युवा कवि और उनके रचना का विषय : सुशील कुमार भारद्वाज
यदि किसी से पूछें
कि हिंदी साहित्य का कौन–सा दौर चल रहा है तो अधिकांश लोग मुंह देखते नज़र आएंगें.
कुछ लोग सीधे यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगें कि यह साहित्य के लिए संकट का काल है जिसका
कोई नाम ही नहीं है. दरअसल इस समय पांच पीढ़ी एक साथ लेखन में हैं उसपर तुर्रा ये
कि अधिकांश युवा कवि हैं चाहे उनकी उम्र 18 वर्ष की हो या 50 पहुँचने के करीब. आखिर किस आधार पर सबों को युवा
कहा जाए?
बात यहीं कहाँ रूकती
है वरिष्ठ एवं स्थापित समालोचक इनकी रचनाओं को एक सिरे से ही नकार देते हैं. फिर भी
ये रचनाकार अथक परिश्रम के साथ लिखे जा रहे हैं. कहीं छप रहें हैं तो ठीक वर्ना
खुद ही छापना और छपवाना शुरू कर देते हैं. जिन्हें किसी पत्र-पत्रिका में जगह नहीं
मिली तो वे फेसबुक और व्हाट्सअप्प के जरिये अपने मित्रों और परिचितों के साथ शेयर
कर रहे हैं. कभी कभी अधिक से अधिक लोगों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए ये रचनाकार
अपनी कविता के साथ तस्वीर और टैग लगाना नहीं भूलते. धीरे धीरे ये ब्लॉग और बेब
पत्रिका में छपने की कोशिश करते या फिर खुद ही अपना ब्लॉग शुरू कर देते हैं. मुझे
हजारी प्रसाद द्विवेदी जी बात याद है जिन्होंने कभी कहा था–“साहित्य में जल्दबाजी
के लिए कोई स्थान नहीं है. और अपनी रचना को खुद से कभी नहीं छापना चाहिए वर्ना
बांकी सब तो याद रहेगा लेकिन लिखना जरूर भूल जाओगे.”
कविता के नाम पर
अस्पष्टता का माहौल खड़ा किया जा रहा है. कविता अपनी अर्थवत्ता खो रही है. आखिर ये
कवि क्यों बने? यदि ये खुद की संतुष्टि के लिए लिख रहे हैं तो डायरी क्यों नहीं
लिखते? और यदि लोगों के लिए लिख रहें हैं तो उनके पसंद–नापसंद की चिंता किए बगैर
आप बाजार में कैसे टिक सकते हैं?
सच तो ये है कि पद्य
सबसे पुरानी विधा है और इसकी अपनी एक कला है, लेकिन पद्य के गद्य रूप में आने की
वजह से लोग कविता को सबसे आसान विधा समझ रातों–रात महान कवि बनने की परिकल्पना
करने लगे हैं बगैर शब्दों की कलाकारी समझे. उन्हें न तो भाषा विज्ञान की अच्छी समझ
होती है न ही वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाओं को बारीकी से समझने का समय. सबों को
जल्दबाजी है अपनी बातों को कह देने की बिना संवेदना और संप्रेषणीयता का विचार किए.
जल्दबाजी का आलम ये है कि जिस उम्र में स्थापित रचनाकार अपनी कविता किसी को सुनाने
से हिचकते थे उस उम्र में कवियों के चार संग्रह खुद के पैसे से छप चुके होते हैं.
लेकिन आलोचकों की परवाह
नहीं करते हैं आज के युवा, क्योंकि समय बदल चुका है, जीवन की सहुलियतें बदल चुकी
हैं, वे अपने आप को अपने दम पर सिद्ध करने में लगे हैं. वे अपने विषयों के चयन में
भी विविधता रखने की कोशिश करते हैं- गाँव की गरीबी, दलित,
साम्प्रदायिकता, समाज, इतिहास, लोक, भूमंडलीकरण, बाजार, साम्राज्यवाद, विषमता
आदि के साथ-साथ स्त्री, सौंदर्य, प्रेम प्रकृति, ईश्वर, विज्ञान जैसे सभी विषयों
को अपने दायरे में रखते हुए काव्यात्मक अभिव्यक्ति को सहज सरल एवं संप्रेषणीय भाषा
में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं. ये बदलते परिवेश में समय के साथ संवाद करते
हुए आगे बढ़ने की कोशिश में हैं भले ही आलोचक क्यों न ये कहते फिरें कि कुछ भी नही
लिखा जा रहा है और जो लिखा जा रहा है वह स्थापित मानकों पर खड़ा नहीं उतर रहा है.
जबकि पंकज
चतुर्वेदी, शायक आलोक, अग्निशेखर, सुरेश सेन निशांत, केशव तिवारी, महेश पुनेठा, भरत प्रसाद, वीरू सोनकर, बोधिसत्व, हेमन्त कुकरेती, प्रताप राव कदम, बद्रीनारायण, राजकिशोर राजन, शाहंशाह आलम, संतोष
चतुर्वेदी, ऋषिकेश
राय,
बाबुषा कोहली, कमलजीत
चौधरी, राज्यवर्द्धन, अरुण शीतांश और हरे प्रकाश उपाध्याय आदि जैसे कवि आलोचकों को
कड़ी चुनौती दे रहे हैं.
इन
पंक्तियों में शायक आलोक की रचनात्मकता को स्वयं देखें-
“एक दिन
कीड़े खा जाएंगे
तुम्हारी रखी जमा की गई किताबों को
फिर कीड़े आहार बनाएंगे तुम्हारी लिखी जा रही कविताओं को
फिर वे तुम्हारे जेहन पर हमला करेंगे
चबा लेंगे अजन्मी कविताओं के एक एक शब्द
वे खा लेंगे नींब से चाटते तुम्हारी पूरी कलम
और अंत में वे तुम्हारी उँगलियों को घर बना लेंगे.”
फिर कीड़े आहार बनाएंगे तुम्हारी लिखी जा रही कविताओं को
फिर वे तुम्हारे जेहन पर हमला करेंगे
चबा लेंगे अजन्मी कविताओं के एक एक शब्द
वे खा लेंगे नींब से चाटते तुम्हारी पूरी कलम
और अंत में वे तुम्हारी उँगलियों को घर बना लेंगे.”
इसी तरह बाबुषा कोहली की
कविता शिल्प और संवेदना के स्तर पर विचारणीय है-
“उन
मछलियों को अपने काँटों में मत फाँसो
उनकी छाती में पहले ही काँटा गड़ा है
कौन कहता है मछलियों की आवाज़ नहीं होती?
मछलियों की पलकों में उलझी हैं सिसकियाँ
टुकुर - टुकुर बोलती जाती हैं निरंतर
उनके स्वर से बुना हुआ है समुद्र का सन्नाटा”
बद्री नारायण उन कवियों में से हैं जो लोक से ताकत लेते हैं. वे कथनों को मुहावरी जामा पहनाने में समर्थ हैं.
उनकी छाती में पहले ही काँटा गड़ा है
कौन कहता है मछलियों की आवाज़ नहीं होती?
मछलियों की पलकों में उलझी हैं सिसकियाँ
टुकुर - टुकुर बोलती जाती हैं निरंतर
उनके स्वर से बुना हुआ है समुद्र का सन्नाटा”
बद्री नारायण उन कवियों में से हैं जो लोक से ताकत लेते हैं. वे कथनों को मुहावरी जामा पहनाने में समर्थ हैं.
“चिड़िया और हिरणी के बारे में सोचना
अन्ततः शिकारी के बारे में सोचना है”
अन्ततः शिकारी के बारे में सोचना है”
इस समय की कविता नारेबाजी, बड़बोलेपन, शोर और उत्तेजना के अतिरेक, आदि से कोसों दूर है. दायरों की बंदिश उन्हें पसन्द नहीं, मामला चाहे
कथ्य का हो या अभिव्यक्ति का. आज के कवि एकांगी नहीं हैं बल्कि वे सही अर्थों में
प्रगतिशील हैं. उनके पास अपनी तरह के अभिव्यक्ति के औजार हैं. लोकजीवन, लोकभाषा, लोककथा,मिथक आदि अछूत नहीं हैं. वह प्रहार
करते हैं लेकिन सार्थक एवं सकारात्मक. इनका विश्वास विध्वंस की बजाय सृजन में है. वे
प्रकृति में महत्वहीन समझे जाने वाली
बातों को भी कविता में यथोचित स्थान देते हैं. फ़्रांस की घटना हो या सीरिया की सब पर
उनकी नज़र है. पंकज चतुर्वेदी स्पष्ट कहते हैं-
“हम अणु युग की ताकत का दुख नहीं चाहते
धरती पर विस्फोट नहीं चाहते
हम थोड़ी सी धरती और थोड़ा सा आकाश चाहते हैं
धरती पर विस्फोट नहीं चाहते
हम थोड़ी सी धरती और थोड़ा सा आकाश चाहते हैं
हम धरती का प्यार चाहते हैं
हम तितली और फूलों का प्यार चाहते हैं”
माँ, पिता, बहन, भाई, बेटियाँ, मित्र आदि पर कविताएं हैं तो भूख, शोषण और विस्थापन भी पीछे नही है. अग्निशेखर यूँ रखते हैं अपनी बातों को -
हम तितली और फूलों का प्यार चाहते हैं”
माँ, पिता, बहन, भाई, बेटियाँ, मित्र आदि पर कविताएं हैं तो भूख, शोषण और विस्थापन भी पीछे नही है. अग्निशेखर यूँ रखते हैं अपनी बातों को -
“छींकती है जब भी मेरी माँ
यहाँ विस्थापन में
उसे याद कर रही होती है गाय
इतने बरसों बाद भी
नहीं थमी है खून की नदी
उस पार खड़ी है गाय”
इस पार है मेरी माँ”
पारिवारिक दर्द को सुरेश सेन की पंक्तियों में देखा जा सकता है-
“पिता के जाने के बाद
हम बेटों ने आपस में
सब कुछ बांट लिया
जमीन, घर, पासबुक में पड़े सभी पैसे
रह गई घर के कोने में पड़ी
टुकुर-टुकुर निहारती माँ और वह छड़ी”
वहीं विडम्बना पर पुनेठा की पंक्तियाँ गौरतलब
हैं-
“कैसा
अदभुत समय है
एक हत्यारा
दूसरे हत्यारें को
देता है सजा
हत्या के आरोप में”
कवि
लगातार समाज की बुराइयों और अत्याचारों पर निडर हो प्रहार कर रहें
हैं वे अपने अनुभव एवं विरोध को जनमानस तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.
यदि इन युवाओं की कविताओं
का मूल्यांकन, पारंपरिक मूल्यांकन पद्धति से परे नये नज़रिये के साथ बगैर
पूर्वाग्रह को मन में रखे किया जाए को कोई कारण नहीं बचता कि ये कविताएँ अपने समय
का प्रतिनिधित्व करते न नज़र आए. इन कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियों में गुजरता हुआ
समय दिखाई देता है. यहाँ सपनों की उड़ान ही नहीं,
बल्कि हकीकत के धरातल पर बेबाक और
बेलौस टिप्पणियां हैं जो नयी उम्मीदों को पल्लवित कर रहे हैं.
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