इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट
हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक
कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों
से खींचकर निकालना तो आप ही को है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है।
कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान
देते आए हैं। तभी तो सरकारें,
न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी
संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। पढ़ते हैं सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'रोटियों के
हादसे' पर शहंशाह आलम की टिप्पणी.
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| शहंशाह आलम |
'रोटियों के हादसे'
( सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ) :
हमें रोज़-रोज़ भूखा रखने वालों के विरुद्ध लोहा लेती कविताएँ
● शहंशाह आलम

कविता किसी सीमा को नहीं मानती। कोई सीमा मानती भी है, तो उसकी सीमा
में उसका लक्ष्य होता है, कि उसे कहाँ पर और कब वार करना है, किस गति से करना है। इसीलिए मेरा
मानना है कि कविता का अपने लक्ष्य के प्रति सीमा को मानते रहना चाहिए। इससे कविता
को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की तीव्रता मिलती है। अब यहाँ यह सवाल उठता है कि
क्या कवि किसी सेना में काम कर रहा होता है, जो कवि को धावा बोलने के लिए अपने
लक्ष्य के प्रति किसी सीमा की आवश्यकता पड़ती है? इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में मेरा हमेशा
रहा है। एक कवि किसी-न-किसी मोर्चे पर ही तो सक्रिय रहता आया है और धावित भी।
इसलिए कि कवि का काम अपने श्रोताओं और पाठकों का काम मनोरंजन करना नहीं, उन्हें उनके
समय से परिचित कराना है। यही वजह है कि समाज में और साहित्य में कवि को ऊँचा दर्जा
दिया गया है। मेरी इस दृष्टि से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद
श्रीवास्तव उन कवियों में मुझे दिखाई देते हैं, जो अपने कवि-कर्म को सीधे उस वर्ग
का हिस्सा बनाते हैं, जिस वर्ग को हमारे समर्थन की ज़रूरत सदियों से रही है। इस कवि की
वास्तविक छवि यही है कि यह कवि दुनिया-भर के आम आदमी के संघर्ष में साथ देने के
लिए खुल्लम-खुल्ला डटा खड़ा है। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव यह कमाल इनके
सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह 'रोटियों के हादसे'
की कविताओं में बाकमाल होकर प्रकट
होता है। इसलिए कि इनकी कविताओं में बहुत सारे कवियों की तरह कवि का अभिनय-भर
दिखाई नहीं देता बल्कि अपने समय के सिस्टम के विरुद्ध जिस लड़ाई की बात-भर हम करते
आए हैं, उस लड़ाई को कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव साक्षात् लड़ते दिखाई
देते हैं :
रास्ता रोका है मज़दूरों ने
क्योंकि उन्हें
रोटी की ज़रूरत है
पुलिस ने बरसाए हैं डंडे
क्योंकि भूख उन्हें भी लगती है ( 'सिस्टम', पृ. 13 )
अथवा,
आज भी
नहीं जला चूल्हा
आज भी
उदास है माँ
आज भी हैं आँसू
वो पूछते हैं
माँ, रोज़ भूख क्यों
लगती है ( 'रोज़-रोज़ भूख',
पृ. 15 )।
यह स्पष्ट है कि कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ
शासन-प्रशासन की उन नीतियों के विरुद्ध हैं, जिन नीतियों ने हमें 'कोल्हू का बैल' मुद्दतों से
बनाए रखा है। यही तो कटु सत्य है। अब आप क्या हैं, हमें नहीं मालूम, लेकिन हम अपने
बारे में कहें, तो हम 'बैल' भी हैं और 'दबैल' भी। यानी देश की सरकारें हमें बैल की तरह खटाती भी रही हैं और खटने
के एवज़ अपने हिस्से की रोटियाँ माँगने पर हमें दबाती भी रही हैं। कवि सत्येंद्र
प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ अपनी लघुता में, अपनी दीर्घता में विस्तार से यही
समझाती आई हैं। इनकी हर कविता का सूत्र यही कहता है कि हम जो सदियों से आम जन हैं, ख़ास जन का जीवन
न सही, हमारे लिए बोटियाँ न सही, रोटियाँ तो रहने दो! तुम तो हमारे
हिस्से की बोटियाँ और रोटियाँ सब छिनते आए हो! लेकिन हमारे क़िस्से का यह सत्य-खंड
कोई स्वीकारने वाला दिखाई कहाँ देता है इस काल-खंड में। कवि की यह अनुभूति कवि के
हृदय से निकलकर अपनी विराटता के साथ कविता में अंकित होती है। यथार्थ का यह सूक्ष्म
आयाम कोई सच्चा और अच्छा कवि ही पकड़ सकता है। इस तरह से देखें, तो कवि
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव एक सच्चे और अच्छे कवि सिद्ध होते हैं :
पहली बार उसे डर लगा
रोटी को देखकर
उसे विश्वास ही नहीं हुआ
इतनी डरावनी भी
हो सकती है रोटी
उसे लगा
व्यर्थ हो गई
हर मेहनतकश के लिए
उसकी रोटी की लड़ाई
उसके सामने पड़ी
ख़ून से सनी रोटी पर
भिनभिना रही थीं मक्खियाँ
मानो हँस रही थीं
उसकी विफलता पर
वह काँप उठा
नहीं
अब सिर्फ़
रोटी के लिए
नहीं लड़ेगा
बल्कि
ढूँढ़ेगा उन हाथों को भी
जो रोटी को
रक्तरंजित कर रहे हैं ( 'दूसरा पहलू', पृ. 24-25 )।
यहाँ कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का इस पूँजीवादी समाज के
प्रति ग़ुस्सा वाजिब है। मेरे ख़्याल से सरकारों को यही समाज समर्थ करता आया है और
सरकारें पूँजीवादी समाज के लिए हमेशा से तत्पर रहती आई हैं। यह कैसी विडंबना है कि
सरकारें बनवाते तो हम हैं, मगर लाभ पूँजीवाद उठा ले जाता है। इसका अर्थ यही है कि जिस भी
विचारधारा की सरकारों को चुनें,
सरकारें पूँजीवादियों को ही
चूमती-चाटती आई हैं। इन कविताओं का उद्देश्य यही है कि आम आदमी के जटिल-कठिन जीवन
के प्रति हमारी संवेदना जीवित हो। यह आकस्मिक या अचानक नहीं होता आ रहा है कि एक
वर्ग अपने ऐश्वर्य में ऐश्वर्यवान और ऐश्वर्यशाली हो-होकर जी रहां है और एक वर्ग
चंद रोटियों के लिए इतनी मशक्कत करता फिरे कि बेचारा दम तक तोड़ डाले। कवि
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का मिशन यही है कि आम आदमी की मुख्य समस्याओं का हल
अब निकलना ही चाहिए। हमें युद्ध नहीं अनाज चाहिए :
रोटी
थाली की जगह
ख़बरों नें है
भूखा बच्चा रोटी समझ
चाँद को लपकना चाहता है
लेकिन काट दिए जाते हैं उसके पंख
वो फड़फड़ाता है
छटपटाता है
उसका पंख लेकर
कोई और उड़ जाता है
उसके हिस्से में ना तो रोटी है
ना ही उड़ान
उसके हिस्से में सिर्फ़ भूख है
बेटे से किया वादा पूरा करना चाहता है
परकटा बाप
वो उसे पेट-भर रोटी खिलाना चाहता
है
लेकिन वो उसी पेड़ से लटका मिलता
है
जिसे उसी ने कभी रोपा था
ये किसानों के हवा में लटकने का दौर है
ज़मीन उसे रास नहीं आ रही ( 'हवा में लटकने
का दौर', पृ. 28 )।
कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बग़ैर किसी लटके-झटके के कवितारत
हैं। ये अभिजात संस्कार के विरुद्ध हैं। यह संस्कार है भी तो ख़तरनाक! आम आदमी के
जीवन की बहुत सारी विषमताएँ,
बहुत सारी समस्याएँ, बहुत सारी
कुरूपताएँ इस अभिजात संस्कार ने अकेले दी हैं। यह अभिजाततंत्र अथवा यह अभिजातकी
जितना हमारे लिए ख़तरनाक है, उतना ही चालाक भी है। यह हम जैसों को फलने-फूलने नहीं देता। स्थिति
इतनी नाज़ूक हो गई है कि सारा त्याग यह वर्ग हमीं से चाहता है। अब हम लाख नए समाज
का ढिंढोरा पीटत रहें। मेरी मुनादी यही कहती है कि आज की सरकारें, आज की न्याय-व्यवस्थाएँ, आज की शासन
प्रणालियाँ, सब-की-सब इसी वर्ग की चाकरी में लगी दिखाई देती हैं। गर ऐसा नहीं
है, तो हम पिछड़े दिनों-दिन अत्यधिक पिछड़ते क्यों जा रहे हैं? सामाजिक
विषमताएँ इस सभ्य समाज में ज़्यादा बढ़ती क्यों जा रही हैं? इन सब विषमताओं
का समाधान निकल क्यों नहीं रहा है? हमारी परिस्थितियाँ ठीक होने-होने
को होती हैं, तो हम पर महँगाई,
बेरोज़गारी, दंगे ( और अब
युद्ध का भय भी ) क्यों लाद देतो हो तुम? तुम्हें उत्तरप्रदेश चाहिए, तुम्हें बिहार
चाहिए, तुम्हें बंगाल चाहिए, तुम्हें दिल्ली चाहिए, तो सब ले लो
भइया, पर यह सब लेने से पहले हमें इतना डरा-धमका क्यों देते रहे हो? तुम इतना
घबराते काहे हो, जो तुम्हें हमें पुरस्कृत और तिरस्कृत नहीं करने देने का बयान देना
पड़ता है, सलाह देनी पड़ती है अपने लगुए-भगुए को? संग्रह की
कमोबेश सारी ही कविताएँ ऐसे दमघोट प्रश्न उठाती हैं।
इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन
हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही
न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों से खींचकर निकालना तो आप ही को
है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है। कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग
है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान देते आए हैं। तभी तो सरकारें, न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी
संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। तभी तो सत्येंद्र प्रसाद
श्रीवास्तव का कवि यह कह रहा है कि :
डरे हुए लोगों की भीड़ में
उसे तलाश रहा हूँ मैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रें
किसी गंभीर प्रश्न के साथ
टटोलती हैं मुझे
खड़े हो जाते हैं मेरे रोंगटे
राइफ़ल, बारूद
विस्फ़ोट, चीख़
ख़ून
इन सबसे अभ्यस्त मेरी आँखें
डर जाती हैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रों
से
इसलिए उसे
तलाश रहा हूँ मैं
नहीं
फ्लड लाइट नहीं
दीया जलाकर लाओ
दीए की रौशनी में ही
पकड़ में आ सकता है
वह शख़्स
फ्लड लाइट में
उसकी कमज़ोर नज़रें
चुंधिया जाएँगी
और सत्तर साल का
वह डरपोक, कमज़ोर
कुपोषण का शिकार बुड्ढा
जाकर छिप जाएगा
किसी घने जंगल में
जंगल
मत पूछो
इसकी परिभाषा मुझसे
परिभाषा के दायरे से
बाहर निकल गया है जंगल
क्योंकि
हिंस्र-ख़ूनख़ार जानवरों से भी
क्रूर जीव
घूम रहे हैं शहरों में
गाँवों में, बस्तियों में
सच तो यह है
कि जंगल अब
शहरों में बसता है
और इसी जंगल में
ठेकेदारों
हत्यारों
खद्दरधारियों
पूँजीवादी सर्वहाराओं
और ऐसे ही अनेक
भले मानुषों की भीड़ में
कहीं खो गया है अपना स्वराज
लाओ
दीया जलाकर लाओ
हम उसे ढ़ूँढ़ निकालेंगे ( 'स्वराज', पृ. 74-76 )।
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रोटियों के हादसे ( कविता-संग्रह
) / कवि : सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव / प्रकाशक : लिटरेचर प्वाइंट, जी-2, प्लॉट नंबर-156, मीडिया
एन्क्लेव, सेक्टर-6, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद ( उत्तरप्रदेश ) / मूल्य : ₹100 / मोबाइल संपर्क
: 09582869580
समीक्षक-संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप
लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़,
पटना-801505, बिहार / मोबाइल
: 09835417537
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