ज्यों ज्यों हमारी जिंदगी विकास की सीढियों की ओर अग्रसर होती जा रही है त्यों त्यों समाज दो भागों में बंटता जा रहा है जबकि बातें हक -हुकूक और समानता की होती हैं। यह छलावा कब तक जारी रहेगा यह तो कह पाना मुश्किल है लेकिन पसीने की गंध का अंतर अवश्य ही नजर आने लगा है चाहे हम इस पार हों या उस पार। विरासत तो हमें जीर्ण ही मिलेगी। ऐसी ही कुछ बातों को रेखांकित करती हैं युवा कवि नरेंद्र कुमार की ये कविताएं। तो आईए गौर करते हैं नरेंद्र कुमार की तीन कविताओं पर।
उस पार
भाई..!
हम सड़क के इस ओर हैं
उस पार बाजार है
इस ओर हमारे खेत,
हमारे फावड़े हैं
और हम लाचार हैं
उस पार उनकी गाड़ियां,
उनकी मंडियां हैं
और वे होशियार हैं
इधर सिसकते नहर,
हमारा सूखा है
उधर छलकते तरण-ताल,
उनकी बरसात है
जरा सोचो..!
मंडियां इस पार भला आएंगी ?
नहरें भला खुद ही मुस्कुराएंगी ?
सूखा अब फंदा बन बढता आये
बचे-खुचे सपनों का दम घुटता जाए
इससे पहले कि अपनी बारी आ जाए
चलो अभी,
उस पार को कूच कर जाएं
भूख
उनकी भूख बढ गई है
पंजे और भी तेज हुए हैं
दाँते और नुकीली
आँखों की चमक
गहरी हो गई हैं
हल्के पदचाप
कान खङे
लार टपकाते
हवाओं में
शिकार की
गंध के पीछे
बढते आ रहे हैं वे
विरासत
जानता हूँ
तुम्हारे यहाँ
महफिलें नहीं सज रहीं
बचे हैं बस
टेंट के टूटे खंभे
फटे टाट और
कुछ कनस्तर
पता है
तुम कभी भी
घोषित कर सकते हो
इसे राष्ट्रीय विरासत
पट्टिकाओं पर
तुम होगे
तुम्हारे पुरखे भी
ठहाकों की चर्चा
सब चाव से सुनेंगे
पसीने की गंध
कहीं नहीं होगी
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उस पार
भाई..!
हम सड़क के इस ओर हैं
उस पार बाजार है
इस ओर हमारे खेत,
हमारे फावड़े हैं
और हम लाचार हैं
उस पार उनकी गाड़ियां,
उनकी मंडियां हैं
और वे होशियार हैं
इधर सिसकते नहर,
हमारा सूखा है
उधर छलकते तरण-ताल,
उनकी बरसात है
जरा सोचो..!
मंडियां इस पार भला आएंगी ?
नहरें भला खुद ही मुस्कुराएंगी ?
सूखा अब फंदा बन बढता आये
बचे-खुचे सपनों का दम घुटता जाए
इससे पहले कि अपनी बारी आ जाए
चलो अभी,
उस पार को कूच कर जाएं
भूख
उनकी भूख बढ गई है
पंजे और भी तेज हुए हैं
दाँते और नुकीली
आँखों की चमक
गहरी हो गई हैं
हल्के पदचाप
कान खङे
लार टपकाते
हवाओं में
शिकार की
गंध के पीछे
बढते आ रहे हैं वे
विरासत
जानता हूँ
तुम्हारे यहाँ
महफिलें नहीं सज रहीं
बचे हैं बस
टेंट के टूटे खंभे
फटे टाट और
कुछ कनस्तर
पता है
तुम कभी भी
घोषित कर सकते हो
इसे राष्ट्रीय विरासत
पट्टिकाओं पर
तुम होगे
तुम्हारे पुरखे भी
ठहाकों की चर्चा
सब चाव से सुनेंगे
पसीने की गंध
कहीं नहीं होगी
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