रविवार, 30 जुलाई 2017

नामवरसिंह को याद करते पी के पाठक

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का जन्मदिन था। नामवर सिंह आज एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गये हैं कि दोस्त और दुश्मन दोनों ही उनकों याद करते हैं। जिन्हें उनका आशीर्वाद मिला वे तो स्वयं को धन्य मानते हैं लेकिन जिन्हें नहीं मिला वे उनके मरने तक की बात करते हैं। जबकि नामवर सिंह कोई कुर्सी नहीं एक आदमी का नाम है। लोग अपनी क्षमता बढ़ा उनके कद का हो सकता है। संभव है उनसे बेहतर भी हो जाएं। लेकिन दुर्भाग्य है कि लोग ईर्ष्यावश उन्हें गाली देने में ही अपना समय और शक्ति लगाते हैं। खैर आइए पढ़ते हैं पुष्पेंद्र कुमार पाठक का संस्मरण।


श्री मान नामवर महाशय को कई बार सुनने को मिला। बीएचयू मे यदा-कदा सेमिनार का आयोजन और नामवर जी स्टार वक्ता के तौर पर जाने जाते थे। बीएचयू परंपरागत रूप से भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का प्रवाह स्थल रहा है। ऐसे प्रवाहमान सांस्कृतिक लहर मे तथाकथित प्रगतिशीलता के कंकड़-पत्थर फेंकने की वामपंथी बुद्धि तो कूट कूट कर भरी थी हमारे पूज्य गुरूवर में। उपर से काशी विश्वनाथ की नगरी। अगर वहां जाकर अगर मुहम्मद गोरी, गजनवी, बाबर,औरंगजेब और वो सभी आक्रांता जिन्होंने भारत की अस्मिता को तार तार किया, उनकी तारीफ की जाए, उनमे अच्छाइयों का दर्शन निर्लज्जता पूर्वक किया जाए तो मशहूर होने के चांसेज ज्यादा हैं। गुरूजी को पता नही कहां से मुगलो की खनकती तलवार मे हिन्दुओ की आर्तनाद की जगह लोकधुन सुनाई देता था। सारांश यह कि गुरु नामवर जी को बोलने के लिए कोई भी टाॅपिक दिया जाता उसमे अमेरिका, आरएसएस, ब्राह्मणवाद विलेन बनकर उभर आते। हां भारत की बहुलतावादी संस्कृति उनकी प्राथमिक चिंता थी जिसकी रक्षा बिना मुगलिया संस्कृति को पिरोए संभव ही नही थी। आरएसएस के हिन्दुत्व मे गुरूजी को हिन्दुस्तान की एकता खंड खंड मालूम पड़ती थी जिसे बचाने के लिए आइने अकबरी या बाबरनामा को आत्मसात करना परम आवश्यक था।हा, गुरू जी मुस्लिम आक्रांता मे नायकत्व की छवि ढूंढने को उतावले रहते। कभी-कभार तो ढूंढने मे असफल होने पर नई छवि ही गढ़ डालते। इस इरादे के साथ की पढ़ने वाला भारतीय संस्कृति पर इस तरह हमला होता देख धैर्य खोकर अनाप-शनाप बोले और फिर मिडिया मे इसे उग्र हिन्दुत्व के रूप मे पेश करें। फिर खुद को साहित्य मे बोल्ड एक्सपेरिमेंटल के तौर पर स्थापित करने मे आसानी भी होगी। गुरूजी जी वेद, पुराण, उपनिषद्, मानस आदि ग्रंथो का गहन अध्ययन किया है लेकिन उनकी व्याकुलता उस समय देखते ही बनती जब वो इन सभी ग्रंथो मे मुहम्मद साहब का कोई जिक्र न पाते। लगता ये सभी ग्रंथ ही अपूर्ण है और इसके साथ साथ सारा संसार भी। भारतीय वैचारिक धरातल का टेक्टोनिक शिफ्ट हो जाता अगर कही से भी हनुमान जी या कृष्ण जी हिन्दुत्व की किताब से न होकर किसी अरबी संस्कृति का कोई नाम होता फिर तो सेक्युलरिज्म और गंगा जमुनी तहजीब  (पता नही इस का उच्चारण गुरु जी बारंबार क्यो  करते थे।) का कुछ अलग ही रंग होता। इसका दर्द उनके चेहरे और वाणी से महसूस किया जा सकता था।लेकिन सेक्युलर तब्के को जीवनज्योति की आभा यही मंद पड़ जाती है। उन्हे हिन्दी आलोचना मे वाचन परम्परा का आग्रही नेता माना जाता है। गुरूजी पर श्री काशी विश्वनाथ की कृपा बनी रहे। वे स्वस्थ एवं दीर्घायु हो। यही हम सब की कामना है।

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर

नागार्जुन मुक्तिबोध से बड़े कवि :खगेन्द्र ठाकुर  

 सुशील कुमार भारद्वाज  

प्रगतिशील लेखक संघ,बिहार के तत्वावधान में आयोजित मुक्तिबोध जन्मशताब्दी समारोह में जब अधिकांश वक्ता मुक्तिबोध के विभिन्न विचारों एवं रचनाओं को उद्धृत करते हुए समकालीन परिदृश्य में दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार पर निशाना साधते हुए भारत में फासिस्टों के आ जाने और उसके प्रभावों के तांडव को रेखांकित कर रहे थे. बाजारवाद और अस्मिता की चर्चा कर रहे थे. तब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए उठे पटना के वयोवृद्ध आलोचक व प्रलेस के पूर्व महासचिव खगेन्द्र ठाकुर एक अलग रूप में दिखे. ससमय अध्यक्षीय वक्ता के रूप आमंत्रित होने की सूचना नहीं मिलने की नाराजगी उन्होंने मंच पर ही जाहिर कर दी. और उसके बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं भी मुक्तिबोध की तरह नेहरू के विचारों से पहले सहमत नहीं था. लेकिन जिस तरह अक्सर नेहरू की खबर रखते हुए अंत समय में मुक्तिबोध कहने लगे थे कि “नेहरू के बाद फासिस्ट आ जाएगा. इसलिए नेहरू का होना जरूरी है”. वैसे ही आज मैं भी मानता हूं कि नेहरू अच्छे थे उनके जाने के बाद फासिस्ट का खतरा है. और यह भी सच है कि आज वे सत्ता में आ गए हैं लेकिन अभी तक फासिज्म आया नहीं है. और इसके लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेवार है. जब-जब वामपंथ कमजोर होता है जनतंत्र कमजोर होता है. आगे उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को समझना कठिन है. रामविलास शर्मा जो उन्हें वाम और दक्षिण अवसरवाद का जंक्शन मानते थे और नामवर सिंह जो उन्हें 'अस्मिता की खोज'वाला कवि कहते हैं. इन दोनों ने ही इनका मूल्यांकन गलत किया है. ‘जिस तरह उनकी कविता ‘अंधेरे में’ को पिछले कुछ वर्षों से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जा रहा है. जितना उनके व्यक्तित्व का बखान किया जा रहा है. उतना वे हैं नहीं. सबसे बड़े कवि के रूप में नागार्जुन हैं. और मुक्तिबोध से कई मायने में बेहतर और जनवादी कवि हैं. मुक्तिबोध की कविता का 'अंधेरा'पूंजीवाद का अंधेरा है जो दिखाई नहीं देता इस कारण वो खतरनाक है. लोगों को सामंती फासीवाद दिखता है जबकि पूँजीवादी फासीवाद सबसे खतरनाक है.”  आगे उन्होंने कहा कि “मुक्तिबोध ने किताबों पर जो आलोचना प्रस्तुत की है वह उन्हें कुछ हद तक अलग बनाता है.”


खगेन्द्र ठाकुर की बातों का जबाब दूसरे सत्र में आलोक धन्वा ने देने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कोई भी कवि छोटा या बड़ा नहीं होता है. जिसने एक भी कविता की वह कवि है. कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिससे किसी को छोटा और किसी को बड़ा कहा जा सके. मुक्तिबोध ने भी नागार्जुन की तरह जीवन में कई कष्ट देखे. बहुत संघर्ष किए. कोई भी महान कवि यूं ही नहीं बन जाता है. वह अपने परिवेश और पहले से मिले चीजों से भी बहुत कुछ सीखता है. मैंने तो मुक्तिबोध और नागार्जुन  दोनों से ही सीखा है. जिस जमीन को निराला ने तैयार किया उसी को मुक्तिबोध ने आगे बढ़ाया. यदि निराला नहीं होते तो मुक्तिबोध भी नहीं होते.’


दूसरे सत्र 'मुक्तिबोध: संघर्ष और रचनाशीलताको संबोधित करते प्रख्यात कवि आलोकधन्वा  ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा "एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा 'मुक्तिबोध'. मुक्तिबोध एक लाइट हाउस की तरह से थे." आलोकधन्वा ने आगे कहा "मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे. यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता. जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता. मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया जो उन्हें विजातीय बनाता है. जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता. मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे." 



मुक्तिबोध की कहानी क्लाइड इथरलीपक्षी और दीमकका जिक्र करते हुए चर्चित कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा "मुक्तिबोध कहते हैं कि इस देश के हर नगर में एक अमेरिका है. ये कहानियां बाजारवाद पर चोट करती है. मुक्तिबोध साम्राज्यवादपूंजीवाद के खतरों को बखूबी समझते थे."
संस्कृकर्मी अनीश अंकुर ने कहा " मुक्तिबोध ने घर-परिवार की बदहाली के राजनीतिक श्रोत को तलाशने की बात की. उन्होंने हमेशा राज्य को अपने निशाने पर रखा. भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के 'रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध होने की परिघटना की गहरी समझ से उन्होंने साठ के दशक में ही उस खतरनाक संभावना को पहचान  लिया था जो  समकालीन परिदृश्य में भयावह  ढंग से साकार हो गई प्रतीत होती है. इससे कैसे लड़ा जाएइसके लिए एक लेखक को अपने व्यक्तिवादी सीमाओं का अतिक्रमण कर सर्वहारा के संघर्ष में शामिल होनेउस स्तर की वैचारिक तैयारी के युगीन कार्यभार को उठाना चाहिए."

  पटना विश्विद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर व आलोचक  तरुण कुमार ने कहा " मुक्तिबोध की पंक्ति 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'. सरकार पोषित प्रतिक्रियावादियीं के अड्डे बगैर इनके ढाहे काम नहीं चलेगा. कुछ गढ़मठ वो भी है जिनके बीच हम काम कर रहे हैं. हमारे बीच अवसरवादी और संस्कारी रुझानों के भी गढ़ को तोड़ना है. मुक्तिबोध को सिर्फ मार्क्सवादी आलोचना के औजारों से नही समझा जा सकता. " तरुण कुमार ने  प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे और मुक्तिबोध के बीच के पत्र सन्दर्भ का उदाहरण देते हुए कहा " प्रगतिशील लेखन के बीच नए संदर्भो में बदलाव आना चाहिए.  लेखकों पर  प्रहार ज्यादा  हुआ जबकि उनकी विचारधारा पर  आक्रमण होना चाहिए था. "  
 प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन ने'मुक्तिबोध जन्मशताब्दी  समारोह  के प्रथम सत्र मेंसमकालीन परिदृश्य और मुक्तिबोध'  को संबोधित करते हुए कहा कि “मुक्तिबोध ने मध्यमवर्गीय लोगों से ये आग्रह किया कि अपनी सीमाओं से आगे जाकर जनता के संघर्ष में व्यापक रूप से  शामिल हों. मुक्तिबोध वैसे लेखक नहीं थे जो सृजनात्मक कार्यों में ही सिर्फ लगे रहे. वे संगठनात्मक कामों में भी भाग लिया करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ की उज्जैन यूनिट की इन्होंने स्थापना की. 1944 में इंदौर में फासीवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया जिसका राहुल सांकृत्यायन ने उद्घाटन किया था.” बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष ब्रज कुमार पांडे ने  समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए विषय प्रवेश किया " समकालीन वक्त में पूरे देश में फासीवादी खतरा है. जिसका नृशंस स्वरूप  हिटलर की आतताई  सत्ता में दिखती है. उस सत्ता का मुकाबला समाजवादी सोवियत संघ ने स्तालिन के नेतृत्व में किया  और उसे पराजित किया. आज भारत को उस महान लड़ाई से सबक सीखना  चाहिए. मुक्तिबोध हमें उसमें हमारी सहायता करते हैं. " जन संस्कृति मंच के सुधीर सुमन ने कहा " अभावों के बीच बहुसंख्यक  जनता का जो संघर्ष है उसमें अपने सवालों को शामिल करने की बात मुक्तिबोध किया करते थे. धारा के प्रतिकूल किस तरह जिया सकता हैएक सार्थकताएक जिद के उदाहरण हैं मुक्तिबोध. संवादों के जरिये निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रवृत्ति हमें मुक्तिबोध सिखाते हैं.” चर्चित कवि व मनोचिकित्सक विनय कुमार  ने परिवारभाषासमाज  से उनके अलगाव का जिक्र करते हुए कहा " मुक्तिबोध का बाह्य और अंतर जगत से संघर्ष बेहद बीहड़ था. मुक्तिबोध जैसी अदम्य जिज्ञासा दूसरी जगह नही मिलता. उनका युगबोध इतना व्यापक थाऐसी स्थितियां बनाई जिससे हमशा उनके जीवन मे तनाव रहता है. सरकारी नौकरी से इनकार,  कविता लिखना व प्रेम इन सब उनके फैसलों को भी  देखना होगा मुक्तिबोध को समझने के लिए. अपने ही अचेतन में इंडिस्कोप डालकर उसे निहारते का काम करने का काम मुक्तिबोध करते थे." 
कवि रमेश ऋतंभर ने अपना कहा "मुक्तिबोध जागने और रोने वाले कवि हैं. समय के,यथार्थ से जलने वाले कवि थे. आत्म भर्त्सना के कवि थे. रूढ़िवादी वादी स्मृतियों से वे लगातार लड़ता है. बेटे को  नौकरी भी लग जाये,पुरस्कार भी मिल जाये और बड़ी कविता भी लिख लें ऐसा नही हो सकता. चुनौती देने वाला कवि है मुक्तिबोध. कविता लिखने के लिए जलना पड़ता हैगलाना पड़ता है." 
प्रलेस के राज्य महासचिव रवींद्र नाथ राय  के अनुसार "एक तरफ सुविधाएं हैं दूसरी तरफ  संघर्ष है.  मध्यमवर्गीय बुद्धजीवी का संघर्षकैसे मार्शल ला लग जाता है. मुक्तिबोध  के अंतःकरण का आयतन  बेहद विस्तृत है. प्रगतिवादी कविता को समाप्त करने की साजिश को वे बखूबी पहचान गए थे. वे यांत्रिक नहीं थे.”  दूसरे सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर ने कहा "रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे महत्वपूर्ण आलोचक मुक्तिबोध को मैं मानता हूं. सबसे अधिक उन्होंने लेखक के आत्मसंघर्ष की बात उठाई."

प्रथम सत्र को डॉ श्री राम तिवारीडॉ सुनीता कुमारी  गुप्तासंजीवसीताराम प्रभंजन आदि ने संबोधित किया. संचालन प्रलेस के  प्रदेश महासचिव रवींद्र नाथ राय ने किया. जबकि दूसरे सत्र को परमाणु कुमार,शशांक शेखर ,  रवींद्र नाथ राय ने भी संबोधित किया. संचालन  कवयित्री  पूनम सिंह ने किया.

सोमवार, 24 जुलाई 2017

आयाम : साहित्यिक आयोजन है या गुटबाजी का एक मंच

आयाम : साहित्यिक आयोजन है या गुटबाजी का एक मंच
-सुशील कुमार भारद्वाज


बिहार की साहित्यिक संस्था “आयाम” की दूसरी वर्षगांठ को जेडी विमेंस कॉलेज, पटना के भव्य सभागार में तिलक एवं अक्षत के साथ बड़ी ही सफलता पूर्वक मनाया गया. जहां रोहिणी अग्रवाल और अलका सरावगी के साथ–साथ नीलाक्षी सिंह, संध्या सिंह एवं अन्य ने माहौल को साहित्यमय बनाये रखा वहीं खगेन्द्र ठाकुर, हृषिकेश सुलभ, शिवनारायण, अवधेश प्रीत, कर्मेंदु शिशिर, शिवदयाल, आशा प्रभात समेत शहर के अन्य प्रतिष्ठित साहित्यकार इसके गवाह बने. 


समारोह की शुरुआत सविता सिंह ‘नेपाली’ के मंगलाचरण से हुई तो पद्मश्री उषाकिरण खान ने विषय प्रवेश करवाया. और मुख्यवक्ता के रूप में आमंत्रित चर्चित कथालोचक डॉ रोहिणी अग्रवाल ने समकालीन महिला लेखन की चुनौतियां और सम्भावनाएं (विशेष सन्दर्भ, बिहार) विषय पर अपना जोरदार एवं प्रभावी भाषण दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्रियों के मार्ग की बाधा पुरूष नहीं बल्कि सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं व परम्पराएं हैं. परम्पराओं ने स्त्री को याचक के रूप में प्रस्तुत कर गुलामी की जंजीरों में जकड़ दिया है जबकि स्त्री से बड़ा कोई दाता हो ही नहीं सकता है. हमें दाता के रूप में उभरने की जरूरत है. स्त्री को देह मानने की सोच से ऊपर उठने की जरूरत है. स्त्री देह ही नहीं विवेक भी है. गीताश्री की कहानियों में स्त्री की सही स्थिति का जायजा लिया गया है. हिंदू- मुस्लिम के विभाजन ने इंसानियत को जितना मारा उससे कम इंसानियत की हत्याएं स्त्री-पुरूष और थर्ड जेंडर के विभाजन से नहीं हुआ. लेकिन स्त्री –लेखन जरूरी है पितृसत्ता की बारीकियों को समझने के लिए क्योंकि पुरूष जहां बाहरी दुनियां को प्रस्तुत करते हैं वहीं स्त्री –रचनाकार खुद के अंदर झांकती हैं. खुद से संवाद करती हैं. और उसे प्रस्तुत करती हैं. लेकिन यह देखना भी जरूरी है कि साहित्य में स्त्री –विमर्श के नाम पर दिया क्या जा रहा है?


पटना को पाटलिपुत्र के विभिन्न बिबों में याद करने के बाद डॉ रोहिणी ने रेणुजी और दिनकरजी को याद किया. जबकि स्त्रियों के विभिन्न स्थितियों एवं उनके बदलाव को रेखांकित करने के लिए उन्होंने उदाहरण के रूप में बिहार की चर्चित कथाकार गीताश्री के डाउनलोड होते सपने एवं अन्य कहानियों के विभिन्न प्रसंगों एवं पात्रों का उल्लेख किया. साथ ही साथ उन्होंने कविता, वंदना राग, नीलाक्षी सिंह, पंखुरी सिन्हा एवं उषाकिरण खान की कहानियों का भी जिक्र किया.
रोहिणी जी के वक्तव्य के बाद जहां अध्यक्षीय वक्तव्य के लिए जेडी विमेंस कॉलेज की प्राचार्या डॉ मीरा कुमारी अपने लिखित भाषण को पढ़ रहीं थीं और सत्र समापन की घोषणा हो रही थी वहीं खचाखच भरे सभागार से पटना के कई सम्मानित एवं चर्चित साहित्यकार उठकर चले गए. कुछ बुदबुदाते रहे कि यह साहित्यिक आयोजन है या गुटबाजी का एक मंच.
दूसरे सत्र में पटना की नीलाक्षी सिंह ने जहां पश्चिमी देश की पृष्ठभूमि पर लिखी अपने एक उपन्यास अंश से काली त्वचा वाली एक औरत की कहानी सुनाई वहीं कोलकाता से आईं साहित्य अकादमी से सम्मानित अलका सरावगी ने अपने आनेवाले उपन्यास एक सच्ची –झूठी दास्तान के एक अंश को सुनाया जो भाषाई पहचान और समस्या पर आधारित थी. तीसरे सत्र में जहां लखनऊ से आईं संध्या सिंह ने अपनी कविता, दोहा, गीत, और गजल से मनमोहा वहीं मीरा श्रीवास्तव, पूनम सिंह, रश्मि रेखा, प्रतिभा चौहान, डॉ भावना कुमारी, एवं पंखुरी सिन्हा ने अलग –अलग तेवर की कविताओं एवं गजलों से समां बांधती रहीं.
पटना में वर्ष 2015 से साहित्यिक गतिविधियां काफी तेज हो गई हैं. और इसी सक्रियता के बीच बिहार की स्त्री-लेखिकाओं को उचित सम्मान और प्लेटफोर्म उपलब्ध कराने के अलावे नये साहित्यकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 22 जुलाई 2015 को आयाम (साहित्य का स्त्री स्वर) को उषाकिरण खान की अध्यक्षता में निवेदिता झा और सुनीता गुप्ता के संयुक्त प्रयास से शुरू किया गया. जिसे भावना शेखर, पूनम आनंद, सुमन सिन्हा, सरिता सिंह नेपाली, तथा अर्चना आदि ने मजबूती दी. आयाम के बैनर तले पिछले दो वर्षों में अमूमन पटना एवं आसपास में रहने वाली रचनाकारों ने कई कहानी पाठ, कविता पाठ एवं परिचर्चाएं आयोजित की. आयाम की खासियत रही कि महिलाओं का संगठन होने, महिलाओं का कार्यक्रम आयोजित करने के बाबजूद इसमें न सिर्फ पुरुष साहित्यकारों को श्रोता के रूप में आमंत्रित किया जाता है बल्कि उनके सलाह-मशविरे का भी सम्मान के साथ स्वागत किया जाता है.
जब आयाम के दूसरे वर्षगांठ को भव्य तरीके से मनाने की पहल हुई तो समस्याएं कम नहीं थी. जहां एक तरफ वक्ता के रूप में गणमान्य रचनाकारों के नाम पर सहमति बनाने एवं उनसे समय लेने की परेशानी थी तो दूसरी तरफ कुछ महिला साहित्यकार कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दबाब भी बना रहीं थीं.  लेकिन आयोजक अपने कौशल का इस्तेमाल करते हुए अपने तय रुपरेखा में कार्यक्रम को आयोजित करने में सफल रहे. लेकिन एक खास बात जोड़ना बहुत ही जरूरी है कि पिछले दो वर्षों से लगातार कलम, मसि एवं आखर के बैनर तले पटना में साहित्यिक गतिविधि को सक्रिय रूप से गति देने वाली आराधना प्रधान का हाथ भी इस आयोजन की सफलता में बहुत अधिक था जिसका उल्लेख किसी ने नहीं किया.
संपर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

किन्नरों की जिंदगी में झांकती है चित्रा मुद्गल की पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा

किन्नरों की जिंदगी में झांकती है चित्रा मुद्गल की पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा  
सुशील कुमार भारद्वाज


चित्रा मुग्द्ल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा समाज से वहिष्कृत और तिरस्कृत किन्नरों की जिंदगी के विविध पहलुओं को उकेरने की एक कोशिश है. उपन्यास में लिखे सारे पत्र नायक (पात्र) विनोद के ही हैं. पत्रों के माध्यम से विनोद जहां सामान्य-सी अपनी पारिवारिक और सामाजिक रस्मों–रिवाज एवं समस्याओं को उकेरने की कोशिश करता है वहीं वह अपने अड्डे पर होने वाली घटनाओं का जिक्र कर हिजड़ों की दुनिया की एक छोटी-सी तस्वीर भी पेश करता है. कुल सत्रह पत्रों में तीन से चार बार विनोद का पता बदल जाता है एक काल-खंड विशेष में .
उपन्यास में बताने की कोशिश की गई है कि किन परिस्थितियों में एक बच्चे का जन्म होता है? वह बच्चा किस प्रकार सामान्य लोगों के बीच असामान्य होते हुए भी सहज होने की कोशिश करता है? उसके बाल-सुलभ प्रश्नों को किस प्रकार टाल दिया जाता है? पढ़ाई के प्रति उसका कितना लगाव है? और किस प्रकार उसके सारे सपने एक ही झटके में टूट कर बिखड़ जाते हैं जब चंपाबाई उसे हिजड़ों के समुदाय में शामिल करने के लिए जबर्दस्ती ले जाती है? परिवार वाले विनोद को बचाने की हर संभव कोशिश करने के बाद प्रतिकूल परिस्थितियों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं. घरवाले घर–परिवार की इज्जत–प्रतिष्ठा के लिए न सिर्फ अपने रिश्तेदारों और विद्यालय से विनोद की सच्चाई छिपाते हैं बल्कि मरने की भी अलग-अलग कथा गढ़ लेते हैं. घर बदल लेते हैं. लेकिन विनोद अपने नये परिवेश और दुनिया में ढलकर भी सहज नहीं हो पाता है. शारीरिक रूप से विकृत और मानसिक एवं भावनात्मक रूप से विस्थापित विनोद उर्फ बिन्नी उर्फ दीकरा या बिमली अपने नारकीय कैद जिंदगी से पलायन भी करता है लेकिन जगह बदलने के सिवाय कुछ भी नहीं बदलता है. उसकी स्वतंत्रता भी सरदार के इच्छा विरुद्ध और सीमित दायरे में है. भले ही वह सबसे अलग दिखने की भरसक कोशिश करते रहता हो. जिसमें उसका कोई दोष भी नहीं है बल्कि वह माता-पिता और समाज की क्रूरता का प्रतिफल है. होश में आने के बाद वह घरवालों की सुध लेता है लेकिन वहां भी नकार दिया जाता है. अपरिचित और अछूता बना रहता है. अपमानित होने के बाबजूद किसी अज्ञात स्वाभिमान और स्वार्थवश अपनी माँ को दुविधा में रख चोरी-छिपे घर से जुड़ाव रखता है. फोन से होने वाली असजहता के कारण पत्र ही संवाद का जरिया बनता है. लेकिन विनोद के लिखे पत्रों को भी घर का पता नसीब नहीं होता है. सारी भावनाएँ, सारी चिंताएं, सारी शुभेच्छाएं और सहानुभूति कई –कई दिन तक पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा में छटपटाती रहती हैं. उन पत्रों को पढ़ने और बर्बाद करने या छिपाने में जितनी सतर्कता बरती जाती उतना ही कष्टसाध्य है सबसे छिपाकर उन पत्रों का जबाब देना.
पत्रों में विनोद की भाषा यथार्थ की कम और आदर्शवाद की अधिक है. भले ही वह अपने घरेलू मसले पर व्यवहारिक बनने की कोशिश करता हो. शिक्षा के महत्त्व की बात होती है तो वैकल्पिक रोजगार की भी. गाड़ी धोने से लेकर कंप्यूटर चलाने और मोबाइल जैसे आधुनिक तकनीकों की भी चर्चाएं होती हैं.
राजनेताओं के बीच भी वह सहज नहीं रह पाता. वहां भी अपनी नई राह तलाशने की कोशिश करता है. कठपुतली बनना उसे मंजूर नहीं. वह किन्नरों के स्वाभिमान की बात करता है. आरक्षण की सीढ़ी को वह पसंद नहीं करता. समाज में उनकी वापसी की वकालत करता है. जाति–धर्म जैसी कुप्रथा से परे किन्नरों को वह फिर से उनके उन्हीं प्रचलित खांचों में स्त्री –पुरुष के रूप में रखकर आरक्षण की बात करता है.
उपन्यास का अंत निराशाजनक है. न विनोद अपने घर वापसी कर पाता है ना ही बा यानि विनोद की माँ वसीयत को अख़बारों में छपवाकर भी अपने दीकरा को कोई सुख दे पाती है. भले ही इसे एक अच्छे कदम के रूप में देखा जाए. दोनों अपनी –अपनी विधि अकाल काल के गाल में समा जाते हैं .
भले ही किन्नरों की जिंदगी की पड़ताल करती किताबें कम लिखी गईं हों लेकिन फिल्मों के माध्यम से इनकी सामाजिक और राजनीतिक भूमिका लोगों के नज़रों के सामने खूब आईं हैं. हिजड़ा कहें या किन्नर. शब्द बदल जाने के बाबजूद न तो गाली के मायने बदल गए हैं न हीं इनके जीवन में कोई खास बदलाव आया है. जड़ समाज में जागरूकता के असर पर चुप्पी ही ज्यादे कारगर है लेकिन विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्तिगत रूप से कुछ किन्नरों को विभिन्न व्यवसाय में लगे कमोबेश जरूर देखा जा सकता है. कोख पर माँ की स्वतंत्रता या हक की बात करना आसान है लेकिन यथार्थ कोरी–कल्पना ही है. कदम (आवाज) तो वाकई में स्वागत योग्य है लेकिन विचारणीय यह भी है कि क्या वाकई में भ्रूण हत्या के मामले में भी स्त्री अभी तक स्वतंत्र हो पाई है एक दो उदाहरण को छोड़ कर? पूरे उपन्यास में बहुत कुछ नयापन नहीं दिखता है सिवाय आरक्षण के विरुद्ध आवाज उठाने के. पढ़ने के दरम्यान यह भी खलता जरूर है कि माँ के एक भी पत्र को ज्यों का त्यों नहीं रखा गया है.
जहां तक शब्दों के चयन और भाषा की शिष्टता की बात है तो उस पर चित्रा मुग्द्ल का अपना अधिकार है. कहीं-कहीं वर्णन उबाऊ भी लगता है लेकिन पढ़ने में में वह कहीं भी बाधक साबित नहीं होता है. उपन्यास का अंत न सिर्फ दारुण कथा का व्याख्यान है बल्कि आपको निःशब्द कर सोचने –विचारने पर भी मजबूर कर देता है. हिन्दी या अंग्रेजी साहित्य में इस तरह का उपन्यास एक अरसे के बाद पढ़ने को मिला है.
पुस्तक- पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा
लेखक :- चित्रा मुद्गल
मूल्य:- 200/-
पृष्ठ:- 224
प्रकाशन :- सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली

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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

शंकरानंद की कविताएं

शंकरानंद की कविताएं हमारे दिल को छूती हैं. दिमाग को सोचने को विवश करती हैं. और प्रस्तुत करती हैं हमारे सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ के परिदृश्य को. कविताएं नोस्टाल्जिया की गिरफ्त में है जो हमारे बदलाव को रेखांकित करती हैं. कविताएं भविष्य की समस्याओं एवं चीजों से भावनात्मक अलगाव को भी स्पष्ट करती हैं. चिट्ठी की उम्र ही नहीं है बल्कि कैलेंडर से जुड़ा सुख-दुःख और सपना-निराशा भी है. जिंदगी के बहुरंगे–चटक रंग हैं और खुद के लिए बोते कंटीले बीज हैं तो निराशा के दौर में डगमगाता भरोसा है. पढ़ते हैं शंकरानंद की कुछ अच्छी कविताओं को:-


 शंकरानंद



चिट्ठी की उम्र
चिट्ठी की उम्र कितनी होती है
कोई पोस्टकार्ड कोई लिफाफा कोई अन्तर्देशीय पत्र
कितने दिनों तक सुरक्षित रहेगा
कभी ये भी जानने का मन करता है

मेरे पास पहले की बहुत चिट्ठियां हैं बक्से में
कभी उन्हें खोल कर देखता हूं तो
और ज्यादा पुरानी लगने लगती हैं
और ज्यादा कमजोर और ज्यादा निरीह
सालों बाद इनका क्या होगा पता नहीं

अब नई चिट्ठियां कम ही आती हैं
कम ही आता है डाकिया
किसी के लिखे की राह देखना कम हुआ
ये अब पुरानी बात है

कौन इंतजार करे इनके लिखने और पहुंचने का
जब इतने साधन मौजूद हैं चिट्ठियों के विकल्प के रुप में
तब कौन इतना धैर्य रखेगा

मैं भी इससे परेशान नहीं हूं
बस इतना सोचता हूं कि सालों बाद अगर बच्चे
चिट्ठी के बारे में पूछेंगे चित्र देखकर
तब बिना उदाहरण उन्हें कैसे समझाउंगा।

कैलेंडर
मैं दीवार पर टांगता हूं तो बीते दिन याद आते हैं
वे बीते तीस साल
कैलेंडर देख कर कौंध जाते हैं

कैसा भी हो वह
पर सबमें तारीख तो वैसी ही रहती है
वैसे ही छपा रहता है दिन

उसके चित्र तो अलग रहते हैं
लेकिन उनका असर कम होता है
खूबसूरत होने पर भी तस्वीरें तारीखों के दुःख
कम नहीं कर पाती

मैं हर बार नये कैलेंडर शौक से खरीदता हूं
सोचता हूं कि ये पहले से अलग हों
कम तकलीफदेह
पहले के आंसू पहले की उदासी पहले का दुःख इससे नहीं झांके
नहीं झांके पहले की मृत्यु

लेकिन जैसे ही महीना नया आता है
बीता समय आंखों के सामने घूम जाता है
तारीख देखकर वही वही

इसके बावजूद मैं पुराने कैलेंडर नहीं रखता
बदलता हूं हर बार हर साल
क्योंकि इसमें भविष्य का स्वप्न भी दर्ज होता है
जो बताता है कि घबराओ नहीं दोस्त!
ये समय बदल जाएगा।

रंग के चोर
इतने से डिब्बे में रंग भरा है
जितने डिब्बे उतने रंग उतना मौसम उतने स्वप्न
जरा सा उड़ेल दो तो
सन्नाटा भी फूल बनकर खिल जाएगा

ये डिब्बे लेकिन पता नहीं कहां गुम होने लगे अब
पहले तो रंग बहुत थे जीवन में
फिर धीरे धीरे सिमटने लगा सबकुछ
उदासी बढ़ी दुःख बढ़ा मृत्यु का कारण बढ़ा
फिर तो रंग स्वप्न से भी लापता हो गये

ये रंग जरुर किसी न किसी की अलमारी में कैद होंगे
किसी न किसी की जेब में होंगे ये रंग
तभी तो बाहर नहीं दिखाई पड़ते इन्द्रधनुष की तरह

ये आपका रंग सबने मिलकर चुराया
अगर भरना चाहते हैं खालीपन तो तलाशी लीजिए

जो अपराधी होगा वह पकड़ा जाएगा।

पेड़
ओ किसान!
तुम नहीं रोंपो बीज धरती के गर्भ में
नहीं जोतो खेत
अब मत बहाओ पसीना
ये तुम्हारे दुश्मन हैं

तुम कुछ और सोचो जो तुम्हें जिन्दा रहने का मौका देगा
तुम कुछ और करो जो दो वक्त की रोटी दे तुम्हें

ये लोकतंत्र है
जिसके सामने रोओगे वही उठ कर चल देगा
जिससे मांगोगे मदद वही सादे कागज पर अंगूठा लगवा लेगा

तुम जिस पौधे को रोपोगे विदर्भ में
वह दिल्ली में पेड़ बनकर खड़ा मिलेगा
वह सबको छांह देगा और तुम्हें धूप में जलना पड़ेगा

तुम्हें ध्यान खींचने के लिए
उसी पेड़ की टहनी में फांसी लगाकर मरना पड़ेगा
भरी सभा में हजारों लोगों के बीच
और सब इसे तमाशे की तरह देखेंगे

इसलिए कहता हूं कि मत रांपो बींज।

भरोसा
पहचानी सी आवाज को खोज रहा हूं
नयी जगह में हवा भी अलग है
पानी भी अलग
भाषा अलग है

जिन सड़कों पर चल रहा हूं ये भी पता नहीं कहां ले जाएंगी
हाथ के नक्शे और शहर में महीन फर्क है
पूछने पर अलग जवाब मिलते हैं
ऐसे में सहम जाता हूं छोटे बच्चों की तरह

न पिता की उंगली है यहां न मां के भरोसे के हाथ का आसरा
कोई तरीका नहीं जो बता दे कि ये दिशा सही है
इतना रहस्य है इतना धुआं इतना विश्वासघात
कि हर पता गलत निकलता है

ये देश हमें कहां ले जाएगा
अब कोई नहीं बता सकता।
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परिचय:-
शंकरानंद
जन्म-8 अक्टूबर 1983
;खगड़िया के एक गांव हरिपुर मेंद्ध

शिक्षा-एम0,बी0एड
प्रकाशन-आलोचना,वाक,आजकल,हंस,पाखी,वागर्थ,पक्षधर,उद्भावना,कथन,वसुधा,लमही,तहलका,पुनर्नवा,वर्तमान साहित्य,नया ज्ञानोदय,परिकथा,जनपक्ष,माध्यम,शुक्रवार साहित्य वार्षिकी,स्वाधीनता,साक्षात्कार,सदानीरा,बया,मंतव्य,दस्तावेज,जनसत्ता,समावर्तन,परिचय,आउटलुक,दुनिया इन दिनों साहित्य विशेषांक,समय के साखी,निकट,अनहद,युद्धरत आम आदमी,अक्षर पर्व,हिन्दुस्तान,प्रभात खबर,दैनिक भास्कर,अहा!जिन्दगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।कुछ में कहानी भी।
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी नियमित रूप से कविताएं प्रसारित।
कविताओं का कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

पहला कविता संग्रह दूसरे दिन के लिए‘;2012द्धभारतीय भाषा परिषद,कोलकाता से
प्रथम कृति प्रकाशन मालाके अंतर्गत चयनित एवं प्रकाशित।
दूसरा कविता संग्रहपदचाप के साथ‘;2015द्धराजभाषा विभाग के सहयोग से बोधि प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित।
सम्मान-2016 का विद्यापति पुरस्कार

सम्प्रति-अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगड़िया-851204,मो0-08986933049