गुरुवार, 30 मार्च 2017

पटना में मदन कश्यप का कविता-पाठ

29 मार्च 2017 को बिहार की धरती पटना में महाराजा कामेश्वर सिंह कॉम्प्लेक्स स्थित टेक्नो हेराल्ड के परिसर में प्रगतिशील लेखक संघ के पटना जिला ईकाई के तत्वावधान में वरिष्ठ कवि मदन कश्यप के सम्मान में एक काव्यात्मक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।'गूलर के फूल नहीं खिलते', 'लेकिन उदास है पृथ्वी', नीम रोशनी में', 'कुरुज' और 'दूर तक चुप्पी' जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप ने प्रतिरोध की आग में तपी -तपायी 'भारत माता की जै', 'डपोरशंख', 'छोटे-छोटे ईश्वर', 'पुरखों का दुःख', 'अभी भी बचे हैं', 'उम्मीद', 'बहुरूपिया', 'काल-यात्री' और 'बिजूका' शीर्षक जैसी कविताओं का पाठ किया। राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के 'नागार्जुन-सम्मान' से सम्मानित  कवि मदन कश्यप के कविता-पाठ आयोजन के मुख्य अतिथि दिल्ली से पधारे प्रसिद्ध कवि गंगेश गुँजन थे, अतिथि दिल्ली से पधारे कवि-आलोचक देवशंकर नवीन थे। अध्यक्षता समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि प्रभात सरसिज ने की। कार्यक्रम का संचालन कवि राजकिशोर राजन किया और धन्यवादज्ञापन कवि शहंशाह आलम ने किया।

पहले सत्र में  मदन कश्यप का कविता- पाठ हुआ तो दूसरे सत्र में आयोजन में शरीक हुए कवि एवं गजलकारों ने अपनी रचना से सबों को बाँधे रखा। जहाँ कुछ वक्ताओं ने मदन कश्यप एवं अन्य रचनाकारों की काव्य-पाठ पर सार्थक टिप्पणी की वहीं कथाकार शेखर ने आयोजन को ऐतिहासिक बताते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के ऐतिहासिक पहलुओं पर अपनी बेबाक टिप्पणी रखी। आयोजन की खासियत रही कि मदन कश्यप अपनी कविता -पाठ के साथ -साथ उसकी रचना प्रक्रिया पर भी बात करते रहे। इस मौके पर अनिल विभाकर, संजय कुमार कुंदन, रामनाथ शोधार्थी, कथाकार अशोक, भगवत झा अनिमेष, बी एन विश्वकर्मा, समीर परिमल, सुशील कुमार भारद्वाज आदि समेत कई साहित्यकार उपस्थित रहे।

रविवार, 26 मार्च 2017

पंकज चतुर्वेदी की कविताएं

पंकज चतुर्वेदी समकालीन साहित्यकारों में एक उत्कृष्ट स्थान रखते हैं जिनकी रचना जितनी कम शब्दों में होती है उतनी ही मारक होती है। ये देश -काल को अपने रचना का विषय बनाकर अपनी स्पष्ट अभिव्यक्ति को यथोचित आकार देते हैं जिनमें गूँज होती है झन्नाटे की। आज उनके फेसबुक वॉल से गुजर रहा था तो उनकी ताजा रचनाओं को पढ़े बिना रह न सका और आपलोगों के लिए भी यहाँ कुछ गौरतलब कविताओं को प्रस्तुत कर रहा हूँ।



बात करते-करते
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बात करते-करते
जब तुम्हें लगे
कि यह आदमी
अब तुम्हारा दोस्त नहीं
सत्ता का मुख़बिर है
तो अपने अनिष्ट की
आशंका तो होती है

पर उससे अधिक
अफ़सोस होता है
कि वह उतना
समुन्नत नहीं है
जितना तुम उसे
मानते थे

रश्क
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गति पर क़ाबू करने का
यह भी उपाय है
कि आप सबसे पीछे
छूट जायें

संभव है कि तब
दौड़ के विजेता को
आपकी आत्म-शांति से
रश्क हो !

बिछोह
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गहरे नीले आसमान में
पेड़ों के झुरमुट की ओट में
जिस दिन
नहीं दिखता चाँद

लगता है
तुम्हारे दर्शन
नहीं हुए

फ़ासीवाद जब बढ़ता है
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फ़ासीवाद जब बढ़ता है
मित्र घटते जाते हैं

वे दैत्य के जबड़े के
सामने नहीं
पड़ोस में
रहना चाहते हैं

मृत्यु से बचने के लिए
ऐसी जगह की तलाश में
जो जीते-जी
मृत बनाये रखती है

धर्म की राजनीति
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धर्म की राजनीति में
एजेंडा तभी तक
गुप्त रखा जाता है
जब तक उसकी
ज़रूरत हो

सीता जब अपनी कुटिया से
बाहर निकल आती हैं
तब उन्हें पता लगता है
कि भिक्षा माँग रहा व्यक्ति
साधु नहीं
रावण है
और उनका
अपहरण करने
आया है

सौम्य कोशिश
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जिस गिलास में
पानी पी रहा हूँ
उस पर खुदा है
दिवंगत का नाम

अमरता की
यह सौम्य कोशिश
मेरे जीते-जी
सफल है

पानी नहीं
उसकी अमरता का
घूँट पीता हूँ

सत्ता का सरोकार
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सत्ता का सरोकार है
कि तुम हिंसक व्यवहार के
आदी बनो

गर्व से कहो
कि तुम विजेता हो

आँसू
कमज़ोरी की निशानी हो
ग़रीब की रोटी छीन लेना
ताक़त की

हँसते समय यह सीखो
कि निर्बल का अपमान करके
कैसे हँसा जाता है

प्यार एक वर्जित ख़याल हो
और जो उस राह पर चले
उसमें शर्मिंदगी और
अपराध-भाव पैदा हो

अपराधी यह कहें
कि निरपराध करना है
समाज को

माना कि यह
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माना कि यह
सपनों का
समय नहीं है
उन्माद से
पराजित है
आदर्श

लेकिन यह कवियों
विचारकों को
भाषा में भागने
और गुनाह करने की
छूट नहीं देता

अपराधी
अपराधी ही है
भाषा में हो
या उसके बाहर

अगर तुम्हारे पास
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अगर तुम्हारे पास
साम्प्रदायिकता के
ज़हर से बुझी
कटार नहीं है

जाति की तीखी
तलवार नहीं है

अतर्कित भ्रष्टाचार
नहीं है

पूँजीपति यार नहीं है

मूल्यों की ढहती
मीनार नहीं है

तो चुनाव में
तुम्हारी जीत पर
विस्मय है

हार तय है

हे राम !
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वैसे यह प्रमाणित नहीं है
पर उसके काफ़ी क़रीब है
कि अपनी हत्या के वक़्त
गाँधी दो ही शब्द कह सके :
''हे राम !''

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है
कि तुम किस भाषा में
अपनी प्रार्थना और शोक
व्यक्त करोगे
जबकि तुम्हें मालूम हो
कि उसी भाषा में तुम पर
होंगे अत्याचार

प्रयोगशाला
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मध्य-युग के बर्बर शासक
विश्वविद्यालयों को जलाते थे

अब जो शासक हैं
उनका ज़ोर इस पर है
कि उन्हें जलाया भले न जाय
पर जो वे करना चाहते हैं
उसकी प्रयोगशाला
बना दिया जाय

करना वे यह चाहते हैं
कि मनुष्य में आत्मा
न रहने दी जाय।

सिर्फ़ माँ है
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एक छात्र जिसे पहले पीटा गया
और फिर ग़ायब कर दिया गया
नहीं मालूम वह कहाँ है कैसा है

जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं
उसके मिलने की आशा
धूमिल होती जाती है

सवालों से कतराती है सत्ता---
जैसे अपराधियों का स्वतंत्र विचरण
कोई समस्या नहीं है
बल्कि जिन्हें सताया जा सकता है
उनका जीवन एक समस्या है---
और वह अपनी क्रूरता से
निश्चिन्त होना चाहती है

शरीफ़ लोग किसी अनहोनी की
आशंका में चुप रहते हैं
और जो उसे पाने के लिए लड़ रहे
हारते जाते हैं

एक नयी नागरिकता निर्मित हो रही
जो यह मानती है
कि अन्याय पर ख़ामोश रहना बेहतर है
और उसे भूलना सबसे कारगर उपाय

सिर्फ़ माँ है
जो शताब्दियों तक
अपने बेटे की प्रतीक्षा करेगी !

नये बनते निज़ाम को देखो
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जो लोग लेखकों की
हत्या कर रहे
वे अज्ञात हैं

जो स्त्रियों को बलात्कार की
धमकियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

जो फ़िल्मों के सेट जला रहे
वे अज्ञात हैं

जो बुद्धिजीवियों के साथ
मार-पीट कर रहे
और उन्हें गालियाँ दे रहे
वे अज्ञात हैं

भले तुम इसे
लोकतंत्र मानते रहो
पर इस नये बनते
निज़ाम को देखो :
मारनेवाले अज्ञात हैं
मरनेवाले ज्ञात हैं !

पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार।

सभ्यता का मानदंडः सुशील कुमार भारद्वाज

आज हिन्दुस्तान दैनिक के संपादकीय पन्ना पर कॉर्टून कोना देख कर सोचता रह गया। एक सांसद महोदय चप्पल हाथ में लिए चल रहे हैं और सभ्यता का मानदंड पर्दे के पीछे छुपने में मशगूल। तुर्रा ये कि महोदय के पैर नंगे हैं। तो मतलब कि जनाब ने पैर की बजाय चप्पलों को हाथों की शोभा बना ली। सभ्यता का मानदंड बदल रहा है तो संभव है कल को कुछ और दिख जाय! लेकिन जेहन में एक सवाल कुलाँचे मार रहा कि भाई गिनती किसने की? चप्पल चलाने वाले या खाने वाले गिन रहे थे कि 25 चप्पल खा चुके? मुझे तो एक सिनेमा का एक दृश्य याद आ गया  जिसमें एक शराबी खुले चैम्बर के पास 25- 25 बोल रहा था और जब एक सज्जन पूछने आया तो उसे भी उसमें धकेल कर नम्बर 26 कर दिया। खैर, एक दिन पहले खबर आई कि सांसद महोदय की पत्नी अपने पति के बचाव में आई कि पिटने वाला की बदतमीजी थी कि उसने "मोदी जी को मोदी" कह दिया। जबकि सांसद महोदय ने बयान दिया कि शिवसेना प्रमुख ने उन्हें मीडिया से दूर रहने की सलाह दी है। आश्चर्य है न कि खुद मीडिया को आगे बढ़ाने वाले ठाकरे साहब खुद "सामना" के पत्रकारों को बेरोजगार कर रहे हैं जबकि खबरें अच्छी अच्छी आ सकती थीं। खैर, ये सब राजनेताओं की बातें हैं राजनेता ही जानें। राजनेता की बातें सबकी समझ में आ ही जाय तो राजनेता काहे का? अब तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि शायद अब संसद ही तय करेगी कि सभ्यता का मानदंड क्या हो? ठीक वैसे ही जैसे पिछले दिनों वित्त मंत्री अरूण जेटली जी ने कहा कि संसद को यह हक है कि वह विचार करे कि सरकारी धन का सदुपयोग कैसे हो? किसे पेंशन दे और किसे न दे? वैसे ही जैसे संसद तय करेगी ओबीसी के श्रेणी में किसे रखा जाय और किसे क्या सुविधा दी जाय? अब अपनी सभ्यता का मानदंड बचा रहे इसके लिए भी यदि संसद पर ही निर्भर रहना पड़े तो शायद जिंदगी की बहुत सारी सहुलियतों की परिभाषाएं ही बदल जाय। खैर लोकतंत्र में भले ही अधिकार जनता के हाथ में हो लेकिन इस्तेमाल तो जनप्रतिनिधि ही न करेंगें। सत्य को स्वीकार करने से गुरेज कैसा?
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शनिवार, 25 मार्च 2017

असग़र वजाहत की कहानी नये ईसा मसीह

प्रख्यात कथाकार असग़र वजाहत साहब जिस तरह किसी परिचय के मुँहताज नहीं हैं वैसे ही उनकी रचना। गंभीर से गंभीर मुद्दे को भी सहजता से रूपरेखा में ढ़ाल लेते हैं। वजाहत साहब न सिर्फ अपने चारों ओर की हवा से वाकिफ रहते हैं बल्कि समय समय पर वे इस पर अपनी राय भी रखते हैं। प्रस्तुत कहानी भले ही व्यंग्य के रूप में है लेकिन पढ़ते ही आपको मालूम पड़ जाएगा कि निशाना कहाँ साधा गया है। तो आइये पढ़ते हैं असग़र वजाहत साहब की कहानी "नये ईसा मसीह"

नये ईसा मसीह
(कहानी)
असग़र वजाहत
(हिंदी के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित कवि, व्यंगकार और पत्रकार  विष्णु नागर जी को समर्पित)
एक नए ईसा मसीह हैं। उन से सभी खुश हैं । उनकी लोकप्रियता आसमान को छू रही है। हर आदमी उनके ऊपर बलिदान होने को तैयार है। वे जहां जाते हैं लोग अपनी आंखें बिछा देते हैं।
इसी समय कोइ और आया। उसने कहा कि वह ईसा मसीह है । अब ईसा मसीह दो हो गए। एक को हम कह सकते हैं नये ईसा मसीह और दूसरे को कह सकते हैं पुराने ईसा मसीह।
नये ईसा मसीह  को जब यह पता चला कि कोई और भी अपने आपको ईसा मसीह कह रहा है तो वे गुस्से से पागल हो गये। उन्होने कहा , किसकी हिम्मत है कि कोई और अपने को ईसा मसीह कह सके। मैं देख लूंगा ।मैं समझ लूंगा। मैं दिखा दूंगा । मैं कर दूंगा ।मैं फोड़  दूंगा ।मैं  तोड़ दूंगा । मैं चीर  दूंगा। मैं फाड़ दूंगा। मैं बजा दूंगा।मैं घटा दूंगा। मैं  मिटा दूंगा।मैं घुसेड़ दूंगा। .... मैं ईसा मसीह था, हूँ और रहूँगा।
पुराने ईसा मसीह को जब ये पता चला कि कोई उनसे खुश नहीं है तो पुराने ईसा मसीह नए मसीह के सामने आए और अपना एक गाल उनके आगे कर दिया। नये मसीह ने उनके गाल पर एक जोर का थप्पड़ मारा। पुराने  मसीह ने दूसरा गाल आगे कर दिया ।नए मसीह ने उस पर भी जोर का तमाचा मारा।  पुराने मसीह ने  फिर पहला गाल आगे कर दिया । पुराने मसीह को नये मसीह लगातार तमाचे मारते रहे। यहां तक कि पुराने मसीह अधमरे हो गए।
और फिर नये मसीह ने  पुराने ईसा मसीह को सूली पर टांग दिया गया।
जनता ने करतल ध्वनि से नए ईसा मसीह का समर्थन किया।
लाखों लोगों की भीड़  को नए ईसा मसीह ने संबोधित किया है।
- असली ईसा मसीह कौन है? आप लोग बताओ? मैं हूं या यह आदमी है जो सूली पर चढ़ा है?
- आप हैं आप हैं।' जनता एक स्वर में  बोली।
-  सच्चा कौन है, मैं हूँ या यह आदमी  है जो सूली पर चढ़ा है ?
- आप हैं आप हैं ।
-  तुम किसके आदेश  मानोगे, मेरे यह इस आदमी के जो सूली पर चढ़ा है ?
- आपके आपके।' पूरी जनता ने कहा ।
-  तुम मुझे वोट दोगे या इस आदमी को जो सूली पर चढ़ा है?
- आपको आपको।'
-  किस पर विश्वास करते हो जो सूली पर चढ़ा है या मुझ पर ?
- आप पर और आप पर और आप पर ।' जनता ने एक स्वर से कहा।
सूली पर लटके यीशु मसीह की आंखें धीरे धीरे बंद हो रही थीं । लोग यह समझे कि उनकी आँखें वास्तव में 'बंद' हो जायेगीं।
पर पुराने  ईसा मसीह की आँखें कभी 'बंद' नहीं होतीं।
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असग़र वजाहत के वॉल से साभार।

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

दलित-चिंतन को मिटाने की मुहिम : प्रेम सिंह (आलेख)


हिन्दी के प्रखर साहित्यकार डॉ धर्मवीर का लम्बी बीमारी के बाद 09 मार्च 2017 को निधन हो गया। आइये उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए दिल्ली  विश्वविद्यालय के प्रेम सिंह का लिखा आलेख पढते हैं।
डॉ धर्मवीर


मध्यकाल के रचनाकारों में कबीर का अध्ययन और मूल्यांकन सबसे जटिल और चुनौती भरा रहा है। साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के अलावा दूसरे विषयों के विद्वानों ने भी कबीर के अध्ययन में रुचि ली है। कबीर का एक विमर्श लोक में भी बराबर चलता रहा है। वहां भी अन्य रचनाकारों के मुकाबले कबीर सबसे आगे और विशिष्ट हैं। हिंदी में कबीर के अध्ययन की लंबी परंपरा है। उस परंपरा में 1997 में डाॅ. धर्मवीर की आलोचना-पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ प्रकाशित हुई। उस पुस्तक में कबीर के व्यक्तित्व और चिंतन के मूल्यांकन संबंधी पूर्व मान्यताओं को ध्वस्त कर डाॅ. धर्मवीर ने अपनी नई स्थापनाएं प्रस्तुत की हैं। इस पुस्तक से कबीर के अध्ययन की परंपरा में पहली बार एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ।
 हिंदी आलोचना के परिदृश्य में सक्रिय सभी रंगतों के आलोचक डाॅ. धर्मवीर की ‘हिमाकत’ से क्षुब्ध हो उठते हैं। और साथ ही उन्हें ठिकाने लगाने के लिए सन्नद्ध। जमे हुए आलोचकों को तजुर्बा है, खासकर प्रगतिवादी आलोचकों को, कि कैसे उनकी काट करने वाले को काटा जाता है। हिंदी के ज्यादातर आलोचक और लेखक डाॅ. धर्मवीर पर चैतरफा हमला बोल देते हैं। इस विश्वास के साथ कि मैदान में नया और अकेला उतरा यह शख्स उनके हमलों के आगे थोड़ी देर भी नहीं टिक पाएगा। लेकिन धर्मवीर उनके हमलों से किंचित भी परेशान नहीं होते। स्वागत और खुशी के साथ पूरी तसल्ली और तफसील से सबकी आपत्तियों और सवालों के नुक्ता दर नुक्ता जवाब देते हैं। बहस के साथ कबीर पर उनका शोध-कार्य जारी रहता है।
 इस दौरान उनकी एक के बाद एक पांच पुस्तकें सामने आती हैं। तीन पुस्तकें - ‘कबीर: डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिंतन’ (2000), ‘कबीर और रामानंद: किंवदंतियां’ (2000), ‘कबीर: बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी’ (2000) - नई सदी में कबीर श्रृंखला के अंतर्गत और दो पुस्तकें - ‘कबीर के कुछ और आलोचक’ (2002) और ‘सूत न कपास’ (2003) कबीर के आलोचक श्रृंखला के अंतर्गत। इन पुस्तकों से पता चलता है कि शुरुआती छोटी पुस्तक के पीछे लेखक की बड़ी तैयारी थी। चर्चा कबीर और उनकी आलोचना के दायरे से निकल कर ज्ञान की कई दिशाओं - दर्शन, धर्म, समाजशास्त्र, इतिहास, न्याय, कानून आदि - में व्याप्त हो जाती है। जो समझ रहे थे कि डाॅ. धर्मवीर को हवा में उड़ा देंगे, जान गए कि मुठभेड़ किसी सामान्य आलोचक से नहीं, एक गंभीर चिंतक से है। कबीर के आत्मविश्वास से लैस एक ऐसा चिंतक जिसने प्रगतिशीलता एवं आधुनिकता के झंडाबरदार ब्राह्मणों-ठाकुरों-वैश्यों को एक झटके में दलित-चिंतन की धार पर धर दिया है। ब्राह्मणवादी दर्शन और संस्कृति में पगे दिमाग को मानववाद, माक्र्सवाद, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषणवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद आदि की पैकेजिंग से संवार कर आधुनिक बुद्धिजीवी बने विद्वानों के सामने यह कड़ी चुनौती थी। जो बड़े उत्साह और आत्मविश्वास के साथ डाॅ. धर्मवीर से उलझे थे, वे सब पीछे हट गए।    
 दरपेश चुनौती के सामने प्रभुत्वशाली प्रतिष्ठान अथवा महानुभाव कई बार चुप्पी की राजनीति (पाॅलिटिक्स आॅफ साइलेंस) का सहारा लेते हैं। वह किसी गंभीर चुनौती को निष्क्रिय करने की बोलने-लिखने से ज्यादा असरदार रणनीति होती है। डाॅ. धर्मवीर की चुनौती के सामने हिंदी के कुछ विद्वानों ने चुप्पी का हथियार इस्तेमाल किया। डाॅ. नामवर सिंह ने कहा कि वे डाॅ. धर्मवीर के विरोध में नहीं बालेंगे; हालांकि वे उनकी स्थापनाओं से सहमत नहीं हैं। उन्होंने पहेली बुझाई कि डाॅ. धर्मवीर का विरोध करने से ब्राह्मणवाद मजबूत होगा। शायद शुरू में डाॅ. नामवर सिंह को लगा होगा कि उनके दो शिष्य डाॅ. वीरभारत तलवार व डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल उनके साथी डाॅ. मैनेजर पांडे के साथ मिल कर ‘डेमेज कंट्रोल’ कर लेंगे। अथार्त् तूफान से माक्र्सवाद और डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी को सुरक्षित बचा कर ले आएंगे। ‘डेमेज कंट्रोल’ न हो पाने की स्थिति में वे खुद कुछ देर के लिए मैदान में उतर कर डाॅ. धर्मवीर को मर्यादा तोड़ने यानी ‘शास्त्र’ एवं ‘गुरु’ की निंदा का दंड देंगे। लेकिन लगता है वे जल्दी ही समझ गए कि इस बार चुनौती विकट है और अभी तक आजमाई ‘साहित्यिक’ युक्तियों से मामला रफा-दफा होने वाला नहीं है। यह कबीर पर कब्जे की लड़ाई नहीं, डाॅ. धर्मवीर ने ज्ञान पर ब्राह्मणी कब्जे को हटाने का ‘कांड’ उपस्थित कर दिया है। यह पहचानने में वे सबसे ज्यादा सयाने निकले कि पूरी तैयार से मैदान में उतरे डाॅ. धर्मवीर के सामने सीधी मुठभेड़ में जीतने का माद्दा इस समय हिंदी के किसी विद्वान में नहीं है। इसलिए चुप हो जाओ, झुक जाओ, नई रणनीति बनाओ!
 ‘कबीर के आलोेचक’ समेत उपर्युक्त छह पुस्तकों और लंबी बहस के बाद कबीर पर कोई नया और गंभीर अध्ययन डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता है। भले ही उसमें डाॅ. धर्मवीर की काट ही काट हो। अगर उस बहस में शामिल रहने वाला कोई विद्वान अपनेे कबीर संबंधी अध्ययन में डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करता है तो अकादमिक जगत के लिए यह चिंता का बायस होना चाहिए। अकादमिक ईमानदारी का विकल्प नहीं है और उसका समुचित निर्वाह सभी विद्वानों की सम्मिलित जिम्मेदारी है। जब डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ का प्रकाशन-पूर्व प्रचार शुरू हुआ तो हमने स्वाभाविक तौर पर माना कि आलोचक ने डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों और बहस को खाते में लेकर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया होगा और इस रूप में वह कबीर पर एक महत्वपूर्ण आलोचना-कृति होगी। पुस्तक प्रकाशित होने पर हमें अपने एक शोधार्थी से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक में डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों का कहीं जिक्र ही नहीं है। पांच साल पहले जो महाभारत कबीर को लेकर मच चुका है उसके बाद यह संभव नहीं है कि कबीर पर तीस-बत्तीस साल लगा कर काम करने वाले विद्वान के सामने डाॅ. धर्मवीर के कबीर की तस्वीर न झूलती रहे।
 यह स्वीकृत मान्यता है कि भक्तिकालीन भक्त एवं संत कवियों ने अपनी-अपनी मनोभूमि से समवेत रूप में प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ सिद्ध कर दिया था। यह भी माना जा सकता है कि कबीर और रैदास की प्रेमोपासना संभवतः सबसे निराली और सबसे उदात्त है। ऐसे में कबीर समेत समस्त भक्तिकालीन रचनाकारों के प्रेमोपासक होने से भला किसे ऐतराज हो सकता है? डाॅ. धर्मवीर ने कबीर की खोज मुक्त-ज्ञान के करुणानिधान के रूप में की है। वहां उनसे मुठभेड़ की जा सकती है जो कुछ हद तक हुई भी और धर्मवीर ने जवाब भी दिए। उनके जवाबों को अपर्याप्त, यहां तक कि गलत ठहराया जा सकता है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक के शाीर्षक से ही यह समझा जा सकता है कि लेखक ने प्रेम की अकथ कहानी की आड़ में ज्ञान पर वर्चस्व की राजनीति की है। कबीर को डाॅ. धर्मवीर से छुड़ा कर प्रेम के पुराने अखाड़े में खींच कर ले जाना दरअसल प्रतिक्रियावाद कहा जाएगा। दलित-चिंतन की भूमि से इसे ब्राह्मणवादी साजिश भी कहा जा सकता है।
 हमने इस पुस्तक की राजनीति के बारे में बाहर से बताया है। बेहतर होगा कि डाॅ. धर्मवीर तीन दषक लगा कर लिखी गई डाॅ. अग्रवाल की बहुप्रशंसित पुस्तक को पढ़ें और उसकी अंदरूनी राजनीति की विस्तृत समीक्षा करें।
प्रेम सिंह

 हमें विश्वास था कि डाॅ. धर्मवीर के कबीर को ‘गायब’ करने का डाॅ. अग्रवाल का ‘जादू’ सभी विद्वानों पर नहीं चलेगा। कहीं न कहीं से आवाज आएगी। हमारे कान पुस्तक की भूरी-भूरी प्रशंसा करने में लगे विद्वानों की तरफ लग गए कि वे डाॅ. धर्मवीर का कोई जिक्र करते हैं या नहीं? भले ही यह कह कर कि डाॅ. अग्रवाल ने कबीर के नाम पर डाॅ. धर्मवीर द्वारा फैलाया गया ‘कूड़ा-कर्कट’ साफ कर दिया है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक का प्रकाशन और विमोचन समारोहपूर्वक हुआ। उस पर गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला अभी जारी है। जिस सुनियोजित ढंग से पुस्तक को ‘लाॅन्च’ किया गया है उससे लगता है गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला लंबा चलेगा। अब तक प्रायः हर रंगत का विद्वान पुस्तक पर न्यौछावर लुटा चुका है। इसमें कोई समस्या नहीं है - जब अफसर-लेखकों के लिए विद्वानों के दिल के दरवाजे खुल जाते हैं तो लेखक-अफसर के लिए छाती चैड़ी क्यों नहीं होगी! समस्या यह है कि किसी विद्वान ने अपनी लिखित या मौखिक राय रखते वक्त डाॅ. धर्मवीर और उनके कबीर का हवाला नहीं दिया है। डाॅ. नामवर सिंह ने भी नहीं, जो कहते थे कबीर पर आगे बात बिना डाॅ. धर्मवीर के नहीं हो सकती। ऐसा माहौल बना दिया गया है मानो कबीर पर धर्मवीर की पुस्तकें आई ही नहीं थीं, न कोई बहस थी, न धर्मवीर नाम का कोई विद्वान हिंदी में है। इसके बावजूद कि कबीर के बाद धर्मवीर की कई विषयों पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं।
 अब हम कह सकते हैं कि डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का काम चूक से या अकेले डाॅ. अग्रवाल के करने से नहीं हुआ है। यह जाना-बूझा और सम्मिलित उद्यम है। जिस तरह से आधुनिक और प्रगतिशील युग में डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का ‘तिलस्म’ रचा गया है, उससे यह आशंका मजबूत होती है कि पिछड़े सामंतकालों में दलित-चिंतन को दबाने और नष्ट करने की युक्तियां और रणनीतियां बड़े पैमाने पर ईजाद की गई होंगी और अमल में लाई गई होंगी। कम से कम शुरुआती दौर में तो जरूर ऐसा हुआ होगा - जब तक दलित और शूद्र जीवन को श्रम और सेवा का पर्याय बना कर ज्ञान-विहीन क्षेत्र में तब्दील नहीं कर दिया गया। यह तो खैर पीछे की बात है और उसे मध्यकाल के मत्थे मढ़ कर तसल्ली पाई जा सकती है। लेकिन प्रस्तुत और इस तरह के अन्य वाकये बताते हैं कि हाशिए के समूहों एवं अस्मिताओं के सशक्तिकरण की आधुनिक बुद्धिजीवियों की चिंता वास्तविक नहीं है। आधुनिक बौद्धिक प्रतिष्ठान हजारों साल तक दबा कर रखी गई हाशिए की अस्मिताओं को स्वतंत्र चिंतन की छूट देने को तैयार नहीं है। ऐसे चिंतन को तो कतई नहीं जिसमें प्रभुत्वशाली चिंतन के बरक्स समुचित ढांचा और दृष्टि मिलती हो।
 डाॅ. धर्मवीर के चिंतन की पद्धति में एक हद के बाद तेर-मेर का रवैया हमें ठीक नहीं लगता रहा है। दुनिया में चिंतन का अभी तक का अनुभव बताता है कि चिंतन की एक मनोभूमि ऐसी होती है जहां अपने रास्ते और दृष्टि से पहुंच कर चिंतक विभक्त नहीं रह जाता है। अब बात हमारी समझ में आती है कि एक दलित-चिंतक अनेक खतरों के लिए खुला होता है। वह मिला कि रला! ब्राह्मणी चिंतन वाले लेखकों-विचारकों से दलितों को सावधन रहने की डाॅ. धर्मवीर की हिदायत का निहितार्थ भी अब हमारी समझ में आता है। रास्ते के बटमार दलित चिंतक को कभी पूर्णकाम नहीं होने दे सकते। दलित चिंतक प्रचलित अर्थ में समन्वयवादी नहीं हो सकता। अगर वह होता है तो ब्राह्मणी चिंतन कई तरह के हथकंडों से उसके चिंतन को रला सकता है। डाॅ. धर्मवीर ने दलित-चिंतन को सबसे बड़ा खतरा ‘मार्क्सकवादी बटमारों’ से बताया है। शायद यही उनका सबसे बड़ा अपराध हो गया है?  
 डाॅ. धर्मवीर के स्वतंत्र दलित-चिंतन के विरोधियों ने पीछे हटते वक्त मुंह बनाते हुए जताया था कि ‘मूर्ख के मुंह कौन लगे’! बात वहीं समाप्त हो जा सकती थी। लेकिन हुई नहीं। डाॅ. धर्मवीर ने बारूद का जो ढेर इकठ्ठा कर दिया था, उसे निष्क्रिय करना जरूरी था। पुश्त दर पुश्त चले आए सत्ता पर कब्जे को बरकरार रखने के लिए ज्ञान पर कब्जा बनाए रखना अनिवार्य है। उन्हें यह अहसास अच्छी तरह हो गया कि डाॅ. धर्मवीर कब्जे में आने वाले नहीं हैं। लिहाजा, अंदर ही अंदर तय पाया गया कि उन्हें ध्वस्त करने की पुख्ता और दूरगामी रणनीति बनानी होगी। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक और उसके जन्म पर जो सोहर गाए जा रहे हैं, उसी रणनीति का प्रतिफल है।
 इस प्रतिफल तक आने के पहले काफी कुछ घटित हुआ है जिसके विस्तृत ब्यौरे में नहीं जाया जा सकता। लेकिन एक-दो मोटी बातें बताई जा सकती हैं। डाॅ. अग्रवाल के शिष्य बजरंगबिहारी तिवारी और रमणिका गुप्ता के निर्देशन में दलित महिलाओं से ‘नैतिकता के ठेकेदार’ धर्मवीर पर चप्पलें फिंकवाई गईं। डाॅ. धर्मवीर द्वारा ‘कफन’ की बुधिया के पेट में ठाकुर का बच्चा बताने पर, सामंतवाद को पानी पी-पी कर कोसने वाले राजेंद्र यादव सरीखे प्रगतिशीलता के पर्याय लेखक हाहाकार कर उठे। बड़े-बड़े लेखकों ने गली के छोकरों के अंदाज में डाॅ. धर्मवीर की बौद्धिकता पर फब्तियां कसीं और लानत भेजी। गोया किसी ‘ठाकुर’ ने किसी दलित महिला का कभी शीलहरण किया ही न हो?
 काॅलिजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में कबीर सभी जगह पढ़ाए जाते हैं। लेकिन लगभग सभी जगह कबीर के अध्ययन के लिए प्रस्तावित संदर्भग्रंथों में डाॅ. धर्मवीर की किताबें नहीं हैं। डाॅ. धर्मवीर पर शोध करने के इच्छुक शोधर्थियों को हतोत्साहित किया गया। चार साल पहले एमफिल के हमारे एक शोधार्थी को डाॅ. धर्मवीर की आलोचना-दृष्टि पर शोध का विषय मिला तो डाॅ. अग्रवाल ने उस पर विषय बदलने के लिए दबाव डाला। हमें यह सुन कर अपने पेषे पर गहरी ग्लानि हुई कि उन्होंने शोधार्थी के सामने डाॅ. धर्मवीर के प्रति असंसदीय भाषा का प्रयोग किया। एक चर्चित दलित लेखक ने भी शोधार्थी को लताड़ा कि वह डाॅ. धर्मवीर पर शोध करके क्यों उनका महत्व बढ़ाता है? हमारे नामचीन और जिम्मेदार पदों पर बैठे विद्वानों का यह क्या हाल हो गया है! डाॅ. सुधीश पचैरी ने जताया है कि वे चैतरफा विरोध के बीच डाॅ. धर्मवीर के समर्थक हैं। लेकिन वे पहली ही नजर में पकड़े जाते हैं जब भारतीय समाज और वांडमय की गहरी खुदाई करने वाली और अपने को आदि स्रोतों से जोड़ने वाली प्रतिभा को उत्तर-आधुनिकता की ‘संजीवनी’ से जाग्रत हुआ बताते हैं। यानी एक ‘आजीवक’ को आज के बाजार का जीव मानते हैं। समर्थन की आड़ में भ्रम फैलाने के और भी उदाहरण मिल सकते हैं।
 कुल मिला कर कहा जा सकता है कि डाॅ. धर्मवीर के चिंतन को निष्क्रिय करने के लिए जार-सत्ता, बाजार-सत्ता और सरकार-सत्ता के नुमांइदे बुद्धिजीवी एकजुट हो गए हैं। यह अलग विषय है कि उनकी संलिप्तता में भारत में पिछले डेढ़ हजार सालों से चली आ रही रूढि़ की बड़ी भूमिका है। क्योंकि वे इतने नादान नहीं हैं कि यह सच्चाई नहीं जानते हों कि मौलिक सृजन और चिंतन कुछ देर के लिए नजरअंदाज किए जा सकते हैं, उन्हें हमेशा के लिए निष्क्रिय नहीं किया जा सकता।

शनिवार, 4 मार्च 2017

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी रसप्रिया

आँचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां', आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है।
अपनी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने आंचलिक जीवन के हर धुन, हर गंध, हर लय, हर ताल, हर सुर, हर सुंदरता और हर कुरूपता को शब्दों में बांधने की सफल कोशिश की है। उनकी भाषा-शैली में एक जादुई सा असर है जो पाठकों को अपने साथ बांध कर रखता है। रेणु एक अद्भुत किस्सागो थे और उनकी रचनाएँ पढते हुए लगता है मानों कोई कहानी सुना रहा हो. ग्राम्य जीवन के लोकगीतों का उन्होंने अपने कथा साहित्य में बड़ा ही सर्जनात्मक प्रयोग किया है।
आज पढ़ते हैं फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी "रसप्रिया"


धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई - अपरूप-रूप!

चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा - अपरुप-रुप!

...खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता!

मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं।

मोहना ने मुस्करा कर पूछा, 'तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?'

'ऐ!' - बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, 'रसपिरिया?

...हाँ ...नहीं। तुमने कैसे ...तुमने कहाँ सुना बे...?'

'बेटा' कहते-कहते रुक गया। ...परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से 'बेटा' कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी - 'बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! ...मृदंग फोड़ दो।'

मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, 'अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!'

बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, 'क्यों, ठीक है न बाप जी?'
बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे।

लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।

'रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? ...बोलो बेटा!'
दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। ...कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।

मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। ...आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया - 'तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?'

हाँ, यह जीना भी कोई जीना है! निर्लज्जता है, और थेथरई की भी सीमा होती है। ...पंद्रह साल से वह गले में मृदंग लटका कर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। ...दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, 'धा तिंग धा तिंग' भी बड़ी मुश्किल से बजाता है। ...अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज विकृत हो गई है। किंतु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा। ...फूटी भाथी से जैसी आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज-सों-य,सों-य!

पंद्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुंडन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मंडली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है! ...गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं - 'अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक जमाना था!'
इस जमाने में मोहना-जैसा लड़का भी है - सुंदर, सलोना और सुरीला! ...रसप्रिया गाने का आग्रह करता है, 'एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!'

'रसपिरिया सुनोगे? ...अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने...'

'हे-ए-ए-हे-ए... मोहना, बैल भागे...!' एक चरवाहा चिल्लाया, 'रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!'
'अरे बाप!' मोहना भागा।

कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार। ...खटमिट्ठाल पाट!

पँचकौड़ी ने पुकार कर कहा, 'मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँक कर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?'
मोहना जा रहा था। उसने उलट कर देखा भी नहीं।
रसप्रिया!

विदापत नाचवाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेंदर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाचवालों ने गा-गा कर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।

खेत के 'आल' पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है, मोहना की राह देख रहा है। ...जेठ की चढ़ती दोपहरी में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। ...पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी - रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गानेवाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाए जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी-
'हाँ... रे, हल जोते हलवाहा भैया रे...'

खुरपी रे चलावे... म-ज-दू-र!

एहि पंथे, धनी मोरा हे रुसलि...।

खेतों में काम करते हलवाहों और मजदूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में - उसकी रुठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसी ने?...

अब तो दोपहरी नीरस कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।

आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी - टिं...ई...टिं-हि-क!

मिरदंगिया ने गाली दी - 'शैतान!'

उसको छोड़ कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़ कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!

उसने अपनी झोली टटोल कर देखा - आम हैं, मूढ़ी है। ...उसे भूख लगी। मोहन के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।

मोहना-जैसे सुंदर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी जिंदगी के अधिकांश दिन बीते हैं। ...विदापत नाच में नाचनेवाले 'नटुआ' का अनुसंधान खेल नहीं। ...सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना-जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि...
मैथिल ब्राह्मणों, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज्जत होती थी। ...अपनी बोली - मिथिलाम - में नटुआ के मुँह से 'जनम अवधि हम रुप निहारल' सुन कर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का 'मूलगैन' नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था - ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजा कर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।

'ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?'

'मधुकांत ठाकुर की बेटी की तरह...।'

'नः! छोटी चंपा-जैसी सुरत है!'

पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मंडली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती है। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटका कर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी दे कर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।

नाच और गाना सिखाने में कभी कठिनाई नहीं हुई, मृदंग के स्पष्ट 'बोल' पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के जिद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और भी शहद लपेट कर वह फुसलाता...

'किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है। ...अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है। अपना-अपना 'गुन' दिखा कर लोगों को रिझा कर गुजारा करना।'

एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी। ...बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि ...बहुत पुरानी बात है।

पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।

'रसपिरिया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?'

मोहना न जाने कब लौट आया।

मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगा कर देखने लगा ...यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिल कर वह खो रहा है। लाल-लाल होठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है जरुर!...
मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है। ...उत्सवों के बासीटटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था। ...लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भून कर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। ...गरम पानी!
पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला, 'हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है, गरम पानी पियो।'
'यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डागडरबाबू भी कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गई है। दवा...।'

आगे कहने की जरूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना-जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछ कर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!

'माँ, भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।'

मिरदंगिया ने मुस्करा कर कहा, 'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ!'
केले के सूखे पतले पर मूढ़ी और आम रख कर उसने बड़े प्यार से कहा, 'आओ, एक मुट्ठी खा लो।'

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

किंतु मोहना की आँखों से रह-रह कर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था। ...भूखा, बीमार, भगवान!

'आओ, खा लो बेटा! ...रसपिरिया नहीं सुनोगे?'

माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया।

...लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देगें। ...भीख का अन्न!

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती हैं। मिरदंगिया ने मोहना - जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता। ...और अपना बच्चा! हूँ! ...अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराए।...

'मोहना!'

'कोई देख लेगा तो?'

'तो क्या होगा?'

'माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?'

'कौन भीख माँगता है?' मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुडंलीकार सोया हुआ साँप फन फैला कर फुफकार उठा, 'ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि...

'ऐ! गाली क्यों देते हो!' मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।
वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास।

आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी ...टिंही ...ई ...टिं-टिं-ग!

'मोहना!' मिरदंगिया की अवाज गंभीर हो गई।
मोहना जरा दूर जा कर खड़ा हो गया।

'किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजा कर, पदावली गा कर, लोगों को रिझा कर पेट पालता हूँ। ...तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह। ...मै नहीं दूँगा। ...तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ।'

मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। ...आसमान में उड़नेवाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है। ...टिं-टिं-हिं टिंटिक!

मोहना डर गया। एक डग, दो डग ...दे दौड़। वह भागा।
एक बीघा दूर जा कर उसने चिल्लाकर कहा, 'डायन ने बान मार कर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय...'

'ऐं! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना? ...रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है।'

'मोहना!'

मोहना ने जाते-जाते चिल्ला कर कहा, 'करैला!' अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया 'करैला' कहने से चिढ़ता है! ...कौन है यह मोहना?

मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसमें कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा। ...सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था।

उसकी आँखों में आँसू झरने लगे।

जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीख कर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजनेवाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद हैं।

सोनमा ने तो गाली ही दी थी - 'गुरुगिरी कहता है, चोट्टा!'
रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठा कर बोली थी - 'हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसला कर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान! इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूट कर...।'
मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लंबी साँस ली। ...रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मंडली में शामिल हुआ था - रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। ...बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती - 'नव अनुरागिनी राधा, किछु नाँहि मानय बाधा।'...मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरु जी ने उसे मृदंग थमा दिया था... आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरु जी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरु जी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी।

रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था। गुरु जी की मंडली छोड़ कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आ कर अपनी मंडली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। ...लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। ...जोधन गुरु जी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी। रमपतिया उसी से मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ जवाब दे दिया था - 'क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नंदूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को...।' चीख उठी थी रमपतिया - पाँचू! ...चुप रहो!'

उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका दे कर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल हो कर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी - 'एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा।'...और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और तल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली! ...हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मंडली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति-नाच ही उठ गया। अब तो कोई भी विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। ...धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठंडी महफिलों में ही पनपा था... बेकार जिंदगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा - मृदंग!
एक युग से वह गले में मृदंग लटका कर भीख माँग रहा है - धा-तिंग, धा-तिंग!

वह एक आम उठा कर चूसने लगा - लेकिन, लेकिन, ...लेकिन ...मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?
उँगली टेढ़ी होने की खबर सुन कर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़ कर रोती रही थी - 'हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। ...मेरी बात लौटा दो भगवान! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू, मैंने कुछ भी नहीं किया है। जरुर किसी डायन ने बान मार दिया है।'
मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए सूरज की ओर देखा। ...इस मृदंग को कलेजे से सटा कर रमतपिया ने कितनी रातें काटी हैं! ...मिरदंग को उसने अपने छाती से लगा लिया।
पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कहा - टिं-टिं-हिंक्‌!

'एस्साला!'उसने चील को गाली दी। तंबाकू चुनिया कर मुँह में डाल ली और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा - धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!

पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।
-अ‌‌‌-कि-हे-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!

सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसी ने सुरीली आवाज में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिया की पदावली उठाई -
'न-व-वृंदा-वन, न-व-न-व-तरु-ग-न, न-व-नव विकसित फूल...'

मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई उसकी उँगलियाँ स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुंड दोपहर की उतरती छाया में आ कर जमा होने लगे।
खेतों में काम करनेवालों ने कहा, 'पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठ कर बजाने लगता है।'

'बहुत दिन के बाद लौटा है।'

'हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।'
रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आ कर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठ कर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पार कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गानेवाला? इस जमाने में रसप्रिया का रसिक...? झाड़ी में छिप कर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बंद करके उसने गले को साफ किया। मोहना के गले में राधा आ कर बैठ गई है! ...क्या बंदिश है!

'न-वी-वह नयनक नी...र!

आहो...पललि बहए ताहि ती...र!'
मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थीं। ...चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। ...रह-रह कर वह अपनी विकृत आवाज में पदों की कड़ी धड़ता - फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!

धिरिनागि-धिनता!

'दुहु रस...म...य तनु-गुने नहीं ओर।

लागल दुहुक न भाँगय जो-र।'
मोहना के आधे काले और आधे लाल होंठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पद समाप्त। करते हुए वह बोला, 'इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?'

मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!
...उफ! मिरदंगिया धम्म से जमीन पर बैठ गया - 'कमाल! कमाल!...किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?'

मोहना ने हँस कर जवाब दिया, 'सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज गाती है। ...प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।'

'हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा। ...समय-कुसमय का भी खयाल रखना। लो,अब आम खालो।'

मोहना बेझिझक आम ले कर चूसने लगा।

'एक और लो।'

मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।

'अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना! तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं?'

'बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।'

'और तुम नौकरी करते हो! किसके यहाँ?'

'कमलपुर के नंदूबाबू के यहाँ।'

'नंदूबाबू के यहाँ?'

मोहना ने बताया उसका घर सहरसा में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे ले कर अपने ममहर आई है... कमलपुर।

'कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?'

मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा।

...नंदूबाबू - मोहना - मोहना की माँ!

'डायनवाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?'

'हाँ।'

'और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधर-पटटी मडंलीवालों का मिरदंग छीन लिया था।

...बेताला बजा रहा था। ठीक है न?'

मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफेद हो गई। उसने अपने को सम्हाल कर पूछा, 'तुम्हारे बाप का नाम क्या है?'

'अजोधादास!'

'अजोधादास?'

बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर। ...मंडली में गठरी ढोता था। बिना पैसा का नौकर बेचारा अजोधादास!

'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।' एक लंबी साँस ले कर मिरदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोल कर कागज की एक पुड़िया निकाली उसने।

मोहना ने पहचान लिया - 'लोट? क्या है, लोट?'

'हाँ, नोट है।'

'कितने रुपएवाला है? पचटकिया। ऐं... दसटकिया? जरा छूने दोगे? कहाँ से लाए?' मोहना एक ही साँस में सब कुछ पूछ गया, 'सब दसटकिया हैं?'

'हाँ, सब मिला कर चालीस रुपए हैं।' मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाई, फिर फुसफुसा कर बोला, 'मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडरबाबू को दे कर बढ़िया दवा लिखा लेना। ...खट्ट-मिट्ठा परहेज़ करना। ...गरम पानी जरुर पीना।'

'रुपए मुझे क्यों देते हो?'

'जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।'

मोहना ने भी एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। उसके होंठों की कालिख और गहरी हो गई।

मिरदंगिया बोला, 'बीड़ी-तंबाकू भी पीते हो? खबरदार!'
वह उठ खड़ा हुआ।

मोहना ने रुपए ले लिए।

'अच्छी तरह गाँठ बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।'
'और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा, यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के...।'

मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया।

'मेरी माँ खेत में घास काट रही है। चलो न!' मोहना ने आग्रह किया।

मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोच कर बोला, 'नहीं मोहना! तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पा कर तुम्हारी माँ 'महारानी' हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर...! दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।'

मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नंदूबाबू की आँखों-जैसी हैं...।

'रे-मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?'

'तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।'

'हाँ। तुमने कैसे जान लिया?'

'रे-मोहना-रे-हे!'

एक गाय ने सुर-में-सुर मिला कर अपने बछड़े को बुलाया।
गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँक कर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।

'जाओ।' मिरदंगिया ने कहा, 'माँ बुला रही है। जाओ।...अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?...

'अरे, चलू मन, चलू मन- ससुरार जइवे हो रामा,
कि आहो रामा,
नैहिरा में अगिया लगायब रे-की...।'

खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।

'ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है?' कौन बजा रहा था मृदंग रे?' घास का बोझा सिर पर ले कर मोहना की माँ खड़ी है।

'पँचकौड़ी मिरदंगिया।'

'ऐं, वह आया है? आया है वह?' उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।

'मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! ...उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।

माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।

'लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी - बेईमान है, गुरु-दरोही है, झूठा है!'

'है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। खबरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया! दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। ...चल, उठा बोझ!'

मोहना ने बोझ उठाते समय कहा, 'जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया...।'

'चौप! रसपिरिया का नाम मत ले।'

अजीब है माँ! जब गुस्साएगी तो वाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुँकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरत खुश, तुरत नाराज...

दूर से मृदंग की आवाज आई - धा-तिंग, धा-तिंग!
मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खा कर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिर कर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटका कर जा रहा था। बोला, 'क्या हुआ, माँ?'

'कुछ नहीं।'

-धा-तिंग, धा-तिंग!

मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज हो गई ...मिटटी की सुंगध हवा में धीरे-धीरे घुलने लगी।

-धा-तिंग, धा-तिंग!

'मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा?' मोहना की माँ आगे कुछ बोल न सकी।

'कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा...'

'झूठा, बेईमान!' मोहना की माँ आँसू पोंछ कर बोली, 'ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।'

मोहना चुपचाप खड़ा रहा।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

जासूसी उपन्यास पर प्रियदर्शन की टिप्पणी


हम जासूसी उपन्यास क्यों पढ़ते हैं?
प्रियदर्शन

मारियो पूजो के मशहूर उपन्यास 'गॉडफादर' में एक इंस्पेक्टर मैक्लुस्की गॉडफादर के बेटे माइकल कारलियोन को थप्पड़ मार कर उसका जबड़ा तोड़ देता है। इस इंस्पेक्टर को और उसके पीछे खड़े लोगों को सजा दी जानी है।
माइकल तय करता है कि वह इंस्पेक्टर को गोली मार देगा। उसका बड़ा भाई सोनी कारलियोन उसे यह समझाना चाहता है कि इंस्पेक्टर की उससे कोई निजी दुश्मनी नहीं थी- इसे वह एक पेशेवर प्रतिद्वंद्विता की तरह ले, निजी हमले की तरह नहीं। कुछ देर बाद यही बात उसका सलाहकार टॉम हेगान उससे कहता है। 'प्रोफेशनल' और 'पर्सनल' के इस फ़र्क को माइकल बड़ी शिद्दत से ख़ारिज करता हुआ कहता है- ‘टॉम, मूर्ख मत बनो। सबकुछ पर्सनल है, कारोबार का एक-एक रेशा। हर आदमी हर रोज़ जो टुकड़ा भकोसता है, वह बस पर्सनल है। वे इसी को कारोबार कहते हैं। लेकिन यह पूरी तरह निजी है। तुम्हें मालूम है, ये मैंने किससे सीखा? डॉन से, गॉडफादर से। अगर उसके किसी दोस्त को बिजली का झटका लग जाए तो वह उसे निजी तौर पर लेता था। मेरा मेरीन में जाना उसके लिए निजी था। यही चीज़ उसको बड़ा बनाती है। वह सबकुछ निजी तौर पर लेता है।‘
यहां पहुंचते-पहुंचते मैं अटक जाता हूं। मैं कोई अपराध कथा पढ़ रहा हूं या जीवन को समझने वाली कोई किताब? मारियो पूजो के इस उपन्यास की ताकत क्या यह है कि उसमें इटली के माफिया गिरोहों की आपसी लड़ाई का बड़ा जीवंत वर्णन है? या उसकी ताकत इस बात में निहित है कि इस अपराध कथा के भीतर भी जीवन के स्पंदन को, रिश्तों के द्वंद्व को अलग-अलग स्तरों पर समझा जा सकता है?
दूसरों की नहीं जानता, लेकिन मेरी साहित्यिक मनोरचना और अभिरुचि के विकास में जासूसी और अपराध कथाओं का भी अच्छा ख़ासा हाथ रहा है। बचपन से ही जासूसी उपन्यास मेरे साथ रहे। राजन इकबाल सीरीज़ वाले एससी बेदी के बाल पॉकेट बुक्स सबसे प्रिय रहे। मिलने पर रायजादा की राम रहीम सीरीज़ भी पढ़ लेता था। लेकिन जल्द ही इन बाल जासूसी उपन्यासों का साथ छूट गया। कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास चले आए। इनके साथ कुशवाहा कांत, कुमार कश्यप, ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश कांबोज के उपन्यास पढ़ता रहा। सच तो यह है कि ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति की मेरी पहली समझ बनाई। इस राजनीति में भारत और रूस के जासूस एक तरफ़ हुआ करते थे और पाकिस्तान-चीन-अमेरिका और इंग्लैंड के दूसरी तरफ। सीआईए और केजीबी जैसी ख़ौफ़नाक संस्थाओं के नाम पहली बार इन्हीं उपन्यासों में मिले। उगांडा, ईदी अमीन, लीबिया,  कर्नल गद्दाफ़ी- इन सबसे पहला परिचय उन्हीं दिनों हुआ। कर्नल विनोद, कैप्टन, हमीद, राजेश, विक्रांत, विशाल, जगन जैसे जासूस तरह-तरह से कातिलों को पकड़ते रहे, देश के दुश्मनों से हमें बचाते रहे, अपनों के बीच छुपे परायों की पहचान करते रहे और उन अपराधी चेहरों को सामने लाते रहे और हमारा मन बहलाते रहे।
तब भी जानता था- अब कुछ और ज़्यादा जानता हूं- ये उपन्यास ज़िंदगी के, जासूसी के, जांच-पड़ताल और खोजबीन के बहुत सतही और उथले संस्करण थे। सेक्स, हिंसा और रहस्य-रोमांच की उस चाशनी को अपने-अपने ब्रांड के हिसाब से मिलाने वाले जो दरअसल पश्चिम के जासूसी उपन्यासों से बनी थी। लेकिन अगर जीवन और अध्ययन की वे प्राथमिक सीढ़ियां नहीं आई होतीं तो कुछ और ऊपर उठकर न गंभीर साहित्य को सहजता से पढ़ पाता और न ही जासूसी उपन्यासों और अपराध कथाओं की उस दुनिया में डूब पाता जो अब भी खींचती है। मैंने बहुत सारे तो नहीं, फिर भी सतही और गंभीर कई तरह की वे कहानियां पढ़ी हैं जिन्हें जासूसी उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इनमें जेम्स हेडली चेज़ और शिडनी शेल्डन से लेकर अगाथा क्रिस्टी, रॉबिन कुक, जेफ़री आर्चर और कई दूसरे भूले-भटके नामों तक की रचनाएं शामिल हैं।
लेकिन इन अपराध कथाओं में ऐसा क्या है जो हमें खींचता है? अपराध कोई अच्छी चीज़ नहीं, कत्ल, अपहरण या लूटपाट की खबरें हमें अख़बारों में रोज़ मिलती हैं जिनसे हम त्रस्त रहते हैं। या हमारे अवचेतन में अपराध को लेकर एक कौतूहल रहता है जो अचानक किसी कहानी के बीच सक्रिय हो जाता है और हमें एक तरह की तृप्ति देता है? यह बहुत आजमाया हुआ और अब तो सर्वेक्षणों से भी प्रमाणित निष्कर्ष है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा अपराध कथाएं बिकती हैं- चाहे वे साहित्य के रूप में हो या फिल्मों में या फिर टीवी सीरियल में। हो सकता है कि इसका कुछ वास्ता हमारे भीतर की उस आदिम अतृप्ति से हो जिनके बीच कोई अपराध घटित होता है- या फिर यह समझने से कि आखिर वह कौन सा मनोविज्ञान है जिसमें इंसान अपराध करता है।
लेकिन अपराध कथाओं या जासूसी उपन्यासों के हिट होने की सबसे बड़ी वजह उस कौतूहल में है जो इंसानी सभ्यता को आगे ले जाने वाले मूल तत्वों में है। यह कौतूहल न होता तो शायद हम अपने भीतर और बाहर की बहुत सारी छुपी हुई दुनियाओं की तलाश न कर पाते। वैसे तो पूरा साहित्य ही एक तरह से बाहर-भीतर के दृश्य-अदृश्य संसार की तलाश है, और कई बार बहुत शास्त्रीय मानी जाने वाली किताबें अपनी दुरूहता के बावजूद बेहद दिलचस्प अपराध और जासूसी कथाएं साबित हुई हैं। उंबेर्तो इको का उपन्यास 'नेम आॅफ द रोज़' कहीं से जासूसी उपन्यास नहीं है लेकिन लंबे दार्शनिक आख्यानों और संदर्भों से भरी यह पूरी किताब अंततः एक मठ में लगातार हो रही मौतों और उसकी जांच करने आए एक संन्यासी और उसके शिष्य की कहानी के बीच ही आगे बढ़ती है। ओरहान पामुक के उपन्यास माई नेम इज़ रेड की शुरुआत भी एक क़त्ल से ही होती है।
बहरहाल, यहां विषयांतर का ख़तरा है। हम एक विधा के रूप में जिन अपराध कथाओं की बात कर रहे हैं, वहां की दुनिया भी उत्सुकता के मूल रेशों से ही बनी है- बस इस फर्क के साथ कि उनमें बड़ी सघन तीव्रता को साधने की कोशिश होती है- उसके अपने फॉर्मूले भी होते हैं। हर अपराध या जासूसी कथा में कुछ कोशिशों को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। मसलन एक शिल्प इस तरह का होता है जिसमें हत्यारा या अपराधी बिल्कुल सामने न आए। बिल्कुल अंत में यह राज खुलता है कि अपराधी कौन है? इसी शैली में यह कोशिश शामिल रहती है कि अपराधी वह निकले जिस पर पूरे उपन्यास में सबसे कम संदेह हो। हत्या करने में उसका हाथ सामने आए जो मृतक के सबसे करीब हो। अगाथा क्रिस्टी के कई उपन्यासों में यह प्रविधि दिखाई पड़ती है। ‘मर्डर इन मेसोपोटामिया’ में एक चौकोर घर के अलग-अलग कमरों में 12 लोग हैं और एक हत्या हुई है। हत्या का संदेह हर किसी पर है- लेकिन अंत में कातिल वह निकलता है जो सबसे पाक-साफ़ मालूम होता है, जिसने मक़तूल की सेवा के लिए एक नर्स और क़त्ल की जांच के लिए एक जासूस को बुलाया है।
दूसरी प्रविधि यह है कि हत्यारा या अपराधी एक के बाद एक जुर्म करता जाता है और जासूस उसके पीछे लगा रहता है। यहां सारी उत्सुकता इस बात को लेकर होती है कि अगला जुर्म कैसे होना है और चूहे-बिल्ली का यह खेल ख़त्म कब होना है।
चूहे बिल्ली के इस खेल की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि इसके अपने नायक हैं- कुछ तो इतने बड़े कि अपने लेखक से आगे निकल कर किंवदंतियों और मुहावरों में बदल गए हैं। आर्थर कानन डायल को कम लोग जानते हैं, उस शर्लक होम्स को सब जानते हैं जो पलक झपकते एक साथ कई चीज़ें विश्लेषित कर लेता है। ज़रूरत पड़ने पर वह बहादुरी भी दिखा सकता है लेकिन उसका नायकत्व दरअसल उस अंतर्दृष्टि में छुपा है जिसके सहारे वह अपराध की जगह देख अपराधी का मन पढ़ लेता है। हिंदी में मेजर बलवंत और कर्नल विनोद जैसे कई जासूस रहे हैं जिनके आने से अचानक पाठक कोई नया राज़ खुलने की उम्मीद पाल लेता है।
बहरहाल, यह सिर्फ ‘कौन’ और ‘कैसे’ का मामला होता तो जासूसी उपन्यास कब की अपनी उम्र खो चुके होते। इसके साथ बहुत सारी और भी चाशनियां हैं जो फेंटी जाती हैं। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की चाशनी इसमें सबसे अहम है। जासूसी कथाओं का संसार वैश्विक राजनीतिक घटनाओं से भी खूब बनता रहा है। बीसवीं सदी के विश्वयुद्धों को पृष्ठभूमि में रखकर कुछ बेहतरीन जासूसी उपन्यास लिखे गए हैं। अगाथा क्रिस्टी के ‘सीक्रेट ऐडवर्सरीज’ की शुरुआत ही पहले विश्वयुद्ध में डुबो दिए गए एक जहाज़ से होती है जिसमें एक शख्स एक अनजान लड़की को कुछ बेहद गोपनीय दस्तावेज दे देता है ताकि वह उसे सुरक्षित पहुंचा सके। इसके बाद वह लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद का उपन्यास उसकी तलाश के बीच दो बेखबर युवाओं के रोमांच से बनता है। इत्तिफाकन इस उपन्यास में अगाथा क्रिस्टी दो और प्रविधियों का इस्तेमाल करती हैं जो आगे चल कर जासूसी उपन्यासों में कई बार इस्तेमाल किए गए। उसकी गुम किरदार स्मृतिलोप की शिकार होती है जिसके चलते बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। इसके अलावा इस उपन्यास में दो बेरोज़गार युवा- टॉमी और ट्यूपेंस- जो कहीं से जासूस होने के लिए प्रशिक्षित या तैयार नहीं हैं, और जिन्हें बस अपनी ज़रूरत के लिए एक खतरनाक मिशन में लगना पड़ता है- सबसे बड़े नायक सिद्ध होते हैं। इसके बाद कई ऐसे उपन्यास आए जिनमें ऐसे शौकिया या मामूली लोग बड़ी-बड़ी साज़िशों का पर्दाफाश करते देखे गए।
जेफरी आर्चर के ‘ऑनर अमंग थीव्स’ में सद्दाम हुसैन के लोग अमेरिका का डिक्लियरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस चुरा लेने की योजना बनाते हैं। एक बार लगता है कि उन्होंने उसे चुरा भी लिया। 90 के दशक के बाद खाड़ी के देशों और अमेरिका के बीच के तनाव की पृष्ठभूमि में यह एक दिलचस्प उपन्यास है। इसी तरह जेफरी आर्चर का ही एक और उपन्यास ‘फॉल्स इंप्रेशंस’ हालांकि एक पेंटिंग को लेकर है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में 9/11 का हमला भी है। इस कहानी में पुराने रईसों को उधार देने वाले एक बैंक की सलाहकार ऐसी ही एक रईस महिला के घर उसकी संपत्ति का मूल्यांकन करने पहुंचती है। महिला उधार चुकाने में अक्षम है और उसकी जायदाद बेचकर रकम वसूली की बात है। ये सलाहकार देखती है कि उसके विशाल मकान में वॉन गॉ का एक सेल्फ पोर्ट्रेट लगा हुआ है। वह उस महिला को बताती है कि बस यह पोर्ट्रेट बेच कर वह अपना पूरा कर्ज़ ही नहीं अदा कर सकती है, आने वाली ज़िंदगी की ज़रूरतों के लिए भी पैसा जुटा सकती है। यह बात वह न्यूयॉर्क में बैठे अपने बॉस को भी बता देती है जो उस लड़की पर बहुत बुरी तरह नाराज होता है। वह उसे फौरन वापस लौटने का आदेश देता है। उसी रात एजिलाबेथ नाम की उस महिला की हत्या हो जाती है और संदेह वहां से चली इस लड़की पर जाता है जो इन सबसे बेख़बर है। वह सुबह वर्ल्ड ट्रेड टावर की ऊपरी मंज़िलों में कहीं स्थित अपने दफ्तर पहुंचती है और एक-एक दो विमानों को इमारत से टकराता हुआ देखती है। अगले कई पन्नों में इस बात का वर्णन है कि वह कैसे वहां से उतरती है। यह पूरा उपन्यास आने वाले पन्नों में पेंटिंग की दुनिया में मूल और नकली की बहस को रखता है, चित्रकला की परंपरा को रखता है और एक बहुत रोचक पाठ बनाता है। 
दरअसल जासूसी उपन्यासों का यह संसार अब तो- खासकर अंग्रेज़ी में- कई हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तरफ शुद्ध अपराध कथाएं हैं जिनमें बहुत वीभत्स तरीके से की जा रही हत्याओं की जांच पड़ताल है, दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव के ताने-बाने से बने जासूसी उपन्यास हैं जिनमें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साजिशें करने और उन्हें नाकाम करने का खेल चलता रहता है। तीसरी तरफ़ कुछ ‘लाइट डिटेक्टिव’ उपन्यास हैं जिनमें न वीभत्स हत्याएं हैं और न ब़ड़ी साजिशें, बल्कि छोटे-छोटे तनावों के बीच छोटे-छोटे अपराधों और चूकों से बनने वाला रहस्य रोमांच है। इन सबके बीच ‘मेडिकल थ्रिलर’ भी हैं जिनके लिए रोबिन कुक मशहूर है। चिकित्सकीय गुत्थियों पर केंद्रित उसके उपन्यास अपनी तरह से बेहद रोमांचक हुआ करते हैं। ‘हार्मफुल इंटेंट’ नाम के उपन्यास में एक डॉक्टर एक महिला को एनीस्थीसिया देता है और उसकी जान चली जाती है। डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, उसे जेल की सज़ा होती है। इसके बाद डॉक्टर कैसे अपने-आप को बेगुनाह साबित करता है और कैसे इस कोशिश में नकली इंजेक्शनों दवाओं का एक कार्टल पकड़ा जाता है, इसकी बड़ी दिलचस्प कहानी मिलती है।
तो मेरे लिए जासूसी उपन्यासों का यह संसार जितना दिलचस्प रहा है उतना ही आंख खोलने वाला भी। मामूली लोगों के विकट साहस, गैरमामूली लगने वाले लोगों की साधारणता, अपराधियों के भीतर दबी इंसानियत, सफ़ेदपोश लोगों के भीतर बसे जुर्म, जीवन के सहज ब्योरों के बीच छुपी रहने वाली कहानियां, एक-दूसरे की वास्तविक शिनाख्त का सवाल- यह सब यह संसार हमारे सामने लाता रहा है।
फिर दुहराना होगा- इन जासूसी उपन्यासों को पढ़ना जीवन या पठन-पाठन की प्राथमिक सीढ़ियों पर ही चढ़ना है। ये लेखक हमारे टॉल्स्टॉय, शेक्सपियर, पामुक या मारख़ेज़ नहीं हैं जो हमारे लिए जीवन की बहुत सारी सूक्ष्मताओं का संधान करते हैं। लेकिन ये वे लोग हैं जो याद दिलाते हैं कि जीवन बहुत सारी अनिश्चितताओं और संभावनाओं से भरा है। इनसे गुज़र कर हम जब वास्तविक लेखकों तक पहुंचते हैं तो उस लेखन का भी कहीं ज़्यादा आनंद ले पाते हैं। जासूसी उपन्यासों ने मेरे लिए यह काम किया है, कुछ सीढ़ियां आसान बनाई हैं, कुछ चीज़ों को समझने की एक पृष्ठभूमि तैयार की है।
हंस से साभार।

आलोक धन्वा की लोकप्रिय कविता -भागी हुई लड़कियां


बिहार की धरती मुंगेर में 1948 ई० को जन्म लेने वाले आलोक धन्वा अब अपनी कविताओं की वजह से नहीं बल्कि सभा-समारोह में शिरकत एवं अन्य कारणों से चर्चा में रहते हैं, लेकिन वे हिंदी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने 70 के दशक में कविता को एक नई पहचान दी। उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है। ’जनता का आदमी’, ’गोली दागो पोस्टर’, ’कपड़े के जूते’ और ’ब्रूनों की बेटियाँ’ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं। अंग्रेज़ी और रूसी में कविताओं के अनुवाद हुए हैं। उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया है। आइए पढते हैं उनकी बहुत ही लोकप्रिय कविता - "भागी हुई लड़कियां"

एक 

घर की जंजीरें 
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं 
जब घर से कोई लड़की भागती है 

क्या उस रात की याद आ रही है 
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी 
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी? 

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले! 

क्या तुम यह सोचते थे 
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गए? 
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का 
जो मंच से अटूट उठता हुआ 
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था? 

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं 
कभी वह खत 
जिसे भागने से पहले 
वह अपनी मेज पर रख गई 
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से 
उसका संवाद 
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा 
उसका आबनूस 
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे 
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफी बची हो सकती है 
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में? 

उसकी बची-खुची चीजों को 
जला डालोगे? 
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे? 
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
सन्तूर की तरह 
केश में 

तीन 

उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे 
उसके ही घर की हवा से 
उसे वहां से भी मिटाओगे 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहां से भी 
मैं जानता हूं 
कुलीनता की हिंसा ! 

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जाएगी 
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह 

वह कोई पहली लड़की नहीं है 
जो भागी है 
और न वह अन्तिम लड़की होगी 
अभी और भी लड़के होंगे 
और भी लड़कियां होंगी 
जो भागेंगे मार्च के महीने में 

लड़की भागती है 
जैसे फूलों गुम होती हुई 
तारों में गुम होती हुई 
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई 
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में 

चार 

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है 
कि कोई लड़का भी भागा होगा 

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं 
जिनके साथ वह जा सकती है 
कुछ भी कर सकती है 
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है 

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत 
घर से बाहर 
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं 
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा 
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो 

वह कहीं भी हो सकती है 
गिर सकती है 
बिखर सकती है 
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में 
गलतियां भी खुद ही करेगी 
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक 
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी 
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी 

पांच 

लड़की भागती है 
जैसे सफेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आरपार 
जर्जर दूल्हों से 
कितनी धूल उठती है 

तुम 
जो 
पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से 
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से 
कितना आतंकित होते हो 
जब स्त्री बेखौफ भटकती है 
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रमिकाओं में ! 

अब तो वह कहीं भी हो सकती है 
उन आगामी देशों में 
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा 

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है 

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी? 

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं? 

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया? 
क्या तुम उसे उठा लाए 
अपनी हैसियत अपनी ताकत से? 
तुम उठा लाए एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें 
उसके निधन के बाद की भी रातें ! 

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने 
सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में 
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
और दुनिया जब तक रहेगी 
सिर्फ आज की रात भी रहेगी