरूरत है। और शुभकामनाएं दें कि पटना पुस्तक मेला 2017 पिछले सारे रिकार्डों को तोड़ते हुए एक नया कीर्तिमान रचे। इस बार तो मेले का आयोजन भी गांधी मैदान के उत्तर में बने नये ऑडोटोरियम में होगा। जहां न धूल के दर्शन होंगें न चिपचिपाती गर्मी का एहसास।
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सुशील कुमार भारद्वाज
जी, नहीं हुजूर। पटना पुस्तक मेला, पटना की संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यह बिहार को साहित्य के केंद्र में लाने की एक सार्थक और सफल मुहिम है। यदि आप अपने निजी स्वार्थवश इसे बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं तो आप आयोजक को नहीं बल्कि अपनी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। आपके लिए शिकायतों की झड़ी लगाना और काँटें बोना आसान हो सकता है लेकिन आपके लिए निर्माण करना बड़ा ही दुरूह कार्य होगा। आज पटना पुस्तक मेला जिस मुकाम और मजबूती पर है उसे और मजबूत किए जाने की जरूरत है। साहित्यकारों के साथ-साथ प्रकाशकों को भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। देश और विदेश का ध्यान पटना की ओर खींचनें की जरूरत है। और शुभकामनाएं दें कि पटना पुस्तक मेला 2017 पिछले सारे रिकार्डों को तोड़ते हुए एक नया कीर्तिमान रचे। इस बार तो मेले का आयोजन भी गांधी मैदान के उत्तर में बने नये ऑडोटोरियम में होगा। जहां न धूल के दर्शन होंगें न चिपचिपाती गर्मी का एहसास।
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सुशील कुमार भारद्वाज

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