रविवार, 28 अगस्त 2016

विनय कुमार की कविता डेड मॉल






डॉ विनय कुमार यूं तो पेशे से चिकित्सक हैं लेकिन वे साहित्य में भी अपनी पहचान रखते हैं. उनकी रचनाएं न सिर्फ यथार्थ के दर्शन हैं बल्कि वे समाज में फैली बीमारी को भी करीने से पकड़ते हैं. पढ़ते हैं उनकी कविता डेड मॉल 

 
डॉ विनय कुमार


डेड मॉल
.............
मॉल बड़ा और भव्य है
दुकानें भी एक से एक
सबकी भवें ऊँची
मगर ख़रीदार कम होते जा रहे हैं
और सामान ए तिज़ारत के बीच
उदासी फैलने लगी है
जूते लात खाने को बेचैन हैं
गद्दे थकी देहों के साथ सोने को
क़मीज़ों का बदन टूट रहा है
पतलूनों के पाँव अकड़े हैं
और साड़ियाँ अपने नंगेपन से शर्मसार
बेक़रार कि पहन लें कोई देह जल्द से जल्द
मालिकान को फ़िक्र तो बहुत
कि धंधा ठीक नहीं चल रहा
मगर उलट-फेर जोड़-घटाव जुगाड़-सुगाड
और दारू-सारू से फ़ुर्सत मिले तब तो
मगर एक दिन अचानक
दुकानों में सजे माल से
मृत्यु की गंध आने लगती है
साहिबान
जब किसी मॉल की मौत क़रीब होती है
तो सबसे पहले
उसमें रखीं चीज़ें मरने लग जाती हैं
जहाँ ज़्यादा चीज़ें
वहाँ मृत्युगंध ज़्यादा तेज़
और मालिकान समझ जाते हैं
कि यह डूबते जगह को छोड़कर भागने का
आख़िरी मौक़ा है
वे मातहतों को हुक्म देते हैं -
कपड़े और गहने उतार लो
सिंगारदानियाँ ख़ाली कर दो
सुगंध की सीसियाँ छीन लो
ब्रेड चीज़ फलों और सब्ज़ियों की
की थालियाँ हटा लो
और घड़ियों के भीतर-बाहर बचे समय को बुहार लो
मातहत हुक्म की तामील करते रहते हैं
और ऐंकर स्टोर के अंग बारी-बारी से मरते रहते हैं
और एक दिन शेष बचता है
मीना बाज़ार का सूखा हुआ अस्थिपंजर
और कुछ मैनेक्विन नंग धड़ंग
बेग़ैरत
जो न आदमी न औरत
साहिबान वह ऐंकर स्टोर
जहाँ क़दमों की थाप से ड्रम सा बजता था अटूट
और जिसके शीशे में ख़्वाहिशों की फ़िल्म-सी चलती थी
एक ख़ौफ़नाक भूतडब्बे में बदल जाता है
ऐंकर स्टोर तो मर जाता है
मगर उसके क़ातिल जरासीम नहीं मरते
मॉल के हर कोने से उठने लगती है मृत्युगंध
और आहिस्ता-आहिस्ता एक महामारी फैल जाती है
इसे सेल कहते हैं
औने-पौने आधे तिहाई चौथाई
ले जाओ भाई
कौन कहता है
कि हम लुटेरे हैं
आओ देखो कि हम कितने दिलेर हैं
पब्लिक सब समझती है
कि यह दिलेरी नहीं मज़बूरी है
शायद चाल
मगर क़दम फिर भी पड़ते हैं
कि मरनेवाले की
आख़िरी ख़्वाहिश हो
या आख़िरी ज़रूरत
या आख़िरी रस्म
कोई भी तहज़ीब मुँह नहीं मोड़ती
माल बिकते जाते हैं
दुकानें ख़ाली होती जाती हैं
और एक दिन
पूरा मॉल इतिहास हो जाता है
मगर जीवित रहते हैं
वे लोग जो वहाँ गए
वे मुलाक़ातें जो दोस्ती में बदलीं
वे प्रेमकथाएँ जो वहाँ शुरू हुईं
वे धोखे जो खाए-खिलाए गए
उन चीज़ों की कहानियाँ
जिनके ख़रीदे जाने से कुछ हुआ
या जो होना था वो न हुआ
वह मॉल
इन कहानियों में
कभी जुगनू की तरह दमकता है
तो कभी किसी भुतहा साये की तरह
नुमायां होते ही फ़ना हो जाता है
आहिस्ता आहिस्ता लोग भूल जाते हैं
कि वह मॉल बना क्यों था
उसकी वास्तुकला क्या थी
उसकी यू एस पी क्या थी
या कि कोई मॉल भी था वहाँ
जहाँ आज
एक नाजायज़ जंग में मारे गए
सिपाहियों की क़ब्रें हैं
साहिबान
कोई मॉल जब मरता है
तो सिर्फ़ प्रदर्शन नहीं
एक दर्शन भी मरता है
न सही पूरा का पूरा मगर काफ़ी कुछ

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

संजय कुमार कुंदन की गजलें

साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। गजल सुनना जितना अच्छा लगता है लिखना उतना ही श्रमसाध्य। साथ ही गजल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह न सिर्फ सुनने वाले को सम्मोहित कर ले बल्कि अपने संवाद को भी उद्देश्यपूर्ण तरीके से लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा सके। तो आज आनंद लेते हैं ख्यात गजलगो संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलों का।
संजय कुमार कुंदन


ग़ज़ल

गरचे  दुनिया में  हैं  हम जैसे  गुनहगार  कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की  दरकार कहाँ

ज़िन्दगी, तेरे  ही तानों से  तो आजिज़ होकर
ख़ुद  को  हम  बेचने आए  हैं, ख़रीदार  कहाँ

शह्र में  अब तलक  गरचे  है वही  रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ

तेज़  था  शौक़  का  व्योपार,  सुना  तो  आए
बढ़  गईं  सारी दुकाँ, गुम  हुआ  बाज़ार  कहाँ

हमने सोचा था  सुकूँ में  कहेंगे  हम  भी  कुछ
एक   लम्हे  के  लिए  भी  मिला   क़रार  कहाँ

शाम  भी  अब  ज़रा  कतरा के गुज़र जाती  है
दिन को भी  शाम का रहता है  इन्तज़ार  कहाँ

साथ   उजड़े   हुए  लोगों  के  रहा  है   कबसे
हाकिमे-शह्र,  वो    तेरा   है   वफ़ादार    कहाँ

किस  अदा  से  वो  कहे  झूठ के दीवाना करे
कर ले तू  शायरी,  उससे  बड़ा फ़नकार कहाँ

तू भी  आलम  पे  भला  छाएगा  कैसे  'कुन्दन'
तू   तो   सादा  है  तेरी  ज़ात   गिरहदार   कहाँ

##############

अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको  क़यास से
हर  शै  को  छू  लिया है  इतना  ही पास  से

शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते  हुए  वो   चेहरे   मिले  हैं   उदास   से

हम उसके  इंतज़ार  में  इस  दरजा  मह्व  थे
हम देख  न  पाए  उसे  गुज़रा  वो  पास  से

इक रात  में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें  बहुत  ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से

महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर   उन्हें   जो   देखा   लगे   मह्वे-यास से

                    ########

क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन

____________


तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना  मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था

तानों में  इलज़ाम   थे  तेरे    मेरी  शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था

टूट  नहीं  पाएगा   रिश्ता  इसपे   यक़ीं  होने  के  बाद
हम दोनों  के बीच  लड़ाई का  थम जाना मुश्किल था

तीरन्दाज़ी  की   यह  तेरी  मश्क़ बहुत  नौख़ेज़  लगी
सख़्त  मेरे  सीने  पे  तेरा  तीर  चलाना  मुश्किल  था

कितना तू बेबस था उस दम  जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन  झूठे  इलज़ाम  पे  मेरा तैश में आना मुश्किल  था

ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं  शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल  था

जिसका दावा था कितनों को  ज़ेरे-अदब ले  आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल  था

                       #########
                   
दिल  की  ही बातें   लिखनी थीं   लेकिन  तूफाँ   उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया

नर्म , मुलायम  उन  जज़्बों  का  एक अजब  ये  हाल हुआ
कारगहे- दुनिया  में   उनमें   पत्थर- सा  कुछ   उतर   गया

अपनी  वो  औक़ात  कहाँ  है  फ़ुरसत  के  कुछ लम्हें  हों
इक लम्हा  ख़ाली  जो गुज़रा  ख़ौफ़ सा कोई  उभर  गया

हम   बेढंगे   लोग  से  उसको   दौलत  ने  यूँ   खेंच  लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो  हम जैसे  थे  लेकिन  कितना निखर गया

उसको   ये   ख़ुशफ़हमी  है   के  वो  आज़ाद  परिन्दा  है
वक़्त  बहुत  हुशियारी से  बस   उसका  पर  है कतर  गया

अब तो  जिधर भी  देखते हैं बस  ज़िल्लत  के  ही  सामाँ हैं
अब तो  इन  हालात  के हाथों  सारा  जादू   बिखर   गया

क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद  कुछ  वक़्त  गुज़ारा,  ख़ामोशी  से  गुज़र  गया
               ########
संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०-  9835660910

रविवार, 21 अगस्त 2016

शंभु पी. सिंह की जनता दरबार पर शहंशाह आलम की टिप्पणी

शंभु पी. उस कैफ़ियत के कथाकार हैं, जिस कैफ़ियत में कोई जब तक अपने भीतर हाहाकार मचा रहे विचारों को बाहर नहीं निकाल लेता, लिखकर क़लमबंद नहीं कर लेता, उसे सुकून हासिल नहीं होता। इसीलिए शंभु पी. सिंह ऊर्जा संपन्न कथाकारों की फ़ेहरिस्त में रखे जाते हैं। यह ऊर्जा संपन्नता इनकी कहानियों में साफ़-साफ़ दिखाई भी देती है। शंभु पी. सिंह दीर्घकालिक समय तक कथा-समय में बने रहने वाले कथाकर हैं। कथाकार शंभु पी. सिंह के पास कहानी कहने का अपना ढंग है, अपनी शैली है, अपना रंग है। शंभु पी. सिंह की जो ख़ासियत मुझे प्रभावित करती है, वह यह कि ये शांत रहकर कथारत रहते हैं और कई असाधारण कहानियाँ हमें सौंपते हैं। इनकी कहानियों में ख़ुद इन्हीं का समय बोलता-बतियाता है और इनके पात्रों का समय रेखांकित करता है। यही वजह है कि डा. खगेंद्र ठाकुर जैसे महत्वपूर्ण आलोचक इनकी कहानियों को 'पैने यथार्थ-बोध की कहानियाँ' कहते हैं और 'नई धारा' के संपादक डा. शिवनारायण ने इन्हें 'अपने पाठकों में प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देता है', का कथाकार कहते हैं। शंभु पी. सिंह जिस सहजता, विनम्रता, व्यावहारिकता के पैरोकार हैं, यह सबकुछ पूरी कुशलता से अपनी कहानियों में दर्ज भी करते जाते हैं।
`````````````````
आदमी के युगपत से मुठभेड़ करातीं शंभु पी. सिंह की कहानियाँ
● शहंशाह आलम

यह स्पष्ट है कि आदमी का वर्तमानकाल जितना जटिल है, उतना ही संदिग्ध भी है। आदमी का आज इन्हीं अटकलों में बीत जा रहा है कि कल का दिन नितान्त अभाव से भरा था लेकिन आज का दिन ज़रूर ख़ुशियों भरा गुज़रेगा। इसे आदमी की ऐतिहासिक परंपरा कही जा सकती है कि हर आदमी कुछ ऐसा ही सोच-सोचकर अपना जीवन जीए चला जाता है। कथाकार शंभु पी. सिंह की कहानियों का संग्रह 'जनता दरबार' की कहानियाँ पढ़ते हुए मैं आदमी की इसी सच्चाई से गुज़रा। ये कहानियाँ पढ़कर पाठक को अपना मौन तोड़ना पड़ता है। ये आदमी के चमत्कारात्मक जीवन की कहानियाँ न होकर आदमी के अद्भुत जीवंत जीवन की कहानियाँ हैं। इसलिए कि यहाँ मैं जिस आदमी के बारे में बार-बार बके जा रहा हूँ, वह आदमी कोई धन्ना सेठ नहीं है जो अपना चमत्कारों से भरा ख़ुशरंग जीवन जीते हुए बाक़ी बचे हुए आदमी को संदेहास्पद दृष्टि से देखता है। हालाँकि इन कहानियों का अंतर्कथन लिखते हुए प्रसिद्ध आलोचक डा. खगेंद्र ठाकुर मानते हैं कि संग्रह की अधिकतर कहानियाँ पति-पत्नी-प्रेम, स्त्री-पुरुष-संबंध या यौन-आकर्षण से संबंधित हैं। यहाँ मेरा प्रश्न इतना-सा खड़ा होता है कि क्या जो यौन-आकर्षण से संबंधित कहानियाँ होती हैं, उन कहानियों के पात्रों का जीवन-संघर्ष अथवा जीवन-यथार्थ नहीं होता? अब संग्रह की पहली ही कहानी 'एक्सीडेंट' को लीजिए। इस कहानी में कथाकार शंभु पी. सिंह ने एक्सीडेंट के बाद की त्रासद स्थिति का सफल चित्रण किया है। यह कहानी एक्सीडेंट की घटना तक आकर रुक नहीं जाती है बल्कि अपने देश में आम हो चुके सांप्रदायिक दंगे का मार्मिक चित्रण भी करती है। इसलिए यह कहानी किसी यथार्थवादी कहानी की तरह ग्रहणीय है : 'मैं आपका ऋण न चुका सकूँगी, शायद कभी नहीं।' वह दोनों हाथ जोड़ रूआंसी होकर बोली। तब तक रीतेश कमरे से बाहर हो चुका था। बड़ी तेज़ी से हम दोनों सड़क तक आए। बिना कुछ बोले बहुत दूर तक चलते रहे। हम किसी होटल की तलाश में थे। तभी रीतेश बोल उठा, 'यार, एक बात बताओ, इस देश में क्या सिर्फ़ हिन्दू और मुसलमान ही रहेंगे, तो फिर इंसान कहाँ रहेगा?' ( 'एक्सीडेंट', पृ. 20)। इस कहानी का परीक्षण यह सिद्ध करता है कि आज समाज को इंसानियत की कितनी ज़रूरत है। यहाँ कथाकार का उदय एक महामानव के रूप में होता दिखाई देता है। शायद इसलिए कि कथाकार का महामानव हमारे भीतर के अतिविशिष्ट मानवीय लक्षण को अपनी इस कथा के बहाने बचाए रखना चाहता है।
शंभु पी. सिंह

     यह आवश्यक है कि हर कथाकार की कथा-रचना को व्यापक दृष्टि से देखा-परखा जाए। शंभु पी. सिंह की सारी कहानियाँ अपने परीक्षण के लिए इसी व्यापक दृष्टि की माँग अपने पाठ के समय करती हैं। इसलिए कि शंभु पी. सिंह ने मनुष्य के जीवन को बेहद क़रीब से देखा-परखा है। मनुष्य-जीवन को देखने-परखने का इनका अपना तरीक़ा है। अब इनकी कहानी 'मर्द' को ही लीजिए। यह झालो दाय की जीवन-कथा है। यह कहानी उस झालो दाय की है, जिसका चीर-हरण ख़ुद उसके चचेरे भाई ने किया है। फिर जिसे झालो के दूर के चाचा, जिसे वह रघु चाचा कहती थी, उस चाचा ने भी झालो का चीर-हरण किया। यह कहानी मर्दजाति की स्त्रीजाति के साथ सदियों से चली आ रही चीर-हरण-परंपरा की कहानी है और झालो बेचारी इस अनूठी परंपरा की साक्षी। यही सच है कि पुरुष का मन किसी स्त्री को लेकर आज भी 'शुद्ध' नहीं हुआ है। पुरुष द्वारा अपने 'शुद्ध मन' की घोषणा बार-बार की जाती रही है ताकि एक स्त्री पुरुष की इस घोषणा से बार-बार छली जाती रहे : पिछली बार तक तो हम तीनों भाई-बहन कमरे में ही सोते थे और मामा-मामी बरामदे पर पड़े दो खाट पर। इस बार थोड़ा परिवर्तन दिखा। मामी ने बरामदे के एक खाट मेरा बिछावन लगा दिया और दूसरा शायद अपने लिए। लेकिन मेरे से बातें करते-करते भाई भी अपनी माँ की खाट पर सो गया। अपने बेटे का प्रतिरोध करना मामी के बस में नहीं था। मामा-मामी घर के अन्दर सोने चले गए। देर तक हम दोनों बचपन के संगी-साथियों की चर्चा करते रहे। नींद ने कब अपना साम्राज्य फैला दिया, पता ही नहीं चला। अचानक मैं एक भारी वज़न से अपने-आपको दबा पाई। आँखें खुलीं, जब तक कुछ बोल पाती, दरिंदे के पंजे ने मुझे इस क़दर जकड़ रखा था कि मैं छटपटाती रह गई, लेकिन न तो एक शब्द मुँह से निकल पाया और न ही मैं उसके पंजे से मुक्त हो पाई ( 'मर्द', पृ. 25-26)। आप इस कहानी को पढ़कर यह महसूस सकते हैं कि झालो जैसी कितनी ही लड़कियाँ दरिंदे रूपी पुरुष के पंजे में घड़ी की टिकटिक के साथ छटपटाती हैं और विडंबना देखिए कि इसका इल्ज़ाम उस पुरुष दरिंदे पर न जाकर सामाजिक पंचायतें झालो जैसी लड़कियों पर ही डाल देती हैं और पुरुष दरिंदा किसी और झालो दाय का शिकार करने निकल पड़ता है, बिना डरे, बिना झिझके, बिना आत्मग्लानि के। लेकिन एक स्त्री जब विरोध पर उतारू हो जाए, आमादा हो जाए, उद्यत हो जाए तो पहलवान-से-पहलवान आदमी भी उस स्त्री के सामने घिघयाने लगता है। इस कहानी में झालो अंतत: यही करती है और पुरुष दरिंदा झालो के आगे अपनी नापाक ज़िंदगी की भीख माँगता दिखाई देता है। संग्रह की एक और कहानी 'बायोलॉजिकल नीड्स' की प्रज्ञा ने अपने से अधिक उम्र के प्रोफ़ेसर अनुपम की देह का इस्तेमाल अपनी देह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए किया। शंभु पी. सिंह का यह कथन, 'कि कथा-कहानियों, सरकारी घोषणाओं, न्यायायिक व्यवस्थाओं में आज तक सिर्फ़ स्त्री-देह के दोहन की बातें ही अनुपम के ज़ेहन में थीं, लेकिन पहली बार वह ख़ुद ही इसका मोहरा बन चुका था। पुरुष तो आख़िर पुरुष है, न तो मर्यादा लाँघते देर लगती है और न ही स्खलित होते ( 'बायोलॉजिकल नीड्स', पृ. 35)।' इस यथार्थ के बावजूद मनुष्य-समाज में झालो दाय की सँख्या अनगिन है और प्रज्ञा जैसी स्त्री की कुछेक। परन्तु शंभु पी. सिंह का यह कमाल है कि इस कुछेक संख्या वाले स्त्री-समूह तक पर अपनी पैनी दृष्टि रखते हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। शंभु पी. सिंह की कहानियों का विशेष महत्व इस अर्थ में भी है कि इनकी कहानियाँ समय के साथ चलती हैं। यह कहानियाँ आत्मतोष के लिए लिखी गई कहानियाँ नहीं हैं। संग्रह की अन्य कहानियों, यथा- 'जनता दरबार', 'कफ़न के बाद', 'खेल-खेल में', 'तृष्णा', 'तोहफ़ा', 'मिस्ड कॉल के इंतज़ार में', 'सिलवट का दूध', 'भूख', 'इजाज़त', 'अगली बार', का यथार्थ उतना ही मारक है, जितना कि हम 'एक्सीडेंट', 'मर्द' और 'बायोलॉजिकल नीड्स' कहानियों में पाते हैं। इन कहानियों में शंभु पी. सिंह एक सजग, एक सच्चे, एक अनुभवी कथाकार के रूप में स्पष्ट प्रकट होते हैं।

     'कफ़न के बाद' शीर्षक कहानी मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'कफ़न' के बाद के परिवेश पर फ़ोकस करती है। शंभु पी. सिंह अपनी इस कहानी के माध्यम से यह बताने की कोशिश करते हैं कि समय ज़रूर बदला है, लोगों का रहन-सहन भी बदला, पर समस्याएँ जस-की-तस वैसी ही बनी हुई हैं। लोगों की ईमानदारी अब भी उतनी ही ख़तरे में पड़ी दिखाई देती है, जितनी मुंशी प्रेमचंद के ज़माने में ईमानदारी ख़तरे में पड़ी हुई थी। यानी बेईमानी एक ऐसी परंपरा है, जो इस पृथ्वी के बचे रहने तक ख़त्म नहीं होने वाली। इसलिए कि बेईमानी व्यवस्थाजनित है और जब व्यवस्था ख़ुद बेईमानी कर-करके अपने को जीवित रखती है, तो इस व्यवस्था का हिस्सा बने राजनेता, अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, व्यवसायी ख़ुद को ईमानदार बनाए रखकर क्या करेंगे और क्यों करेंगे भला? भाई मेरे, ईमानदारी घाटे का सौदा जो है। फिर सारा पाप धोने के लिए बेचारी गंगा अविरल बहती चली आ ही रही है...गंगा में कुछ डुबकियाँ मारो और आपके सारे पाप ग़ायब! इस संग्रह की कहानी 'खेल-खेल में' भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के समय अपने सहिष्णु देश की जो हालत हो जाती है, कथाकार ने उसी सहिष्णुता का वीभत्स चित्रण किया है, एकदम बेबाक होकर। जबकि 'तृष्णा' कहानी का ताना-बाना प्रेम के त्रिकोण पर है। यह संग्रह की लंबी कहानी है। यह उस प्रेम की कहानी है, जिस प्रेम में प्रेम की तृष्णा बाक़ी रह जाती है। 'तोहफ़ा' कहानी भी अधूरे प्रेम की कहानी है। 'मिस्ड कॉल के इंतज़ार में', 'सिलवट का दूध', 'इजाज़त' आदि कहानियाँ पठनीय हैं। 'जनता दरबार' शीर्षक कहानी, जो संग्रह का भी शीर्षक है, वर्तमान व्यवस्था पर गहरे जाकर चोट करती है। पूरा सच यही है कि जो व्यवस्था सर्वहारा के लिए बनती है, वही व्यवस्था सर्वहारा वर्ग को लूटकर, पीटकर और पटककर अपने ज़िंदा होने का आभास कराती रहती है। हमारा आज का परिवेश ऐसा ही है और हम जिस परिवेश को जीते चले जा रहे हैं, इसकी पहचान ऐसी ही है, जिसमें आज की व्यवस्था हमें रोज़ मारती है, रोज़ हमारा अस्तित्व धूमिल करती है, रोज़ हमारी धज्जियाँ उड़ाती है। शंभु पी. सिंह की कहानियों में यही सब चित्रित हुआ है। वह भी बिलकुल किसी आईने की तरह साफ़।

     दरअसल शंभु पी. उस कैफ़ियत के कथाकार हैं, जिस कैफ़ियत में कोई जब तक अपने भीतर हाहाकार मचा रहे विचारों को बाहर नहीं निकाल लेता, लिखकर क़लमबंद नहीं कर लेता, उसे सुकून हासिल नहीं होता। इसीलिए शंभु पी. सिंह ऊर्जा संपन्न कथाकारों की फ़ेहरिस्त में रखे जाते हैं। यह ऊर्जा संपन्नता इनकी कहानियों में साफ़-साफ़ दिखाई भी देती है। शंभु पी. सिंह दीर्घकालिक समय तक कथा-समय में बने रहने वाले कथाकर हैं। कथाकार शंभु पी. सिंह के पास कहानी कहने का अपना ढंग है, अपनी शैली है, अपना रंग है। शंभु पी. सिंह की जो ख़ासियत मुझे प्रभावित करती है, वह यह कि ये शांत रहकर कथारत रहते हैं और कई असाधारण कहानियाँ हमें सौंपते हैं। इनकी कहानियों में ख़ुद इन्हीं का समय बोलता-बतियाता है और इनके पात्रों का समय रेखांकित करता है। यही वजह है कि डा. खगेंद्र ठाकुर जैसे महत्वपूर्ण आलोचक इनकी कहानियों को 'पैने यथार्थ-बोध की कहानियाँ' कहते हैं और 'नई धारा' के संपादक डा. शिवनारायण ने इन्हें 'अपने पाठकों में प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देता है', का कथाकार कहते हैं। शंभु पी. सिंह जिस सहजता, विनम्रता, व्यावहारिकता के पैरोकार हैं, यह सबकुछ पूरी कुशलता से अपनी कहानियों में दर्ज भी करते जाते हैं। और किसी कथाकार में यह सब गुण कथाकार के सर्वगुण-संपन्न होने का द्योतक भी है। उल्लेखनीय है कि शंभु पी. सिंह अपने समय के जिस कठिन दौर को जी रहे हैं, उस कठिन दौर को परदे से बाहर भी ला रहे हैं। शंभु पी. सिंह अपनी कहानियों के माध्यम से जहाँ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध तीखा प्रहार करते हैं, वहीं उनका नायक प्रेम को भी बचाने का प्रयास करता है और इनकी नायिका पुरुष-वर्चस्व का विरोध दर्ज करती हैं। यह सब मिलकर शंभु पी. सिंह को एक नायाब प्रखर कथाकार घोषित करता है, इसमें संदेह नहीं।
````````````````````````````````````````````````````
शहंशाह आलम
'जनता दरबार' ( कहानी-संग्रह ) / कथाकार : शंभु पी. सिंह / प्रकाशक : संस्कृति प्रकाशन, प्रथम मंज़िल, मिश्रा कॉम्प्लेक्स, ईशाकचक, नज़दीक भोलानाथ पुल, भागलपुर-812001, बिहार / मोबाइल : 09334166909 / मूल्य : ₹300

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, कमरा सँख्या : 17, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015 / 09835417537
●●●

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

सुशील कुमार की कविता सुनना केवल तुम

भागमभाग की इस जिंदगी में चारों ओर सिर्फ शोर ही शोर सुनाई पड़ती है. शोर चाहे वो गुस्से में चिल्लाते इंसान की हो, या फिर अपनी तेज गति से दूरी की जवानी लेती गाड़ी की. लेकिन हैरत है कि इंसान समस्यओं से जूझने की बजाय उन तेज आवाजों में ही शांति की तलाश करने लगता है. जबकि वह जितने तेज आवाज का आदि होता जा रहा है वहां सुनाई नहीं पड़ती है तो खुद की आवाज, अपनों की आवाज, रिश्ते और मानवता की आवाज. और ऐसे में याद आती है कवि सुशील कुमार की कविता सुनना केवल तुम. आप खुद देखे इस कविता को.

सुशील कुमार 


सुनना केवल तुम


सुनना केवल तुम
वह आवाज़
जो बज रही है
इस तन-तंबूरे में
स्वाँस के नगाड़े पर
प्रतिपल दिनरात
वहाँ लय भी है,
और ताल भी,..तो
जरुर वहाँ नृत्य भी
होगा और दृश्य भी

ओह, कितना शोर है
सब-ओर
कितने कनफोड़ स्वर हैं
आवाज़ की इस दुनिया में
और कितनी बेआवाज़
हो रही है
अपनी ही आवाज़ यहाँ !

कहीं चीखें सुन रहा हूँ,
कहीं क्रंदन
मशीनों के बीच घूमता हुआ
खुद एक मशीन हो गया हूँ
भीड़ का तमाशाई बन रहा कहीं
तो कभी तमाशबीन हो गया हूँ !

कम करो कोई बाहर की
इन कर्कश-बेसूरी आवाज़ों को...
लौट आने दो मुझे अपने घर
सुनने दो आज
वह अनहद नाद
जन्म से ही मेरे भीतर
जो बज रहा है
मेरे सुने जाने की प्रतीक्षा में

उसकी लय और ताल पर
मुझे झूमने दो
मुझे थोड़ी देर यूँ ही
स्वांस-हिंडोला में
झूलने दो।


संपर्क :-
सुशील कुमार
हंस निवास / कालीमंडा
पुराना दुमका / दुमका / झारखंड 814101

ईमेल- sk.dumka@gmail.com

फोन न / मो. न. . 0657 2650744 / 09431310216  / 09006740311