बिहार की राजधानी पटना हमेशा से साहित्य के केंद्र में बना रहा है। आयोजित-प्रायोजित अथवा नि:स्वार्थ भाव से कोई न कोई साहित्यिक गतिविधि छोटे अथवा बडे पैमाने पर होते रहे हैं। एक बार फिर जब पटना में "विश्व कविता सम्मेलन" का आयोजन होने जा रहा है तो बहसों का एक लम्बा दौर शुरू हो गया है जहाँ आप सबकुछ निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक होने की बात नहीं सोच सकते हैं तो वहाँ प्रस्तुत होने वाली कविता पर अभी क्या कहा जाय? खैर, इन मामलों से अलग युवा कवि प्रत्युष चंद्र मिश्र के संयोजन में "दूसरा शनिवार" नामक गोष्ठि का सफल आयोजन पिछले कुछ महीनों से नियमित रूप से किया जा रहा है जिसमें समकालीन प्रख्यात साहित्यकार भी ससमय अपना योगदान देते रहे हैं। जहाँ साहित्य पर निष्पक्ष होकर टिप्पणी भी की जाती है। पिछले दिनों आयोजित गोष्ठि की रपट युवा कवि नरेंद्र कुमार की नजर से।
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दिनांक 17.09.2016 संध्या 5 बजे गाँधी मैदान पटना। बादलों की उमड़–घुमड़ के बीच हमारा उत्साह चरम पर था। गाँधी मैदान हमेशा की तरह हमारे स्वागत को तत्पर। मुजफ्फरपुर से आए बिहार के जाने–माने कवि रमेश ऋतंभर हमारे बीच उपस्थित थे। गोष्ठी में प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, राजकिशोर राजन, शहंशाह आलम, बालमुकुन्द, अमरनाथ झा, ललन कुमार सिंह, शिवनारायण, अरविन्द कुमार झा, विकास राज, अक्स समस्तीपुरी, श्याम किशोर प्रसाद, रामनाथ शोधार्थी, कुंदन आनंद, गुंजन श्री, समीर परिमल, अंचित, अनीश अंकुर, सुनीता गुप्ता एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कुछ नए लोग थे। अतः आपस में परिचय प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्यूष चन्द्र मिश्र द्वारा कार्यक्रम की शुरुआत की गई।
हमारे कवि रमेश ऋतंभर ने विकास–कथा, दौड़, कर्जदार, कहाँ से लाऊं लोहे की आत्मा, पसंद का शास्त्र, अपने शहर पर, कस्बे, कहाँ–कहाँ से भागोगे रमेश, अपने हिस्से का सच, अवज्ञा, अधेड़ होती कुँवारी लड़कियाँ, एक उत्तर आधुनिक समाज की कथा, तुम्हारा राष्ट्रवाद एवं सबसे ऊपर है मनुष्य शीर्षक वाली कविताएं सुनाई। उन्होंने अपनी रचना–प्रक्रिया पर भी बातें की। अपनने परिवेश में घटती घटनाओं एवं मनुष्यों में उत्पन्न असंतोष एवं पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने कविता का मार्ग चुना। बाद में उनकी कविताओं पर चर्चा हुई। बालमुकुन्द ने कहा कविताएं भाव के स्तर पर सपाट एवं पुरानी लगी। विकास राज ने कविताओं को अच्छा बताया। श्याम किशोर प्रसाद ने कविताओं को ठीक बताया पर कुछ कविताएं उन्हें महज नारेबाजी के स्तर पर लगी। नरेन्द्र कुमार के अनुसार कविताएं कवि के परिवेश एवं अनुभव–क्षेत्र को व्यक्त करती हैं परन्तु पाठक को पुनर्पाठ के लिए आमंत्रित नहीं करती हैं। शहंशाह आलम ने बताया कि कविता सीधे पाठक तक पहुँचती है। राजकिशोर राजन ने कहा कि कवि ने अच्छी कविताएं सुनाई। अनगढ एवं सपाट होने के बावजूद कविताएं सहज प्रयोग एवं समकालीन शिल्प के कारण रूपवाद को धत्ता बताती हैं। रचनाएं नए इलाकों में जाने का माद्दा रखती हैं तथा पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। सुनीता गुप्ता की नजर में कविताएं जीवन के विविध क्षेत्रों को छूती हैं तथा कवि अपनी पूरी इमानदारी से कविता में हैं। अध्यक्षता कर रहे हमारे वरिष्ठ साहित्यकार शिवनारायण की नजर में कविताएं अच्छी लगी तथा एक लंबे अरसे से वे कवि को सुनते आ रहे हैं। कवि समाज के विविध क्षेत्रों, परिस्थितियों एवं घटनाओं को संजीदगी से दर्ज करते हैं। अंत में प्रसिद्ध नाटककार अनीश अंकुर ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आपसब से कवि रमेश ऋतंभर की एक कविता 'पसन्द का शास्त्र' साझा कर रहा हूँ। सभी मित्रों की राय का स्वागत है।
हज़ारों चेहरों के बीच कोई वही एक चेहरा क्यों चुनता है
जो दूसरों की नज़र में न तो ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है, न तो ज्यादा ख़ास।
हज़ारों रंग के बीच कोई वही एक रंग क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुर्ख़ होता है, न तो ज़्यादा प्यारा।
हज़ारों फूल के बीच कोई वही एक फूल क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा दिलकश होता है, न तो ज़्यादा ख़ुशबूदार।
हजारों शहर के बीच में कोई वही शहर क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुविधाजनक होता है, न तो ज्यादा संभावनाओं से भरा।
यह तो किसी पर दिल आ जाने की बात है
यहाँ हमारी दुनिया का कोई गणित नहीं चलता।
- रमेश ऋतंभर
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| नरेंद्र कुमार |
दिनांक 17.09.2016 संध्या 5 बजे गाँधी मैदान पटना। बादलों की उमड़–घुमड़ के बीच हमारा उत्साह चरम पर था। गाँधी मैदान हमेशा की तरह हमारे स्वागत को तत्पर। मुजफ्फरपुर से आए बिहार के जाने–माने कवि रमेश ऋतंभर हमारे बीच उपस्थित थे। गोष्ठी में प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, राजकिशोर राजन, शहंशाह आलम, बालमुकुन्द, अमरनाथ झा, ललन कुमार सिंह, शिवनारायण, अरविन्द कुमार झा, विकास राज, अक्स समस्तीपुरी, श्याम किशोर प्रसाद, रामनाथ शोधार्थी, कुंदन आनंद, गुंजन श्री, समीर परिमल, अंचित, अनीश अंकुर, सुनीता गुप्ता एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कुछ नए लोग थे। अतः आपस में परिचय प्राप्त करने के उपरान्त प्रत्यूष चन्द्र मिश्र द्वारा कार्यक्रम की शुरुआत की गई।
हमारे कवि रमेश ऋतंभर ने विकास–कथा, दौड़, कर्जदार, कहाँ से लाऊं लोहे की आत्मा, पसंद का शास्त्र, अपने शहर पर, कस्बे, कहाँ–कहाँ से भागोगे रमेश, अपने हिस्से का सच, अवज्ञा, अधेड़ होती कुँवारी लड़कियाँ, एक उत्तर आधुनिक समाज की कथा, तुम्हारा राष्ट्रवाद एवं सबसे ऊपर है मनुष्य शीर्षक वाली कविताएं सुनाई। उन्होंने अपनी रचना–प्रक्रिया पर भी बातें की। अपनने परिवेश में घटती घटनाओं एवं मनुष्यों में उत्पन्न असंतोष एवं पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने कविता का मार्ग चुना। बाद में उनकी कविताओं पर चर्चा हुई। बालमुकुन्द ने कहा कविताएं भाव के स्तर पर सपाट एवं पुरानी लगी। विकास राज ने कविताओं को अच्छा बताया। श्याम किशोर प्रसाद ने कविताओं को ठीक बताया पर कुछ कविताएं उन्हें महज नारेबाजी के स्तर पर लगी। नरेन्द्र कुमार के अनुसार कविताएं कवि के परिवेश एवं अनुभव–क्षेत्र को व्यक्त करती हैं परन्तु पाठक को पुनर्पाठ के लिए आमंत्रित नहीं करती हैं। शहंशाह आलम ने बताया कि कविता सीधे पाठक तक पहुँचती है। राजकिशोर राजन ने कहा कि कवि ने अच्छी कविताएं सुनाई। अनगढ एवं सपाट होने के बावजूद कविताएं सहज प्रयोग एवं समकालीन शिल्प के कारण रूपवाद को धत्ता बताती हैं। रचनाएं नए इलाकों में जाने का माद्दा रखती हैं तथा पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। सुनीता गुप्ता की नजर में कविताएं जीवन के विविध क्षेत्रों को छूती हैं तथा कवि अपनी पूरी इमानदारी से कविता में हैं। अध्यक्षता कर रहे हमारे वरिष्ठ साहित्यकार शिवनारायण की नजर में कविताएं अच्छी लगी तथा एक लंबे अरसे से वे कवि को सुनते आ रहे हैं। कवि समाज के विविध क्षेत्रों, परिस्थितियों एवं घटनाओं को संजीदगी से दर्ज करते हैं। अंत में प्रसिद्ध नाटककार अनीश अंकुर ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आपसब से कवि रमेश ऋतंभर की एक कविता 'पसन्द का शास्त्र' साझा कर रहा हूँ। सभी मित्रों की राय का स्वागत है।
हज़ारों चेहरों के बीच कोई वही एक चेहरा क्यों चुनता है
जो दूसरों की नज़र में न तो ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है, न तो ज्यादा ख़ास।
हज़ारों रंग के बीच कोई वही एक रंग क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुर्ख़ होता है, न तो ज़्यादा प्यारा।
हज़ारों फूल के बीच कोई वही एक फूल क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा दिलकश होता है, न तो ज़्यादा ख़ुशबूदार।
हजारों शहर के बीच में कोई वही शहर क्यों चुनता है
जो दूसरों के नज़र में न तो ज़्यादा सुविधाजनक होता है, न तो ज्यादा संभावनाओं से भरा।
यह तो किसी पर दिल आ जाने की बात है
यहाँ हमारी दुनिया का कोई गणित नहीं चलता।
- रमेश ऋतंभर




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