सोमवार, 26 जून 2017

दूसरा शनिवार में शिवदयाल (रपट): नरेंद्र कुमार









दिनांक 24.06.2017 शाम 5 बजे 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में साहित्य सुधीजन प्रिय कवि शिवदयाल को सुनने हेतु उपस्थित थे। गांधी मैदान का वातावरण मानो काव्य-पाठ के लिए ही आमंत्रित कर रहा था। गोष्ठी में अस्मुरारी नंदन मिश्र, राजकिशोर राजन, सुजीत वर्मा, प्रत्युष चंद्र मिश्र, हरेन्द्र सिन्हा, अरुण शाद्वल, मधुरेश नारायण, कुमार पंकजेश, मुकेश प्रत्यूष, अनिल विभाकर, भगवती प्रसाद द्विवेदी, जयेन्द्र सिंह, प्रभात सरसिज, डॉ निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, अशोक जंगबहादुर, राजेश शुक्ल, शिव पुरी, एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कवि ने 'नाव', 'खोज', 'कवि ने लिखी कविता', 'बेवजन', 'अपने को देखना', 'अकिलदाढ़', 'घोंघा', 'ताक पर दुनिया', 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग', 'मीनू मैम का पर्स', 'मीनू मैम की हँसी', 'मीनू मैम की बिंदी', 'खरीददारी', 'आने वाले दिनों में', 'चादर', 'शरणार्थी बच्चा' एवं 'लिफाफा' शीर्षक से कविताएं सुनाई। कविताएं श्रोताओं से सीधे संवाद कर रही थीं।

काव्य-पाठ के बाद हुई चर्चा में सुजीत वर्मा का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं एक तेवर की नहीं हैं तथा उनमें गंभीरता के साथ संवेदनशीलता है। 'नाव' कविता संवेदनशील है, वहीं 'घोंघा' शीर्षक कविता अस्तित्ववादी है। 'खोज' शीर्षक कविता में यांत्रिक युग में मनुष्यता की खोज की बात कवि कहते हैं। विषयवस्तु, भाषा, संरचना एवं शैली के स्तर पर कविताएं लाजवाब हैं तथा उनमें चेतना का गंभीर अंतरप्रवाह स्पष्ट दिखता है। अरुण शाद्वल का कहना था कि शिवदयाल की कहानियों, उपन्यासों एवं कविताओं में आदमी का संघर्ष स्पष्ट दिखता है। इनकी रचनाएं सामान्य चीजों को विशेष बना देती हैं।




शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए डॉ निखिलेश्वर वर्मा का कहना था कि कविता के गुणों के साथ कवि पाठक तक पहुंचते हैं। विषय के हिसाब से शिल्प अपनाते हैं। अशोक जंगबहादुर का कहना था कि कवि की रचनाएं समाज का दर्पण है। आगे कुमार पंकजेश ने कहा कि कवि के लिए विषय ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। उनकी कविताएं समस्या के साथ समाधान की बात करती हैं। मुहल्लों और घर की चीजों से लगाव के कारण कवि 'गर्दनीबाग' एवं 'ओसारा' जैसी कविताएं रचते हैं। अपनी रचनाओं में कवि बिना लाग-लपेट अपनी बात कह जाते हैं।

अनिल विभाकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कवि का ध्यान रोजमर्रे की चीजों पर है। झूठी शानो-शौकत पर कवि कटाक्ष करते हैं। संवेदना के स्तर पर कविताएं बढिया हैं, पर कुछ कविताओं को और खुलना चाहिये था। भगवती द्विवेदी का कहना था कि शिवदयाल मूलतः कवि हैं। सभी कविताएं अनुभूतिपरक लगीं...सीधे संवाद करती हुई। संवेदना को झकझोरती हुई कविता 'गर्दनीबाग' सांस्कृतिक क्षरणशीलता को व्यक्त करती है। प्रत्यूष चंद्र मिश्र ने कहा कि किसी रचनाकार की रचनाओं में स्मृतियों का कोलाज़ नहीं बनता है तो लगता है कि रचना में कुछ कमी रह गयी हैं। 'गर्दनीबाग' कविता में कवि अपनी निजी स्मृतियों को सामूहिक स्मृतियों में तब्दील कर देते हैं।


जयेन्द्र सिंह कविताएं सुनते हुए अभिभूत थे। उन्होंने कहा कि शिवदयाल कुल मिलाकर एक सजग साहित्यकार हैं और वे एक श्रोता। प्रभात सरसिज ने कहा कि कवि की रचनाओं में सम्यक दृष्टि है, करुणा है, बस गुस्सा नहीं है। कविताओं में अवधि-विस्तार दिखता है। राजेश शुक्ल का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं मानस में अंकित रह जाती हैं। वे सही मायने में एक पूर्णकालिक लेखक हैं।

अस्मुरारी नंदन मिश्र ने कहा कि आज बहुत-कुछ छूटता जा रहा है। इस उपेक्षा से संवेदनशील मन में जो पीड़ा उपजती है, वह कवि की रचनाओं में आ गयी हैं। शिवदयाल ईमानदारी के चुकने की बात करते हैं तथा छूटती चीजों के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कविताओं में जो व्यंग्य है, वह महीन है तथा भीतर तक प्रभावित करती हैं। हरेन्द्र सिन्हा का कहना था कि संवेदनहीनता आज सबसे बड़ा संकट है। शिवदयाल के व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म में संवेदना समाहित है। इनकी कविताएं सुनने के पश्चात तनाव खत्म होता है।


मधुरेश नारायण ने कहा कि शिवदयाल की कविताएं पाठकों एवं श्रोताओं से सीधे जुड़ती हैं तथा घर के अंदर-बाहर की छोटी-छोटी चीजों पर बात करती हैं। मुकेश प्रत्युष ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि कवि सीधे अपना पॉलिटिक्स जाहिर करते हैं...कोई छुपाव नहीं। कवि का काम समाज के सत्य को सामने लाना है। समय के सत्य को उजागर करने से बचने की कोशिश में कितने कवि अप्रासंगिक होते चले जाते हैं। 'घोंघा' कविता में इसी अस्तित्व की असुरक्षा की बात कवि करते हैं।

 राजकिशोर राजन ने कहा कि समकालीन कविता दवाब में लिखी जा रही हैं। नये युवा कवि आलोचकों की पसंद पर कविताएं लिख रहे हैं। शिवदयाल की यात्रा कथा से कविता के बीच होती रहती है। उनकी कविताओं की भाषा, शिल्प और विषय अपने समकालीन कवियों से भिन्न है। यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कवि अपने रचनाकर्म को ले कर कितना गंभीर है। बिना लंबे संघर्ष के इस स्तर पर आप अलग से रेखांकित नहीं हो सकते। शिवदयाल जी की कहानियां भी शिल्प और कहन के स्तर पर हिंदी में अपनी अलग पहचान बनाती हैं। वहीं कुछ रचनाओं में वैचारिक दवाब के कारण हृदय पक्ष मौन हो गया है।नरेन्द्र कुमार ने शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए कहा कि कवि विषय-वस्तु की तलाश में दूर नहीं जाते, बल्कि अपने आस-पास ही नजर दौड़ाते हैं। रचनाओं में कोई चमत्कार करने का प्रयास नहीं...भाषा की क्रीड़ाओं में उलझने की कोई इच्छा नहीं। उनकी कुछ लंबी कविताओं में उनकी औपन्यासिक प्रवृति स्पष्ट दिखती है।

शिवदयाल का अपनी कविताओं के संदर्भ में कहना था कि उन्होंने कहानी एवं उपन्यास के वनिस्पत कविताओं पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि चाहिए। आज कविताओं पर हुई चर्चा से मैं अभिभूत हूं। 'दूसरा शनिवार' के सद्प्रयासों के प्रति उन्होंने शुभकामनाएं व्यक्त की। अगली गोष्ठी में मुकेश प्रत्यूष के एकल काव्य-पाठ का निर्णय लिया गया। अंत में प्रत्यूष चंद्र मिश्र द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

शुक्रवार, 23 जून 2017

अनिरुद्ध सिंहा की कुछ गजलें

         
    अनिरुद्ध सिंहा की कुछ बेहतरीन गजलें


                 
   अनिरुद्ध सिन्हा

जाँ बदन से जुदा  है रहने दे
ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे

एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ
अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे

छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें
ये  फसाना  सुना  है  रहने दे

अपनी सूरत से मत डरा मुझको
सामने  आईना   है  रहने  दे

छेड़खानी  न  कर  वफ़ाओं से
वो अगर  बेवफ़ा  है  रहने दे

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राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते
जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते

नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू
दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते

कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में
देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर  देखते

बेबसी की  बाजुओं में  जाने  कब से क़ैद है
चंद लम्हों के  लिए  बाहर निकलकर देखते

उम्र भर जलते रहे  जो  रंजिशों की आग में
वो मुहब्बत के चिरागों  में भी जलकर देखते


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लोग  पीछे थे  मेरे  हाथ में पत्थर लेकर
मैं कहाँ  भागता  शीशे का बना घर लेकर

प्यास  सहरा  में  बुझा देंगे ये मेरे  आँसू
मैं तेरे  साथ हूँ  आँखों  में समुंदर  लेकर

ऐसे  हालात  में जज़्बात भी मर जाते  हैं
लोग मिलते  हैं जहाँ  हाथ में खंज़र लेकर

फिर चिरागों को बुझा दे न हवाओं का जनून
घर में  बैठे रहे  सब  रात का ये डर  लेकर

ये मुहब्बत का सफ़र तन्हा सफ़र  रहता  है
कौन चलता है यहाँ साथ  में  लश्कर लेकर


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रगों  में रेत  भरकर  रोज़ घटता जा रहा है
वो दरिया तो किनारों  से लिपटता जा रहा है

मेरा ये दायरा  जब से सिमटता  जा रहा  है
मेरा किरदार भी अब मुझसे कटता जा रहा है

ये दुनिया तो हमेशा  की तरह रंगी  बहुत  है
न जाने  क्यों हमारा  दिल उचटता जा रहा है

नई तहजीब  अपना  क़द बढ़ाती  जा रही  है
पुराना  जो  है  धीरे-धीरे  हटता  जा रहा  है

वो जाहिल था वो जाहिल है वो जाहिल ही रहेगा
किताबों के  वो बस  पन्ने पलटता जा रहा  है


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जो आँसू पीके हँसना जानता है
मुहब्बत को  वही  पहचानता है

पड़े हैं पाँव में  जिसके भी छाले
सफ़र की वो हक़ीक़त जानता है

भरम  कल टूट जाएगा तुम्हारा
फ़रिश्ता कौन किसको मानता है

वो किसकी याद लेकर बस्तियों में
गली की ख़ाक हर दिन छानता है

शहर में फिर रहा हूँ अजनबी सा
कोई मुझको  कहाँ पहचानता  है


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इजहारे-मुहब्बत  की जो हिम्मत नहीं करते
वे  लोग  ज़माने  से  बगावत  नहीं करते

खुशबू से जिन्हें इश्क़ है लुट जाते हैं लेकिन
काँटों से किसी  हाल में  उल्फ़त नहीं करते

हर हाल  में रिश्तों  की  ये सांसें  रहे ज़िंदा
हम जुल्म तो सहते हैं शिकायत  नहीं करते

बेचैन  बहुत  होते  हैं  वो  रातों में अक्सर
जो अपने  उसूलों  की हिफाज़त नहीं  करते

सच-झूठ  का  अंदाज़  लगा लेते हैं हम भी
माना कि  अदालत  में  वकालत नहीं करते

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दिखाई दे न  जो उसका हिसाब क्या रखता
अँधेरी रात में  सूरज का ख़्वाब क्या रखता

हरेक बार  की  फूलों  से  जिसने गुस्ताखी
मैं उसके हाथ में दिल का गुलाब क्या रखता

वो मेरा दोस्त था हमदम था जाँनिसार भी था
मैं उसके सामने कोई  हिजाब  क्या  रखता

किसी चिराग की लौ में न ख़ुद को पहचाना
सियाह रात में रुख पर नकाब  क्या रखता

हरेक  सिम्त  की  मजबूरियों  के  घेरे में
हवा के रुख पे ग़मों की किताब क्या रखता


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उलझनों से  तो कभी प्यार से कट जाती है
ज़िंदगी वक़्त की  रफ्तार से  कट  जाती है

मैं   तो   क्या   हूँ   मेरी   परछाई  भी
रोज़  उठती  हुई दीवार  से  कट  जाती है

यूँ तो मुश्किल है बहुत इसको मिटाना साहब
दुश्मनी प्यार  की  तलवार से कट  जाती है

सारी  बेकार  की  खबरें  ही छपा करती  हैं
काम की बात तो अखबार से कट  जाती है

इतना  आसान नहीं प्यारे मुहब्बत   करना
ये वो गुड़िया है जो बाज़ार से कट जाती है

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परिचय
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नाम –अनिरुद्ध सिन्हा
जन्म -2 मई 1957
शिक्षा –स्नातकोत्तर
प्रकाशित कृतियाँ
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-(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह )(3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह) (4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)(9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण(12)हिन्दी ग़ज़ल परंपरा और विकास (13)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (आलोचना )
सम्पादन-
साहित्यिक पत्रिका “समय  सुरभि” और ”,जनपथ “ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन
“किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है(अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें)तथा बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार का सम्पादन ।
देश के तमाम स्तरीय पत्र/पत्रिकाओं में निरंतर ग़ज़लों और आलेखों का प्रकाशन
सम्मान  
बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा,विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,आचार्य लक्ष्मीकान्त मिश्र स्मृति सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
सदस्य-बिहार फिल्म विकास एवं वित्त निगम
संप्रति –स्वतंत्र लेखन
संपर्क- गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

             

बुधवार, 21 जून 2017

शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना उन्हीं की जुबानी

शत्रुघ्न सिन्हा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति के उम्मीदवारी के लिए बधाई देने के बाबजूद जिस तरीके से बयान दिया उसमें नया कुछ भी नहीं है. वे भाजपा में रहते हुए भी पार्टी के खिलाफ ही बयानबाजी नहीं करते रहे हैं बल्कि वे जन्म से ही अख्खड़ साहसी हैं. उनके बागी रूप को भारती एस प्रधान की लिखी एनिथिंग बट खामोश में भी बखूबी पढ़ा जा सकता है. आइए पढ़ते हैं शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना को उन्हीं की जुबानी. जिसे आपलोगों के लिए हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है – सुशील कुमार भारद्वाज




वे एक खास घटना के बारे में बताये. “एक दिन पटना साइंस कॉलेज के लड़के लड़कियों को प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ककोलत, पटना से सत्तर से अस्सी किलोमीटर दूर पर्वतीय इलाके में घुमाने की तैयारी की गई. मेरी छवि की वजह से मुझे उस कार्यक्रम से अलग रखा गया, जो मुझे मंजूर नहीं था. उनलोगों ने मेरे बगैर जाने की बात कैसे सोच ली? मैंने तय किया कि बाबजूद इसके मैं इस कार्यक्रम का हिस्सा बनूँगा.
“मेरे एक दोस्त ध्यान देव शर्मा, जो कि मुझे बहुत चाहता था, मुझे आधे रास्ते में बख्तियारपुर बस अड्डे के पास मिला और मुझे अपने साथ रिक्शे से ले गया, रिक्शा को वह खुद चला रहा था. जलती गर्मी में धूल भरी लंबी यात्रा से हमलोग ककोलत पहुंचे लेकिन बस लौटने ही वाली थी. प्रभारी प्रोफेसर श्री डीएन सिंह, जो कि मुझे बिल्कुल ही पसंद नहीं करते थे, को बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने वहां पहुंचने की गुस्ताखी की थी. उन्होंने जब मुझे बस के अंदर बैठे देखा तो उन्होंने इसे अपने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लिया और वे नीचे उतर गए. उन्होंने कहा, ‘ये बस पटना वापस नहीं जाएगी. तुम्हें इस परिभ्रमण में शामिल नहीं किया गया था इसलिए जब तक तुम बस से बाहर नहीं निकलोगे, यह हिलेगी नहीं.’ अंधेरा हो रहा था और मैं जंगल में अकेला नहीं रहना चाहता था. लेकिन इसी समय मुझे बस से बाहर निकलना था. प्रोफेसर के जानकारी के बिना कुछ दोस्तों ने मुझे बस के उपर चढ़ने में मदद की. बस के उपर में लेटे हुए छड को पकडे रहा. बस के उपर में बड़े बड़े बर्तन और पिकनिक का सामान रखा हुआ था. बाहर कर दिए जाने के कारण मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, और बस भी इतने खराब तरीके से चलाया जा रहा था कि मेरा पूरा शरीर उपर –नीचे उछल रहा था. बस के अंदर बैठे प्रोफेसर और अन्य को आभास भी नहीं हुआ कि बस के उपर इतना उछल कूद मचाने वाला मैं था, उनलोगों को लगा कि ये आवाज बस के उपर रखे बर्तन की है. रास्ते में कुंठा के कारण बर्तन और प्लेट को फेंकता रहा. यह मुझे परपीडन की खुशी देती रही. अब मैं महसूस कर रहा हूं कि उस तरह का काम कलाबाजी दिखाने वाले का था लेकिन वह मजबूत इरादा ही था जिसकी वजह से बख्तियारपुर पहुंचने तक उपर में ही जमा रहा. जब बस चाय–नाश्ता के लिए रूकी, तो मैं नीचे आया और सिगरेट जलाकर धुआं प्रोफेसर के सामने उड़ाने लगा. सब कोई चकित था कि मैं वहां पहुंचा कैसे? कुछ लड़कियां मेरे इस साहसी कारनामें को देखकर बहुत खुश हुई. उस दिन, प्रोफेसर के चेहरे पर छाये नफरत की अभिव्यक्ति को मैं नहीं भूल सकता.
“लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई. मेरे दोस्त ध्यान देव के कुछ प्रभावी मित्र परिवहन विभाग में थे. हमलोगों ने ऐसी स्थिति बना दी कि बस खुल ही नहीं सकती थी. उन्होंने बहाना बनाया कि बस में कुछ खराबी है. लेकिन 11:30 बजे रात तक मैं ही चलने के लिए उतावला होने लगा. मुझे लगा कि लड़कियों के बस के साथ हमलोगों को आगे बढ़ना चाहिए. हमारे चेहरे पर भयंकर मुस्कुराहट देखकर प्रोफेसर ऐंठ कर रह गए. अठारह साल के लड़के के इरादे के सामने अधिकारी के चेहरे पर इतनी शर्मिंदगी और बेबसी छाई थी कि हमलोगों ने बस को आगे बढ़ाने और दूसरे रास्ते से पटना पहुंचने का निश्चय किया.



उनकी खासियत है कि शस इस तरह के शरारत के बारे में कहने से हिचकते नहीं हैं भले ही इसमें उनको कोई फायदा न हुआ हो.
“मैं जनता हूं कि इस तरह का बचकाना हरकत करना बेकार था. मुझे नहीं करना चाहिए था.” वे माने, “मैंने उस प्रोफेसर के लिए कोई ईर्ष्या नहीं रखा. यदि मैं आज उनकी जगह होता तो मैंने भी वही किया होता. लेकिन मुझे ध्यान देव के लिए बहुत प्यार और दुलार है, जिसने उसदिन मेरी मदद की. मैंने इस घटना के बारे में जीवन के इस पड़ाव पर सुनाया सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं आमदा हो जाने पर क्या कर सकता हूं. आज यह बेकार लग सकता है, दुस्साहसी लग सकता है लेकिन सतरह और अठारह की उम्र में इस तरीके के कार्यों को कर पाना बहत ही मुश्किल था और इरादे का मजबूत होना जरूरी था. उसदिन मुझे कुछ भी हों सकता था.”
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मंगलवार, 20 जून 2017

लालकृष्ण आडवाणी के साथ जो हो रहा है वैसा ही उन्होंने भाजपा में किया भी

 शत्रुघ्न सिन्हा के शब्दों में कहें तो “भाजपा पहले एक अलग पार्टी थी लेकिन अब यह अलग-अलग की पार्टी हो गई है”. आज जब राष्ट्रपति के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी को दरकिनार करते हुए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को आगे किया गया है तो भाजपा की कार्यशैली फिर से चर्चा में आ गई है. भाजपा और खुद लाल कृष्ण आडवाणी के कार्य पद्धति को शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी “एनिथिंग बट खामोश” से समझा जा सकता है. भारती एस प्रधान की अंग्रेजी में लिखी इस किताब के कुछ पन्नों को हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है. आप भी इसे पढकर देखें. – सुशील कुमार भारद्वाज



“जब आडवाणीजी ने लोकसभा सीट से लड़ने की बात कही, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब मैं राज्यसभा में जाने का अनिच्छुक था तब उन्होंने और पार्टी ने समझाया कि मैं उपरी सदन के लिए बहुमूल्य रहूँगा; हमलोगों को वहां अपनी पार्टी को मजबूती देने की जरूरत है. तब उन्होंने सुविधा का तर्क दिया कि पार्टी नियम के अनुसार दो से अधिक कार्यकाल नहीं दिया जा सकता.” शस ने कुछ गौरतलब अपवाद की ओर ध्यान खींचा. “पार्टी के अनेक नेता जैसे अरुण जेटली, और मेरे दोस्त रवि शंकर प्रसाद एवं वेंकैयानायडू को राज्यसभा में तीसरी बार भी मौका दिया गया.”
शस के चुनाव के समय तक राज्यसभा में रहने के अपने कारण थे.
2009 के चुनाव होने में एक साल का समय शेष था. मुझे दिल्ली का अपना घर छोड़ कहीं और अपनी व्यवस्था करनी थी.” उन्होंने व्यवहारिक रूप से कहा. “इसलिए मैंने सलाह दिया कि मुझे दो साल राज्यसभा में रहने दिया जाए ताकि मैं दिल्ली में चुनाव और उसके बाद भी रह सकूं, मैं सीट को छोड़ लोकसभा जा सकता था.” यह होशियारी की सलाह थी क्योंकि यदि वे लोकसभा में हार भी जाएंगें तो राज्यसभा की सीट बची रहेगी.
यह विकल्प पार्टी के नेताओं को पसंद नहीं आया.
शस बोले, “मैं क्यों कहता हूं कि उस दिन मैंने आडवाणीजी में राजनेता को देखा क्योंकि वे बार बार हाथ धो रहे थे और तब कहा, ‘इस बार राज्यसभा में जाना आसान नहीं होगा और लोकसभा का चुनाव लडूं. यह मेरे छवि के साथ न्याय नहीं होगा’”
कोई उपाय नहीं बचा था सिवाय पार्टी के निर्णय को स्वीकार करने के. “इसके अलावे, आडवाणीजी की इच्छा मेरे लिए निर्देश था. लेकिन मैं चकित था कि जैसे राजेश खन्ना से हारने के बाद निसहाय हो गया था, वैसे ही फिर से खुद पर आ गया,” उन्होंने उदासीनता से चिढ़ कर कहा. “मेरे कहीं ठहरने के लिए न ही कोई मदद में आया न ही किसी ने अपनी कार दी.”
सौभाग्य से, शस खुद एक सफल इंसान थे. “एक साल के लिए किराये पर रहकर खुद को बचाया,” कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए. “तब जसवंत सिंह ने मेरी मदद उस समय की जब उन्होंने आवास समिति को पत्र लिखकर कहा कि जो मेरे साथ हो रहा है वह ठीक नहीं है.”
एक साल तक बीहड़ राजनीति में विचरण करते हुए, उन्होंने महसूस किया कि पार्टी के द्वारा निस्संकोच भाव से एक तरफा नीतियों का पालन किया जा रहा है.
“इसी बीच, राजीव प्रताप रूडी, जो कि उस समय मेरे अच्छे दोस्त थे, को दो साल के लिए राज्यसभा भेजा गया और लोकसभा का चुनाव लड़ने को कहा गया जबकि मैं वहीं था. जो राम के लिए गलत है वह श्याम के लिए सही कैसे हो सकता है?” उन्होंने सवाल किया. “लेकिन उसका कोई मतलब नहीं रहा और मैंने महसूस किया कि बहस थी कि ‘तुम मुझे आदमी बताओ मैं तुम्हें नियम दिखाता हूं.’ दुर्भाग्य से रूडी हार गए और रूडी की राज्यसभा सीट बरकरार रही. मैं वह नहीं कर सका.”
लगता है शस को इससे अधिक चोट लगी कि उन्हें कहा गया था कि उनका तीसरा सत्र रखा हुआ है जिसका मतलब हुआ कि यह उनके हाथ से अंतिम समय में राजनीति के छद्म खेल के कारण निकला.
उन्होंने कहा, “तीसरे सत्र के आने से पहले, मैं जसवंत सिंह के कार्यालय में राजनाथ सिंह से मिला था. उन्होंने मुझसे बाहर आकर बात करने का आग्रह किया और तब उन्होंने मुझसे पूछा कि राज्यसभा की दूसरी सीट जो खाली हो रही है उसके लिए कौन सही होगा. मैंने सीपी ठाकुर की सलाह दी. मैंने कहा, ‘वे अच्छे आदमी हैं लेकिन पहली सीट के बारे में क्या विचार है?’ उन्होंने सुस्पष्ट मुझसे कहा, ‘पहली सीट आपकी है उसपर कोई सवाल ही नहीं है.’ इसका मतलब है कि  आडवाणीजी ने जो मुझसे कहा उसके बाबजूद, तीसरी बार मुझे वह सीट देने का निर्णय लिया गया था. इस प्रकार एक राजनीति मेरे साथ लम्बे समय से खेली जा रही थी. मेरी अच्छी दोस्त सुषमाजी ने टेलिविजन पर कहा था कि शत्रुघ्न सिन्हा राज्यसभा में रहेंगें, वे हमारी पार्टी की संपत्ति हैं. मुझे विश्वास है कि 11:30 बजे सुबह तक उन्हें आश्वस्त किया गया था कि वह सीट मेरी है. लेकिन शाम में दो अलग लोगों को वे सीटें दे दी गईं. पार्टी में मतभेदों ने अपना सिर फिर से उठाया.”


कुछ समय के लिए, वे अस्थायी रूप से नरम हो गए जब, “आडवाणीजी ने मुझसे कहा कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए देश भर में किसी भी सीट को चुनने का हक होगा.”
लेकिन जब 2009 में टिकट बांटे जा रहे थे, तो उनके रास्ते में रोड़ा अटकने लगा. “सामान्यरूप से,” शस ने टिप्पणी दी. “मुझे बताया गया कि पार्टी के प्रख्यात नेता और वकील पटना-साहिब से चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन राज्यसभा में तीसरी बार जाने से जिस बुरी तरीके से रोका गया था कि उसकी वजह से वे इस बार किसी भी दबाब में झुकने को तैयार नहीं थे.”
शस ने सुविदित रूप से मामले को अपने हाथों में लिया और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पटना साहिब को अपनी सीट घोषित कर ली. “पार्टी कोई घोषणा करती उससे पहले ही सम्पतचक में, मैंने अपना प्रसिद्ध बयान दिया, ‘पटना साहिब मेरी पहली पसंद है, पटना साहिब मेरी दूसरी पसंद है और पटना साहिब मेरी आखिरी पसंद है.’”
इसकी वजह से पार्टी के अंदर खूब बबाल हुआ. यह कभी नहीं सुना गया था कि किसी उम्मीदवार ने अपने सीट का चयन और उसकी घोषणा बगैर पार्टी की सहमति और हरी झंडी मिले ही कर दी हो. “कुछ नीति-निर्धारकों को बुरा लगा कि बगैर कुछ कहे सुने ही मैंने अपने सीट की घोषणा कर दी.” उन्होंने ताना मारा.
नतीजा का प्रवाह किए बगैर, उन्होंने तेजी से आए प्रतिक्रियाओं का बखान किया. “उस समय राजनाथ सिंह ने मेरा समर्थन किया लेकिन खुलकर नहीं आए क्योंकि वे मौसमी राजनेता हैं जो कि अपना दांव चलने के लिए कुछ बचा कर रखते हैं. लेकिन सुषमा स्वराज उदारता से उनके समर्थन में आईं. उन्हें मेरे बारे में पता था जब वो टीवी पर कही, ‘हां, पार्टी ने उनसे वादा किया था कि वे अपनी पसंद से कोई भी सीट चुन सकते हैं. और यदि शत्रुघ्न सिन्हा ने पटना साहिब चुना तो पटना साहिब उनका है.’”
शस ने सुषमा स्वराज और उनके पति के प्रति अपने खास लगाव को स्वीकारा. “जब सुषमाजी और मैंने एक साथ फोटो खिंचवाई, हमलोग एक दूसरे को ज्यादे जानते थे और भाजपा को कम,” वे हँसे.
लेकिन संक्षिप्तता अधिक परिपक्व है,” वे किस तरह लगातार कमतर माने गए उसपर निगाह डालने से पहले उन्होंने स्वीकारा. “मुझे पटना साहिब सीट ना मिले इसके लिए काफी हाथ आजमाए गए लेकिन मैं कठोर बना रहा.”
2009 में उन्हें दिल्ली से टिकट देने की व्यवस्था की जा रही थी. “वे मुझे वहां से खड़ा करना चाह रहे थे जहां पार्टी दो लाख से अधिक वोट से हारी थी. आडवाणीजी ने भी मेरी पत्नी प्रोमि से कहा, ‘यदि वह पटना से खड़ा होगा तो हार जाएगा.’”
सच्चाई कुछ और थी.
2009 में भाजपा खुद सत्ता से बाहर हो गई लेकिन पटना साहिब में नहीं.

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संजय कुमार कुंदन की कुछ नई गजलें

शहर के चर्चित शायर संजय कुमार कुन्दन की गजलों में भाषा की जो रवानी है वो आपको अपनी ओर खींचती है तो संप्रेषित भाव आपको काफी कुछ सोचनें को विवश करती है। इनकी 'बेचैनियाँ', 'तुम्हें क्या बेकरारी है' और 'एक लड़का मिलने आता है' जैसे तीन गजल संग्रह पहले ही से राजकमल प्रकाशन से छप कर लोगों के बीच पहुँच चुकी है। अब इनकी चौथी गजल संग्रह "भले तुम और भी नाराज हो जाओ" जल्द ही छपकर आने वाली है। संजय कुमार कुंदन का यह संग्रह निरंकुश सत्ता के विरूद्ध बिगूल फूंक रही है। आइए पढ़ते हैं संग्रह की कुछ बेहतरीन गजलों को।



माफ़ करना मेरे आक़ा

आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ

 आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी

ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे

 ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका

 जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
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अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
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इक तख़्तनशीं आज भी इतराया  हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके  मुसाहिबों की यहाँ  भीड़  लगी  है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते  सकाफ़त  के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं  मगर कहिए अलग हैं
उसकी  नसीहतों का  नशा  छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो  बाहर  कहीं  से  आया  हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया  बस वही  फ़रमाया  हुआ  है
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मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
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सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको  तुम  पुकार लो
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समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
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एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास  मगर  हसरते-परवाज़  तो है
हो  ये चेहरे पे भले चस्पाँ  मगर  राज़  तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम  दबाते रहे उसको  सरो-सामाँ के  तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र  इतना  ही  नहीं  है  के  पिसे  जाते  हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र  है  नाज़ाँ  के  उसे  साज़  तो  है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो  ख़स्ताहाल  है पर  ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे  कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना  है,  उसकी  इनायत  है  बेहयाओं  पर
चलो ये शुक़्र है  'कुन्दन'  से  वो नाराज़ तो  है।
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हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार  .
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कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
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मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ  , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
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सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी

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सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
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ज़िन्दगी,  तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
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मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
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दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे  दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं  रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं  देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं

मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी

गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

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शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
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संपर्क:-  91-9835660910, 8709042189
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रविवार, 18 जून 2017

लेखक की पहचान का संकट:अमरेंद्र मिश्र

बदलते समय में बहुत सारी चीजें बदलती जा रही हैं। लोग सिमटते जा रहे हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में पड़ोसी तक से मिलने-बात करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यिक गतिविधि तक भी अपने अलग ढंग और तेवर में हो रहे हैं फिर पहचान की संकट क्यों नहीं हो? फिर, जब जमाना सेल्फ प्रमोशन का हो, तब भी यदि आस-पास के लोग आपको नहीं पहचानते हैं। तो  स्थिति सचमुच में भयावह है। फिर भी क्योंकर तो दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कहीं -न-कहीं लेखक स्वयं भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। खैर, आइये पढ़ते हैं साहित्यिक संपादक अमरेंद्र मिश्र के संस्मरण को और जानते हैं उनके अनुभव।



लेखक की पहचान का संकट
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एक लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए है कि उसकी किताब जिन पाठकों तक पहुँच रही है, वे 'नोटिस' नहीं ले रहे हैं, या इसलिए कि वह जहाँ रहता है, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर स्थित जो लोग रह रहे हैं, वे उसे नहीं जानते ! या लेखक ही आज के समय में अकेला हो गया है ? क्या कारण है कि एक लेखक की अपनी पहचान उसके आसपास ही नहीं बन रही ?

हाल ही में मैं हिंदी के एक वरिष्ठ कथाकार से मिला।उनके आवास तक तो मैं पहुँच गया लेकिन फ्लैट का नंबर भूल गया।जो नंबर मोबाइल पर लिया था वह भी कहीं खो गया।लेकिन उनसे मिलना चूँकि पच्चीस वर्षों बाद हो रहा था, इसलिए मुझे पक्का विश्वास था कि उनके फ्लैट को तो मैं पलक झपकते ही पहचान लूँगा।और फिर इतने बड़े लेखक हैं तो कोई भी चायवाला, पानवाला, पटरी लगाने वाला जरूर उनका फ्लैट बता देगा।

उस पार्क की एक बेंच पर बैठा-बैठा अपने सामने के तमाम फ्लैट देखता मैं सोचता रहा-सामने वाले फ्लैट से थोड़ा हटकर हल्के पीले और गाढ़े भूरे रंग का फ्लैट ही विभूति बाबू का हो सकता है।पार्क की बेंच पर बैठे-बैठे इतना इतमीनान कर लेने के बाद मैं उठा और सामने की सड़क पार कर उनके फ्लैट के पास पहुँच गया।कुछ देर तो उनके नाम से ही उन्हें खोजता रहा पर किसी ने भी आदरपूर्वक यह नहीं बताया कि विभूति प्रसाद जी, जो एक मशहूर लेखक हैं, वह पास के किस फ्लैट में रहते हैं ?मैं जिस फ्लैट को पहचानता उनके उस संभावित फ्लैट तक पहुँचना चाहता था, वह तो उनका था ही नहीं।पुरानी स्मृति में बार-बार लौटते मैं हताश हो चुका था और लगभग लौट जाना चाहता था कि इस बीच विभूति प्रसाद जी सामने से आते दिखे।उनके साथ मैं उनके फ्लैट तक पहुँच गया।उसी फ्लैट में जिसका मैंने पार्क में बैठे-बैठे संभावित अनुमान लगाया था।अंतर बस इतना-सा था कि प्रवेश-द्वार का रास्ता बदल गया था।

''आपको परेशानी हुई, यहाँ तक आने में ?''
मैं कुछ कहने को तैयार हो ही रहा था कि वह फिर कह बैठे-''देखिए, अब वह समय तो रहा नहीं कि आप लेखक हैं तो आपको पूरा शहर पहचानता है।टोले-मोहल्ले के लोग आपको सर आंखों पर बिठाये हुए हैं ! समय तेजी से बदल रहा है।एक वक्त था जब मेरा या मेरे जैसे लेखक का पता तो नीचे रहने वाले या आसपास के लोग ही बता देते थे।और तो और,आये हुए आगंतुक को मेरे फ्लैट तक छोड़ भी जाते थे।डाकिया रोज दस-बारह पत्र और तीन-चार पत्रिकायें दे जाता था।कहता था,''-आपका सिर्फ नाम पढ़ता हूँ, फ्लैट का नंबर तो पढ़ने की जरूरत ही नहीं होती।''

मैं सोचता रहा,''जितना कहना चाहते हैं, कह लें, तब मैं अपनी बात उनके समक्ष रखना चाहूँगा।वे फिर शुरू हो गये-''भाई, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।आज से चार साल पहले कोलकाता में जो इलाज करवाया था, वह अबतक याद है।मैं अपने पुत्र रोहित के साथ एक-एक डाक्टर से अपनी परेशानी सुनाता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।इसी बीच एक नौजवान डाक्टर मेरे पास आया, मेरे चरण स्पर्श करते कहा-''सर, आप यहाँ कैसे ?''
''मैं आश्चर्य में पड़ा उसकी ओर देखता कह गया-''क्या आप मुझे पहचानते हैं ?''
''सर, आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी फोटो किताब पर देखी थी।आप विभूति जी हैं।आपकी लगभग सभी किताबें पढ़ गया हूँ।विशेषकर आपका वह उपन्यास 'सागर तीरे'।क्या गजब लिखा है सर आपने।''
मैं लगभग भावुक होता सिर्फ' धन्यवाद' कह पाया।

मेरी चिकित्सा व्यवस्था में बेहतरीन  सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयीं।एक सुखद अनुभूति के साथ घर लौटते मैं सोचता रहा-''ऐसा कभी-कभी ही होता है।ऐसे प्यारे लोग कभी कभार कहीं मिल जाते हैं और मेरा 'लेखक' उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर लेता है।''

अब न तो वह समय रहा, न वे लोग रहे, न पाठक।कुछ भी तो नहीं रहा ! अब तो सौ पृष्ठों का लिखा कथानक उपन्यास बन जाता है और कहानी 'लघुकथा' में सिमट गयी है।जिस तरह हिंदी फ़िल्म के कलाकार अपनी अभिनीत फिल्म का प्रचार स्वयं ही करते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक भी अपनी किताबों का प्रचार ख़ुद ही करता है।उसे तनिक धैर्य नहीं कि उसकी किताब पर उसे पाठकों के विचार जानने चाहिए।इंतजार करना चाहिए।क्या यह पहचान का संकट नहीं ?''

वे कहीं गहरे खो गये और शायद अपने बीते दिनों में लौट आये।

''लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए भी नहीं की उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक...''

''किस किताब की बात कर रहे आप''?वे गुस्सा हो आए।फिर तनिक सहज होते कहा- "लेखक जब खुद ही प्रकाशक का काम करने लग जाये तो फिर कैसे कह सकते हैं कि उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक नहीं पहुँच पाती ?लेखक पहले अपने व्यक्तित्व का निर्माण तो करे, फिर देखिए, यह संकट कुछ कम हो।''

कारण जो भी हो पर इतना तय है कि लेखक की पहचान का संकट इन दिनों जटिल होता जा रहा है।समाज उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहता है, जो उसे प्रिय है।उसकी अपनी पसंद-नापसंद है।उसके परिचय और 'पहचान' की परिधि में अब न तो वह पुराना समय है, न पुराने लोग, न उनकी प्रसिद्धि, न प्रतिष्ठा।

एक एकाकीपन तन गया है हमारे आपसी सरोकारों के बीच।लेखक की पहचान का संकट उतना ही अहम् है जितना परिवार और समाज में व्यक्ति के खुद की पहचान का संकट।यही कारण है कि बदलते समय में आज आदमी अकेला रह गया है।सच यह भी है कि जिस लेखक को आज का समाज पहचान नहीं पा रहा-वह उन्हीं को बेहद आत्मीयता के साथ जाने कब से रोज देखता-पहचानता आ रहा है !
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अमरेंद्र मिश्र
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फेसबुक वॉल से साभार।

शनिवार, 17 जून 2017

पंखुरी सिन्हा की कहानी हत्या की शिनाख्त का सपना

जीवन अदृश्य समझौतानुमा बंधनों के मकड़जाल में जकड़ा हुआ है. और इंसान जाने–अनजाने उसी जकड़न में ऐंठ कर रह जाता है. उस ऐंठन के बीच भी सपने कुलबुलाते हैं. सपनों की एक हसीन दुनियां बनती है तो दूसरी उजड़ती भी है. इस बनने और बिखरने के बीच से जीवन का एक नया रास्ता खुलता है. जहां हमें कुछ अनसुलझे सवाल भी मिलते हैं. नियति के सहारे हम उनमें से कुछ सवालों के जबाब तो पा जाते हैं लेकिन कुछ की तलाश जारी रहती है. जिंदगी और जीवन के इसी द्वन्द को रेखांकित करने की कोशिश करती है कवयित्री–कथाकार पंखुरी सिन्हा की कहानी “हत्या की शिनाख्त का सपना”. कथाकार ने अपने छोटे-बड़े हिन्दी-अंग्रेजी वाक्यों एवं शब्दजाल से जिस कथा-कौशल का प्रदर्शन किया है वह पाठक को अंत–अंत तक बांधे रखने में सफल है बाबजूद इसके की थोड़ी–सी भी असावधानी आपको कहानी में ही उलझाकर रख सकती है. आप स्वयं इस कहानी को पढ़ कर देखें:-




हत्या की शिनाख़्त का सपना
पंखुरी सिन्हा

कोई नींद में बोल रहा था. नहीं, ये रात के सन्नाटे में किसी के फ़ोन पर झगड़ने की आवाज़ नहीं थी, ये एक बहकी हुई बेहोश आवाज़ थी, मैं अचानक डर गयी. यह आवाज़ नशे में बहकी हुई नहीं थी, नींद में बेहोश थी, लस्त पस्त। मैं उसे पहचानती थी. वह घर में रहने वाली दूसरी हिंदुस्तानी लड़की थी. मैंने सोचा जाकर दस्तक दूँ, लेकिन वह कोई आसान शक्सियत नहीं थी. बाक़ायदा साइंटिस्ट थी, कैंसर सेल पर रिसर्च कर रही थी. उसे भला क्या दुःस्वप्न सकते थे? प्रलाप सी ही सुनाई दे रही थी उसकी आवाज़, एक तरफ़ा। नहीं, वह फोन पर नहीं थी. मैंने कसकर अपने कमरे की साँकल, कुण्डी चढ़ाई, और कंफोर्टर ओढ़कर सो रही. जबकि इस घर के सारे दरवाजों की सारी कुंडियां ख़राब थीं, कमज़ोर थीं. दरवाज़ा एक झटके में खोला जा सकता था. मैंने करवट बदली, और उस ईश्वर को याद किया जिससे मेरा जन्मजात परिचय था और जो शायद उस लड़की का और मेरा साझा ईश्वर था. अद्भुत चीज़ है, 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स', देश विदेश, अपना पराया, सरहद, रात और दिन!
सुबह उठी तो कोई आवाज़ नहीं थी, सिवाय बजते हुए अलार्म क्लॉक के सब शांत था. थोड़ी सी धूप भी निकल आयी थी. कई लोग घर से रवाना भी हो चुके थे. सब सामान्य था, मैं घर में बिल्कुल नई थी. उसकी आवाज़ों से नितांत अपरिचित। फिलहाल, किसी परिचय का समय भी नहीं था, मुझे फ़ौरन बिस्तर छोड़ना था. समय से निकलना था. अप्रैल का महीना था और  एल्बर्टा कनाडा की सर्दी पिघलते पिघलते भी बर्फ़ की शक्ल में काफ़ी कुछ फुटपाथों पर जमी हुई थी. मुझे बस स्टॉप पर बस के लिए हर रोज़ इंतज़ार करना पड़ता था. जी हाँ, तलाक़ में करार की हुई गाड़ी मुझे अबतक नहीं मिल सकी थी. एल्बर्टा की हवा बरछी सी तेज़ थी. बस स्टॉप के शीशे के बाहर बर्फ के बहुत सफ़ेद टीलों के बीच, एक खूबसूरत नहर थी, अब भी जमी हुई. मुझे कभी कभी बस का इंतज़ार करते में वह मिली थी, वह दूसरी हिंदुस्तानी लड़की। उसका पहला नाम वही था, जिस नाम की मेरी प्रिय मित्र ने अभी अभी अमेरिका में आत्म हत्या कर ली थी---रूपम! अजीब इत्तफाक है, है ! मैं दुबारा लेट गयी. 'आज छुट्टी कर लूँ तो?' 'पागल हो! आज तुम्हारी फ़ेवरेट टीचर की क्लास है. उठो मीरा!' 'तुम तो चैन से सोई भी हो.' 'हाँ, मैं सपने कम देखती हूँ. कभी कभार। भयानक सपने नहीं के बराबर!’ ‘बस, अब उठ जाओ मीरा!’
          फिर रूपम से मेरी मुलाकात दो दिन बाद किचन में हुई. हमारा चीनी लैंडलॉर्ड या हाउस मेनेजर कह लें, भी वहां उपस्थित था, लेकिन मेरे आते ही ऐसे चल पड़ा जैसे हम दोनों को बातें करने का एकांत दे रहा हो. फिर मैं भी ज़्यादा देर नहीं रुकी, अल्ली टल्ली कर, गिलास भर पानी पी, किचन से निकल आयी. रूपम अपनी बड़ी सी हांडी में शायद चिकन और चावल पका रही थी. हम सबकी बड़ी, बड़ी हांडियां थीं और पकाने का भी अलग अलग समय हम ढूंढ लेते थे. रूपम खाना पकाते हुए हमेशा अपने बड़े से एंड्राइड फोन पर एक फिल्म देख रही होती थी. इस तरह, किचन में सबका समय बंटा था. सिवाय, तब के जब यांग सुकी अपने चीनी हर्ब्स उबालती थी, पूरा घर उस गन्ध में सराबोर हो जाता था. वो कुछ औषधि जैसी जड़ी बूटियां थीं, जिनकी शायद इस घर को ज़रूरत थी. ये दुःस्वप्न या नींद में बोलने वाला हादसा कुछ एक रात और हुआ. क्या वह नाटक कर रही है? क्या वह मुझे डरा रही है. बाकी सब सो चुके, मैं देर रात पढ़ रही हूँ. नहीं, ये आवाज़ फोन पर बातें करने की नहीं। कहीं भी विराम नहीं, यह निश्चित नींद में बोल रही है. लेकिन इतनी देर? लेकिन मैंने नहीं पूछा।
          फिर एक दिन अचानक, किचन में ही उसने मुझे बताया, मेरे कभी बिना किसी उत्सुकता जताए। उसके गले में ये जो निशान है , एक बार लैब में एक्सीडेंट हो गया था. आग लग गयी थी. और एकदम से उसके दुपट्टे में लगी, इतनी तेज़ी से कि उसका दुपट्टा जल गया, और उसकी गर्दन का कुछ हिस्सा भी जला गया. 'ओह! पर ज़्यादा कुछ दिखता नहीं।' मैंने कहा और मुझे लगता है, कुछ हड़बड़ाहट में ही किचन से फिर दौड़ी. ये मैं बार बार भाग क्यों जाती हूँ उसकी लंबी कहानी सरीखी बातों से? मुझे लगता है कि लड़कियां मुझे पहले अपनी कहानियां सुनाती हैं, बाद में, मेरी कहानी पूछकर पूछकर परेशान करती हैं, लिखने भी लगती हैं, भाग्य निर्माता की तरह! वो तो ठीक, लेकिन मैं इतनी घबराई और उत्तेजित सी भी क्यों हूँ? जैसे अभी-अभी किसी ने मेरी चलाती हुई गाडी को ठोक दिया हो. पढ़ने में भी दिल नहीं लगा, नींद भी नहीं रही. बाहर टहलने जाने का सवाल नहीं है. मैं बत्ती बुझा कर लेट जाती हूँ, पर वही सवाल कभी ट्यूब लाइट, कभी बल्ब, कभी सड़क की वेपर लाइट सा परेशान कर रहा है---- क्या ये संभव है, कि रूपम ने आत्म हत्या नहीं की हो, उसे मारा गया हो? ये मैं कैसे कह सकती हूँ? मैं तो उनमें से किसी को जानती तक नहीं। पिछली बार जब उससे बात हुई थी, चहक रही थी वह. कितना हँसे थे हम उसकी इस बात पर, ' ऑफिस हैज़ बिकम लार्जर दैन लाइफ!' क्या ऐसा ही होता है रूप? लंबी, गोरी चिट्टी बहुत सुंदर रूप, हममें सबसे क़ाबिल, सबसे होशियार, क्या कुछ नहीं कर चुकी थी, यहाँ पढ़ाना, वहां लिखना, ये फैशन, वो अदा! “'रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना', हम उसे गा गा कर चिढाते! कॉलेज के पुराने दिन किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह मेरी आँखों के आगे से गुजरने लगे. मुमकिन है, इन सब गीली सूखी बातों की एक धार भी बह गयी हो! सब चेहरे गए आँखों के आगे! अभी, कुछ महीने ही हुए हैं इस दुर्घटना को. रूप अब इस दुनिया में नहीं है! तो क्या तफ़सील से याद भी नहीं किया जा सकता बीते समय को?
            अभी दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि किसी का हाथ मेरे ऊपर लहराया। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती अँधेरे का एक घटाटोप हुआ, जैसे तकिया उठाकर किसी ने रख दिया मेरे सर पर और कसकर दबाने लगा. मैं घिघियाती भी तो कैसे? नहीं, ये किसी का हाथ था मेरी गर्दन पर, पूरी ताक़त से उसे दबाता हुआ. मैंने अपने सारा ज़ोर लगाया और एक बारगी उछल गयी. कमरे के घबराये हुए अन्धकार और ब्लाइंड की सुराख से आती रौशनी में मैंने देखा, कोई नहीं था, बस सपना था! मैं सपना देख रही थी, एक दुःस्वप्न, कि कोई मेरी हत्या कर रहा है. क्यों? हवा के किसी गुम्फित जाल के भीतर, पसीने से सराबोर, मैं जाने समय के किस दरवाज़े पर खड़ी थी? एक ऐसी चौखट जहाँ से बीता समय किसी जाली दार मेहराब से छनकर आने वाले समय में प्रवाहित हो रहा था. इतना डर लग रहा था कि दरवाज़ा खोलकर बाथरूम जाना सम्भव था, एक ग्लास पानी पीना। जाने अँधेरे के किस गुरुत्वाकर्षण से बंधी हुई, किस हवा को लपेटे मैं लेट गयी.
          मैंने ये सपना कैसे देख लिया? मैं तो कभी सपने नहीं देखती। और तिसपर इतना भयानक सपना। अमूमन मेरी नींद बिल्कुल निर्बाध होती है---खाली, एक क्लास ख़त्म हो जाने के बाद शिक्षक द्वारा पोंछ दिए गए स्लेट की तरह साफ़, उस कागज़ की सफेदी लिए, जो कविता ही क्यों, कुछ भी लिखे जाने के लिए प्रस्तुत रहता है. कितनी ज़िम्मेदारी का काम है, कागज़ पर कुछ भी लिखना! वकीलों, नेताओं ही क्यों, इस देश के इमीग्रेशन डिपार्टमेंट के अफसरों द्वारा ही क्यों, हर किसी के द्वारा टेबल के नीचे, पैसे लेते देते, कितना कुछ फ़र्ज़ी लिखा जा रहा है रोज़. और मैं इतनी दूर चली आयी हूँ, अंग्रेजी के रोमांटिक काल के कवियों को पढ़ने---क्या पागलपन है? और उससे भी बड़ा पागलपन कि मैं अपने सुपरवाइजर से बहस कर रही हूँ, कीट्स पर शोध करना चाहती हूँ, वो चाहते हैं मैं येट्स पर पढ़ाई करूँ। जॉन कीट्स, २५ की उम्र में मरने से पहले दुनिया की सबसे खूबसूरत कविताएं लिख गया, येट्स से भी ज़्यादा सुंदर। हाँ येट्स से भी ज़्यादा सुंदर। येट्स को नोबेल सम्मान दीर्घायु होने की वजह से मिला, अपने अनेकों प्रेम संबंधों की वजह से. कलम का ही नहीं, दिल और दृष्टि का धनी आदमी था. लेकिन कीट्स---पानी में आग---‘When I behold, upon the night’s starr’d face, Huge cloudy symbols of a high romance, And think that I may never live to trace’, मैं कीट्स को इसलिए नहीं पढ़ना चाहती क्योंकि ट्यूबर कुलोसिस ने उसे मार डाला और मैं बच गयी!
'लेकिन ये पढ़ाई तो तुम घर लौट कर भी कर सकती हो', घर से आने वाले हर फ़ोन में यही बात. जैसे, जैसे स्टडी परमिट रिन्यूल में देर, घर की ये ज़िद और तेज़. बुलाहट और ऊँची। मैं अपनी इतनी बड़ी महत्वकांक्षा छोड़कर घर लौट जाऊँ? क्या मुझे यहाँ दुबारा मारा जा रहा है? क्या पानी पर देर तक चलते रहने से मौत हो जा सकती है? ठोस ज़मीन की प्रतीक्षा, हिचकोलों की अनिश्चितता में? मैंने क्यों कहा मैं सपने नहीं देखती? सपने महत्वकांक्षाओं से अलग होते हैं! दिन की तल्खी में, रात के अँधेरे में हम महत्वकांक्षाओं को गोल मटोल शब्द दे देते हैं, मिठास दे देते हैं, सपना कह देते हैं! सपने ही हमारा वजूद बन जाते हैं. कुछ लोग उसके पीछे, भटकते भी रह जाते हैं. लेकिन सचमुच मैंने क्यों कहा मैं सपने नहीं देखती? यानि क्या दुःस्वप्न? बुरे सपने? डरावने सपने? लेकिन वह तो कोई बुरा सपना नहीं था, वह तो बेहद अच्छा सपना था. बिल्कुल दिन की रौशनी की तरह वास्तविक था. ये अलग बात कि जो सपना देखा था, हुआ उसका ठीक उल्टा! यानि सपने की उलट बांसी हो गयी. मुझे अब भी वह सपना, कल देखे सपने की तरह याद है. उसकी आवाज़ें जेहन में बिल्कुल ताज़ी हैं. उनकी भी--"तुमने टॉप किया है."
वो मेरी प्रिय टीचर थीं, डॉ श्रेया सहगल। जबकि इतिहास केवल मेरा सब्सिडियरी विषय था. लेकिन, डॉ सहगल दोनों विभागों में पढ़ाती थीं. ‘' हिस्टोरिकल लुक एट इंग्लिश लिटरेचर', उनका पहला सेमिनार था, जिसके लिए मैंने साइन किया था. लेकिन, फिर बाद में मुग़ल इंडिया के क्लास में मैं उनकी दीवानी हो गयी. कितनी पढ़ाई की थी मैंने, उस सबसी के पेपर के लिए भी. मुझे याद है दूसरा सवाल मुहम्मद बिन तुग़लक़ पर था. जिसे कहते हैं , कलम तोड़ कर लिखना, वैसे लिखा था पर्चा मैंने। बाक़ी के पर्चे भी बढ़िया। परीक्षा फल का बेसब्री से इंतज़ार था. बिल्कुल जिस दिन रिजल्ट आया, उसी दिन, उसी सुबह का सपना है. और नतीजा देखा तो उन्हीं के पेपर में मेरे नम्बर इतने कम थे कि रिपीट करना पड़ा. मैंने शहर छोड़ दिया, मैंने पढ़ाई छोड़ दी, मैंने विषय छोड़ दिया। अब और क्या बचा था छोड़ने को? कुछ एक साल बाद की दूसरी पढ़ाई, दूसरे शहर, दूसरे राज्य, दूसरी नौकरी के बाद मैंने प्रेमी के साथ यह देश छोड़ दिया। मैं बिल्कुल बेगानी, परायी, खुद से अजनबी! मैं फूलों पत्तों में भटकती हुई सी, कि अब था क्या दफ्तरों की कुर्सियों में? बाहर डैफोडिल्स थे. टूलिप्स थे, डेज़ी हर खड्डे में खिली हुई थी. छोटी छोटी नहरों पर लकड़ी के पुलों से जुड़ीं हुईं, वर्तुलाकार, सर्पीले मोड़ों वाली राहें थीं, जिनसे हो कर कभी शेली, कभी कीट्स, लेकिन सबसे ज़्यादा बायरन की अगस्टा शीर्षक कविता मुझ तक पहुँचने लगी. इन राहों की बगल में, पेड़ों के विशाल झुरमुट थे---जिनपर कभी फौल के रंग थे, कभी बर्फ, कभी प्रस्फुटन था, और ज़रा देर की ग्रीष्म की हवायों में पक्षियों का बसेरा था. कितनी ठंड थी, कितनी ठंढी और कितनी लंबी! घरों के भीतर हीटिंग थी. यों ही नहीं पिघल जाती थी कीट्स की कविताओं की बर्फ---- मुझे बी में सेकंड डिवीज़न आया था. लेकिन, कितना कुछ बाकी था अभी. अभी तो सब कुछ बाक़ी ही था. जीवन, प्रेम, सोहर, बधाई के गीत, घर जाने क्या क्या और कवितायेँ। ‘Of the wide world I stand alone, and think, Till love and fame to nothingness do sink’ कौन जानता था यूनिवर्सिटी का मतलब सिर्फ राजनीति होगा। अब ये इस बार का दाख़िला, तो दुबारे का दाख़िला है.
जी, बचा हुआ था बहुत कुछ, उन्होंने किया आघात और ले गए. पुरुष कितनी जल्दी न्योत लेते हैं लोगों को अपने घरों के भीतर। मैं उन्हें निकाल नहीं पायी। उल्टे, फँस गयी गोरे के अवैध प्रेम में. फँसा ली गयी. इस फँसाने में हिंदुस्तानी मित्रों का क्या योगदान रहा, मत पूछिये। क्या करेंगे जान कर नहीं, वह एक अलग किस्सा है. एक लंबी कहानी। जागरूकता इस अर्थ में ही बड़ी नहीं, कि आगे ऐसे किस्से दुहराए जाएँ, बल्कि इस अर्थ में भी कि गुनहगार निर्दोष बने घूम रहे हैं. जबकि मैं यह मानती हूँ कि कानून न्याय करे इसके लिए लोगों को और मित्रों को सड़क पर उतरने की ज़रूरत नहीं। कानून को अपना काम खुद खुद कर देना चाहिए, लेकिन ऐसा है नहीं। उसका दरवाज़ा बहुत ज़ोर ज़ोर से पीटना होता है. क्यों? जबकि कानून कहता है, पुरुष दोषी है, अवैध प्रेम में स्त्री को फ़साने का, सज़ा मुझे दी गयी. अक्सर ऐसा ही होता है, स्त्री भुक्त भोगी होती है. हज़ार किस्से हैं यहाँ, हमारे आस पास अवैध प्रेम के. एक दिन में तो कोई मामला नहीं सलटता। पर ऐसे आनन फानन में, मेरे तलाक़ नामे पर दस्तख़त कर दी गयी, जो कभी स्त्री के अधिकारों को सुलझाने के लिए काफी नहीं होता। ख़ैर, सरहद पार करने के बाद ही आया ठप्पा लगा निर्णय। मुझे मालूम होता कि लौट नहीं सकूंगी तो दस्तख़त ही नहीं करती, तलाक के कागज़ पर. तो विदेश में खड़ी हुई एक नई नवेली सरहद, लगभग नागरिकता हासिल कर लेने के बाद. बुरी तरह मात खाकर, एक बार जेल से देश भेजाए जाकर, चूड़ी की तरह संगीत के सारे तार काट कर, तोड़ कर भेजी गयी पढ़ाई करने। दिन दहाड़े दुःस्वप्न की सीमा थी. आँख खोले भूकम्प से भी भयानक सपना !
फिर भी मुझे कभी कोई दुः स्वप्न नहीं आया. लेकिन रूपम का यों चल देना! ये दुबारे की फूलों से लदी ज़मीन! आजकल टहलने जाती हूँ तो एक सफ़ेद बालों वाला उम्र दर गोरा आदमी, मुझसे कुछ दूरी पर अपनी पत्नी/प्रेमिका का हाथ थामे चल रहा होता है. अब रोज़ यही ड्रामे सा नज़ारा होता है, पहाड़ों की गोद में! अद्भुत ख़ूबसूरत जगह है अल्बर्टा, लेकिन ग़ज़ब की राजनैतिक भी. एक स्टडी परमिट ही तो रिन्यू करना है, कितनी देर कर रहे हैं. मैं घर वालों से कह कहकर थक गयी हूँ, 'यहाँ किताबें बेहतर हैं, कहीं ज़्यादा, रिलेटेड रीडिंग्स की भी.' ठंढ के बारे में तो डर से कुछ बोल ही नहीं पाती। मैंने घर बदल लिया है. हॉस्टल में गयी हूँ. टनल्स से होती हुई क्लास तक पहुँच जाती हूँ. हॉस्टल में हर दूसरे दिन फ़ायर ड्रिल होती है. मैं हर रोज़ क्लास से लौटते अपनी चिट्ठियों का बक्सा खोलती हूँ. पर वह नहीं आयी, तो नहीं आयी. वह अंत तक इस तरह नहीं आयी कि फिर आना भी बेकार रहा. प्राय द्वीप की सीख यही रही कि बेहद सम्भल कर रहना था. ऐसे रहना था कि बन्दूक की नोक पर छीन ली जायेगी बसी बसाई ज़िन्दगी। लेकिन, अगर ऐसा ही था तो फिर गोरों के इतने निमंत्रण क्यों? और हिंदुस्तानियों के साथ तो यह होता नहीं। हर शुक्रवार निमंत्रण। फिर किस्म किस्म के निमन्त्रण। मेरा फुल टाइम काम लोगों को कहना क्यों हो?
तो लो, इस बार भी हाँ कहा और फिर फंस गयी. यह एक देशी जाल है. घरवालों के हल्ले के बीच, शादी के एक प्रस्ताव के साथ लौटा ली गयी हूँ देश. ठगी गयी हूँ फिर से. मुझे मंज़ूर नहीं। नहीं है क़ुबूल। और अब लौट नहीं सकती। मेरा वीसा सिंगल एंट्री था. आपने कहीं सुना है कि इतनी लंबी पढ़ाई का वीसा सिंगल एंट्री हो?
जबसे लौट कर आई हूँ, अमेरिका नामक उस महान देश में तीन क़त्ल दिन दहाड़े हो चुके हैं. एक बूढ़े से घर का रास्ता पूछते, और दो अभी अभी, बिल्कुल घर के सामने। एक परिवार के सदस्य जैसे मित्र को मेरे वहां रहते ही, रोड एक्सीडेंट में मार दिया गया था. कौन तब्दील कर रहा है, सरहद को एक खूबसूरत स्वप्न से दुःस्वप्न में? कौन कर सकता है तहकीकात इसकी? शहर और राजधानियां बदलने के एक वहशी जूनून के बीच. अपनी शिक्षिका की वही महीन आवाज़ सुनाई देती है, 'तुमने टॉप किया है. "


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