शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

जाति भजाने (लघुकथा) -सुशील कुमार भारद्वाज

जाति भजाने (लघुकथा) -सुशील कुमार भारद्वाज
सुशील कुमार भारद्वाज 
“मंत्रीजी! हम आपही के क्षेत्र से आए हैं. बहुत आस लगाकर आए हैं.” – वह गिरगिरता हुआ मंत्री जी के चरणों में गिर पड़ा– “कुछ रहम कीजिए, घर की सारी जमीन बेचकर आए हैं. इससे अधिक रूपया हमसे संभव नहीं है.”
“देखो भाई, अगर हम अधिक जनकल्याण की बात सोचने लगेंगें तो एक दिन हमें ही भीख मांगने पड़ जाएंगें. सिद्धांत से कोई समझौता नहीं. जो रकम कहा गया उससे एक भी पैसा कम रहा तो, समझो तुम्हारा काम नहीं हो पाएगा.” – मंत्रीजी टका-सा जबाब देकर कुर्सी से उठने लगे.
श्याम बुरी तरह से ऐंठ कर रह गया. समझ नही पा रहा था कि क्या करें? आखिरकार उसने अपने तरकश का अंतिम बाण छोड़ते हुए कहा– “हुजूर, कुछ नहीं तो जाति के ही नाम पर रहम कीजिए. हम आपही की जाति के हैं.”
मंत्री जी आँख फाड़ते हुए बोले – “क्या कहे? आप हमारे ही जाति के हैं?”
श्याम आशा की किरण मिलते ही बोला- “जी जी, हमलोग जातिभाई हैं. बातचीत में कभी बताने का मौका ही नहीं मिला.” – आत्मविश्वास के साथ वह तेज आवाज में बोलता चला गया – “मजाल था जो कोई एक भी वोट इधर से उधर हो जाता? पूरी मुस्तैदी थी हमारी. चुनाव में हमलोग अपनी जाति का मान–सम्मान और गौरव को बचाए रखने के लिए जी जान लगाए हुए थे.”
मंत्रीजी के चेहरे पर सहज ही मुस्कुराहट की रेखाएं खींचती चली गई. कुर्सी पर बैठते हुए वे श्याम को देखते रह गए और धीरे से बोले– “भाई चुनाव में जो आपने जाति के लिए किया उसका ऋण तो शायद कोई भी नहीं चुका पाएगा. और हर इंसान का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी जाति की भलाई के लिए जान कुर्बान कर दे. लेकिन आप ही कहिए चुनाव से आज तक का जो सारा खर्च चल रहा है वह कोई जाति वाला दे जाता है क्या?”

श्याम सिर्फ उनकी बातों को आँखें फैलाए सुनता रहा और मंत्रीजी बोलते रहे– “आप हमारी जाति के हैं तो, हम क्या करें? हमको आपके साथ कोई शादी–विवाह का सम्बन्ध करना है जो ई सब बात हमको बता रहे हैं?”- मंत्रीजी कुर्सी से उठ कमरे में जाते हुए बोले- “अगली बार पैसा हो जाए तो आइएगा जाति भजाने नहीं.”     

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