सोमवार, 12 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की गजलें

मालिनी गौतम के गजल में भाषा की रवानी है तो भावों में संवेदना की अभिव्यक्ति. इनके भाव –संसार में करूणा और चित्कार का समावेश है तो आक्रोश की गूंज भी. शब्दों का संयोजन भी काबिलेगौर है. पढ़ते हैं मालिनी गौतम की कुछ गजलों को:-   

मालिनी गौतम


ग़ज़ल  1




कभी आँखें दिखाते हो कभी ख़जर चलाते हो
गरीबों पर बताओ इस तरह क्यों जुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारखानों में हैं मरते लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी बहाते हो

रखोगे कैद कब तक रौशनी को अपने महलों में
उजालों को भी तुम अपना-पराया क्यों सिखाते हो
दवा-दारू, मिठाई, तेल-घी की छोड़ दो बातें
महब्बत में भी तुम तो ज़हर नफरत का मिलाते हो
पढ़ाते पाठ लोगों को सचाई और नेकी का
स्वयं बाजार में ईमान की बोली लगाते हो
वो चीखें जो उड़ा देतीं तुम्हारी नींद रातों की
उन्हें गूँगा बनाने का हुनर क्यों आजमाते हो




                                                        ग़ज़ल  2



चाय की कुछ चुस्कियों में जिंदगी को पी गये
घिसते-घिसते एड़ियाँ वे उम्र पूरी जी गये
नोट बरसाने लगे नेताजी अपनी जीत पर
लूटने उनको गली के चन्द बच्चे ही गये

रेल औ बस में मिले हमको नये चहरे कई
कुछ हँसे अपना समझकर कुछ लबों को सी गये
खिलखिलाती धूप जैसे जब मिले कुछ पल उन्हें
भूल कर अपनी थकन वे उन पलों को जी गये
हर तरफ से मार मौसम की पड़ी कुछ इस क़दर
चंद लमहे थे खुशी के हाथ से वो भी गये


                                                              ग़ज़ल  3



झूठ है जिनकी नस-नस में
सत्य नहीं उनके बस में
बाहर उजियारा दिखता
घोर अँधेरा अंतस में
चाहे जितना खौफ बढ़े
हो न कमी कुछ साहस में
वे ही गुण अपनाओ तुम
जो गुण होते पारस में

अँधियारों से लड़ने को
तीर न कोई तरकस में



                                                                 ग़ज़ल  4



वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ जुल्म ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को खिलाती है

नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत जिन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
वो बहती इक नदी है तुम उसे पोखर समझना मत
है इतना वेग उसमे राह का पत्थर हटाती है
समुन्दर दे नहीं सकता किसी को बूँदभर पानी
वो मीठी-सी नदी फिर भी समुन्दर में समाती है
उठाकर रेत-मिट्टी की तगारी साधती है लय
पसीने में नहाकर जिंदगी को गुनगुनाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले मार देते तुम
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हे दुनिया मे लाती है

ग़ज़ल  5



कहीं घर-बार जलता है कहीं संसार जलता है
सुलगता दौर है इसमें न कोई ख्वाब पलता है
उठाकर बोझ काँधों पर जो पाते रोटियाँ अपनी
वो जब भी ठान लेते हैं ज़माना ये बदलता है
थके तन औ थके मन को जगाकर तो जरा देखो
अँधेरी रात के पीछे सुनहरा दिन मचलता है
अगर चाहो तो करवा दो मुनादी आज गलियों में
न आये राह में कोई यहाँ दरिया उछलता है
ज़माना देवियाँ कहकर तुम्हें है पूजता अक्सर
मगर तुम जान लो इतना ज़माना तुम को छलता है

मालिनी गौतम
  मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
          गुजरात
मो. 09427078711












शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-

परंपरा ऋतुराज सम्मान 2015 से सम्मानित मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-
:-

घनीभूत संवेदनाओं की प्रवहमान धारा
----------------------------------------------
एक नदी जामुनी सी-मालिनी गौतम
----------------------------------------------

मालिनी गौतम हिंदी कविता के क्षेत्र में एक परिचित  नाम हैं।इनकी कविताएँ अपनी सहजता और सादगी के कारण सहज ही आकर्षित करती हैं।आलोच्य संग्रह 'एक नदी जामुनी सी'व्यापक सामाजिक सरोकार और प्रेम के विस्तृत संसार की कविताएँ हैं।इस संग्रह के पूर्व'बूँद बूँद एहसास' कवितासंग्रह और'दर्द का कारवां' (ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशित हैं।

इस संग्रह की कविताओं में स्त्री अस्मिता के यक्ष प्रश्नों से मुठभेड़ है ।इस संसार में प्रेम है,ख़ुशी है,दुःख है,अफ़सोस है,पीड़ा है और इन सबके बीच एक स्त्री का अपनी स्वतंत्र पहचान रचने की पटकथा है।पहली ही कविता 'छतरियां' स्त्री के त्याग, बलिदान और जीवन में हासिल का मर्मस्पर्शी कथा कहती है कि किस प्रकार घर परिवार और बच्चों पर छतरी की तरह तनी रहती है पर उसकी किस्मत में छतरियां नहीं है-----

औरतें------------
लाल,पीली,, नीली,सफ़ेद छतरियों सी
हर दम तनी हुई
अपने घर परिवार और बच्चों पर
---------------
पर अफ़सोस
उनके नसीब में नहीं होती
कोई लाल,पीली,नीली,या सफ़ेद छतरी

एक नदी जामुनी सी एक प्रेम कविता है।सीधी-सहज यह कविता ह्रदय के तार को झंकृत कर देती है।'उफनती आदिवासी नदी' एक बेहतर प्रेम कविता है ,इसमें प्रेम के ख़ूबसूरत पलों को सहेज लेने का प्रस्ताव है।'अनंतकाल के लिए'प्रेम को व्यापकता और सम्पूर्णता में देखती है,जहां दैहिक स्तर से  ऊपर उठ कर अस्तित्व के स्वीकार की बात है साथ ही जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश भी बनी रहे।'चाँद के साथ'कविता देर तक साथ रहती है,इसमें कवयित्री ने संसार में सर्वाधिक प्रिय चीजों को गिनाते हुए बताया है कि सबका अपना अपना चाँद होता है।अपनी कहन के कारण यह कविता बहुत प्रभावित करती है।इस संग्रह की प्रेम कविताओं का संसार भी व्यापक है वह मात्र रूमानी कार्य व्यापार  नहीं है।इन कविताओं में प्रेम का उच्चतर स्वरुप  है।इस संग्रह में प्रेमविषयक और स्त्रीविमर्श की जो कविताएँ हैं वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रांत नहीं हैं।प्राकृतिक रूप से वे जड़ों तक पहुंच स्त्री के दुःखों और विडंबनाओं की पहचान करती हैं।स्त्री विमर्श के अभ्यस्त चलन को लाँघ कर कवयित्री ने अपनी बात कही है और हर बात पर और बात बात पर पुरुषों को कटघरे में खड़ा नहीं किया है और सारे दुखों के लिए पुरुषों को जिम्मेदार मान अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर लेतीं।इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता'प्रेम में होना'में उनके विचारों को देखा जा सकता है।यह कविता बताती है कि एज औरत, पुरुष के प्रेम से पल भर उबरना नहीं चाहती,वह पुरुष के प्रेम में इस कदर डूब जाती है  और उस गहराई तक डूब जाती है जहाँ पहुंचकर उसका स्वयं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।जबकि पुरुष स्वयं के अस्तित्व को बचा लेता है और अपनी दुनिया में लौट आता है।कवयित्री की इस स्थापना को गंभीरता से समझने की जरुरत है।इससे भले कुछ लोग असहमत हो सकते हैं,पर इसमें सच्चाई है।इस कविता मैं'नमकीन सा फ़्लर्ट' जैसे प्रयोग भी है जो एक उदाहरण है कि उनके पास पर्याप्त शब्द भंडार हैं और शब्दों का बेहतर प्रयोग उन्हें भली भाँती ज्ञात है साथ ही काव्यतत्व की समझ भी------

पर पुरुष----
जिस तीव्रता से चढ़ता है
प्रेम की सीढियाँ
उतनी ही तेजी से वापस
उतरना भी चाहता है
इस भंवर में गोता लगाकर
अपनी दुनिया में

सर्द रिश्ते,जर्द पत्ते,कमबख्त दूरियां,लकीरें,बरसात,मिलान एक पल का,टूटता तारा,एक और एक ग्यारह,होने से न होने तक,जैसी प्रेम कविताएँ विभिन्न कोणों से प्रेम की अंतर्यात्रा करती हैं।ये कविताएँ जमीन से जुडी हुई कविताएँ हैं।'जर्द पत्ते'  आकार में छोटी पर एक खूबसूरत कविता है, जो पाठक से बार बार पाठ की मांग करती है-----

जरा ध्यान से
झांककर देखो
इन पीली निस्तेज आँखों में
मोहब्बत के सुर्ख पत्ते
अब यहाँ नहीं रहते
यह तो घर है
पीले जर्द पत्तों का
जिन्हें मैंने बरसों से रखा है
सहेजकर!

समाज में स्त्रियों के प्रति अत्याचार,भेदभाव,शोषण का विरोध मालिनी गौतम की कविताओं के मुख्य स्वर हैं।'सजा एक अपराध की' कविता की पहली ही दो पंक्तियाँ ही समाज में स्त्रियों की दुर्दशा को प्रभावपूर्ण तरीके से कहने में समर्थ है-------

लड़कियां कटती हैं
खेत में खड़ी फसलों की तरह
खटती हैं
मशीनों के कलपुर्जों की तरह
कच्चे सूत सी
काती जाती हैं चरखों पर
कच्ची हांड़ी सी
चढ़ाई जाती हैं आंच पर

राजकिशोर राजन


यह कविता लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव को गहराई तक जा बारीक़ चित्रण करती है और प्रकारांतर से प्रश्न पूछती है कि यह कैसा सभ्य समाज है! जहां लड़कियां मालगाड़ी सी दौड़ती हैं और हाथ पोंछे नैपकिन की भांति डस्टबिन में फेंक दी जाती हैं! कवयित्री अपनी कविताओं में कागज की लेखी नहीं, आँखन देखी कहती हैं इसीलिए इनकी कविताएँ जीवंत लगती हैं।इनकी कविताओं का सपना है कि यह संसार उस लायक बने जहां लड़कियों के लिए,स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित कोना हो।इनकी कविताएँ उम्मीद की कविताएँ हैं।तमाम जड़ताओं के बाद भी दुनिया बदल रही है।स्त्रियों की लड़ाई रंग ला रही है,अपनी दुनिया के नवनिर्माण का उनका सपना रंग ला रहा है।कुछ इसी प्रकार की ध्वनि'लड़कियां बदली बदली सी' में सुनाई पड़ती है जहां वे अपनी स्कूलों और कालेजों में स्वतंत्रता का अनुभव तो कर रही हैं पर घर पहुँचते पहुँचते उनके पैरों में बेड़ियां पद जाती हैं ।यह कविता शिल्प की दृष्टि से भी संग्रह की बेहतरीन कविताओं में से एक है।उसी प्रकार 'औरत' कविता है जहां आज भी एक औरत सुबह के इंतजार में है।कविताएँ लयात्मक हैं जिसका मुख्य कारण कवयित्री का गीतकार होना है और कविता भी तो अंततः यही चाहती है कि वह किसी के होठों  पर थिरके ,गीत बन जाये----

आज मैंने फिर ढूंढ उसे
माथे पर लगे सिंदूर में
ऊँन के गोलों में
बिस्तर पर बिछी चादरों में
कर रही थी वह इंतजार
एक और सुबह का

संग्रह की कविताओं की भाषा सहज और तरल है,कहीं भी अमूर्तन या अबूझ पन नहीं है।कहन का सलीका और सादगी इन कविताओं को एक अलग आस्वाद प्रदान करता है और सबसे बड़ी बात की मालिनी गौतम का कवि सब कुछ खोकर भी कविता को बचाना चाहता है----

अपना अब कुछ खोकर भी
मैं बचाना चाहती हूँ
मेरी कविता --मेरी कविताई
                         (मैं और कविता)



शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें

संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलें
संजय कुमार कुंदन

22 अक्टूबर 2016 को पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान में महात्मा गाँधी की मूर्ति के पास हर बार की तरह साहित्यिक गोष्ठि "दूसरा शनिवार" का मुक्ताकाश में शाम के चार बजे कार्यक्रम चल रहा था और ख्यात शायर संजय कुमार कुंदन अपनी बेहतरीन नज़्मों एवं गजलों के साथ थे। ' बेचैनियाँ ' "एक लड़का मिलने आता है" और "तुम्हें क्या बेकरारी है" के गजलकार को नजदीक से बैठकर सुनने का जो मजा है वह कहीं और कहाँ? उनकी गजलों के शब्दों एवं भावों में सुनते सुनते खो जाना श्रोताओं के लिए बडी बात नहीं है। आज प्रस्तुत है आपके लिए उनकी कुछ गजलें, जिसका आस्वादन आप भी करें।

ग़ज़ल

आज  फिर  रस्मो-राह  हो   जाए
दिल  ज़रा-सा  तबाह   हो   जाए

ये तो मुमकिन नहीं के उल्फ़त में
जाँ  न दें  और  निबाह  हो  जाए

दिल को आती है जो ये पगडंडी
चल  दे   तू  शाहराह   हो   जाए

आज बदला हुआ मिज़ाज है कुछ
इक करम   की  निगाह  हो  जाए

कौन  हसरत  थी  जो   हुई   पूरी
कैसे   पूरी   ये    चाह  हो   जाए

दिन भी  कट  जाए तो ग़नीमत है
और  बसर  कैसे  माह  हो  जाए

वैसे  'कुन्दन' ने  ये  बताया  नहीं
चाहता   था    तबाह   हो   जाए

            #######

ग़ज़ल

कुछ  बात है ऐसी  जो  कही ही नहीं जाती
छुप  बैठी  है  आँखों में  नमी ही नहीं जाती

ख़ामोश रह, इज़हार न कर अपने ग़मों का
फ़रियाद  ग़रीबों की  सुनी  ही  नहीं  जाती

आने को  तो आते  हैं ख़यालात बहुत   से
कहने  के बाद  तिश्नालबी  ही  नहीं  जाती

संजीदा ज़माने को  यही  हमसे शिकायत
होंठों पे जो ठहरी  है हँसी  ही  नहीं  जाती

हों दोस्त के दुश्मन हैं सभी बर-सरे- पैकार
और जंग कोई  हमसे  लड़ी  ही नहीं जाती

कुछ तल्ख़ तजरबों से नज़र हो गई धुँधली
माज़ी  की  वो  तहरीर  पढ़ी  ही नहीं जाती

वादा कोई करते हुए  डर जाता है 'कुन्दन'
जो  बात  न  पूरी  हो  कही  ही नहीं जाती

                #########

तिश्नालबी- प्यास,बर-सरे- पैकार-लड़ने को उतारू,तल्ख़- कटु, तजरबों- अनुभवों,माज़ी- अतीत,तहरीर- लेखनी.

ग़ज़ल

ये दुनिया है  आनी-जानी  कब  तक हम को  भरमाए
शायद दरिया पार ही बेकल मन को थोड़ा चैन आए

आने-जानेवाला मौसम उजले-काले तन का रोग
सच्चे  जज़्बों  का  एक  लम्हा बादे-फ़ना भी  जी जाए

हम उजड़े लोगों की  कोई बस्ती- गाँव , न शह्र कोई
हमको सलीक़ा बस जाने का कोई भला क्यूँ समझाए

बेहतर है तुम देख के हमको अपनी नज़र को फेर ही लो
हम इसके क़ायल ही नहीं हैं  सर ये कहीं पे झुक जाए

उस पागल को देख के हम भी बचपन में कुछ हँसते थे
आईना अब  हमपे  हँसकर  अक्स उसी  का दिखलाए

गाड़ी,सोफ़ा, दौलत, बँगला, ओहदा, कुर्सी, ताक़त, नाम,
कितना भी कुछ दे दे लेकिन आँख का पानी
ले जाए

दिल तो  पारा-पारा  बाँटा , अब क्या  जाँ भी बाँटोगे
'कुन्दन जी' क्यूँ ठहरे हुए हो?कौन तुम्हारे पास आए

                   ########

ग़ज़ल

तनहा-तनहा   लफ़्ज़   मिलेगा,  पारा-पारा  तहरीरें
कड़ियाँ जब बिखरेंगी इक दिन, टूटेंगी जब ज़ंजीरें

कौन किसी को पूछनेवाला, कौन किसी का है महरम
तनहाई  की नागन आकर  डंस  जाती  सब तक़दीरें

इक कमरा तो भरा हुआ है,इक कमरा वीरान बहुत
इक में ख़्वाबों का कोलाहल, इक से गुम  हैं ताबीरें

कोई समझाएगा हमको जीवन भर का क्या हासिल
चारों जानिब एक ख़ला है, कहाँ  गईं  सब तदबीरें

बंदिश पे तो नाज़ बहुत था नपा-तुला था हर मिसरा
प्रेम के गीत ने तोड़े बंधन  नाच उठीं कितनी हीरें

तेरा दर्पण एक जज़ीरा  जिसमें बस  तेरा ही राज
दर्पण तोड़ो,  मिल  जाएँगी  तुझको  हज़ारों  जागीरें

" 'कुन्दन जी' कब चुप रहते हैं," सब कहते हैं, जाने कौन
उनकी  है  गुफ़्तार में चुप्पी,  ख़ामोशी में तक़रीरें

                  #########

पारा-पारा  तहरीरें - टुकड़ा टुकड़ा लेखनी,महरम-अंतरंग, ताबीरें - स्वप्नफल,ख़ला-शून्य मिसरा- पंक्ति, जज़ीरा- टापू,
गुफ़्तार- बोली

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश

31अक्टूबर :सनसनी के बहाने दर्शकों को जुटाने की नाकाम कोशिश
-सुशील कुमार भारद्वाज
गूगल से साभार


फिल्मकार फिल्म बनाते समय फिल्म की कहानी, विषय, कलाकार तथा कमाई जैसे अन्य चीजों पर भी विचार करते हैं। लेकिन इन दिनों फिल्म की सफलता की गारंटी के लिए कुछ खास नुस्खों का भी उपयोग किया जाने लगा है बिल्कुल समाचार चैनलों की तरह समाचार सनसनी फैलाने और लोगों को आकर्षित करने की नीयत से। शायद निर्देशक शिवाजी लोटन पाटिल और निर्माता हैरी सचदेवा ने कुछ सनसनी फैलाने और कम बजट में अधिक मुनाफा कमाने के इरादे से ही फिल्म का नाम "31 अक्टूबर" रखा। इतना ही नहीं वर्ष 1984 और भारत शब्द को भी पोस्टर में टिकट की तरह प्रस्तुत किया गया है। और यदि 31 अक्टूबर 1984 का भारतीय इतिहास में कोई खास महत्व है तो इसलिए कि उस दिन भारत के तत्कालीन महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी जिसका तात्कालिक कारण ब्लू अॉपरेशन यानि सेना का अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों का मार गिराने की अनुमति देना था। और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर फैलते ही दिल्ली और आसपास के इलाके में साथ ही देश के लगभग सभी राज्यों में कमोवेश हिंसा का एक लहर चल पडा। दंगे की आग में काफी जानमाल की क्षति हुई थी। बाद के वर्षों में जाँच और अदालत की भी बातें हुईं लेकिन परिणाम सिफर ही रहा। तब से अब तक में एक लंबा दौर गुजर चुका है। इस बीच अनेक अन्य दंगें भी हुए और दंगों के बहानें कुछ फिल्में भी आईं।
लेकिन सोहा अली खान, वीर दास, दयाशंकर पांडे, लखा लखविंदर सिंह, प्रीतम कांगे, और सेजल शर्मा अभिनित फिल्म "31 अक्टूबर" न तो इंदिरा गाँधी की कहानी है न उनके हत्या की कहानी बल्कि यह एक दंगा पीडित परिवार की कहानी है जो अपने धर्म के कारण पहले तो अपनों के बीच शक की निगाह से देखा जाता है और बाद की उसकी जिंदगी बने माहौल की वजह से दुश्वारियों से भर जाती है। वे न्याय की आस में आगे बढते हैं जहाँ उन्हें कुछ लोगों का साथ तो मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं।
फिल्म में कलाकारों के अभिनय और गीत संगीत पर कुछ कहना अलग बात है लेकिन सवाल उठता है कि क्या फिल्मकार के लिए फिल्म का नाम न्यायोचित है? क्या 1984 के भारत को पूर्णत: दिखाने में सफलता मिली? क्या दंगा पीडित की प्रस्तुत स्थिति सिर्फ इसी दंगें में हुई थी या कमोबेश यही स्थिति हर दंगें की होती है? क्या फिल्मकार ऐतिहासिक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे? यदि नहीं तो फिर फिल्म का नाम सनसनी फैलाने के लिए क्यों? जब फिल्म 2015 में ही तैयार हो गई थी तो 2016 में वह भी अक्टूबर के महीने में प्रदर्शित करने की क्या वजह बनी? शायद फिल्म निर्देशक कहीं न कहीं भ्रम की स्थिति में रहे जिसका खामियाजा यकीनन फिल्म को भुगतना पड रहा है या पडेगा। फिल्म की सफलता के लिए फिल्म की सारी कसौटियों पर खडा उतरना भी निहायत ही जरूरी है। और दर्शकों के नब्ज को पकडने की जरूरत भी

सुशील कुमार भारद्वाज

शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'रोटियों के हादसे' पर शहंशाह आलम की टिप्पणी.

इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों से खींचकर निकालना तो आप ही को है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है। कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान देते आए हैं। तभी तो सरकारें, न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। पढ़ते हैं सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव के काव्य संग्रह 'रोटियों के हादसे' पर शहंशाह आलम की टिप्पणी.
                        
शहंशाह आलम


'रोटियों के हादसे' ( सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ) : हमें रोज़-रोज़ भूखा रखने वालों के विरुद्ध लोहा लेती कविताएँ
शहंशाह आलम
कविता किसी सीमा को नहीं मानती। कोई सीमा मानती भी है, तो उसकी सीमा में उसका लक्ष्य होता है, कि उसे कहाँ पर और कब वार करना है, किस गति से करना है। इसीलिए मेरा मानना है कि कविता का अपने लक्ष्य के प्रति सीमा को मानते रहना चाहिए। इससे कविता को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की तीव्रता मिलती है। अब यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या कवि किसी सेना में काम कर रहा होता है, जो कवि को धावा बोलने के लिए अपने लक्ष्य के प्रति किसी सीमा की आवश्यकता पड़ती है? इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में मेरा हमेशा रहा है। एक कवि किसी-न-किसी मोर्चे पर ही तो सक्रिय रहता आया है और धावित भी। इसलिए कि कवि का काम अपने श्रोताओं और पाठकों का काम मनोरंजन करना नहीं, उन्हें उनके समय से परिचित कराना है। यही वजह है कि समाज में और साहित्य में कवि को ऊँचा दर्जा दिया गया है। मेरी इस दृष्टि से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव उन कवियों में मुझे दिखाई देते हैं, जो अपने कवि-कर्म को सीधे उस वर्ग का हिस्सा बनाते हैं, जिस वर्ग को हमारे समर्थन की ज़रूरत सदियों से रही है। इस कवि की वास्तविक छवि यही है कि यह कवि दुनिया-भर के आम आदमी के संघर्ष में साथ देने के लिए खुल्लम-खुल्ला डटा खड़ा है। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव यह कमाल इनके सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह 'रोटियों के हादसे' की कविताओं में बाकमाल होकर प्रकट होता है। इसलिए कि इनकी कविताओं में बहुत सारे कवियों की तरह कवि का अभिनय-भर दिखाई नहीं देता बल्कि अपने समय के सिस्टम के विरुद्ध जिस लड़ाई की बात-भर हम करते आए हैं, उस लड़ाई को कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव साक्षात् लड़ते दिखाई देते हैं :
रास्ता रोका है मज़दूरों ने
क्योंकि उन्हें
रोटी की ज़रूरत है
पुलिस ने बरसाए हैं डंडे
क्योंकि भूख उन्हें भी लगती है ( 'सिस्टम', पृ. 13 )
अथवा,
आज भी
नहीं जला चूल्हा
आज भी
उदास है माँ
आज भी हैं आँसू
वो पूछते हैं
माँ, रोज़ भूख क्यों लगती है ( 'रोज़-रोज़ भूख', पृ. 15 )
यह स्पष्ट है कि कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ शासन-प्रशासन की उन नीतियों के विरुद्ध हैं, जिन नीतियों ने हमें 'कोल्हू का बैल' मुद्दतों से बनाए रखा है। यही तो कटु सत्य है। अब आप क्या हैं, हमें नहीं मालूम, लेकिन हम अपने बारे में कहें, तो हम 'बैल' भी हैं और 'दबैल' भी। यानी देश की सरकारें हमें बैल की तरह खटाती भी रही हैं और खटने के एवज़ अपने हिस्से की रोटियाँ माँगने पर हमें दबाती भी रही हैं। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविताएँ अपनी लघुता में, अपनी दीर्घता में विस्तार से यही समझाती आई हैं। इनकी हर कविता का सूत्र यही कहता है कि हम जो सदियों से आम जन हैं, ख़ास जन का जीवन न सही, हमारे लिए बोटियाँ न सही, रोटियाँ तो रहने दो! तुम तो हमारे हिस्से की बोटियाँ और रोटियाँ सब छिनते आए हो! लेकिन हमारे क़िस्से का यह सत्य-खंड कोई स्वीकारने वाला दिखाई कहाँ देता है इस काल-खंड में। कवि की यह अनुभूति कवि के हृदय से निकलकर अपनी विराटता के साथ कविता में अंकित होती है। यथार्थ का यह सूक्ष्म आयाम कोई सच्चा और अच्छा कवि ही पकड़ सकता है। इस तरह से देखें, तो कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव एक सच्चे और अच्छे कवि सिद्ध होते हैं :
पहली बार उसे डर लगा
रोटी को देखकर
उसे विश्वास ही नहीं हुआ
इतनी डरावनी भी
हो सकती है रोटी
उसे लगा
व्यर्थ हो गई
हर मेहनतकश के लिए
उसकी रोटी की लड़ाई
उसके सामने पड़ी
ख़ून से सनी रोटी पर
भिनभिना रही थीं मक्खियाँ
मानो हँस रही थीं
उसकी विफलता पर
वह काँप उठा
नहीं
अब सिर्फ़
रोटी के लिए
नहीं लड़ेगा
बल्कि
ढूँढ़ेगा उन हाथों को भी
जो रोटी को
रक्तरंजित कर रहे हैं ( 'दूसरा पहलू', पृ. 24-25 )
यहाँ कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का इस पूँजीवादी समाज के प्रति ग़ुस्सा वाजिब है। मेरे ख़्याल से सरकारों को यही समाज समर्थ करता आया है और सरकारें पूँजीवादी समाज के लिए हमेशा से तत्पर रहती आई हैं। यह कैसी विडंबना है कि सरकारें बनवाते तो हम हैं, मगर लाभ पूँजीवाद उठा ले जाता है। इसका अर्थ यही है कि जिस भी विचारधारा की सरकारों को चुनें, सरकारें पूँजीवादियों को ही चूमती-चाटती आई हैं। इन कविताओं का उद्देश्य यही है कि आम आदमी के जटिल-कठिन जीवन के प्रति हमारी संवेदना जीवित हो। यह आकस्मिक या अचानक नहीं होता आ रहा है कि एक वर्ग अपने ऐश्वर्य में ऐश्वर्यवान और ऐश्वर्यशाली हो-होकर जी रहां है और एक वर्ग चंद रोटियों के लिए इतनी मशक्कत करता फिरे कि बेचारा दम तक तोड़ डाले। कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का मिशन यही है कि आम आदमी की मुख्य समस्याओं का हल अब निकलना ही चाहिए। हमें युद्ध नहीं अनाज चाहिए :
रोटी
थाली की जगह
ख़बरों नें है
भूखा बच्चा रोटी समझ
चाँद को लपकना चाहता है
लेकिन काट दिए जाते हैं उसके पंख
वो फड़फड़ाता है
छटपटाता है
उसका पंख लेकर
कोई और उड़ जाता है
उसके हिस्से में ना तो रोटी है
ना ही उड़ान
उसके हिस्से में सिर्फ़ भूख है
बेटे से किया वादा पूरा करना चाहता है
परकटा बाप
वो उसे पेट-भर रोटी खिलाना चाहता है
लेकिन वो उसी पेड़ से लटका मिलता है
जिसे उसी ने कभी रोपा था
ये किसानों के हवा में लटकने का दौर है
ज़मीन उसे रास नहीं आ रही ( 'हवा में लटकने का दौर', पृ. 28 )
कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बग़ैर किसी लटके-झटके के कवितारत हैं। ये अभिजात संस्कार के विरुद्ध हैं। यह संस्कार है भी तो ख़तरनाक! आम आदमी के जीवन की बहुत सारी विषमताएँ, बहुत सारी समस्याएँ, बहुत सारी कुरूपताएँ इस अभिजात संस्कार ने अकेले दी हैं। यह अभिजाततंत्र अथवा यह अभिजातकी जितना हमारे लिए ख़तरनाक है, उतना ही चालाक भी है। यह हम जैसों को फलने-फूलने नहीं देता। स्थिति इतनी नाज़ूक हो गई है कि सारा त्याग यह वर्ग हमीं से चाहता है। अब हम लाख नए समाज का ढिंढोरा पीटत रहें। मेरी मुनादी यही कहती है कि आज की सरकारें, आज की न्याय-व्यवस्थाएँ, आज की शासन प्रणालियाँ, सब-की-सब इसी वर्ग की चाकरी में लगी दिखाई देती हैं। गर ऐसा नहीं है, तो हम पिछड़े दिनों-दिन अत्यधिक पिछड़ते क्यों जा रहे हैं? सामाजिक विषमताएँ इस सभ्य समाज में ज़्यादा बढ़ती क्यों जा रही हैं? इन सब विषमताओं का समाधान निकल क्यों नहीं रहा है? हमारी परिस्थितियाँ ठीक होने-होने को होती हैं, तो हम पर महँगाई, बेरोज़गारी, दंगे ( और अब युद्ध का भय भी ) क्यों लाद देतो हो तुम? तुम्हें उत्तरप्रदेश चाहिए, तुम्हें बिहार चाहिए, तुम्हें बंगाल चाहिए, तुम्हें दिल्ली चाहिए, तो सब ले लो भइया, पर यह सब लेने से पहले हमें इतना डरा-धमका क्यों देते रहे हो? तुम इतना घबराते काहे हो, जो तुम्हें हमें पुरस्कृत और तिरस्कृत नहीं करने देने का बयान देना पड़ता है, सलाह देनी पड़ती है अपने लगुए-भगुए को? संग्रह की कमोबेश सारी ही कविताएँ ऐसे दमघोट प्रश्न उठाती हैं।
इस संग्रह को पढ़कर इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारे शत्रु कौन हैं और कहाँ-कहाँ छिपे-घात लगाए बैठे हैं। अब एक कवि आपके शत्रुओं की निशानदेही ही न करेगा, अपने शत्रुओं को छिपने वाली जगहों से खींचकर निकालना तो आप ही को है न बंधु, उन्हें सज़ा भी आपको ही देनी है। कवि तो आपके प्रति हमेशा से सजग है। आप ही विमुख हो-होकर अपने शत्रुओं को क्षमादान देते आए हैं। तभी तो सरकारें, न्यायपालिकाएँ, प्रशासनें, दक्षिणवादी संगठनें यानी सबके-सब आप ही पर चढ़े दिखाई देते हैं। तभी तो सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का कवि यह कह रहा है कि :
डरे हुए लोगों की भीड़ में
उसे तलाश रहा हूँ मैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रें
किसी गंभीर प्रश्न के साथ
टटोलती हैं मुझे
खड़े हो जाते हैं मेरे रोंगटे
राइफ़ल, बारूद
विस्फ़ोट, चीख़
ख़ून
इन सबसे अभ्यस्त मेरी आँखें
डर जाती हैं
सहमी, डरी, सशंकित नज़रों से
इसलिए उसे
तलाश रहा हूँ मैं
नहीं
फ्लड लाइट नहीं
दीया जलाकर लाओ
दीए की रौशनी में ही
पकड़ में आ सकता है
वह शख़्स
फ्लड लाइट में
उसकी कमज़ोर नज़रें
चुंधिया जाएँगी
और सत्तर साल का
वह डरपोक, कमज़ोर
कुपोषण का शिकार बुड्ढा
जाकर छिप जाएगा
किसी घने जंगल में
जंगल
मत पूछो
इसकी परिभाषा मुझसे
परिभाषा के दायरे से
बाहर निकल गया है जंगल
क्योंकि
हिंस्र-ख़ूनख़ार जानवरों से भी
क्रूर जीव
घूम रहे हैं शहरों में
गाँवों में, बस्तियों में
सच तो यह है
कि जंगल अब
शहरों में बसता है
और इसी जंगल में
ठेकेदारों
हत्यारों
खद्दरधारियों
पूँजीवादी सर्वहाराओं
और ऐसे ही अनेक
भले मानुषों की भीड़ में
कहीं खो गया है अपना स्वराज
लाओ
दीया जलाकर लाओ
हम उसे ढ़ूँढ़ निकालेंगे ( 'स्वराज', पृ. 74-76 )
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रोटियों के हादसे ( कविता-संग्रह ) / कवि : सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव / प्रकाशक : लिटरेचर प्वाइंट, जी-2, प्लॉट नंबर-156, मीडिया एन्क्लेव, सेक्टर-6, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद ( उत्तरप्रदेश ) / मूल्य : ₹100 / मोबाइल संपर्क : 09582869580

समीक्षक-संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / मोबाइल : 09835417537
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