अँधेरे समय में रोशनी बाँटती कविताएँ
(पदचाप के साथ-शंकरानंद) : राजकिशोर राजन
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शंकरानंद एक प्रतिभावान युवा कवि हैं।उनकी पहली कवितासंग्रह 'दूसरे दिन के लिए' भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से प्रकाशित हुई।'पदचाप के साथ' उनका दूसरा काव्यसंग्रह है जो बोधि प्रकाशन से आई है।इस संग्रह को कई कई बार पलटा,कई कई बार पढ़ा और यह विश्वास गहरा होता गया की शंकरानंद अंतर्वस्तु और शिल्प के मामले में हमें निरंतर प्रभावित करते हैं और कई बार तो चकित कर देते हैं। शब्दों की मितव्ययिता और गहन भावबोध लिए इनकी कविताएँ ऐसी हैं जिन पर इस कवि के हस्ताक्षर हैं।इधर हिंदी में समकालीन और समकालीनता आदि पर जो बहस छिड़ी हुई है तथा भाषा,कहन,चेतना आदि को खंगाला जा रहा है तब पता चल रहा है कि वर्तमान में लिखना ही समकालीन होना नहीं है।आज मुहावरे और अंतर्वस्तु के मामले में भी कई कवि विगत हैं।शब्द और विषय इतने घिसे पिटे की अधिकांश कविताओं से कवि गायब हैं यानी कविता पर कवि का अपना हस्ताक्षर ही नहीं है।कहने का तात्पर्य यह की कविता में मौलिकता ही गायब है जो किसी कविता को कविता बनाने के लिए प्राथमिक कारक है।गौरतलब है कि वक्त के साथ समाज की भाषा भी बदली है और जनता से जुड़ा कवि उस भाषा से सायास नहीं जुड़ता वह उसी में साँस लेता है।मान बहादुर सिंह ने सही कहा है कि भाषा ,कविता का डी एन ए है और वह भाषा ही है जिससे हम कवि के संसार के बारे में जान सकते हैं।शंकरानंद की काव्यभाषा और काव्यचेतना समकालीन है।समय के साथ होना एक कवि के लिए बुनियादी शर्त है,बाकी शर्तें इसके बाद हैं।इस कवि की भाषा में बलात् और सायास पच्चीकारी नहीं है, देसज शब्दों की बहुलता है न तत्सम शब्दों की,ज्यादा से ज्यादा उसने तद्भव को साधा है।लड़कियां(पृ.107)शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें--
कहीं तो जरूर है वसंत
जिसके कारण घर चहक रहा है
इसी प्रकार की भाषा को कवि ने अपनी कविताओं में साधा है जिसमें न ज्यादा चाक चिक्य है,न उलझाव और न असहजता।सधी और कसी हुई भाषा जरूर है पर इतनी भी नहीं जैसे नट टंगी हुई रस्सी पर करतब दिखाता है।इस स्वभाव के कारण ही कविताएँ संप्रेषित होती हैं और अमूर्तन का शिकार होने से अपने को बचा लेती हैं।इन दिनों यह प्रचलन में है कि कई कवि सायास शब्दों का पहाड़ खड़ा करते हैं और आप बारम्बार उस पहाड़ पर चढ़ें और उतरें पर कविता कामिनी के दर्शन न होने हैं।और अंत में वही होता है,आप आगे बढ़ जाते हैं।यहाँ सिर्फ कवि नहीं चुकता ,कविता भी एक मौका खो देती है।शंकरानंद की कविताएँ भाषा में कैद हो कर नहीं रहतीं अपितु वे भाषा का अतिक्रमण करती हैं।संग्रह की एक कविता है'बन रहा है(प,101)यह कविता दरअसल ,हर पल परिवर्तन के परम् सत्य को रेखांकित करती है।हर पल कुछ बन रहा है,कुछ नष्ट हो रहा है परंतु जीवन है कि पुनर्नवा हो रहा है।यानी परिवर्तन के बीच भी एक अनुशासन है,व्यवस्था है जो अपना काम कर रही है-----
कोई आकाश बना रहा है
कोई पंख
कहीं धूप पक रही है
कहीं गल रही है रात
कोई पत्थर को पानी बनाता है
कोई राख को चिंगारी
जीवन की तमाम उलझनों,दुःख दर्द और नाउम्मिदियों के बीच भी
कवि उम्मीद की रेख देख पाता है।यथार्थ को पहचानने और कविता में ढालने के लिए जो समझदारी और हुनर की जरुरत पड़ती है उसे साधने में कवि निरंतर सचेष्ट है।अपने तेवर और कहन में उसकी कविता समकालीन कविता की अभ्यस्त सरंचना के अंतर्गत है।इसके दो परिणाम हुए हैं-प्रथम, की कवि शब्दों को साधने और मितव्ययिता बरतने में काफी हद तक सफल हुआ है।इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में शंकरानंद ने भाषिक प्रयोग के मामले में जिस संयम और अनुशासन का परिचय दिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए और कवि से हमारी उम्मीदें बढ़ जाती है।एक कविता (फूंकना,प-112)का उदाहरण लिया जा सकता है----
लौ जल रही थी दीये की
उसे बुझाना था
वह फूंक रहा था बार बार
लेकिन लौ जलती रही
दीया अपलक था
इस कविता में लौ को बुझाने के लिए यानी हमारी उम्मीदों,आशाओं को बुझानें के लिए निरंतर कोशिशें होती रहीं परंतु लौ जो मनुष्य की जिजीविषा का प्रतीक है,जीवन का पर्याय है उसे कोई बुझा न सका, सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ।लौ जलती रही ,दीया अपलक रहा।अगर उम्मीद न रहे तो फिर बचेगा क्या!यह कविता बड़े सलीके से नपे तुले शब्दों में मनुष्य की आदिम कथा कहती है।हर कवि के पास कुछ विलक्षणता होनी चाहिए और जब आप इस कवि की कविताओं की यात्रा करेंगे तो इसे सहज ही रेखांकित कर सकते हैं।पर,यही मितकथन और शिल्प सजगता कई बार किसी कवि की सीमा भी हो जाती है।इस संग्रह में कुछ कविताएँ उसी शिल्प सजगता के कारण कमजोर और प्रभावहीन भी हो गयी हैं।क्योंकि शिल्प कविता में शिल्पहीनता की हद तक बारीक भी हो सकती हैं और इतना भारी कि कविता उसके नीचे दब कर रह जाए।
इन दिनों हिंदी कविता में गांव की उपस्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है और यदा कदा जो गाँव दीखता भी है वह सतही है।गांव के भीतर भी गांव होता है जैसे शहर के भीतर शहर। शंकरानंद की कविताओं में जो गांव है वह वास्तविक गांव है।आमतौर पर गांव के चरित्र को समझे बिना हम गांव की बात करते हैं।आज बड़े शहरों में रहने वाले कवि,लेखक भी गांव जाते हैं पर एक पर्यटक की तरह।उनका गाँव नकली होता है उनका ग्रामीण बोध अवास्तविक होता है।कवि स्वयं बिहार के कोसी क्षेत्र का निवासी है इसीलिए वह गांव के भीतर गांव को देखता है।सिर्फ देखता ही नहीं वह जीता भी है।इस संग्रह में कई कविताओं की पृष्ठभूमि गांव है।'जिद'कविता अपने टटके बिम्बों के साथ मनुष्य की अदम्य इच्छा,जिजीविषा और अंतत उसके जीने के लिए जिद को जिस ताकत के साथ उठाती है वह कविता को अंततः पुनर्नवा करती है।यहां वही चिरकालिक दुःख और अभाव है जिसने जीवन को ताकत दी है-
जो कांच धूप रोकती थी
उसे एक बच्चे ने पत्थर मार कर तोड़ दिया
आज इस देश में किसान और किसानी की स्थिति हृदयविदारक है,किसान मर रहे हैं और पूरा देश मर्सिया गा रहा है।पोखर,तालाब,कुएं सभी सूख रहे हैं।ऐसा लगता है कि इस देश को अब इनकी जरुरत नहीं रह गयी है।अमेरिकी आवारा पूंजी जब एक तरफ सब कुछ तहस नहस करती जा रही है हम जात पात और धर्म की राजनीति में जी रहे हैं।यह कैसी विडम्बना है कि अन्नदाता किसान अब स्वयं अन्न के लिए बड़े बड़े शहरों की तरफ भाग रहा है।आप कभी जनसेवा एक्सप्रेस में बैठ कर देखिये यह देश किधर जा रहा है।शंकरानंद की 'भाव'नामक कविता बड़ी संजीदगी से उस करुण दृश्य को शब्दों के माध्यम से जीवंत करती है------
सबसे सस्ता खेत सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज सबसे सस्ती फसल
और उससे भी बढ़ कर भी सस्ता किसान
और यह भी की-
जिसके मरने से किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फांसी नहीं होती
शंकरानंद की ऐसी कविताओं में जो बिम्ब उभरता है वह भरोसे को भरोसा देता है।कवि का यह परिवेश उसे जीवन देता है।कविता को जीवन जैसे कवि के जीवन देता है।शंकरानंद की इन कविताओं को पढ़ते त्रिलोचन की याद हो आती है जब वे कहते हैं-
जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है,तप है,नहीं चाय की चुस्की
यह कवि कविता में कागज की लेखी नहीं लिखता बल्कि आँखिन देखी लिखता है।किसी कवि को समझने के लिए भाषा और बिम्ब महत्वपूर्ण उपकरण हैं।इन दो उपकरणों के आधार पर अगर कोई इस कवि को समझे तो वह इतना समझ लेगा की यह कवि जमीन से गहराई तक जुड़ा कवि है।उसने अपनी शैली आप गढ़ी है और उसकी कविताओं में मौलिकता है।उसका अंदाजे बयाँ अलहदा है।
(पदचाप के साथ-शंकरानंद) : राजकिशोर राजन
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शंकरानंद एक प्रतिभावान युवा कवि हैं।उनकी पहली कवितासंग्रह 'दूसरे दिन के लिए' भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता से प्रकाशित हुई।'पदचाप के साथ' उनका दूसरा काव्यसंग्रह है जो बोधि प्रकाशन से आई है।इस संग्रह को कई कई बार पलटा,कई कई बार पढ़ा और यह विश्वास गहरा होता गया की शंकरानंद अंतर्वस्तु और शिल्प के मामले में हमें निरंतर प्रभावित करते हैं और कई बार तो चकित कर देते हैं। शब्दों की मितव्ययिता और गहन भावबोध लिए इनकी कविताएँ ऐसी हैं जिन पर इस कवि के हस्ताक्षर हैं।इधर हिंदी में समकालीन और समकालीनता आदि पर जो बहस छिड़ी हुई है तथा भाषा,कहन,चेतना आदि को खंगाला जा रहा है तब पता चल रहा है कि वर्तमान में लिखना ही समकालीन होना नहीं है।आज मुहावरे और अंतर्वस्तु के मामले में भी कई कवि विगत हैं।शब्द और विषय इतने घिसे पिटे की अधिकांश कविताओं से कवि गायब हैं यानी कविता पर कवि का अपना हस्ताक्षर ही नहीं है।कहने का तात्पर्य यह की कविता में मौलिकता ही गायब है जो किसी कविता को कविता बनाने के लिए प्राथमिक कारक है।गौरतलब है कि वक्त के साथ समाज की भाषा भी बदली है और जनता से जुड़ा कवि उस भाषा से सायास नहीं जुड़ता वह उसी में साँस लेता है।मान बहादुर सिंह ने सही कहा है कि भाषा ,कविता का डी एन ए है और वह भाषा ही है जिससे हम कवि के संसार के बारे में जान सकते हैं।शंकरानंद की काव्यभाषा और काव्यचेतना समकालीन है।समय के साथ होना एक कवि के लिए बुनियादी शर्त है,बाकी शर्तें इसके बाद हैं।इस कवि की भाषा में बलात् और सायास पच्चीकारी नहीं है, देसज शब्दों की बहुलता है न तत्सम शब्दों की,ज्यादा से ज्यादा उसने तद्भव को साधा है।लड़कियां(पृ.107)शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखें--
कहीं तो जरूर है वसंत
जिसके कारण घर चहक रहा है
इसी प्रकार की भाषा को कवि ने अपनी कविताओं में साधा है जिसमें न ज्यादा चाक चिक्य है,न उलझाव और न असहजता।सधी और कसी हुई भाषा जरूर है पर इतनी भी नहीं जैसे नट टंगी हुई रस्सी पर करतब दिखाता है।इस स्वभाव के कारण ही कविताएँ संप्रेषित होती हैं और अमूर्तन का शिकार होने से अपने को बचा लेती हैं।इन दिनों यह प्रचलन में है कि कई कवि सायास शब्दों का पहाड़ खड़ा करते हैं और आप बारम्बार उस पहाड़ पर चढ़ें और उतरें पर कविता कामिनी के दर्शन न होने हैं।और अंत में वही होता है,आप आगे बढ़ जाते हैं।यहाँ सिर्फ कवि नहीं चुकता ,कविता भी एक मौका खो देती है।शंकरानंद की कविताएँ भाषा में कैद हो कर नहीं रहतीं अपितु वे भाषा का अतिक्रमण करती हैं।संग्रह की एक कविता है'बन रहा है(प,101)यह कविता दरअसल ,हर पल परिवर्तन के परम् सत्य को रेखांकित करती है।हर पल कुछ बन रहा है,कुछ नष्ट हो रहा है परंतु जीवन है कि पुनर्नवा हो रहा है।यानी परिवर्तन के बीच भी एक अनुशासन है,व्यवस्था है जो अपना काम कर रही है-----
कोई आकाश बना रहा है
कोई पंख
कहीं धूप पक रही है
कहीं गल रही है रात
कोई पत्थर को पानी बनाता है
कोई राख को चिंगारी
जीवन की तमाम उलझनों,दुःख दर्द और नाउम्मिदियों के बीच भी
कवि उम्मीद की रेख देख पाता है।यथार्थ को पहचानने और कविता में ढालने के लिए जो समझदारी और हुनर की जरुरत पड़ती है उसे साधने में कवि निरंतर सचेष्ट है।अपने तेवर और कहन में उसकी कविता समकालीन कविता की अभ्यस्त सरंचना के अंतर्गत है।इसके दो परिणाम हुए हैं-प्रथम, की कवि शब्दों को साधने और मितव्ययिता बरतने में काफी हद तक सफल हुआ है।इस संग्रह की अधिकांश कविताओं में शंकरानंद ने भाषिक प्रयोग के मामले में जिस संयम और अनुशासन का परिचय दिया है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए और कवि से हमारी उम्मीदें बढ़ जाती है।एक कविता (फूंकना,प-112)का उदाहरण लिया जा सकता है----
लौ जल रही थी दीये की
उसे बुझाना था
वह फूंक रहा था बार बार
लेकिन लौ जलती रही
दीया अपलक था
इस कविता में लौ को बुझाने के लिए यानी हमारी उम्मीदों,आशाओं को बुझानें के लिए निरंतर कोशिशें होती रहीं परंतु लौ जो मनुष्य की जिजीविषा का प्रतीक है,जीवन का पर्याय है उसे कोई बुझा न सका, सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए ।लौ जलती रही ,दीया अपलक रहा।अगर उम्मीद न रहे तो फिर बचेगा क्या!यह कविता बड़े सलीके से नपे तुले शब्दों में मनुष्य की आदिम कथा कहती है।हर कवि के पास कुछ विलक्षणता होनी चाहिए और जब आप इस कवि की कविताओं की यात्रा करेंगे तो इसे सहज ही रेखांकित कर सकते हैं।पर,यही मितकथन और शिल्प सजगता कई बार किसी कवि की सीमा भी हो जाती है।इस संग्रह में कुछ कविताएँ उसी शिल्प सजगता के कारण कमजोर और प्रभावहीन भी हो गयी हैं।क्योंकि शिल्प कविता में शिल्पहीनता की हद तक बारीक भी हो सकती हैं और इतना भारी कि कविता उसके नीचे दब कर रह जाए।
इन दिनों हिंदी कविता में गांव की उपस्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है और यदा कदा जो गाँव दीखता भी है वह सतही है।गांव के भीतर भी गांव होता है जैसे शहर के भीतर शहर। शंकरानंद की कविताओं में जो गांव है वह वास्तविक गांव है।आमतौर पर गांव के चरित्र को समझे बिना हम गांव की बात करते हैं।आज बड़े शहरों में रहने वाले कवि,लेखक भी गांव जाते हैं पर एक पर्यटक की तरह।उनका गाँव नकली होता है उनका ग्रामीण बोध अवास्तविक होता है।कवि स्वयं बिहार के कोसी क्षेत्र का निवासी है इसीलिए वह गांव के भीतर गांव को देखता है।सिर्फ देखता ही नहीं वह जीता भी है।इस संग्रह में कई कविताओं की पृष्ठभूमि गांव है।'जिद'कविता अपने टटके बिम्बों के साथ मनुष्य की अदम्य इच्छा,जिजीविषा और अंतत उसके जीने के लिए जिद को जिस ताकत के साथ उठाती है वह कविता को अंततः पुनर्नवा करती है।यहां वही चिरकालिक दुःख और अभाव है जिसने जीवन को ताकत दी है-
जो कांच धूप रोकती थी
उसे एक बच्चे ने पत्थर मार कर तोड़ दिया
आज इस देश में किसान और किसानी की स्थिति हृदयविदारक है,किसान मर रहे हैं और पूरा देश मर्सिया गा रहा है।पोखर,तालाब,कुएं सभी सूख रहे हैं।ऐसा लगता है कि इस देश को अब इनकी जरुरत नहीं रह गयी है।अमेरिकी आवारा पूंजी जब एक तरफ सब कुछ तहस नहस करती जा रही है हम जात पात और धर्म की राजनीति में जी रहे हैं।यह कैसी विडम्बना है कि अन्नदाता किसान अब स्वयं अन्न के लिए बड़े बड़े शहरों की तरफ भाग रहा है।आप कभी जनसेवा एक्सप्रेस में बैठ कर देखिये यह देश किधर जा रहा है।शंकरानंद की 'भाव'नामक कविता बड़ी संजीदगी से उस करुण दृश्य को शब्दों के माध्यम से जीवंत करती है------
सबसे सस्ता खेत सबसे सस्ता अन्न
सबसे सस्ता बीज सबसे सस्ती फसल
और उससे भी बढ़ कर भी सस्ता किसान
और यह भी की-
जिसके मरने से किसी को जेल नहीं होता
जिसके आत्महत्या करने से किसी को फांसी नहीं होती
शंकरानंद की ऐसी कविताओं में जो बिम्ब उभरता है वह भरोसे को भरोसा देता है।कवि का यह परिवेश उसे जीवन देता है।कविता को जीवन जैसे कवि के जीवन देता है।शंकरानंद की इन कविताओं को पढ़ते त्रिलोचन की याद हो आती है जब वे कहते हैं-
जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है,तप है,नहीं चाय की चुस्की
यह कवि कविता में कागज की लेखी नहीं लिखता बल्कि आँखिन देखी लिखता है।किसी कवि को समझने के लिए भाषा और बिम्ब महत्वपूर्ण उपकरण हैं।इन दो उपकरणों के आधार पर अगर कोई इस कवि को समझे तो वह इतना समझ लेगा की यह कवि जमीन से गहराई तक जुड़ा कवि है।उसने अपनी शैली आप गढ़ी है और उसकी कविताओं में मौलिकता है।उसका अंदाजे बयाँ अलहदा है।










