कवि राजकिशोर राजन
की कविताओं में एक अलग आकर्षण है. वे कविताओं में यथार्थ की विद्रूपता को व्यंग्य
के रूप में रखने से भी नहीं चुकते हैं. चाहे प्रसंग कुछ भी क्यों न हो उसकी
प्रासंगिकता जरूर बनी रहती. प्रस्तुत कविताएं कवि, उसके काव्य संसार और उसके
व्यक्तिगत जिंदगी की जद्दोजहद पर केंद्रित हैं. पढ़ते हैं राजकिशोर राजन की कविताओं
को :-
ख्वाब में मकबूल
मकबूल दर्जी बन सकते थे
पर लाल खाँ को अंगूठा दिखा कर ऐसे भागे
कि कभी लौटे ही नहीं
मकबूल परात में घर भर के लिए आटा गूंथते थे
खाने-पीने के बेहद शौकीन
वे एक हलवाई भी बन सकते थे
पर किसी मामूली दुकान को
वीथिका में बदलने का हुनर उन्हें पता था
फिर कैसे बनते हलवाई ᵎ
मकबूल को याद नहीं था माँ का चेहरा
पर वे नाप लेना चाहते थे दुनिया का भूगोल
उनकी तसवीरों में लेता था इतिहास रुक कर साँस
फिर कैसे होता उन्हें पृथ्वी से विराग
पोस्टर बनाते चलचित्र के मायानगरी में
वे चाय में शक्कर की तरह घुल सकते थे उसकी माया
में
पर आकाश का तसवीर बनाते
उन्हें मालुम था अपनी आँखों में उसे थामने का
हुनर
फिर कितने दिन बनाते रहते पोस्टर
गरमी के दिनों में जब कोलतार की सड़कें पिघल रही
होतीं
अपने नंगे पैरों को आराम देने के लिए
वे विलम भी सकते थे किसी एकांत में
पर हुसैन को घोड़ा पसंद था
मांडू, उज्जैन पसंद था
ढूँढे नहीं मिलता, उनकी कल्पना का छोर
जैसे तितली देख लेती है एक रंग में सैकड़ों शेड्स
वे अंधेरे में ढूँढ रहे थे अँधेरे को
प्रकाश में प्रकाश को
अपने अस्तित्व के पार
वे कैनवास के सामने सोचते जब आँख
बन जाया करती थी आँख
सोचते कर्णफूल और वह टँग जाता कानों में
जब वे सोचते पैरों पर खिले महावर के बारे में
सलज्ज मुसकान से वह उन्हें आमंत्रित करता स्वयं
ही
कई-कई जेबों वाली कमीज पहने
किसी गली या नुक्कड़ पर
वे आज भी मिल सकते हैं नंगे पैर
क्योंकि उनको जानने वाले कहते थे
चकरी थी उनके पैरों में
और जिसके पैरों में होती है चकरी
वह नहीं रह सकता टिक कर कहीं भी ज्यादा दिन
वैसे भी, सिर्फ उनके ख्वाब में ही नहीं थी तसवीर
हर तसवीर के ख्वाब में हैं मकबूल ।
काव्य-संसार
आपने उनकी बात सुनी
तो सुनते रह जाएंगे
आपने अपनी बात कही तो
वे बुरा मान जाएंगे
यहाँ जो जहां है
ठहरना तो दूर
किसी और को देखना भी
मुनासिब नहीं मानता
ऐसे मोहमुक्त, निर्दयी
संसार में
मैंने एक प्रेम कविता लिखी
और हाथ में लिए
घूम रहा हूँ, बरसों
से
गाँव-गाँव, शहर-शहर
दिल्ली और पटना
इसे कोई पढ़नेवाला नहीं
कोई सुनने वाला नहीं
हद तो यह कि, कविता
की नायिका
वह प्रेमिका भी मेरी नहीं रही
जिस दिन सुनाई थी उसे अपनी कविता
मुझ पर लानतें भेजती, पैर
पटकते चली गई
यह कहते हुए कि, उसके
प्रेम को मैंने
बना दिया किताबी, कर
दिया जगजाहिर
मेरे जैसा आदमी क्या खाक करेगा प्रेम
काव्य-संसार के आचार्यगण, चिंतकों
लेखक-कवि, संपादक-गण
कम से कम आप
मेरी कविता तो सुनें ।
एक कवि को सुनते हुए
चीखने से लेकर स्वगत-कथन तक
सुनना चाहता था कवि को
देखना चाहता था शब्दों की धार
कर लेना चाहता था इकट्ठा
उन कविताओं के मर्म
जो थीं हमारे वक्त की सबूत
उसकी बोली, हँसी-मुस्कुराहट, सोच-विचार
किसी नये इलाके में पहुँचाते थे
हमेशा
उसका मानना कि गुलाब के फूल
और कवि मन के बीच
पारस्परिक अटूट होता संबंध
कि उखड़ जाए एक पंखुड़ी भी
तो बिखर जाए फूल
इसलिए जीना ही चाहिए
कवि को, कवि
का जीवन
कि कलि वृंत पर चटखती रहे
जैसे हुलसता है गुलाब कँटीली डाल पर
कवि मर्त्य में अमर्त्य का फूल बन
महकता है
हमेशा से रहे दुःसमय के विरूद्ध
अंततः कवि के जीवन से ही
कविता को मिलती जीवन
इस कवि को सुनते जाना
कैसे सुना जा सकता समय को
सिर्फ कान से नहीं
लाखों-लाख रोम कूप से ।
प्रतिकार
बुरे दिनों में लिखी कविताओं को
अपनी डायरी में देखा
अच्छे दिनों में
तो लगा इस डायरी को
कहीं रख देनी चाहिए
अलमारी या किसी बक्से में तहाकर
नहीं तो देखूँगा इसे जब-जब
सुख की चाय में
घुल जायेगा दुःख का नमक
बहुरे हैं दिन बरसों बाद
जब तरक्कीपसंद दुनिया के साथ
चल रहा हूँ साथ-साथ
पहले मुझे दिखता था पेड़
उसके हरे-पीले पत्ते
अब मैं ढूढ़ता
उनमें सैकड़ो शेड्स
अब लिखूँगा भी तो
हकासल-पियासल कविताएं नहीं लिखूँगा
कला की हर बारीकी
उसके रूप-रंग-आकार
और अक्षर-अक्षर का रखूँगा ख्याल
सपाटबयानी की हद तक लिखी
जवानी के दिनों की जवान कविताओं को
अब देखते हुए भी लाज लगती है
मगर वे कविताएं
प्रतिकार में, पहले
से तैयार थीं
डायरी को कहाँ-कहाँ तो न छुपाया
पर उसमें लिखी हर कविता
मुझे शब्दशः याद थी ।
एक संतुलित आदमी के नाम
वे न तो कभी क्रोधित होंगे
न भरेंगे कभी अँकवारी में
न देंगे कभी सीधा-सपाट उत्तर
न स्वीकारेंगे मन-प्राण से
वे जब भी मिलेंगे
चकित कर देंगे, रंग-ढंग
से
आपको लगेगा
इस आदमी का साथ है
पिछले जन्मों से
उनका संतुलन
आपको अन्वेषक बना देगा
आपकी उम्र कट जायेगी
यह जानने में
कि वे दोस्त हैं या दुश्मन ।
विषाद
उसने तारीफ की
कलाईयां में जँचती कत्थई चूड़ियों
पाँवों में खिले महावर
दमकती लाल बिंदी
चंपई रंग की साड़ी
और जामुनी नेल पॉलिस की
उसने तारीफ की
नये फैशन के चप्पलों से लेकर
उँगलियों में पहनी सलीकेदार
अँगुठियों तक की
कानों में झूलते झुमकों पर तो
वह मुग्ध ही हो गया
मगर यह नहीं कहा
कि तुम सुन्दर लगती हो ।

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