धेमुरादाय को किसने
मारा: कोसी और धेमुरा की त्रासदी की कहानी
(पुस्तक-समीक्षा)
-सुशील कुमार
भारद्वाज
शायद ही कोई हों,
जिन्होंने बाढ़ की विभीषिका के बारे में नहीं सुना हो. बचपन से ही लोग इसके वीभत्स
रूप के साथ–साथ कारणों और परिणामों को जानते-समझते आ रहे हैं, लेकिन जिन लोगों ने
इसे झेला है, करीब से महसूसा है, वे जानते हैं कि बाढ़ की पीड़ा क्या होती है? यह
कितना मानवीय और अमानवीय है? यह कितना प्राकृतिक आपदा है और कितना मानवीय व स्वार्थजनित?
कोसीपुत्र तेज
नारायण खेड्वार की नई किताब “कोसी की चीत्कार – धेमुरादाय को किसने मारा!” न कोई
मानवीय कहानी है न ही कोई उपन्यास, बल्कि यह वर्षों बाद 18 अगस्त 2008 को कोसी प्रक्षेत्र
में कोसी नदी द्वारा मचाए गए भयंकर तबाही का गल्प रूप में वर्णन है. साथ ही साथ सत्तालोलुप्त
और धनवासना में लिप्त भ्रष्ट नेताओं, प्रशासनिक पदाधिकारियों एवं ठीकेदारों की कारगुजारियों
को भी पर्दे के सामने रखा गया है. कोसी और धेमुरा नदी का मानवीकरण करते हुए मैथिली
भाषा के प्रेम और क्रोध भरे संवादों और गीतों से ही कहानी को आगे नहीं बढ़ाया गया
है बल्कि कोसी का परिचय एक नदी के अलावे इसके
आध्यात्मिक एवं पौराणिक कथाओं के सन्दर्भ में भी दिया गया है. साथ ही साथ विभिन्न
प्रसंगों पर आधारित कोसी के लोककथाओं एवं गीतों में इसका राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक
एवं सांस्कृतिक स्वरूप भी सामने आता है.
लेखक तेज नारायण
खेड्वार बहुत ही चतुराई से दिखाने की कोशिश करते हैं कि कोसी की वह विभीषिका कितनी
प्रकृतिजनित थी और कितनी मानवजनित? कोसी के पेट में समाये बालू के ढेर को हटाना तो
दूर, लोगों ने कोसी की धाराओं को ही बांधों आदि से मोड़ने (नियंत्रित) की कोशिश
करते हुए सस्ते जमीन के खेल में वारा न्यारा नहीं किया बल्कि अतिक्रमण करते हुए
वहां आबादी बसाने के लिए अट्टालिकाएँ खड़ी कर दी. जिस कोसी और धेमुरा की वजह से खेत
लहलहाया करते थे, सदियों से संस्कृति का संरक्षण होता आ रहा था, वहां
आधुनिकता और विकास की अंधी दौर में तेजी से सीमेंट, गिट्टी और अलकतरे की नई
दुनियां बसा दी गई है. भौतिक समृद्धि तो खूब हुई लेकिन पीछे छूटते चली गई हमारी
सामाजिकता और नैतिकता. और शायद अब भी न चेते तो संभव है कि भविष्य में 2008 से भी बड़ी त्रासदी
का सामना करना पड़े.
किताब भले ही कोसी
और धेमुरा की कहानी कहती हो लेकिन इस सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि बाढ़
जैसी प्राकृतिक आपदा जल्द ही मानवजनित आपदा का रूप ले ले, यदि मनुष्य अपने क्षुद्र
स्वार्थ में आकर नदियों का अतिक्रमण करने से बाज न आया.
लेखक तेज नारायण
खेड्वार ने जिस शिल्प कला से संवादों व शब्दों को पिरोया है वह न सिर्फ पाठकों को
बांधे रखने में सफल है बल्कि भाषा क्षेत्र विशेष की गरिमा का भी परिचय कराती है.
पुस्तक – धेमुरादाय
को किसने मारा!
लेखक - तेज नारायण
खेड्वार
प्रकाशक – शेखर प्रकाशन
पटना
मूल्य – 100/- रुपए
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