मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सुल्तान अहमद की "पतझड़ में पेड" की समीक्षा समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में


   सुल्तान अहमद की कविताओं का लोक मनुष्य के अपने लोक का रूपक है। यह चिह्न, यह लक्षण, यह भाव सुल्तान अहमद के कविता-शिल्प को हरदम ताज़ा बनाए रखता है। इनकी कविताएँ आत्मगत, ख़ुद के लिए अथवा आनंद के लिए नहीं रची गई हैं। बल्कि ये कविताएँ उस बड़े समाज के लिए हैं, जिसे पूँजी से लबालब समाज हमेशा घृणा की नज़र से देखता भर नहीं है, घृणा की हद पार करते हुए इस समाज से घृणा करता है। ये कविताएँ उस भूखण्ड की कविताएँ हैं, जहाँ रहने वालों की आँखों का पानी सूख चुका है। इसलिए कि इस भूखण्ड का पानी तक उन तत्वों के लिए है, जो सत्ता पाते तो हैं इस भूखण्ड की विकास से वंचित जनता के प्रयास से, मगर वे उसी पूँजी का हिस्सा होकर इनका सारा हिस्सा मार जाते हैं। सुल्तान अहमद जनता के पक्ष के कवि हैं, सो जनता के पक्ष की लड़ाई अपनी लड़ाई मानकर सत्तापक्ष की मुख़ालफ़त करने से बाज़ नहीं आते। यह सच है कि कविता का हर पक्ष विश्व की आम जनता रही है। इसलिए हर कवि जनता का कार्यकर्ता अपने को मानता रहा है। यह कवि की अपनी परंपरा रही है, इसीलिए प्रत्येक कवि इस परंपरा को बचाए रखना चाहता है।
पढते हैं सुल्तान अहमद की "पतझड़ में पेड" की समीक्षा समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में।

'पतझड़ में पेड़' ( सुल्तान अहमद ) : इस निपात समय को जवान बरगद का पेड़ सौंपते कवि की कविताएँ
● शहंशाह आलम

सुल्तान अहमद समकालीन कविता के वैसे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, जिनकी कविताएँ हमारे समय की अवनति को, ह्रास को, अध:पतन को को चिह्नित करके जवान, हरियल, उन्नति से भरे पत्ते फागुन और चैत माह को सौंपते रहे हैं। यानी जिस माह में सभी वृक्षों के पत्ते झड़कर नए पत्ते आते हैं, सुल्तान अहमद यही काम कविता के साथ भी करते दिखाई देते हैं। इनके 'कलंकित होने से पूर्व', 'उठी हुई बाहों का समुद्र', 'दीवार के इधर-उधर', 'लंका की परछाइयाँ', 'पहला क़दम' कविता-संग्रह की कविताएँ कविता के जीवन को मनुष्य के जीवन से जोड़कर देखी जाती रही हैं। मेरा मानना है कि कविता का भी अपना एक जीवन हुआ करता है। तभी तो कविता में सदियों से मनुष्य का जगमग जीवन पूरी तरह प्रकट होता रहा है। कवि का काम ही है रक्त-रंजित स्याह समय का आख्यान रचते हुए मनुष्य-जीवन को जगमग करना। सुल्तान अहमद यही करते आए हैं। तभी तो अपने शिल्प और अपनी भाषा को पसारते-विस्तारते हुए पतझड़ के पेड़ तक पहुँचते हैं, पहुँचकर समकालीन कविता के शिल्प, समकालीन कविता की भाषा को एक नया शब्द-संसार दे डालते हैं। यही वजह है कि अपने नए संग्रह का नाम 'पतझड़ में पेड़' रखते हैं और एक ज़बरदस्त आवेग रचते हैं :

          आवाज़ों से
          आवाज़ें जब
          दुश्मनों की तरह
          टकरा रही हों
          अपने सारे
          अर्थ गँवा रही हों
          पराजय नहीं है
          ख़ामोश रह जाना
          बाँसुरी के लिए
          जगह बनाना है ( 'बाँसुरी के लिए' / पृ. 42 )।

   सुल्तान अहमद की कविताओं का लोक मनुष्य के अपने लोक का रूपक है। यह चिह्न, यह लक्षण, यह भाव सुल्तान अहमद के कविता-शिल्प को हरदम ताज़ा बनाए रखता है। इनकी कविताएँ आत्मगत, ख़ुद के लिए अथवा आनंद के लिए नहीं रची गई हैं। बल्कि ये कविताएँ उस बड़े समाज के लिए हैं, जिसे पूँजी से लबालब समाज हमेशा घृणा की नज़र से देखता भर नहीं है, घृणा की हद पार करते हुए इस समाज से घृणा करता है। ये कविताएँ उस भूखण्ड की कविताएँ हैं, जहाँ रहने वालों की आँखों का पानी सूख चुका है। इसलिए कि इस भूखण्ड का पानी तक उन तत्वों के लिए है, जो सत्ता पाते तो हैं इस भूखण्ड की विकास से वंचित जनता के प्रयास से, मगर वे उसी पूँजी का हिस्सा होकर इनका सारा हिस्सा मार जाते हैं। सुल्तान अहमद जनता के पक्ष के कवि हैं, सो जनता के पक्ष की लड़ाई अपनी लड़ाई मानकर सत्तापक्ष की मुख़ालफ़त करने से बाज़ नहीं आते। यह सच है कि कविता का हर पक्ष विश्व की आम जनता रही है। इसलिए हर कवि जनता का कार्यकर्ता अपने को मानता रहा है। यह कवि की अपनी परंपरा रही है, इसीलिए प्रत्येक कवि इस परंपरा को बचाए रखना चाहता है। सुल्तान अहमद भी यही करते हैं :

          तुम चाहती हो
          दीवारों के बीच
          जितना विस्तार है
          उससे कुछ ज़्यादा हो
          मैं चाहता हूँ तुम्हें
          पूरा आकाश मिले
          पंखों को विकास
          शक्ति और अभ्यास मिले
          लड़ने को तूफ़ानी हवाएँ
          तो आँखों को
          वासंती उल्लास मिले
          लेकिन इन दीवारों का
          मैं भी क्या करूँगा
          तुम भी क्या करोगी
          व्यक्तिगत ( 'अपनी मासूम चिड़िया से' / पृ. 48 )।

   समय तेज़ी से आगे की तरफ़ बढ़ रहा है। ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस तेज़ी से बदल रहे समय में अपने यहाँ की जो श्रमशील जनता है, इसने ख़ुद को कितना बदला है, इसने अपने सपनों को कितना बदला है, इसने पूँजीवाद के विरुद्ध, शासन-सत्ता के विरुद्ध अपनी लड़ाई का कौन-सा तरीक़ा बदला है? मुझसे इसका उत्तर आप चाहें, तो मेरा उत्तर यही है कि भारत की श्रमशील जनता ने आज़ादी के बाद से आज तक पूँजीवाद से कोई ऐसी गंभीर निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ी, जिससे भारत का पूँजीवादी वर्ग, जोकि श्रमशील जनता का ही नहीं बल्कि इस आज़ाद देश को अपनी नई ग़ुलामी में जकड़ रखा है, क़ैद कर रखा है, इस वर्ग में जनता की किसी लड़ाई का भय पैदा होता और यह वर्ग श्रमशील जनता को उसका वाजिब हक़ देता। मुझे लगता है कि पूँजीवाद सत्ता के सुरक्षित संरक्षण में जिस तेज़ी से अपने देश में अपनी जड़ें जमा रहा है, इस पूँजीवाद को ऐसे ही छोड़ दिया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब समाजवाद का सपना सिर्फ़ सपना रह जाएगा और भारत की जनता बस मुनाफ़ा बटोरने का ज़रिया भर रह जाएगी। सुल्तान अहमद की भी यही चिंता रही है। इस मुनाफ़ाख़ोर संस्कृति के विरुद्ध कोई निर्णायक लड़ाई हर कवि की तरह सुल्तान अहमद भी चाहते हैं और इस लड़ाई का बिगुल भी बजाते हैं :

          एक ख़ौफ़नाक परछाईं है
          चौतरफ़ा मंडराती हुई
          जिसके सिर से गुज़र जाती है
          उसकी साँसें सिकुड़ जाती हैं
          सीना सूना हो जाता है
          आँखें मरुस्थल की तरह फैल जाती हैं

          अपनी साँसों को समेटते हुए
          एक शहर से
          दूसरे शहर भागता है आदमी
          उससे तेज़
          मंडराती है परछाईं
          मेरी ही तरह तुम भी
          पहचानते हो उस परछाईं को
          और उसे भी
          जिसकी है वो ('ख़ौफ़नाक परछाईं' / पृ. 30 )।

   सुल्तान अहमद पूँजी की जिस काली परछाईं की तरफ़ इशारा करते हैं और पहचान भी बताते हैं, इस परछाईं से कवियों की लड़ाई बेहद पुरानी है। सुल्तान अहमद जनता के जिस शासन का निर्माण विश्व भर में चाहते हैं, यह कठिन निर्माण अवश्य है, परन्तु विश्व की जनता की शक्ति के आगे असंभव कुछ भी नहीं है। इसमें संदेह नहीं कि जनता जब ठान लेती है, तो बड़े-से-बड़े टैंक के आगे सीना तानकर खड़ी हो जाती है और सरकारें यहाँ-वहाँ मुँह छिपाती भागती दिखाई देती हैं। तब भी अपने भारत में जनता के द्वारा ऐसी लड़ाई का सपना बाक़ी है, समर शेष है। इसलिए कि यहाँ की मिट्टी सहिष्णु है। पूँजी के लात-जूते खाकर भी हमने सहिष्णु ही बने रहना सीख लिया है। अब कवि कोई हो, अपने यहाँ के सुल्तान अहमद हों, जो ज़रा धीमी आँच में अपने विरोध को पकाते हैं अथवा पाकिस्तान के अहमद फ़राज़ हों, जो किसी लावे की तरह खदकते हुए अपना विरोध प्रकट करते हैं, दोनों अपने-अपने तेवर के साथ मुनाफ़ाख़ोर सरकारों के विरुद्ध अवाम को उकसाते रहे हैं। मगर अवाम को फ़ुर्सत कहाँ है कि उनके लिए रचे जा रहे शब्दों का परीक्षण करे और कवि द्वारा कहे पर अमल भी करे। इसलिए कि कविताएँ पूरे समाज के लिए होती हैं :

          मेरी बातों को
          बहकावा समझते हुए
          गमलों में चले गए
          कुछ दुनियादार पौधे
          वक़्त से
          खाद-पानी पा रहे हैं
          क्या हुआ जो
          रह गए हैं बौने ( 'इस कड़ी धूप में' / पृ. 74 )।

   ग़ौरतलब है कि सुल्तान अहमद उम्मीद के कवि हैं। भले इनकी कविताई किसी सत्ता से, किसी पूँजीपति से, किसी अँधेरे समय से सीधे मुठभेड़ न भी करती हो, तब भी मेरी नज़र में सुल्तान अहमद मुठभेड़ के कवि हैं। इसलिए कि सुल्तान अहमद गुजरात जैसे जिस प्रदेश से आते हैं, जो काले समय की प्रयोगशाला रहा है, जिस काले समय को ख़ुद सुल्तान अहमद ने जिया है, उस काले समय के प्रति उनका तीव्र विरोध न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। इसीलिए सुल्तान अहमद रचनात्मकता से बँधे कहते हैं : सूखे होंठों पर / सूखी ज़बान फेरते हुए / वहाँ से मैंने / सिर्फ़ धुआँ ही देखा / आग नहीं देखी / वह जिन घरों में / लगाई गई थी / उन्हें छोड़कर / किस तरह भागे थे लोग / कौन-कौन-सी ज़रूरी / और कौन-कौन-सी / प्यारी चीज़ें आ गई थीं / उसकी चपेट में / देख नहीं पाया मैं / न यही देखा / कि कोई आदमी / कितनी देर तलक / और किस तरह / ज़िंदा रहा जलते हुए ( 'उस वहम का डर' / पृ. 27-28 )। इस लय-प्रवाह में सुल्तान अहमद का 'पतझड़ का पेड़' रक्त-रंजित होकर भी, कठिनाई सहकर भी, अशांत रहकर भी हरियल पत्ते अपने कठिन समय को देता-सौंपता है। इसलिए कि कवि अगर सच्चा है, तो वह नपुंसक बने रहना पसंद नहीं करेगा। वह अपने समय को जो भी देगा, सार्थक ही देगा और अपने समय से सार्थक ही चुनेगा। सुल्तान अहमद को पढ़कर सुल्तान अहमद से जो सीखा जा सकता, मैंने यही सीखा है कि अपने समय के छंद को पकड़कर समय को लयबद्ध किया जाना ही समय को रचा जाना है। और सुल्तान अहमद भी इसी सूत्र को पकड़कर कवितारत हैं। इसमें न मुझे कोई संदेह है, न सुल्तान अहमद के पाठकों को।
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पतझड़ में पेड़ ( कविता-संग्रह )
कवि : सुल्तान अहमद
प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, नई दिल्ली-110002
मोबाइल : 09979451234
मूल्य : ₹300
शहंशाह आलम


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कालोनी, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505 / मोबाइल : 09835417537
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मंगलवार, 12 जुलाई 2016

भावना की गजलें

भावना की गजल में शिल्प की रवानी दिखती है तो कथ्य में जनचेतना से जुडे सवाल। जहां मर्म और चुनौती एक साथ देखने को मिलते हैं। आप खुद भावना की प्रस्तुत गजलों में इसे महसूस करें।
भावना

1
नदियों के गंदे पानी को घर में निथार कर
चूल्हा जला रही है वो पत्ते बुहार कर

फुटपाथ के परिंदों की तकदीर है यही
ताउम्र उनको जीना है दामन पसार कर

उड़ने लगी है कल्पना बिंबों की खोज में
कुछ शब्द चल पड़े हैं स्वयं को निखार कर

जो कामयाब होते हैं हर गाम पर सदा
जो हर लड़ाई लड़ते हैं ग़लती सुधार कर

अब तो लड़ाई है मेरी अन्याय के ख़िलाफ़
हर झूठ का रख देंगे हम चोला उतार कर

2
वो मंज़िल से पिछड़ता जा रहा है
मगर फिर भी वो चलता जा रहा है

डुबो कर पूरी धरती चैन लेगा
ये जो बादल बरसता जा रहा है

दिखी है आइने में शक्ल जबसे
हर-इक मंजर बदलता जा रहा है

भला क्यूं छीन लेते हो खिलौने ?
वो बच्चा अब हहरता जा रहा है

ख़बर क्या देख ली चैनल पे उसने
बदन तबसे सिहरता जा रहा है

कभी तो आग निकलेगी यहां से
वो पत्थर को रगड़ता जा रहा है

3
ये गुस्सा फूट लावा हाे रहा है
उन्हें लगता दिखावा हो रहा है

प्रलोभन है कि मांगें पूरी होंगी
मगर यह तो भुलावा हाे रहा है

सुना था स्वर्ग जैसा है ये धरती
यहां फिर क्यों दिखावा हो रहा है

वो पानी में दिखाने चांद लाया
बड़ा अच्छा छलावा हो रहा है

हुई सत्ता की ऐसी ताजपोशी
नगर भर को बुलावा हो रहा है

4
एक-सी होती नहीं हर इक कहानी की वजह
कौन कह सकता है दरिया की रवानी की वजह

वक़्त ने धीरे से आकर कह दिया कुछ कान में
आ गई हमको समझ इस मेहरबानी की वजह

जब जिसे चाहो, उसे सत्ता के मद में रौंद दो
क्यूं भला होती नहीं है हुक्मरानी की वजह ?

पेड़-पौधे काटकर औ तोड़ कर चट्टान को
पूछते हैं वो ही यूं बौराये पानी की वजह

है अड़ा घोड़ा बहुत शतरंज की इस चाल में
है यही राजा की अब तक ज़िंदगानी की वजह

5
कुछ तो लब से कहा करे कोई
मेरी ख़ातिर दुआ करे कोई

तोड़ कर पत्थरों के सीने को
बन के दरिया बहा करे कोई

दिल लगाया है चांदनी से अगर,
रात भर फिर जगा करे कोई

प्रेम बूंदों में ढल के जब आये
कितने दिन तक बचा करे कोई

छोड़ कर चल दिया शहर उनका
बेख़बर हो, रहा करे कोई

ख़ार राहों का फिर न चुभ जाये
बाख़बर हो चला करे कोई

उम्र भर हम किया करें सज़्दा
यूं ही खुल कर हंसा करे कोई

6
देर तक माटी के संग सज़्दा हुआ है धूप में
खेतिहर से बीज तब रोपा गया है धूप में

जेठ की इस दोपहर में नींद क्यूं आती नहीं
वो परिंदा दर-ब-दर क्या खोजता है धूप में

हाथ में रस्सी बंधी है और रुखे बाल हैं
एक पागल बैठ कर क्या सोचता है धूप में ?

गंध होती क्या बदन की, शख़्स क्या कह पाएगा
छांव को जो आशियाना टांकता है धूप में

बूंद माथे की टपक कर दास्तां उसकी कहे
जो फलों औ सब्जियों को बेचता है धूप में

7
पलकों से क्या कहता पानी
आंसू में जब ढलता पानी

जिस रंग में घोलोगे उसको
घुल कर वैसा बनता पानी

कीचड़ रख कर मन के भीतर
ख़ूब कमल-सा खिलता पानी

क्या कहता है तट से जाकर
कल-कल छल-छल बहता पानी

सूरज ने नज़रें क्या डालीं
सात रंग में ढलता पानी

बादल तो उसकी छत पर था,
मेरे घर क्यूं बरसा पानी ?

झील में अक्सर ख़ामोशी से
नाम किसी का जपता पानी

8
अपने बचपन की कहानी आज भी
याद मुझको है जुबानी आज भी

दोपहर की धूप में गुड़ियों के संग
खेलती मुनिया सयानी आज भी

छांव में पीपल के, पंचों की यहां
चल रही है हुक्मरानी आज भी

चाय-बिस्कुट से नहीं करते विदा
गांव में है मेजबानी आज भी

झील में ही अक्स अपना देखता
ये गगन है आसमानी आज भी

9
कई जालों में उलझा आदमी का
कहां रहता ठिकाना आदमी का

दिलों की मिल्लतें होती यहां भी
सहज होता है रिश्ता आदमी का

कभी गिरगिट, कभी गिद्धों की भाषा,
तो कैसे हो भरोसा आदमी का

कोई चाहत, कोई अहसास होगा
सड़क पर ईंट ढोता आदमी का

नहीं भाता है मुझको तिल बराबर
समंदर-सा गरजना आदमी का

मुकद्दर साथ हो, सबकुछ मुमकिन,
ज़माना क्या करेगा आदमी का

10
यूं सरे राह क्या माजरा हो गया
दिल अकेला था, अब आपका हो गया

चैन मिलता नहीं है कहीं भी यहां
एक दूजे से क्या वास्ता हो गया

ढूंढ़ते रह गए, बस, तुम्हारा पता
मुझसे मेरा पता लापता हो गया

जिनकी ख़ुशियों से मतलब नहीं था कभी
उनके ग़म से भी अब वास्ता हो गया

है बदल-सा गया सारा मंजर यहां
पल में कैसा अलग वाक़या हो गया

थीं जुदा मंज़िलें, ख़्वाहिशें भी अलग
क्यूं भला एक-ही रास्ता हो गया


संपर्क:-
bhavna.201120@gmail.com




रविवार, 10 जुलाई 2016

अनिरूद्ध सिंहा की गजलें


      साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है जो न सिर्फ़ अपने शब्दों के रचाव-कसाव से सबको सम्मोहित करने में सफल होता है बल्कि बहुत ही तेजी से लोगों के जुबां पर भी चढ जाता है। आज आनंद लेते हैं गजलगो अनिरूद्ध सिंहा की पांच गजलों का।
अनिरूद्ध सिंहा


1.

रख रही ज़ख़्मों पे अपनी उँगलियाँ पागल हवा
खोल देगी  दर्द की सब  खिड़कियाँ पागल हवा

ले  गई  है बादलों  तक  गर्म रातों की सनक
अब गिराएगी मकां पर बिजलियाँ  पागल हवा

बस जरा उनके दिलों से  दूर क्या हम हो गए
है  बढ़ाने  पर  अमादा  दूरियाँ  पागल  हवा

आंधियों की बात  तुमसे क्या करें हम  दोस्तो
जब  उड़ाकर ले गई सब तितलियाँ पागल हवा

हर दफ़ा तूफान  में  वो बादलों  की  आड़ में
साहिलों से  दूर करती  कश्तियां  पागल  हवा


2.


 अपना किसी भी और से लहजा नहीं मिला
जीने  का  ढंग  और  सलीका  नहीं मिला

जुगनू  तमाम  रात   चमकते   रहे  वहाँ
लेकिन सफ़र में एक भी साया  नहीं मिला

सहरा में अपनी प्यास  को देता रहा  फ़रेब
पानी भरा हो जिसमें  वो दरिया नहीं मिला

पहले तो  मेरी  बात  पे  आई  हया  उन्हें
फिर मुझको बात करने का मौका नहीं मिला

खुश हैं पड़ोसवाले  भी  इस बात पर  बहुत
मुझको मेरे  नसीब से ज्यादा  नहीं   मिला

3.

हवा में  पाँव  होठों पर हँसी है
ये कैसी हुस्न  की दीवानगी है

नए वादों के  फिर जेवर पहनकर
सियासत मुफ़लिसी में ढल रही है

वहाँ कुछ होंठ भी पत्थर के होंगे
जहां कुछ  बेअदब सी ज़िंदगी है

न इतनी तेज़ चल पुरवाइयों  में
अभी मौसम में थोड़ी सी नमी है

भला क्यों  चाँद के पहलू में तेरे
बदन खामोश कुछ-कुछ बेबसी है  

4.

कदमों के जब निशान  इरादों में ढल गए
हम हौसलों के  साथ  हवा में निकल गए

अब भी  है अपने  नूर पे मगरूर वो बहुत
रस्सी तो जल  गई है कहाँ उसके बल गए

प्यासी ज़मीं के जिस्म पे ऐसी बला की धूप
चेहरे थे जिनके  चांद  सफ़र  में बदल गए

फिर मुझको भूलने  की भी रस्में  अदा हुईं
पहले तमाम  ख़त थे जो यादों के जल गए

रक्खे हैं जब से सर पे किसी ने दुआ के हाथ
मुट्ठी  में  बंद  उनके  मुकद्दर  संभल  गए

5.

गरीबी जब कभी  हालात  से रिश्ता निभाती है
मेरे कच्चे  मकानों  से कोई आवाज़  आती  है

खमोशी छाई  रहती है  सवालों  के उठाने  पर
सियासत गुफ़्तगू  से हर दफा  दामन बचाती है

अदब की  तंग चादर  ओढ़  लेते  ही कोई बेटी
लड़कपन गाँव की गलियों में हँसकर छोड़ जाती है

कलेंडर में  शहीदों  की  जो  सूरत  देखता हूँ तो
गुलामी  की  कोई  तारीख  मेरा  दिल  दुखती है

मुहब्बत की  कलाई  को  हवस  के थाम लेते  ही
शराफ़त  चीख़  उठती  है  वफ़ा  आँसू  बहाती  है

संपर्क:-
अनिरूद्ध सिंहा
-गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार)811201  
मोबाइल-09430450098
Email-anirudhsinhamunger@gmail॰com                          
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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

भावना की 'सपनों को मरने मत देना' पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी

  भावना की अपनी ख़ासियत है कि इनकी कविताएँ इन्हीं की जीवनानुभूतियों को प्रकट करती हैं। हर कविता में भावना अपने को रचते हुए पूरी स्त्री-जाति को रच जाती हैं। भावना की स्त्री-जाति आज के पुरुष-समाज को पूरी तरह चुनौती भी देती हैं। ये कविताएँ पुरुष द्वारा किसी स्त्री को अमरत्व की प्रार्थना के बाद का प्रसाद लेने से मना भी करती हैं। इन कविताओं में स्त्री की अपनी शक्ति बार-बार लौटती दिखाई देती है। ये कविताएँ किसी आदिम भय की तरह अपने पाठ के समय हमारे कानों तक नहीं पहुँचतीं बल्कि ये कविताएँ एक डरी हुई स्त्री को उसके डर से मुक्ति का रास्ता दिखाती हुई चलती हैं। पढते हैं भावना की 'सपनों को मरने मत देना' पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी।
भावना

     'सपनों को मरने मत देना'(भावना) : एक अच्छी दुनिया का मतलब समझाती कविताएँ
     ● शहंशाह आलम

कविता का मतलब प्रार्थना के शब्द नहीं होते। मेरा मानना है कि कोई कवि जैसे ही अपनी कविता को प्रार्थना का माध्यम बना लेता है, कविता की मृत्यु उसी क्षण हो जाती है। इसलिए कि कविता-लेखन का अर्थ यह तो क़तई नहीं है कि कवि अपने आस-पास की उन शक्तियों के पक्ष में कविता लिखना शुरू कर दे, जो शक्तियाँ हमारे हिस्से का सबकुछ छिनती चली आई हैं सदियों से। बहुत सारे कवि ऐसा शिद्दत से करते आए हैं। यानी बहुत सारे कवि ऐसा करके कविता को मारते आए हैं। ऐसे बहुत सारे कवियों के होने के बावजूद उन कवियों की सँख्या अधिक है, जो नींद तक में चलते हुए उन शक्तियों के पास नहीं चले जाते, जो शक्तियाँ कुछ लाभ पहुँचाने के बदले में कवि के लड़ने की ताक़त को मार डालते हैं। मुझे समकालीन कविता की कवयित्री भावना की कविताओं को पढ़ते हुए यही लगा। भावना एक ऐसी कवयित्री हैं, जो अपने हिस्से के सपनों को पाने के लिए आवेदन अथवा निवेदन नहीं करतीं। न इसके लिए करुण शब्दों का इस्तेमाल करती दिखाई देती हैं :
   जब भी आती है यह ख़बर
   फिर किसी का नोचा गया है
   ज़िंदा गोश्त
   किसी भेड़िए ने फिर बनाया है
   किसी लड़की को शिकार
   तो सच पूछिए
   स्त्री होने की आत्मग्लानि
   मुझे जीने नहीं देती।

भावना इन पंक्तियों के तुरंत बाद अपने कवि के ज़िंदा होने का सबूत देती हैं :
   सवाल इतना
   कि कैसे जीएगी लड़की
   लेकिन पीड़िता की जिजीविषा
   बोझिल आँखों में उतरते सपने
   और देह के साथ निचोड़ी गई आत्मा
   सुप्त नहीं हुई है
   फ़ोटो पत्रकार कहती है
   'बलात्कार जीवन का अंत नहीं
   मैं लौटना चाहती हूँ काम पर'
   तो सच कहूँ
   हमारे अंदर भरने लगती है
   धरती की ऊष्मा
   प्रकृति की ख़ुशबू
   और स्त्री होने का अहसास।

कविता की ये पंक्तियाँ भावना की सद्य: प्रकाशित कविताओं की किताब 'सपनों को मरने मत देना' से ली गई हैं। संग्रह में भावना की नब्बे के आसपास कविताओं को जगह दी गई है। ये सारी कविताएँ एक स्त्री की मिट्टी, एक स्त्री की थकान, एक स्त्री के पसीने से होते हुए एक स्त्री के ही चाक पर गढ़ी गई हैं। यही वजह है कि इन कविताओं में एक स्त्री की तकलीफ़ इस तरह दिखाई देती है, जैसे हम किसी झील के साफ़ पानी में अपना चेहरा स्पष्ट देख लेते हैं। लेकिन यहाँ दर्ज तकलीफ़ उस स्त्री की नहीं है, जो अपने कमरे को बंद करके रोज़ रोती हैं। ये ऐसी स्त्री की तकलीफ़ की कविताएँ हैं, जो पूरी तरह स्वस्थ है और जिनके स्तनों में अभी दूध भी ख़ूब भरा हुआ है यानी ये कविताएँ एक ऐसी स्त्री की कविताएँ हैं, जो जीवट है, जीवित है और जिसका जीवन वृत्तांत संघर्ष से परिपूर्ण है :
   नदी अब भी तड़पती है समुंदर के लिए
   लेकिन नदी अब समझदार हो गई है
   वह नहीं मिटाना चाहती अपना वजूद
   वह जीना चाहती है
   अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ(नदी/पृ.14)।

भावना की अपनी ख़ासियत है कि इनकी कविताएँ इन्हीं की जीवनानुभूतियों को प्रकट करती हैं। हर कविता में भावना अपने को रचते हुए पूरी स्त्री-जाति को रच जाती हैं। भावना की स्त्री-जाति आज के पुरुष-समाज को पूरी तरह चुनौती भी देती हैं। ये कविताएँ पुरुष द्वारा किसी स्त्री को अमरत्व की प्रार्थना के बाद का प्रसाद लेने से मना भी करती हैं। इन कविताओं में स्त्री की अपनी शक्ति बार-बार लौटती दिखाई देती है। ये कविताएँ किसी आदिम भय की तरह अपने पाठ के समय हमारे कानों तक नहीं पहुँचतीं बल्कि ये कविताएँ एक डरी हुई स्त्री को उसके डर से मुक्ति का रास्ता दिखाती हुई चलती हैं :
   उसे पता है
   सूरज तो आसमान से निकलता है
   किसी की आँखों में कैसे
   पर उसे नहीं मालूम
   सूरज आँख में भी निकलता है
   बशर्ते उसके अंदर बचा हो
   रात के अँधकार को झेलने का जज़्बा(प्यार का सूरज/पृ.23)।

भावना की कविताएँ हमारे भीतर धरती की तरह फैलती हैं। इनकी कविताएँ एक स्त्री के वर्तमान के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। इसलिए कि भावना ने अपने कवि-जीवन में जो कुछ सीखा है, एक स्त्री से ही सीखा है, जोकि दब्बू टाइप स्त्री क़तई नहीं है। भावना जानती हैं कि इस पुरुषवादी समाज से अपना हक़ और अपना हिस्सा लेने के लिए यह ज़रूरी है कि एक मज़बूत स्त्री की पूरी ताक़त के साथ अपने हिस्से की लड़ाई ख़ुद ही लड़नी पड़ेगी। एक स्त्री के लिए ऐसा करना बेहद ज़रूरी भी हो गया है क्योंकि आज पुरुष स्त्री को लेकर अपनी असंवेदनशीलता की हदें पार करने में लगातार भीड़ा दिखाई देता है। उस पर से इस कठिन, जटिल, असहज, क्रूर-कठोर समय अलग ही तरह से इनका पीछा करता दिखाई देता है :
   इससे पहले कि
   तेज़ धूप
   झुलसा दे मेरा चेहरा
   मुझे ढूँढ़ लेनी चाहिए
   भावनाओं की गहन छाँव
   इससे पहले कि
   उबड़-खाबड़ ज़मीन
   थका दे मुझे बुरी तरह
   मुझे तलाश लेनी चाहिए
   एक समतल कोलतार में
   लिपटी सड़क(मेरा अस्तित्व/पृ.17)।

भावना की यह एक अलग तरह की विशेषता है कि संकट आने से पहले अपनी सुरक्षा में लग जाना चाहती हैं। यह भी सुखद है कि भावना ऐसा करने के लिए किसी चतुराई से काम नहीं लेतीं बल्कि बिलकुल सहज और रचनात्मक होकर अपने स्त्री-समाज के लिए एक बेहतर, जीने लायक़ दुनिया को सुरक्षित कर लेना चाहती हैं। अपनी दुनिया को बचाए रखने का किसी स्त्री का यह तरीक़ा मुझे देशज लगता है और कारगर भी। यही कविता का काम भी है कि बिना मार-काट के इस पूरी दुनिया को बचाए रखना, जिस दुनिया को आज हम सब पूरी तरह नष्ट कर देने के लिए उतारू हैं। इतने उतारू हैं कि हम अपने जीवन में बिलकुल अप्रकृत दिखाई देते हैं। अब हम अपने जीवन में न मिट्टी से कुछ सीखते हैं, न किसी पेड़ से, न किसी स्त्री से :
   औरत
   जो ख़ुद एक नदी है
   स्थिर नदी
   जो तोड़ दे अपनी सीमाएँ
   तो आ जाता है सैलाब(औरत/पृ.51)

अथवा,
   मेरी कविता
   नहीं बनना चाहती
   कॉरपोरेट जगत की ज़ुबान
   न ही पढ़ना चाहती है
   किसी के सम्मान में कशीदे
   मेरी कविता
   आज भी पंचायत भवन जाते हुए
   सुस्ता लेना चाहती है
   पीपल की छाँव में
   जहाँ टोकरी भर घास छिल
   गप मारती होती हैं तरुनियाँ(मेरी कविता/पृ.81)।

भावना की कविताएँ कोई नई कविता-प्रवृति, कोई नई कविता-शैली, कोई नई कविता-भाषा या कोई नई कविता-परंपरा भले विकसित नहीं कर पाई हैं, तब भी इन कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए हम एकदम से निराश नहीं हो जाते। भावना की कविताओं को पढ़ते हुए हमें इतना अहसास ज़रूर होता रहता है कि ये कविताएँ इतने के बावजूद हमारे भीतर एक नया साहस अवश्य देती हैं। साथ ही, इन कविताओं की कवयित्री के भीतर समकालीन कविता को विस्तारने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं, इससे हम इनका नहीं कर सकते। इसलिए कि कविता-कर्म एक निहायत दुष्कर कर्म है और हर कवि अंतत: अपने इस कर्म को चमकाने-दमकाने के लिए सीखता ही रहता है। भावना भी कविता के इस दुष्कर कर्म से जुड़े रहकर समकालीन कविता को एक नवीनता और एक अनूठापन भविष्य में देंगी, इसे लेकर कविता समाज पूरी तरह आश्वस्त दिखाई देता है। भावना के भीतर कविता को समझने, कविता को बरतने की जो गहराई, जो व्यापकता है, वह तारीफ़ के क़ाबिल है। इसलिए भी कि भावना की कविताएँ मूल्य-केन्द्रित हैं और मानव-केन्द्रित भी। इसलिए भी कि भावना की कविताएँ हमारे सपनों को मरने नहीं देना चाहतीं।
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सपनों को मरने मत देना(कविता-संग्रह)/ कवयित्री : भावना/ प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, सी-56/यू जी एफ़-4, शालीमार गार्डेन, एक्सटेंशन-।।, ग़ाज़ियाबाद-201005 (उत्तर प्रदेश), मोबाइल संपर्क : 09546333084, मूल्य : ₹ 225 मात्र।
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शहंशाह आलम

शहंशाह आलम
प्रकाशन विभाग, कमरा सँख्या : 17, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015, बिहार, मोबाइल : 09835417537
 
 
 
 



मंगलवार, 5 जुलाई 2016

राजकिशोर राजन की नजर में बी आर विप्लवी की काव्य-यात्रा


कवि शोषण के ऐतिहासिक, सामाजिक कारणों का गहराई से विश्लेषण करता है। इनका अध्ययन चकित करता है और यह अकारण नहीं कि इस खंड काव्य के अंत में कुल 38 संदर्भ ग्रंथों की सूची दर्ज है। हिन्दी भाषा में लिखी खंड काव्य में इस प्रकार की तैयारी प्राय: दृष्टिगोचर नहीं होती। इय तथ्य से प्रकारांतर से यह भी साबित होता है कि कवि की काव्ययात्रा 'स्वांत:सुखाय' नहीं अपितु 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' है। हमें ये जान लेना चाहिए कि जिसे हम काव्य-सत्य कहते हैं वह सामाजिक सत्य से अलग नहीं हो सकता। अगर दोनों में अंतर है तो वैसी रचना भाषा में विलास के अलावा कुछ भी नहीं है। बी.आर. विप्लवी की यह काव्य-कृति उसी सामाजिक सत्य को उद्धाटित करती है। पढते हैं कवि- समीक्षक राजकिशोर राजन की नजरों में बी आर विप्लवी की काव्य-यात्रा को।
बी आर विप्लवी

आदमीयत का आरजूनामा-
कवि बी.आर.विप्लवी की काव्य यात्रा
-राजकिशोर राजन

मानवता का दर्द लिखेंगे
माटी की बू-बास लिखेंगे
हम अपने इस कालखंड का
एक नया इतिहास लिखेंगे
जब मैं अपने समय के एक महत्वपूर्ण गजलकार बी.आर.विप्लवी के रचना कर्म से गुजर रहा था तो अदम गोंडवी की ये पंक्तियाँ रह-रह कौंध जा रही थी। कारण कि विप्लवी जी की काव्ययात्रा के पीछे जो प्रेरक शक्तियाँ हैं उनमें मनुष्यता का दर्द, अन्याय और शोषण से मुक्त एक नया इतिहास लिखने की तड़प और संकल्प है। इनकी प्रथम प्रकाशित कृतियों में एक  'प्रवंचना' नामक खंडकाव्य है। इस काव्यसंग्रह की रचना सन् 1978 में हुई जब विप्लवी जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक (विज्ञान) के छात्र थे। इसकी भूमिका जिसे कवि ने 'सुलह-सफाई' नाम दिया है पढ़ कर अचंभित रह जाना पड़ता है। भारत की वर्णवादी-जातिवादी व्यवस्था, इतिहास का एक नया सच हमारे सामने पहाड़ की तरह खड़ा होता है। क्या भारत का इतिहास, षड़यंत्र, हनन-दलन, शोषण का इतिहास है ? क्या ! भारत में धर्म, बर्चस्व की राजनीति है ? ऐसे बहुत सारे प्रश्नों की ऊपज है 'प्रवंचना'। कुल आठ सर्गों में बँटी यह कृति 'सम्भावना' तक पहुँच अपने गंतव्य तक पहुँचती है। समाज-व्यवस्था के मूल में कौन-कौन सी प्रेरक शक्तियाँ हैं ? क्या हमारी व्यवस्था का निष्कर्ष इसी तथ्य में निहित है कि सबल, निर्बल जन पर शासन करे और उसके लिए न्याय-अन्याय, नीति-अनीति, पाप-पुण्य सब स्वीकृत हो ? सत्ता-सुख-साधन ही हमारी सभ्यता का प्रेय-श्रेय हो ? कितना दु:खद वह क्षण होगा जब कवि को कहना पड़ा -
आदर्श यहाँ का सत्ता-सुख-साधन है
आदर्श यहाँ निर्बल जन पर शासन है
जाने ऐसा अधिकार दिया है किसने ?
परवशता को स्वीकार कराया किसने ? (पृ0 26)
कवि की दृष्टि साफ है, उसे कोई गफलत नहीं है। वह और उसकी कविता ऐसी शक्तियों के विरूध्द खड़ी होती हैं जो शोषक हैं, जो निर्बल की छाती पर खड़ा हो अपनी महानता का उद्धोष करते हैं। दरअसल हर कवि की अपनी जमीन होती है और होनी चाहिए। वह उसी जमीन पर खड़ा होता है, तब बड़ा होता है। बी. आर. विप्लवी की कविता इसी जमीन से उपजती है। इसीलिए उनकी कविता में चाक-चिक्य नहीं है, बनावटीपन नहीं है, तितली के पंख में पटाखा बाँध कर, भाषा के हलके में विस्फोट करने की कोई लालसा नहीं है।
इस खंड काव्य के अंतर्गत (प्रथम सर्ग) कवि की स्थापना है कि सिन्धुघाटी की सभ्यता आर्यों की सभ्यता से उन्नत, समानतावादी श्रमण-सभ्यता थी जिसे आर्यों ने नष्ट कर दिया और वहीं से कोलों-भीलों, मुण्डा, उराँव, शम्बर, नल-नीलों, द्रविणों यानी इस देश के मूलवासियों का शोषण प्रारंभ हो गया। कवि की स्थापना कल्पनाश्रीत नहीं है। बहुत सारे इतिहासकार सिन्धुघाटी की सभ्यता के पतन के मूल में इसे एक कारण मानते हैं। आप कवि से कई मामलों में असहमत भी हो सकते हैं। उदाहरणस्वरूप  सिन्धुघाटी सभ्यता निस्संदेह उन्नत नगरीय सभ्यता थी परन्तु उसमें भी पर्याप्त मात्रा में असमानताएं मौजूद थीं। सामाजिक गतिशीलता में निरंतर ठहराव आ रहा था। भोग-विलास की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही थी जबकि आर्यों का समाज मुक्त समाज था उनमें विजय प्राप्त करने की जीजिविषा थी। वे कुशल अश्वारोही, बलिष्ठ और स्वर्ण-लिप्सा से दूर थे। परन्तु इतना तो सत्य है कि उस सभ्यता के विनाश ने भारत की प्राचीन संस्कृति के स्थान पर आर्य संस्कृति को जन्म दिया जिसने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक असमानता, श्रम का अवमूल्यन और बर्चस्ववादी नीति को जन्म दिया -
सोने की चिड़िया सब कहते थे जिसको
किसने पर कतरा, भस्म कर दिया उसको
द्रविड़ों के सुदृढ़ पाँव सत्ता से उखड़े
वे विन्ध्य पार जाकर फिर से निखरे (पृ0 32)
कवि शोषण के ऐतिहासिक, सामाजिक कारणों का गहराई से विश्लेषण करता है। इनका अध्ययन चकित करता है और यह अकारण नहीं कि इस खंड काव्य के अंत में कुल 38 संदर्भ ग्रंथों की सूची दर्ज है। हिन्दी भाषा में लिखी खंड काव्य में इस प्रकार की तैयारी प्राय: दृष्टिगोचर नहीं होती। इय तथ्य से प्रकारांतर से यह भी साबित होता है कि कवि की काव्ययात्रा 'स्वांत:सुखाय' नहीं अपितु 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' है। हमें ये जान लेना चाहिए कि जिसे हम काव्य-सत्य कहते हैं वह सामाजिक सत्य से अलग नहीं हो सकता। अगर दोनों में अंतर है तो वैसी रचना भाषा में विलास के अलावा कुछ भी नहीं है। बी.आर. विप्लवी की यह काव्य-कृति उसी सामाजिक सत्य को उद्धाटित करती है। गोस्वामी तुलसीदास अद्भुत प्रतिभाशाली कवि हैं परन्तु उनका सामाजिक सत्य तब पता चलता है जब वे गुरू-गंभीर स्वर में अह्वान करते हैं :-
बरनाश्रम निज-निज धरम, निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भय सोक न रोग॥
(रामचरित मानस/उत्तर कांड)
यह तुलसी के लिए आदर्श समाज व्यवस्था है। समाज व्यस्था का यही स्वप्न हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) और मुख्यधारा के भारतीय साहित्य का रहा है। इस व्यवस्था, परंपरा, दुनिया को बदलने का स्वप्न कवि का है। यह संग्रह ऑंख खोलने वाली कथा कहती है कि किस प्रकार छल-कपट से इस देश के निवासियों  को गुलाम बनाया गया और उन्हें चिरकाल तक उसका दंश झेलने के लिए दस्यु, शूद्र, नाग आदि-आदि नाम दे दिया गया। सदियों से हो रहे विश्वासघात की कथा लंबी है:-
किसकी-किसकी कथा कहें, कितने ऐसे नर-वर हैं
जिनका कहीं न लेखा, साक्षी मात्र धरा-अंबर है (पृ0 -39)
परंन्तु बात यही खत्म नहीं होती, शुरू होती है। कवि भारतीय कुटिल परंपरा की नृशंसता को उकेरता है कि छलने वाला-दलने वाला ही शोषित-वंचित समाज के लोगों से अपनी पूजा-अभ्यर्थना करवाता है। और इस प्रकार स्वत्व चुरा लेता है।
तृतीय सर्ग से आरंभ कर सप्तम सर्ग तक बाली वध का वर्णन है। और अष्टम सर्ग है संभावना जिसे उपसंहार भी कहा जा सकता है। इसमें कवि प्रवंचना का शिकार होते रहे समुदाय का आह्वान करता है :-
यह मनुज जब तक सरल है, सौम्य है
जाल के धागे नहीं पहचानता
वह प्रवंचित ही बनाया जायेगा
छद्म-छल को है न जब तक जानता। (पृ0 90)
संक्षेप में कहा जाए तो 'प्रवंचना' वंचित समाज का ऐतिहासिक दस्तावेज है। कवि ने दलित, वंचित समाज के इतिहास की पृष्ठभूमि में बाली वध प्रकरण चित्रित किया है। परन्तु कई प्रश्न विचारणीय हैं। अगरचे बाली वध आर्य राम ने षड़यंत्र के अंतर्गत किया ताकि रावण वध का पथ प्रशस्त हो सके और इसके लिए बाली भ्राता सुग्रीव को माध्यम बनाया गया परन्तु, अंगद बाली पुत्र था वह पितृहंता राम का भक्त और लंका की सभा में राम का राजदूत कैसे बन गया ? किष्किंधा निवासियों ने बाली वध को स्वीकार कैसे कर लिया ? क्या यह मात्र कूटनीति और राजनय की विजय है ?
भाषा और शिल्प का सम्यक् योग इस काव्यकृति को पठनीय और महत्वपूर्ण बनाता है। इसके साथ ही अपने युगीन -संदर्भों के साथ मनुष्य की यात्रा-वृतांत सुनाती यह कृति अपनी सहजता और काव्य-सौष्ठव से भी चमत्कृत करती है :-
आकर्षण से ही यह समष्टि पलती है
लय-ताल-युक्त सांस हवा चलती है
प्रतिकूल प्रकृति के-दोहन है, शोषण है
यह जीवन-उन्मूलन है, प्रतिकर्षण है (पृ0 27)
मनुष्य को केन्द्र में रखती यह कृति सबका आह्वान करती, कहती है :-
सब मिल कर जन-गण-मन को अब सन्मति दें
आओ सरभाव-शील को नयी प्रगति दें
कुल-वंश, जन्म का भेद, घृणा का घर है
मानवता इन सिध्दांतों से ऊपर है (पृ0 100)
हम कवि के ऐतिहासिक-सामाजिक निष्कर्षों से सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु इतना तो प्रकट हो जाता है कि वह इतिहास और साहित्य का गंभीर अध्येता है और यह कृति विमर्श की माँग और शुरूआत भी करती है।
खंड काव्य की रचना के बाद गजलों से गुजरते हुए विप्लवी जी 'तश्नगी का रास्ता' नामक गजल संग्रह ले कर आते हैं। 'तश्नगी' जिसे हम 'तृष्णा' कहते हैं और बौध्द साहित्य में तृष्णा का खेल ही संसार है। सारे दु:खों की जड़, मोह-माया, ईर्ष्या-द्वेष, युध्द, सभी कुछ इसी की कोख में पलते हैं। भूमिका में उन्होंने कबूल भी किया है : ''तश्नगी का रास्ता' केवल दैहिक प्यास का ही हालिया-बयान नहीं है। वरन् हमारे समय की हर तृप्त-अतृप्त अंतहीन तृष्णा की ओर देखने और आत्म-निरीक्षण के प्रस्ताव का सिलसिला है।'' कहने की आवश्यकता नहीं कि विप्लवी जी भले गजल की तलाश में हों या फिर गजल उनकी तलाश में हो, ऊपरी तौर पर यह परिवर्तन परिलक्षित होता है। आंतरिक रूप से उनकी वैचारिक जमीन वही है जहाँ से उनकी काव्ययात्रा 'प्रवंचना' शुरू होती है। बुध्द की समानता, करूणा से गहरे प्रभावित इस कवि की यात्रा जब गजल गाँव में पहुँचती है तो वहाँ भी केन्द्र में आज का संसार है, जहाँ तृष्णा का व्यापार है। जहाँ सभी ठगे जा रहे है, छले जा रहे हैं परन्तु तुर्रा यह कि हम कामयाब हो रहे हैं। भाषा की जीवंतता उनके पहले संग्रह में भी चकित करती है जब वह गजल गाँव में प्रवेश करती है तो और परवान चढ़ती है। दुर्बोधता और अमूर्त्तन का सहारा इन्हें लेने की जरूरत कहीं नहीं पड़ती, चूँकि इनके पास कहने को बहुत कुछ है। अनुभव समृध्द है, दृष्टि यायावर की है, अध्ययन विपुल है, सहृदयता कमाल की है। सबसे बड़ी बात कि, कवि हृदय इन्हें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुआ है, इसके लिए इन्हें जप, तप, माला नहीं फेरना पड़ा है।
कवि के पास सूक्ष्म अंतर्दृष्टि होनी चाहिए और विप्लवी जी इस गजल संग्रह में हमारे समय के यथार्थ को उकेरने में उसी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का परिचय देते हैं। रदीफ-काफिया, बहर के साथ उन्होंने मज़मून और कहन को महत्व दिया है यानी केशव दास उनके आदर्श नहीं हैं। उनकी दृष्टि जनवादी है और विषय स्पष्ट:-
अधिक कुछ और मिल जाये अधिक कुछ और जुड़ जाये
कहाँ तक तश्नगी का रास्ता ले जाएगा हमको
दिनों दिन 'विप्लवी' रंजो-अलम हलचल बढ़ी जाए
कहाँ अगली सदी का रास्ता ले जाएगा हमको
विप्लवी जी की गजलों की पृष्ठभूमि में जनवादी चेतना है जो कहन के स्तर पर भी साफ परिलक्षित होती है परन्तु जैसे कि गजल की फितरत होती है, वह दिल की आवाज है और उसे किसी खास विचारधारा से जोड़ कर नहीं देख जा सकता। परन्तु इनकी गजलें जरूर एक संतुलन साधती हैं। और कहा जाता है कि जो कविता संतुलन साधती है उसकी उम्र बहुत लंबी होती हे। कविता या गजल में शिल्पगत चमत्कार अगर आवश्यकता से बेसी हो तो मर्म को उद्धाटित करना कठिन हो जाता है। संग्रह की गजलों की खासियत है कि इस मोर्चे पर भी वह संतुलन साधती है, मध्यममार्ग का अनुसरण करती है। कला खूबसूरत हो तो अच्छी बात है परन्तु अगर खूबसूरत और सच दोनों हो तो बहुत अच्छी बात है। शब्द का अर्थ शब्द के बाहर होता है और इसके लिए हमें शब्द के बाहर यानी जीवन में जाना होगा। कहने का गरज यह कि विप्लवी जी की गजलों से निकट होने के लिए जीवन में जाना होगा :-
जागें तो बदल देंगे यह हालात यकीनन
हम सोई हुई कौम जगाने में लगे हैं (पृ0 112)
विप्लवी जी की शाइरी महफिल में गुलबदन की कसीदाकारी नहीं है। और न ही आह:-आह: और वाह:-वाह: की मुरीद। उसका रास्ता अलग है, मरहला अलग है, उसकी मंजिल अलग है। वैसे वह इश्क और हुश्न की तमाम बातें करती है परन्तु उसका मकसद मदहोश करना नहीं, अज्ञानता, गरीबी, अभाव में सदियों से डूबे लोगों को जगाना है, खड़ा होना सिखाना है। हिंदी में कविता की तरह गजलों की आमद बहुत है। टनों-मनों लिखे जा रहे हैं परन्तु अच्छी कविता या अच्छी गजल पहचान ली जाती है। विप्लवी जी की गजलें पहचान में आ जाती हैं और यही किसी रचनाकार की सार्थकता है। फिराक साहब जिन्दगी से इतने अजहद प्यार करते थे कि उसे दूर से ही पहचान लेने की बात करते हैं :-

बहुत पहले से उन कदमों की आहट
जान लेते हैं
तुझे ऐ जिन्दगी
हम दूर से पहचान लेते हैं
विप्लवी जी की शाइरी कुछ इसी तरह जिन्दगी को दूर से पहचान लेती है। कहीं अटकती-भटकती नहीं। सीधी और सधी भाषा और कहीं भी बेमतलब की कलाबाजी नहीं होने के कारण पाठकों पर इनकी शाइरी का गहरा असर होता है। शायर को पुख्ता यकीन है कि सोई हुई कौम अगर जाग गई तो यकीनन हालात बदल देगी। शर्त यही है कि वह जागे। जब तक वह सोई है तमाम बातें, योजनाएं सरकारी-गैरसरकारी कवायद बेमतलब, बेमानी हैं। दरअसल सत्ता नहीं चाहती कि वे जागें। परंपरावादी और विरोधी ताकतें नहीं चाहती कि वे जागें। सभी के सभी उन्हें जगाने के नाम पर सुलाने में लगे हैं। सभी उनकी लड़ाई लड़ रहे रहें। आजादी के बाद से तो यही मंजर आम है। इस देश में वंचितों-शोषितों की लड़ाई वे लड़ रहे हैं जो वास्तव में शोषक हैं। इसीलिए यह लड़ाई अंतहीन सुरंग में प्रवेश कर गई है, यथास्थिति बरकरार है। और जब तक सोई हुई कौम खुद नहीं जागेगी हालात् में तब्दीली होने की कोई गुंजाइश नहीं है। विप्लवी जी की गजलों की पुकार यही है, ख्वाहिश यही है। और इन्ही कारणों से अपने समकालीन गजलकारों में वे दूर से पहचाने जाते हैं। आज की दास्तां कहती इन गजलों में आप सच को सच की तरह, प्यार को प्यार की तरह, घृणा को घृणा की तरह ही देखेंगे। सब कुछ का समायोजन जिन्दगी की तरह। देश-दुनिया की गमजदा सच्चाईयों से रू-ब-रू कराती इन गजलों की ख्वाईश बस इतनी है कि आदमी को आदमी होना मयस्सर हो, अमन का दिन और रात हो, खूबसूरत हमारा संसार हो। परंतु उसके सपने से हकीकत की दुश्मनी जो है :
रो रही है चमन की हालात पर
गमजदा अन्दलीब की चिट्ठी
'विप्लवी' आँसुओं की तहरीरें
ये है गम के अदीब की चिट्ठी (पृ0 101)
विप्लवी जी की गजलें कलावाद की उदाहरण बनने से इनकार करती हैं, दीवान-ए-खास में उनका मन नहीं लगता। वे लोक में जीना चाहती हैं, इसीलिए भाषा के स्तर पर या शिल्प के स्तर पर कहीं दुरूहपन, उलझाव, अतिरिक्त बुनावट नहीं है। राजनैतिक चेतना भी गजलों में दिखती है, उनमें व्यंग्य के स्वर भी हैं पर सतही तौर पर नहीं, वैचारिक स्तर पर। गंभीर राजनैतिक समझ इनकी गजलों की वह खासियत है जो इन्हें अपने समकालिनों में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। इसके कुछेक उदाहरण द्रष्टव्य हैं :-
'विप्लवी' उस हुकूमत की जड़ हिल गयी
कैसी चुप्पी थी इतना असर हो गया (पृ0 68)
आस्तीं अश्क में डूबी हैं रहनुमाओं की
या खुदा कितनी जलालत है इस जमाने में (पृ0 30)
बाड़े से निकलना नहीं चाहे यहाँ की कौम
महदूद तरक्की है यहाँ जात-पात में (पृ0 27)
अलबत्ता ऐसे कई-कई शेर हैं जिनको देखने के बाद यह पुख्ता हो जाता है कि इस गजलकार की गजलों में तश्नगी के सैकड़ों पहलू हैं जिनके कारण जिन्दगी से नमी, धरती से खूबसूरती और दुनिया से सुख-चैन छीन रहा है। भूमिका में  उन्होंने लिखा भी है :- ''तश्नगी का रास्ता', केवल दैहिक प्यास का ही हालिया बयान नहीं है वरन् हमारे समय की हर तृप्त-अतृप्त अंतहीन तृष्णा की ओर देखने और आत्म-निरीक्षण के प्रस्ताव का सिलसिला है।'' बुध्द ने तृष्णा को दु:खों का मूल कहा है। इस संग्रह की गजलें भी दुनिया में तृष्णा से उपजे, फले-फूले व्यापार की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कराती हैं। और उस तृष्णा रूपी अग्नि के आग में झुलस रही मनुष्यता को बचाने का आह्वान करती हैं।
विप्लवी जी की गजलों का स्वर यूँ तो जनवादी है परन्तु गजल विधा की जब बात होगी तो वहाँ भी इनकी पकड़ मजबूत है। हिंदी-उर्दू दोनों को भले अलग खानों में नहीं बाँटा जा सकता है (जैसा कि गजलकार का मत है) परन्तु हकीकत में अदब की दुनिया में ये अलग-अलग भाषाएं हैं। इनकी गजलों में आवश्यकतानुसार शब्द-चयन किये गये हैं। जहाँ जिस भाषा के शब्द उपयुक्त प्रतीत होते हैं उन्हें जगह दी गई है। सायास न उर्दू के शब्द लादे गये हैं न हिन्दी के। इससे इनकी गजलों में एक अलग आस्वाद पैदा होता है। इन दिनों गजलों के साथ जिस प्रकार अतिरेक और ज्यादती हो रही है, विप्लवी जी ने उससे बचने का प्रयत्न किया है। अगला दुष्यंत बनने की होड़ा-होड़ी में हिन्दी के कई गजलकारों ने जैसे गजल का हिंदीकरण  करने की प्रतिज्ञा ले ली है, तत्सम शब्दों की पैरोडी लिखी जा रही है, उससे गजल विधा को नुकसान भले न हो, पाठकों पर आफत तारी है।
उर्दू गजल की परंपरा व उसके विस्तार को बिना आत्मसात् किए गजल जैसे कठिन विधा से अलग रहना बुध्दिमत्ता ही कही जाएगी।
विप्लवी जी किसी खास विचारधारा या वाद से बँधे नहीं हैं। दबे-कुचले, वंचित-शोषित जनों की पीड़ा उनकी रचनाओं का मूल स्वर है परन्तु जब कला की बात होगी, वहाँ भी उनके पास बेहद सौन्दर्यवान और लाजवाब कर देने वाली शाइरी है, जिनकी वक्रोक्ति दर्शनीय है:-
वो जो कलियों की हँसी से हैं जख्म खाए हुए
पूछिए ऑंख की शमसीर तबस्सुम क्यों है
'विप्लवी' पूछे है दुश्मन भी बड़ी हैरत से
मेरे लब पे बचा आखीर तबस्सुम क्यों है (पृ0 98)

देश-दुनिया, घर-परिवार, सियासत, धर्म, पाखंड, समाज आदि मुद्दों से संबंधित इन गजलों में विप्लवी जी की दृष्टि यथार्थ से मुँह मोड़ने वाला या आत्ममुग्धता वाला नहीं है। ये 'कला, कला के लिए' के पैरोकार नहीं है और न इनका दृष्टिकोण व्यावसायिक है। ये साहित्य को एक सामाजिक दायित्व की तरह ग्रहण करते हैं :-
गजलगोई भी तिजारत हो गई है
रहजनी रहबर की आदत हो गई है (पृ0 57)
ये तश्नगी का रास्ता, इंसानियत, रोशनी, खूबसूरती, अमन के खिलाफ रास्ता है जो एक दलदल से निकलती है और एक दूसरे दलदल में डूब कर खुदकशी कर लेती है। यही कारण है कि :-
राह से भटकी सदा-ए-इंकिलाब
हादसों को एक शह देकर गई (पृ0 84)
विप्लवी जी की 'तश्नगी का रास्ता' के बाद 'सुबह की उम्मीद' नामक गजल संग्रह 'वाणी प्रकाशन' से एक नई सृजनात्मक ऊर्जा के साथ गजलों की दुनिया में आई। वसीम बरेलवी, पद्मश्री डॉ0 गोपालदास 'नीरज', पद्मश्री बेकल उत्साही, यश मालवीय और अशोक 'अंजुम' जैसे शायरों ने इस संग्रह की उम्दा गजलों को बेहद सराहा है। इसमें कोई शक नहीं कि इस संग्रह ने गजल विधा में एक रचनात्मक हस्तक्षेप किया और अपनी गहन दृष्टिबोध के कारण अपनी खास मुकाम बनाने में कामयाब हुई। गजल की रूह तक उतरती इस संग्रह की गजलों ने पद्मश्री डॉ0 गोपालदास 'नीरज' को यह लिखने को बाध्य कर दिया कि 'अनेक गजलकारों को गजल कहने का शऊर भी सिखाएगी'।
इस संग्रह में भी विप्लवी जी की शाइरी ने अपनी जमीन यानी प्रवंचित जन के दुख-दर्द और उनकी दशा-दिशा को मुखर हो कर उठाया है परन्तु पूर्व की अपेक्षा उनमें कलात्मकता या यूँ कहा जाए कि कहन शैली में भिन्नता आई है। एक उदाहरण देखें :-
झूठ, सच, जीत, हार की बातें
छोड़िए, दास्तान लम्बी है (पृ0 23)
ये दास्तान स्वयं शायर की भी है और भारतीय समाज में वंचित जन का भी है। ये दास्तान उम्र से लंबी है, और इसके खत्म होने की फिलहाल कोई सूरत भी नजर नहीं आती। एक तथ्य को जान लेना जरूरी है कि विप्लवी जी का चिंतन सदियों से पददलित उस समुदाय को केन्द्र में रखता है जिसे अब दलित नाम से अभिहित किया जाता है। और इन दलित समुदाय के साथ आदिवासी आदि भी जुड़ते हैं, जिनकी व्यथा-कथा का अंत नहीं। जिन्हें कर्म से नहीं, जन्म से उपेक्षा, अपमान, गैर-बराबरी का दंश झेलना पड़ता है। इसके अलावा मानव समाज की 'तिश्नगी' ये दो बुनियादी चिंतन और उसके कारण संसार में व्याप्त पीड़ा, दर्द को जुबान देने का नाम है, विप्लवी जी शायरी :-
खामुशी से बयान देते हैं
दर्द को इक जुबान देते हैं (पृ0 32)
अपने देश को आजाद हुए कई दशक बीत गए। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। पर जाति यहाँ धर्म और ईश्वर से भी बड़ी है। जात-पात के नाम पर बँटा  यह लोकतंत्र दुर्दशा के ऑंसू बहा रहा है। दुनिया का कौन-सा देश होगा, जहाँ जन्म से ही छुआछूत शुरू हो जाती है? और देश, समाज और आदमी को जाति के समक्ष कमजोर और लाचार हो जाना पड़ता है :
यहाँ खूबी-खराबी की कसौटी कुछ अलग ही है
यहाँ तो आदमी से पहले उसकी 'जात' जाती है (पृ0 39)
दुनिया जैसे-जैसे आधुनिकता-उत्तार आधुनिकता की ओर बढ़ रही है, छल-छद्म और अमानवीयता बढ़ती जा रही है। भरोसा किसी चिड़या की मानिंद दुनिया से उड़ गई है। लगातार कुरूप हो रहा है मनुष्य। तृष्णा के पिंजरे में कैद मनुष्य उससे निकलने की जद्दोजहद क्या करे, उसी में सुकून की तलाश कर रहा है। शाइर इस व्यापक और मूल प्रश्न पर इस संग्रह में भी आमने-सामने होता है :

अधिक कुछ और मिल जाए, अधिक कुछ और जुड़ जाए
कहाँ यह तिश्नगी का रास्ता ले जाएगा हमको (पृ0 47)
भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता विप्लवी जी भविष्य को भूत और वर्तमान संदर्भों से अलग नहीं करते। वे इतिहास के घटनाक्रमों का सूत्रबद्ध मूल्यांकन करते हैं और इस प्रकार नीर-क्षीर विवेक के प्रयोग पर बल देते हैं। इतिहास को समग्रता से समझे बिना जो दृष्टि निर्मित होती है वह एकांगी और खंड-खंड होता है। विप्लवी जी से हम पूर्णतया सहमत नहीं भी हों तथापि उनकी इतिहास दृष्टि हमें चकित करती है। कबीलाई सभ्यता, सिन्धुघाटी, आर्य और आधुनिक भारत के इतिहास का ये कोना-कोना झाँक आए हैं। तिश्नगी के रास्ते का जिक्र करते और अंधेरे भविष्य के बारे में सोचते ये पीछे लौटते हैं, भारतीय परंपरा का एक सिरा पकड़ते हैं :-
यहाँ शोलों से सीता को परखने की रवायत है
कहाँ पाकीजगी का रास्ता ले जाएगा हमको (पृ0 47)
क्या गजब कि अपने देश में तिश्नगी का रास्ता और पाकीजगी का रास्ता दोनों  ही भूल भूलैया और जड़ता की ओर ले जाता है जो प्रगतिशील परंपरा की विरोधी और अमानवीय है। इस संग्रह की गजलों में कहन की अद्भुत ताजगी है। जैसे आग पर चढ़कर गर्म पानी में चावल पक जाता है, न गीला होता है न कच्चा। कविता या शाइरी के साथ भी ऐसा ही होता है जहाँ शब्द को चावल और पानी को भाव मान सकते हैं। अगर चावल कच्चा रह जाता है तो सब बेमजा। इस संग्रह की खास विशेषता यह भी है कि शिल्प और भाव का मणिकांचन संयोग हुआ है। भाव के साथ शब्द पक गये हैं। साहित्य में यह पकना आसान प्रक्रिया नहीं है चूँकि इसे जबरदस्ती नहीं पकाया जाया सकता। चावल से इस मायने में यह भिन्न है। विप्लवी जी की शाइरी बहुत बडे फ़लक की बात भी आसानी से कहने में समर्थ है। कुछ उदाहरण देखी जाए:-
तू हजारों ख्वाहिशों में बँट गयी
जिन्दगी! कीमत ही तेरी घट गयी
(पृ0 27)
भोले बचपन की, लड़कपन की निशानी ले गया
वक्त मुझसे चन्दामामा की कहानी ले गया
(पृ0 35)
मैं जिसको देखूँ उसे एतबार मिल जाए
मिरी निगाह को इतना तो मोतबर कर दे
(पृ0 42)
क्हने की जरूरत नहीं विप्लवी जी की शाइरी को वो निगाह उनकी शायरी ने ही बख्श दी है।
विप्लवी जी की शाइरी संसार की बुनियादी समस्याओं, अन्याय और शोषण के साथ जिन्दगी में फैली तमाम दुश्वारियों से भी मुठभेड़ करती है। जो सबसे घुट गया उस पर उनकी निगाह जाती है। जिस दफ्तरी जीवन में वे दिन बिताते हैं वहाँ की हकीकत भी उनकी शाइरी में यत्र-तत्र देखी जा सकती है :
खुशी है सच की कहीं गुम कि जैसे दफ्तर में
कोई गरीब की फाइल इधर-उधर कर दे (पृ0 42)
किसी साधारण कर्मचारी की फाइल इधर-उधर होने के बाद उस आदमी को कितना पापड़ बेलना पड़ता है यह व्यवस्था के बाहर रहने वाले नहीं समझ सकते।
वह शायर ही क्या जो अपने समय और समाज की धड़कन को सात तह के भीतर से सुन न ले। विप्लवी जी का एक शेर द्रष्टव्य है :
रहजनों से मिरी दोस्ती क्या बढ़ी
कैसा महफूज मुश्किल सफर हो गया (पृ0 44)
कितने अफसोस और दुख की बात है, यह सोच कर ही तन-मन सिहर जाता है। क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति का निष्कर्ष यही है कि आज रहजनों की दुनिया में हम शुतुरमुर्ग की तरह रह रहें हैं और हमारी खैरियत उनकी अनुकंपा पर आश्रित है। रहजनों की दोस्ती से मुश्किल सफर का महफूज बन जाना एक त्रासदी है जिससे हमारा दौर गुजर रहा है। यह सच हमारे चेहरे पर कालिख है जिसे हम लाख धोने की कोशिश करें और साफ-शफ्फाक दिखने का जुगत भिड़ायें, हमारा चेहरा और गंदा दिखता है। शाइर इस बहुरूपिये समय को गइराई से विश्लेषित करता है और कहता है कि :
क्या शराबों पे राय लें उनकी
जो पियें और हराम लिखते हैं (पृ0 50)
इंतिहा है इस विदूषक व्यवहार का और शाइर की कलम का कमाल जिससे कुछ छुट जाए! यह हमारा दौर है जहाँ आदमी पाप भी करता है तो भगवान को चढ़ावा चढ़ा कर। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय जैसे शब्द व्यंग्य बन गए हैं। परन्तु शिकायत कोई, किसके करे ? यही तो इस देश की व्यथा कथा है कि मनुष्य की कौन कहे देवता, भगवान कहाने वाले भी छल-छद्म में आकंठ निमग्न हैं :
सल्तनत लूट ली 'बली' की सब
और जमीं तीन गाम लिखते हैं। (पृ0 50)
राजकिशोर राजन
विप्लवी जी की शाइरी परंपरा से हो रहें तमाम कुटिलताओं, अन्याय, शोषण को जहाँ बेनकाब करती है वहीं वर्तमान के रेशे-रेशे को उघाड़कर देखती हे और एक ऐसे भविष्य का सपना ऑंखों में रोकती है जहाँ मनुष्य, अपनी जड़ों की ओर लौटेगा और स्वयं से साक्षात्कार करेगा, अपनी सकल अपकर्म को पहचानने के लिए दृष्टि प्राप्त करेगा। संक्षेप में कहा जाए तो विप्लवी जी की काव्ययात्रा आदमीयत का आरजूनामा है।
इनकी साहित्य यात्रा निरंतर प्रवहमान है और यह आलेख उनकी काव्ययात्रा की एक झलक मात्र है। उनसे हम सबकी बड़ी उम्मीदें हैं। बहरहाल,
संदर्भ (1) प्रवंचना (खंड काव्य) (3) सुबह की उम्मीद
विप्लवी प्रकाशन       (गजल संग्रह)
लखनऊ       वाणी प्रकाशन
प्र. संस्करण-2011 नई दिल्ली
प्र. संस्करण-2004
(2) तश्नगी का रास्ता
विप्लवी प्रकाशन
लखनऊ
प्र. संस्करण-1994

सोमवार, 4 जुलाई 2016

शहंशाह आलम की नजर में शिवनारायण की "दिल्ली में गाँव"

तोदयुश रौज़ेविच ने कभी लिखा था : 'खेद की बात है कि तथाकथित मानवता कितनी तत्परता से उस विवेक को तज दे रही है जिसे इतनी कठिनाई के साथ हासिल किया गया था।' ऐसी ही चिंता शिवनारायण अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते रहे हैं। आज समाज में जो कुछ दिखाई देता है, भ्रामक ही दिखाई देता है। वह चाहे मानवता-मनुष्यता हो या फिर प्रेम-प्यार हो या फिर स्वभाव-स्वभाषा हो, सबकुछ ही उलट-पुलट दिखाई देता है।
पढते हैं शिवनारायण जी की दिल्ली में गाँव की समीक्षा समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में।

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इस संसार को देखने की समझ देती कविताएँ:दिल्ली में गाँव
शहंशाह आलम

हर कवि अपने समय को गहराई में जाकर सुनता है, तब अपने सुने हुए समय को एकदम विलक्षण प्रकट करता है। सच्चाई यही है, कवि के समय में जो कुछ घटित हुआ होता है, हर कवि उसी घटे हुए के प्रभाव में होता हुआ ख़ुद को रचनारत रखता है। शिवनारायण जी ऐसे ही कवियों में हैं। उनका सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह 'दिल्ली में गाँव' की सारी ही कविताएँ अपने पाठ के समय यही एहसास कराती हैं। शिवनारायण उस जमात के कवियों में हैं, जो आमजन के निकट जाकर उन्हीं की बातें करने में विश्वास रखते हैं, घनीभूत रूप में। हम कह सकते हैं कि शिवनारायण मानुष से प्यार करनेवाले कवि हैं। यही कारण है कि कवि दिल्ली जाता है तो उन मानुषों की तलाश में लग जाता है, जो उसी के गाँव के होते हैं और दिल्ली में रोज़ी-रोटी के लिए जी रहे होते हैं :
     जब कभी दिल्ली जाता हूँ
     अनगिन व्यस्तताओं के बीच भी
     निकाल ही लेता हूँ समय
     सुंदर से मिलने का (दिल्ली में गाँव/पृ.11)।
शिवनारायण 

मेरे विचार से किसी भी कवि के भीतर जो दुर्लभ छुपा होता है, वह यही है कि शब्द की क़ीमत वह पहचान रहा होता है। समय जितना यातनापूर्ण होता जाता है, हर कवि उतना ही उस यातनापूर्ण समय के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है। इसलिए हम जिस समय को जी रहे होते हैं, उस समय में घृणा को जनतंत्र का हिस्सा बनाकर पेश किया जा रहा है और यह दुखद है जबकि किसी भी जनतंत्र में प्रेम की, सौहार्द की जलधारा बहनी चाहिए :
     उसने निर्मम गाली-गलौज के साथ
     किया था मेरा अपमान
     भीड़ देखती रही सब
     किसी ने कुछ नहीं कहा उससे
     मैं अपने अपमान का प्रतिकार करता रहा
     और वह धमकी देता फ़ुर्र हो गया(भीड़ की चुप्पी/पृ.26)।

तोदयुश रौज़ेविच ने कभी लिखा था : 'खेद की बात है कि तथाकथित मानवता कितनी तत्परता से उस विवेक को तज दे रही है जिसे इतनी कठिनाई के साथ हासिल किया गया था।' ऐसी ही चिंता शिवनारायण अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते रहे हैं। आज समाज में जो कुछ दिखाई देता है, भ्रामक ही दिखाई देता है। वह चाहे मानवता-मनुष्यता हो या फिर प्रेम-प्यार हो या फिर स्वभाव-स्वभाषा हो, सबकुछ ही उलट-पुलट दिखाई देता है :
     हर आमो-ख़ास सन्नारियों को
     इत्तिला दी जाती है कि
     दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों
     एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी
     जो अपने को हिंदी का समालोचक बताता है
     सुंदरियों के प्रेमपत्र लिए घूम रहा है(दिल्ली की सड़कों पर/पृ.17)।


इन दिनों दिन की गाथा हो अथवा रात की, इन गाथाओं में मनुष्य की हँसी, मनुष्य का चैन-सुकून सब ग़ायब दिखाई देता है। हमारी आँखों में जो-कुछ रच-बस रहा है। हमारी ध्वनियों से जो भी स्वर बाहर आ रहा है, वह डरा, हारा, सहमा ही दिखाई देता है। लेकिन रचनाकार  कोई भी हो, ज़िन्दगी से अच्छा चुनना जानता है :
     बेमतलब जीने में
     कई बार सृजित हो जाती है
     मतलब की दुनिया
     जैसे ममल ख़ाँ के
     स्याह अँधरे जीवन में
     फैल गया था उजास
     लैलख के प्रेम का(लैलख ममल ख़ाँ/पृ.32)।

'दिल्ली में गाँव' में शिवनारायण की लगभग चालीस कविताएँ शामिल की गई हैं। इससे पूर्व शिवनारायण के दो अन्य कविता-संग्रह, 'काला गुलाब' और 'सफ़ेद जनतंत्र' प्रकाशित हुए हैं। 'दिल्ली में गाँव' की कविताएँ पहले के दोनों कविता-संग्रह से थोड़ी ज़्यादा इस मायने में अलग हैं, क्योंकि 'दिल्ली में गाँव' की कविताएँ जीवन के क़रीब अधिक दिखाई देती हैं। इसमें जहाँ 'मलाल की आवाज़' और 'निर्भया' जैसी कविताएँ हमें एक नए उद्देश्य से जोड़ती हैं, वहीं 'मीना माँझी', 'बाला मुस्करा रही है' आदि कविताएँ हमें इस संसार को कुछ अलग तरह से देखने की दृष्टि देती हैं। मेरा मानना है कि जैसे किसी अपने से लपककर मिलते रहे हैं, वैसे ही शिवनारायण की कविताएँ आपकी तरफ़ लपकती हुई दिखाई देती हैं, अपनों की तरह।
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शहंशाह आलम
दिल्ली में गाँव
कवि : शिवनारायण
प्रकाशक : संजना प्रकाशन, डी-70/4,
अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली-110 094/मूल्य : 250₹
 मोबाइल : 09334333509




शनिवार, 2 जुलाई 2016

पंखुरी सिंहा की कविता-संग्रह "रक्तिम संधियाँ" की समीक्षा

   पंखुरी सिन्हा नीरस पुरातनता को ढोए चलनेवाली कवयित्री नहीं हैं। उनकी तहक़ीक़ात इस बात में है कि जो समस्याएँ अवधियों-अवधियों से चली आ रही हैं, उनका रचनात्मक निदान कहीं दिखाई क्यों नहीं देता। ख़ास तौर से स्त्री विषयक समस्याएँ उन्हें कुछ अधिक भावनात्मक बना देती हैं। एक स्त्री होने के कारण पंखुरी सिन्हा का ऐसा सोचना जायज़ भी हो जाता है : 'जिन तकलीफ़ों की रिपोर्ट लिखाई हमने/क्या हुआ उनका।' या उनका यह कहना भी जायज़ है कि 'हम रेतेंगे गला तुम्हारा/तुम माँगो सुरक्षा।' ऐसे ही कितने-कितने सवाल पंखुरी सिन्हा की कविताओं में छिपे हुए हैं। और उनके प्रश्नों को झेल पाना आज की व्यवस्था के लिए क़तई संभव नहीं है। इसलिए कि व्यवस्था आज की ज़रूर है, परन्तु है वही पुरातन, जिनके पास हमारे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता। समीक्षक शहंशाह आलम के शब्दों में पढते हैं पंखुरी सिंहा की कविता-संग्रह "रक्तिम संधियाँ" की समीक्षा।


    'रक्तिम सन्धियाँ' यानी एक स्त्री के रक्तिम समय की कविताएँ
     ● शहंशाह आलम

जिस तरह कवि का काम है अपने समय को सुनना, उसी तरह कविता का काम है मनुष्य-प्रजाति को उसके समय को सुनाना। इसलिए कि कवि और कविता का जो समय होता है, वह शोकाकुल कभी नहीं होता। यही वजह है कि कोई कवि जब अपनी कविता अपने मंजे हुए और सधे हुए हाथ से लिखता है तो कविता सिर्फ़ कविता नहीं रह जाती बल्कि मनुष्य का अपना स्वर बन जाती है, एक ऐसा स्वर, जिसमें मनुष्य का भूत, वर्तमान, भविष्य सब सुनाई देने लगता है, एकदम विलक्षण, जिसमें कमज़ोर प्रार्थनाएँ नहीं होतीं बल्कि उस स्वर में मनुष्य की पवित्रता, मनुष्य का उल्लास, मनुष्य का क्रोध सब संगठित दिखाई देता है। मुझे यही सबकुछ पंखुरी सिन्हा की कविताओं में दिखाई देता रहा है। पंखुरी सिन्हा की यही पवित्रता, यही विलक्षणता, यही संगतियुक्तता उनकी सद्य: प्रकाशित कविता-पुस्तक 'रक्तिम सन्धियाँ' की लगभग सारी ही कविताओं में आप भी देख सकते हैं। पंखुरी सिन्हा अपनी कविता 'अनहद' में कहती हैं : 'कुछ नहीं कहा गया अभी तो/ अभी बहुत कुछ कहा जाएगा।' यहाँ 'अभी बहुत कुछ कहा जाएगा' जैसी पंक्ति उन जनसामान्य लोगों के बारे में है, जिनके बारे में अभी विपुल रूप में कहा जाना शेष है।
पंखुरी सिन्हा


     दरअसल पंखुरी सिन्हा नीरस पुरातनता को ढोए चलनेवाली कवयित्री नहीं हैं। उनकी तहक़ीक़ात इस बात में है कि जो समस्याएँ अवधियों-अवधियों से चली आ रही हैं, उनका रचनात्मक निदान कहीं दिखाई क्यों नहीं देता। ख़ास तौर से स्त्री विषयक समस्याएँ उन्हें कुछ अधिक भावनात्मक बना देती हैं। एक स्त्री होने के कारण पंखुरी सिन्हा का ऐसा सोचना जायज़ भी हो जाता है : 'जिन तकलीफ़ों की रिपोर्ट लिखाई हमने/क्या हुआ उनका।' या उनका यह कहना भी जायज़ है कि 'हम रेतेंगे गला तुम्हारा/तुम माँगो सुरक्षा।' ऐसे ही कितने-कितने सवाल पंखुरी सिन्हा की कविताओं में छिपे हुए हैं। और उनके प्रश्नों को झेल पाना आज की व्यवस्था के लिए क़तई संभव नहीं है। इसलिए कि व्यवस्था आज की ज़रूर है, परन्तु है वही पुरातन, जिनके पास हमारे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता। वहाँ से उत्तर मिलता भी है तो हममें उलटे अचरज भर देता है। आक्रोश भर देता है। बेचैनी भर देता है। तनाव भर देता है : 'अब और सबूत ज़रूरी नहीं/बहुत जघन्य हुआ सबूत का खेल यह।' या 'चुप्पी अधिकारी की/पुलिस अफ़सर की।' या 'अजीब-सी आँखमिचौली/कौन चोर सिपाही कौन।'
शहंशाह आलम

     सच्चाई यही है कि जब हम पंखुरी सिन्हा की कविताओं में प्रवेश करते हैं तो अपने आसपास फैली हुई सड़ांध से घृणा करने की बजाय हम संघर्ष करना ज़्यादा ज़रूरी समझते हैं, इसलिए कि कवयित्री को यह पता है कि एक स्त्री का समय जैसा भी हो, किसी स्त्री को बिना संघर्ष के कुछ भी हासिल नहीं होता है। स्त्री के बाहर-भीतर जितनी सन्धियाँ की जाती हैं वे सारी की सारी सन्धियाँ रक्तिम ही हुआ करती हैं, किसी भी स्त्री के लिए। इसलिए कि स्त्री कोई भी हो, हम उनके बोलने की प्रतीक्षा नहीं करते बल्कि जो बोलता है, पुरुष ही बोलता चला जाता है। स्त्री हमेशा की तरह चुप ही रह जाती है। स्त्री का जो-जो कुछ उपहास से शुरू होता है, पंखुरी सिन्हा की कविताएँ उस-उस का विरोध सलीके से करती दिखाई देती हैं। दरअसल पंखुरी सिन्हा अपने आसपास की जा रहीं सारी की सारी 'रक्तिम सन्धियाँ' अपने चमत्कारिक अनुभव से तोड़ देना चाहती हैं। संग्रह में शामिल उनकी साठ से अधिक कविताओं का पाठ करते हुए ऐसा आपको भी ज़रूर महसूस होगा। इसलिए कि हमारे पूरे जीवन-क्रम को जब असहजता से भरा जा रहा है तो हमारा विरोध सहज कैसे रह सकता है। यही असहजता पंखुरी सिन्हा की कविताओं में आ गई है : नुक्ता बदलकर/या बदलकर बिन्दु का स्थान/जिससे ऐसे बदलें अर्थ/आज्ञाओं के/स्थितियों के/पालन के उनके/कोई एक शब्द/जो कहता किसी बदलाव की बात/ऐसा कुछ नहीं था/उसके ख़त में/सीधी-सी बात थी/कि मशग़ूल था/वह अपनी ज़िंदगी में/लिप्त अपनी प्रेमिका में/लेकिन बात वो नहीं थी/सवाल वो नहीं था/मसला यह था/कि वो कौन लोग थे/जिनका था/मेरी ज़िंदगी पर यूँ क़ब्ज़ा ( 'नुक्ता बदलकर, पृष्ठ : 95 )।
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रक्तिम सन्धियाँ (कविता-संग्रह)
 कवयित्री : पंखुरी सिन्हा
 प्रकाशक : साहित्य भंडार, 50 चाहचंद, इलाहाबाद-211003 (उत्तर प्रदेश)/
मूल्य : 50 ₹