शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

शशिकांत मिश्र की नॉन रेजिडेंट बिहारी: फुल ऑन मस्ती (समीक्षा) - सुशील कुमार भारद्वाज



         नॉन रेजिडेंट बिहारी: फुल ऑन मस्ती (समीक्षा)
- सुशील कुमार भारद्वाज

पिछले कुछ वर्षों में चेतन भगत की सफलता से प्रेरणा लेते हुए कई लोगों ने हिंदी लेखन में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया. कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह के अधिकांश लेखक साहित्यिक पृष्ठभूमि के नहीं हैं. इनके लिए लेखन रोजी –रोटी का मात्र एक जरिया है और मनोरंजन का एक साधन. इनका एक मात्र मकसद नाम और दाम कमाना नहीं है बल्कि ये कहानी या उपन्यास को इस उम्मीद के साथ मसालेदार बनाने लगे हैं कि आगे इन पर फिल्म भी बनायी जा सके. हिंदी के सीमित पाठकों की समस्या से जूझते प्रकाशकों ने भी बदले फिजा में बाजार –विस्तार के सुनहले अवसर को भुनाना ही उचित समझा. और इसी के साथ शुरू हो गए गंभीर और लोकप्रिय साहित्य की बहस.
इसी कड़ी को आगे बढाती है पत्रकार शशिकांत मिश्र की पहली किताब “नॉन रेजिडेंट बिहारी” कहीं पास कहीं फेल, जो कि एक हास्य उपन्यास है. जिसमें बिहार के एक युवा की कहानी है, जो अपनी प्रारंभिक पढाई कटिहार में करने के बाद दिल्ली के मुखर्जी नगर में नए सांस्कृतिक परिवेश में सिविल सर्विसेज की तैयारी करने पहुँचता है. जहाँ सामाजिक एवं भावनात्मक विस्थापन के बीच न सिर्फ अपने परीक्षा की तैयारी और टिप्स से जूझते रहता है बल्कि अपनी प्रेम –कहानी के तनाव से भी जूझते रहता है. कहानी कॉमेडी के तर्ज पर मिलन–बिछुड़न और पुनर्मिलन के पुराने फार्मूले पर ही है, जिसमें रोमांच, प्रेम-भरी नोक-झोंक और पारिवारिक द्वंद्व ही नहीं चलता है बल्कि एक–दूसरे को पा लेने के लिए होने वाले दिमागी कसरत और हद से गुजर जाने का पागलपन भी. प्रसंगों से पूंजीवादी व्यवस्था के तहत आर्थिक–विषमता से त्रस्त समाज को दिखाया गया है, तो जाति–धर्म और साम्प्रदायिकता के दानव को भी, आर्थिक एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का अहसास है तो प्रेरणा भी. साथ ही हास्य–व्यंग्य के प्रसंगों में आज के युवाओं का समाज, धर्म और सभ्यता–संस्कृति के प्रति बदलते नजरिए को उभारने की भी कोशिश की गई है. सच तो यह है कि हम जिन चीजों को मजाक में लेते हैं वह भी हमारी सभ्यता-संस्कृति का ही एक रूप होता है जिसे हमारी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष सहमति होती है. कुछ प्रसंग जबरन ठूंसे गए हैं लेकिन वह रोमांच को बहुत अधिक बोझिल नहीं करता है.
मौज –मस्ती और अल्लहड़पन को प्रस्तुत करने के लिए परिवेशानुकुल बोल-चाल की भाषा का प्रयोग किया गया है जो पाठकों को सहजता से गुदगुदाते हुए बांधे रखने में सफल है. लेखक शशिकांत मिश्र ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि उन्होंने इस मशालेदार किताब की रचना पैसा कमाने के लिए की है जिसमें वे काफी हद तक सफल हुए हैं.  


पुस्तक :- नॉन रेजिडेंट बिहारी
लेखक :- शशिकांत मिश्र
मूल्य :- 90 रुपए
प्रकाशक :- फंडा (राजकमल प्रकाशन का एक उपक्रम)

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