सोमवार, 26 जून 2017

समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य: राजकिशोर राजन की कविता के सन्दर्भ में - सुशील कुमार

युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है। पढ़ते हैं समीक्षक सुशील कुमार  की टिप्पणी को:-


राजकिशोर राजन



समकालीन कविता में परिवेश और मूल्य
[राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए]       - सुशील कुमार


राजकिशोर राजन की कविताओं में जीवन के शाश्वत मूल्यों को बचाने के बजाए विघटित होते जीवन को बचाने की अंदरुनी छटपटाहट ज्यादातर दृष्टिगत होती है। आप देखेंगे कि मूल्यों के निरंतर अवगाहन से कविता प्रायः उपदेशपरक और आग्रहशील होने लगती है जो उसे कमजोर बनाती है पर राजकिशोर राजन कविता के इस क्रियाव्यापार से साफ बच निकलते हैं और मूल्यों के अन्वेषण पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, उनका सारा प्रयत्न सीधे जीवन के सत्यान्वेषण पर केंद्रित होता है। यही समकालीन कविताओं की पहचान है जहाँ लोक का आंतरिक यथार्थ और उसकी संचेतना जीवन-मूल्यों के बजाए सीधे परिवेश से ग्रहण करता है जिससे क्षण की तह की सच्चाई कविता में एकदम टटका दिखती है। इसके बावजूद कविकर्म के कार्यसाधना की यह विडम्बना है कि जो उसके जीवन-पर्यन्तछूट जाता है, वही बची हुई अप्रकाशित पांडुलिपियां ही उसके मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं, देखिए राजकिशोर राजन की कविता अप्रकाशित का यह अंश कुछ आलोचक, विचारक, काव्य-प्रेमी मानते हैं/ उस कवि को समझने के लिए/ महत्वपूर्ण है उन्हें पढ़ा जाना /चुकि यही होता आया है अब तक/ प्रकाशित से ज्यादा/ कवि रह जाता है अप्रकाशित । राजन की एक अन्य कविता भगदड़ में छूटी हुई चप्पलेंमें कवि की संवेदना मन को कुरेदती हुई यथार्थ के उस सिरे को जा पकड़ती है जहाँ बहुत कम कवियों का ध्यान जाता है।माता रोएगी पुत्र के लिए/ पुत्र पिता के लिए/प्रमिकाएँ प्रेमी के लिए और पत्नियाँ पतियों के लिए/पर कोई नहीं रोएगा/ गदड़ में छुटी हुई चप्पलों के लिए। - यह पाठक के भीतर जो एब्सट्रेक्ट भाव रचती है वह परिवेशगत यथार्थ के वास्तविक संधान का ही प्रतिफलहै। टूटी हुई चप्पलें कितने बड़े फलक की कविता है,देखने के लायक है! क्योंकि दुर्दिन में महज अपने-अपने सम्बन्धों तक सीमित रहकर हमारी आत्मिक सम्पदा संकुचित रह जाती है, इस अर्थ में यह कविता यहाँ हमारे हृदय को विस्तार देती दिखती है।उपर्युक्त दोनों कविताओं में कवि की चिंता मूल्यगत न होकर परिवेशगत है  है।
     परम्परा, मिथक और इतिहास में जो सुहै उसे समय की घानीपेरकर उससे मूल्य-तत्व को उत्पन्न करता है पर जब मूल्यों को कवि इतना कसकर पकड़ ले कि परिवेश उसकी मुट्ठी से फिसल जाए तो वह लोक के यथार्थ से दूर होने लगता है। उसके आसपास और पूरी दुनिया में जो चिरनवीन क्षण की तह में घटितसत्य है (जिसे हम कविता का खनिज कहते हैं) उसकी पकड़ से बाहर जाने लगता है। परिवेश से दूर जाने की यह पलायन-वृति हम उन कवियों में अधिक देखते हैं जिनमें लोक के सत्य को भोगने का साहसऔर संघर्षनहीं होता। उनकी मनोगत दशाएँ अंतर्मुख होती हैं और उकी काव्य-प्रक्रिया अंदर से बाहर की ओर गमन करती है,(बाहर से अंदर की ओर नहीं)। उनमें कमरे में बंद होकर कृत्रिम वस्तुओं और किताबी मूल्यों का अवगाहन कर बुर्जुआ-सौंदर्य को रचने की आदत-सी पड़ जाती है जहाँ से साहित्य में रूपवाद का जन्म होता है। आप देखेंगे कि छायावादोत्तर काल में पूरा आरम्भिक प्रगतिशील साहित्य ही मूल्यों की आड़ में परिवेश से कहीं न कहीं कटा हुआ है। इसका प्रमाण यह है कि तारसप्तक के अधिकांश कवियों ने 'नई कविता'या प्रयोगधर्मी कविता' के रूप में साहित्य-जगत को लोक से कटी हुई, निहायत ही आत्मबद्ध-व्यक्तिपरक कृतियाँ दी जिसकी विशद् चर्चा करना इस आलेख का वर्ण्य-विषय नहीं। पर भारतीय साहित्य ही नहीं, पूरी दुनिया के चिंतक-लेखक अब यह महसुस करने लगे हैं कि यथार्थ के अंत:सूत्र खोलने में परिवेश का देखा-सुना-भोगा सत्य ही कविता के असल काम की चीज है। मूल्य परिवेश की अभिव्यक्ति का साधन है, वह साध्य नहीं हो सकता। इतिहास और मिथक भी परिवेश के द्वन्द्व से ही रगड़ खाकर कविता में अपनी रूपाभा और चमक पाते हैं। इसका अन्यतम उदाहरण राजकिशोर राजन जी की कविता-पुस्तक कुशीनारा से गुजरतेहै जिससे गुजरना भारतीय मिथक-मूल्यों के एक अंध-पथ से गुजरना नहीं, बल्कि परिवेश के उस विस्तार से गुजरना है जिसमें जीवन और चेतना की मानवीय उपस्थिति दीप्त है। युवा कवि राहुल झा ने राजन के इस संग्रह की कविताओं पर इस बावत एक जगह बड़ी उल्लेखनीय बात कही है कि भारतीय मनीषा के अस्तित्वगत चिंतन की महायात्रा में 'बुद्ध' की पूर्णकालिक उपस्थिति दरअसल जीवन के संबुद्ध एकाँत और विरोधाभासी संसार के भीतरी यथार्थ से सीधा औसहज साक्षात्कार है। राजकिशोर राजन की कविता की धार में पँखुड़ी-सी तैरती दार्शनिकता बुद्ध के जीवन और उनके प्रगल्भ छवि को एक अद्भुत अर्थ देती हुईदिखती है,शायद इसीलिए उनकी कविताएँ जिन जगहों, चीज़ों, पात्रों के बीच से गुज़रती हैं उनके गहरे मर्म भी साथ लेकर चलती हैं और वह तथागत की संबुद्ध महायात्रा की ज़मीन पर बीज की तरह पड़ती हैं और अंततः अपना एक विशिष्ट यथार्थ पाती हैं।...  और बेशकउनकी कविता इतिहास और यथार्थ के बीच का एक स्थगित पुल हैऔर यह पुल इधर या उधर की राह नहीं हैबुद्ध की सम्यक्-संबुद्ध महायात्रा पर उनकी ये सारी कविताएँ दरअसल हलचल के भीतर की स्थिरता को देखने की एक भरपूर कैफ़ियत है। इन कविताओं को कवि राहुल झा का देखने का जो तरीका है उसमें परिवेशगत मूल्यों के प्रति उनकी गहरी अंतर्दृष्टि और आग्रह है जो इस संग्रह की कविताओं की काया में प्रवेशकर उनमें उन लोकगत तत्वों को ढूंढता है जो कवि राजकिशोर राजन को परिवेश के आत्मसंघर्ष से हासिल हुआ है। परिवेश के साथ मूल्यों का यह घर्षण ही इनकी कविताओं में प्राण फूँकता हैवरिष्ठ कवि और लोक-चिंतक विजेंद्र का काव्य-सौंदर्य संबंधी चिंतन भी इन्हीं बातों को लेकर कविता-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है जिसे वे लोकधर्मिता के विस्तृत फलक से जोड़कर काव्य-मूल्यों को उसीमें अंतर्भूत कर देते हैं अर्थात् उनके काव्य-संसार में मूल्य परिवेशगत है, उससे अलग नहीं। कथाकार स्व. कमलेश्वर की किताब नई कहानी की भूमिकासे भी यह बात समझ में आती है कि कथ्य के यथार्थ-अन्वेषण में कहानी और उपन्यास पर भी परिवेश संबंधी उपर्युक्त बातें उतनी ही शिद्दत से लागूहोती हैं।
     हर कवि को परिवेश और मूल्य के बीच के इस अन्तर्संघर्ष को जानना और समझना चाहिए। इसे जाने-गुने बिना कोई कवि सही अर्थों में समकालीन नहीं हो सकता क्योंकि समकालीन यथार्थ को केवल मूल्यगत काव्य-वस्तु से समझना-परखना चीजों को दूर किसी टीले पर बैठकर दूरबीन से देखने जैसा है, उसके पास जाकर नहीं ।
     देखा जाए तो आलोचना और कविता का भारतीय चित्त तुलसी-सूर के काल से ही नहीं, बल्कि हिन्दी के उद्भव-काल से ही शाश्वत मूल्यों और परंपराओं के प्रति आग्रहशील रहा है लेकिन जैसे ही कविता साठ के दशक से आगे आई, वह अपना पुराना चोला तेजी से उतारने लगी, कविता की मुक्ति-प्रक्रिया में उसके रूप और कथ्य में ही नहीं, उसकी भाषा में भी अविश्वसनीय परिवर्तन दृष्टिगत हुए। इससे नई कविता में शाश्वत मूल्यों की आग्रहमूलकता न केवल खंडित होने लगी, बल्कि बहुत हद तक इन मूल्यों के प्रति अस्वीकार-भाव भी आने लगे। निरंतर बदलते परिवेश में आदमी के अस्तित्व-संकट के रूप और संघर्ष की प्रकृति भी पहले से भिन्न हो गई। जीवन-संघर्ष के सामने उन मूल्यों की अमरता को एक प्रकार से धक्का लगने लगा जिसे आदिकाल से प्रगतिशील साहित्य तक महाकवियों और मनीषी-आलोचकों ने रच रखा था, अथवा कहें तो पूरे विश्व में आदर्शवाद को यथार्थवादने समय की चादर से ढँक लिया। इसलिए जीवन-मृत्यु के सिवाय अब और बातें उतनी शाश्वत और टिकाऊ नहीं रही। परिवेश ने पुराने मूल्यों को धीरे-धीरे नए और आधुनिक मूल्यों में बदलना शुरू कर दिया। समकालीन कविता के मूल्यांकन की दृष्टि से कवियों और आलोचकों का यह साझा नया परिवेश जितना विवादास्पद और उत्तेजक है उतना ही महत्वपूर्ण और रचनात्मक, जो समकालीन हिन्दी कविता की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। कवियों के नई पीढ़ी ने एकदम नंगी और बेलौस आवाज और खुरदुरी भाषा में परिवेश के यथार्थऔर अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करना शुरू किया जिन पर अखबारीपन, रिपोर्ताज, गद्यमयता, सरलीकरण, सपाटबयानी, लयहीनता आदि केतरह-तरह के आरोप लगने लगे लेकिन बकौल नामवर सिंह वर्तमान की सही पहचान, सूक्ष्म पर्यवेक्षण और अप्रतीकी अभिव्यक्तिके कारण वह सार्थक हुई। कहना न होगा कि बिम्ब और प्रतीक ही एक मात्र रचनात्मक माध्यम नहीं है नंगे तथ्यों का नाटकीय उपयोग भी उतना ही रचनात्मक है’’ (कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 206)। लेकिन लोकधर्मी परंपरा के अग्रधावक कवि-चिंतक विजेंद्र (प्र. सं. कृति ओर) ने इसके उलट, लोकधर्मी सौंदर्यशास्त्र के आख्यान में अपना तर्क देते हैं कि कविता के सौंदर्यशास्त्र में यह बात प्रमुख है कि हम किसी भाव को कितना संश्लिष्ट बना पाते हैं। जीवन की कोई भी क्रिया सामान्य होकर भी कविता में संश्लिष्ट रूप ले लेती है। बिंब उसी संश्लिष्ट भाव का मूर्तन है। यही वजह है कि कविता बिना बिंब के सतही और इकहरी बनी रहती है। भाषा के चमत्कार और वाग्मिता से संश्लिष्टता पैदा नहीं होती। वह होती है क्रियाशील जीवन, प्रकृति और समाज को गहराई तक समझने से। फिर भावों की संश्लिष्टता तभी आती है जब हम अपनी सामान्य संवेदना को बुद्धिगत बनाकर उसे पुनर्गठित कर लेते हैं। या कहें जब विचार भावमय हो जाता है। यही काव्य-रस है। कविता के सौंदर्य की सहज प्रक्रिया भी। यह भी लक्ष्य किया जा सकता है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप, शिल्प, लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। पर यह सब कविता में घुलमिल कर ही होता है। बाहर से कुछ टाँका या थोपा नहीं जाता। आदि कवि बाल्मीकी यही कर रहे हैं।‘’(सौंदर्यशास्त्र: भारतीय चित्त और कविता, पृ. सं. 80)। कविता में संश्लिष्ट भावों की मूर्तनता, विचार की भावमयता, काव्य-बिंबों और प्रतीकी अभिव्यक्ति को लेकर दो परस्पर विरोधी स्थापनाओं का यह परिणाम रहा कि जनधर्मी कविता के अंदर दो अलग-अलग प्रवृतियाँ सामने आईं। एक तो सपाटबयानी की ओर मुड़ गई जो रुखड़ीऔर लगभग बिम्बरहित भाषा में परिवेश के आंतरिक यथार्थ को व्यक्त करने लगी और दूसरी, बिंब वाली लोकधर्मी कविता-धारा में। (लेकिन लोकधर्मिता के कवि भी जाने-अनजाने बिम्ब-रहित गद्य-कविताएँ खूब लिख रहे हैं)। हालाकि विजेंद्र जी ने यह स्वीकार किया है कि जब कवि अपना कथ्य और सामाजिक सरोकार बदलता है, सौंदर्यशास्त्र भी बदलता है। कविता के रूप,शिल्प,लय, भंगिमा, भाषा, पद-रचना और स्थापत्य में भी बदलाव होते हैं। लेकिन उनकी पक्षधरता काव्य-बिंब की ओर है। यहाँ यह महसुस किया जा सकता है कि विजेंद्र जी का परिवेशकाव्य-बिंबों से बना वह सक्रिय-सचेतन जन (अभिजन नहीं) का लोक है जो इंद्रियबोध की राह से होकर गुजरता है अर्थात उनकी कविता की दुनिया दृश्य-श्रव्य-स्पर्श-गंध से प्रतिकृत और प्रकृति के धूप-धुल-ताप-जल-रश्मि-वायु आदि उपकरणों से युक्त है जबकि नामवर सिंह सापेक्ष स्वतन्त्रताके साथ कविता की एक स्वायत्त दुनिया रचने की वकालत करते हैं और कोई भी सेंसर लगाने के पक्षधर नहीं हैं। उनके इस खुलेपन और उदारवाद आलोचना-दृष्टि से जहाँ एक ओर जनधर्मी कविताओं के विकास को व्यापक पाट मिला, कविता के नए डाइमेंशन्सका उदय हुआ, कविता की सपाटबयानी शैली में उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन हुआ वहीं दूसरी ओरकविता में रूपवादी झुकाव और बुर्जूआ-सौंदर्य को भी तवज्जो मिली जो स्वभाव से लगभग अभिजनवादी है यानि कविता के अपने प्रतिमान-पाश में ही नामवर जी ने कविता के विष-तत्व भी छिपा रखे हैं। अपने प्रतिमान के द्वितीय संस्करण की भूमिका में इस पर उन्होंने जो स्पष्टीकरण दिए हैं उसे पढ़कर यही लगता है कि रूपवाद को कविता के प्रतिमान में अभिव्यक्ति जानबूझ कर नहीं दी थी। कविता में मूल्य की प्रासंगिकता पर गहरी बात करते हुए आगे कहते हैं कि निसंदेह किसी कविता का सिरजा हुआ संसार ही उसका मूल्य है किन्तु उस मूल्य की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर है कि वह सिरजा हुआ संसार कितना वास्तविक है अथवा वास्तविकता के बारे में हमारी समझ को कितना गहरा और कितना समृद्ध करता है, हमारे आसपास के संसार को अर्थ प्रदान करने में ही किसी कविता के अपने संसार की सार्थकता है। वास्तविकता की इस अर्थ-भूमि पर ही मूल्यों का सच्चा संघर्ष होता है।’(कविता के नए प्रतिमान: पृ. सं. 217)। यहाँ सिरजा हुआ संसारका मतलब कवि के परिवेश यानि कविता-लोक से है। स्पष्टतः उनके परिवेश का दृष्टिकोण विशुद्ध यथार्थवादी है और मूल्यका खनिज भी वह वहीं से लेते हैं।  उसमें बिंबों-प्रतीकों कामहत्वपूर्ण स्थान नहीं। कविता में बिंबों को लेकर उनकी चुप्पी से उनकी अप्रतीकी अभिव्यक्तिकी पक्षधरता साफ झलकती है।तबसंतोष की बात यह है कि इन दोनों विपरीत ध्रुवों की स्थापनाओं का लक्ष्य सर्वदा एक ही रहा है: वह है जनधर्मिता।
     अगर इन स्थापनाओं के मध्य नब्बे के दशक से आगे समकालीन कवियों के कविताओं को रखकर बात करें तो यह साफ झलकता है कि उनके काव्य-संसार कापरिवेश न तो केवल काव्य-बिंबों और प्रतीकों से बना है न मात्र सपाट शैली की अप्रतिकी अभिव्यक्तिसे। सच्चाई तो यह है कि कोई भी कवि न पूरा सपाट होताहै, न पूरा बिंबों का धनी। सबमें न्यूनाधिक दोनों बातें पाई जाती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन अभी लोकधर्मी प्रतिमान के अंतर्गत ये वर्जनाएँ या सेंसर्स सक्रिय हैं जो जनधर्मी रचनाओं की सही और निष्पक्ष समीक्षा से आलोचकों को रोक रही है। फिर भी इन वर्जनाओं की बिना परवाह किए नब्बे के दशक से अब तक के लोकधर्मी कवियों ने जो कविताएँ रचीं, वे अपने रूप, कथ्य, अभिव्यक्ति के ढंग और उसकी भंगिमा, अंतरलय व बनक, सरोकार की गहराई व व्यापकता, और सबसे बड़ी बात कि जनसंघर्ष की लहक के कारण जनधर्मी कविताओं में शुमार हुई हैं। इनमें एक बेहद महत्वपूर्ण नाम है – राजकिशोर राजन जिनकी कविताएं इस आलेख के केंद्र में है।    
     राजकिशोर राजन की कविता में जब मिथक कवि के परिवेश में अपना स्वरूप ग्रहण करता है तो वहाँ भी यह बात साफ तौर पर घटित होती है,“कुशीनारा से गुजरतेसंग्रह की पहली कविता कला और बुद्धको देखिए, सौंदर्य संधान में किसी प्रतिमान की आवश्यकता नहीं पर मन के बीहड़में प्रवेश करती है – ‘सौंदर्य तो पात-पात में/क्या देखना पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण/ऊपर-नीचे/वह नित परिवर्तित सौंदर्य/ है कण-कण में विद्यमान/वही सत्य का आधार/जिसका, न आर-न-पार/जो कर लेता/अपने हृदय में/उस अप्रतिम सौंदर्य का संधान/कला करती उसी का अभिषेक/करती उसी का सम्मान/जब तक, इसका ज्ञान नहीं/तब तक,सकल मान-अभिमान। -मिथ का सोना कवि के परिवेश की भाँथी में गलकर वर्तमान के द्वंद्व से कितना टकराता है और दमकता है, देखिए बैरकविता का एक अंश - परसों ही, एक पड़ोसी ने मुझे छला था/उसके बाद देर तक/मैं क्या-क्या सोचते गला था...क्यों नहीं लौटा दिया उसे, जिससे लिया/बैर से, स्वयं को भरता रहा। -  यह कविता अपने कथ्य में जितना प्राचीन है, भाव में उतना ही अर्वाचीन अर्थात क्षण का सूक्ष्म निरीक्षण। जगत के बैर- भाव का तथागतीकरण ! मिथक-मूल्य के उपकरण से वर्तमान का अवगाहन कविता में बहुत ही जटिल और श्रमसाध्य कार्यहोता है जिसे कवि राजकिशोरनेबखूबी किया है, यही वस्तु का पुनःसृजन है जो विशिष्टता का सर्वव्यापीकरण (जेनरलाईजेशन)करता है, जब वस्तु बिल्कुल वही नहीं होती जो उसका मूल स्वरूप है बल्कि कवि के परिवेश यानि आभ्यांतर से प्रतिकृत होकर नए संघटन में पुनर्रचित हो जाती हैऔर तब सृजन जन-संप्रेष्य हो जाता है जो उसकी सफलता है।
     अक्षत दुनिया कभी किसी कवि का काव्य-संसार नहीं होती। जब हम काव्य-संसार की बात कर रहे होते हैं तो यह कवि द्वारा आत्मसात किया हुआ उसके परिवेश का वह हिस्सा है जो उसपरिवेश से निष्पन्न होकर भी उससे भिन्न होता है। जैसे सब व्यक्तियों का चेहरा एक सा नहीं होता, उनका स्वभाव एक सा नहीं होता, उसी प्रकार एक जगह, एक भौगोलिक परिवेश में रहते हुए भी कवियों के आपसी रचना-परिवेश में वैयक्तिक भिन्नता होती है। अगर किसी कवि में रचनाशीलता नहीं दिखती है तो इसका मतलब यह है कि कवि ने काव्य-वस्तु को मूल परिवेश से ज्यों का त्यों उठा लिया है, गृहीत परिवेश की अर्थवत्ता के संधान का प्रयास कवि के द्वारा नहीं किया गया अर्थात् वस्तु के पुनस्सृजनमेंचुक हुई है। साहित्य का यथार्थ अखबारी समाचार की तरह नहीं होता बल्कि रचनाकर द्वारा भुक्त यथार्थ की पुनर्रचना होती है, यह परिवेश का नकल मात्र भी नहीं होता। परिवेश की पुनर्रचना कवि की जीवन-दृष्टि, आत्मसातीकरण की क्षमता, इन्द्रियबोध की प्रखरता और जीवनानुभव से बनती है। हमें राजकिशोर राजन की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि उनका काव्य-परिवेश लोकजीवन का वह देखा-सुना-भोगा हुआ यथार्थ है जिसमें कविता गरीबों की हुकऔर किरकिराते आँखों में फूँककी तरह महसुस होती है, कहीं वह आँखों का पानीबनकर तो कहीं प्रेम और जादू का रूप बनकरआती है जिसमें कवि की पृथ्वी घूमती है अपनी वृत्त पर। यहाँ कवि के लोक का विद्रुप स्वर भी उतना ही मुखर है -खुरपी और हँसुआ से भी तेज है बोली/पता नहीं, कब, किस बात पर/चल जाए लाठी-गोली/दरिद्रता में भी हठी बेजोड़/एक कट्ठा खेत में डाली जाती/कितनी राजनीति की खाद/कभी जानना हो/तो पधारिए हम्मर गाँव’ -कविता (पधारिए हम्मर गाँवसे)।कहना न होगा कि कवि का परिवेश वह जीती-जागती जगह है जिसमें अस्तित्व के लिए अंतर्द्वंद और जद्दोजहद पूरे स्वरित तेवर में मौजूद हैं। इसमें आदमी के श्रम का औजार हँसुआ और खुरपीही केवल नहीं, बदरंग होते समाज में हिंसा-प्रतिहिंसा की प्रतिध्वनियाँ भी हैं अर्थात् कहीं गोली और लाठीहै तो कहीं जल बिन छूँछऔर बेरौनक होती नदियां। कहने का तात्पर्य यह है कि उनके काव्य-संसार में कविताएं उसी तरह पक रही है जैसे समय की धौंकनी में खेतों में धान पकती है। इसमें जीवन प्राकृतिक ऊष्मा और पूरी गति के साथ में उपस्थित और दीप्त है (किसी किताबी कवि के कुंठित नैराश्य का प्रतिबिंबन नहीं।) राजकिशोर राजन कविता में मूल्यों के गढ़ने के आदी नहीं, वहाँ कविता का परिवेश ही एक ऐसे दुर्निवार समय का आख्यान रचता है जिसमें मूल्य स्वंय परिवेशगत हो जाता है और जन से लेकर प्रकृति तक लोकजीवन की अविकल अंदरुनी व्यग्रता दीखती है - गोया कि, वहाँ नदियों का समुद्र से मिलने की इच्छा खत्म हो चुकी है, कोयल कूकना बंद कर चुकी है, तितलियों में चपलता नहीं रही, हँसी भी दिल से नहीं, दिमाग से आने लगी है और यह सब देखते-सुनते कवि भी अब बूढ़ा हो रहा है पर जिजीविषा मरी नहीं है, वह उद्दीप्त है स्फुट चिंगारियों की तरह। उनके लेखक का मूल्य लोक से संपृक्त होकर कितना समसामयिक और जीवन की गतिकी से भर उठता है, यह आप इस कविता के सहारे देख सकते हैं:मिट्टी में पड़ा धान- ठीक नहीं लगता, जब दादी चुनती/ मिट्टी से धान का एक-एक दाना/ अकसर दादी से कहता/ क्या! इतने गरीब हैं हम/ कि तुम नाखुनों से उठाती हो धान/ परन्तु दादी बुरा मान जाती/ और हम मिट्टी से चुनने लगते धान/ उन दिनों बैलों को भर दुपहरिया/ गोल-गोल चलना पड़ता धान के पुआल पर/ हम भी चलते गोल-गोल/ जैसे पृथ्वी को नाप लेंगे आज ही/ सन जाते हाथ-पैर, कपड़े, पसीने-मिट्टी से/ होने लगती सांझ/ तब दादी को आता हम पर दुलार/ चूम लेतींहमारा माथा/ और बताती, मिट्टी में पड़ा धान रोता है बेटा/ कि मिट्टी से आये और मिट्टी में मिल गए/ तब बरकत नहीं होती किसान की/ नहीं रही दादी, पर/मिट्टी में पड़ा धान/ आज भी दिखाई देता है रोते।अन्न के बर्बाद न करने का यह पुराना मिथलोक-बिम्ब के जिस ऐन्द्रिक रचाव और पोएटिक विजनके साथ पाठक के अन्तस्तल को छूता है, मिथ का मूल्य जिस तरह परिवेश के तत्व में रूपांतरित होता है कि इसकी अन्विति से पाठक बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाता! यहाँ बिम्बों की बहुलता नहीं, कथ्य बिम्ब को स्वभावतः रचते हैं। देशज भंगिमा और संवेदना की नव्यता राजन के कविता-संसार में अँटा पड़ा है, फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी रसप्रियामें कवि ने उसी भंगिमा का कविता-रूप में नवोन्मेष किया है जहाँ अपरूप प्रेम की प्रतिच्छाया पाठक के मन को हिलोर कर रख देती है, देखिए-
असमाप्त ही रह जाती है रसपिरिया की कथा/ रह-रह फूटती, मिरदंगिया की हूक/कि रसपिरिया नहीं सुनेगा मोहना!/देख न! आ गया कैसा कठकरेज वक्त/ कि पहले रिमझिम वर्षा में लोग गाते थे बारहमासा/ चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर, लगनी/ अब तो भूलने लगी है कूकना कोयल भी/ पंचकौड़ी मिरदंगिया को पता होगा जरूर/ अगर परमात्मा कहीं होगा, तो होगा रस-रूप ही/ तभी तो टेढ़ी उँगली लिए/ बजाता रहा आजीवन मृदंग/ और इस मृदंग के साथ फूटता रहा रमपतिया का करूण-क्रंदन/ कि मिरदंगिया है झूठा! बेईमान! फरेबी!/ऐसे लोगों के साथ हेलमेल ठीक नहीं बेटा/ भौचक है मोहना!/ ठीक मेरी तरह/ इस अपरूप प्रेम की कथा में।अनुभवसिक्त परंपरा मूल सबन्धों के रूप में कवि के यहाँ इस कदर ढलता है कि कवि पूछता भी है : मेरा तो मानना है/ऐसे अनुभव को ले तुम ओढ़ोगे कि बिछाओगे/ खाओगे कि नहाओगे... / दादा की अनुभवी आँखों में कितनी घृणा थी अनुभव से/कि जब कोई बच्चा उन्हें चिढ़ाता मुँह/वे उसे न समझाते, न गुस्साते, चिढ़ाने लगते मुँह। लेकिन पेट की आग से बेफिक्र लोग भी वहाँ हैं जहां कविता गहरी व्यंग्यात्मक अभिव्यंजना के साथ व्यक्त होती है कि जो पेट से बेफिक्र हैं/घूम रहे झक्क-सफेद दिल्ली-पटना/ लगाने को आग। मनुष्य का दिपदिपाता हुआ मुखमंडल तब स्याहहो जाता है। लेकिन फिर भी कवि की प्रतिबद्धता बनी रहती है और रसूखदार आदमी के प्रश्न पर कवि कहता है किगनीमत है/कम से कम /एक कविता तो आप से छुट गई। कवि का यह प्रतिबद्ध संसार उस लोक का हिस्सा है जिसमें पृथ्वी के पेड़ उनके पुरखों की तरह हैं और खेतों की फसलें उनके सपनों की तरह। यह चिंतन कवि को अपनी जगह पर रहते हुएउसे वैश्विक बनाता है जिसमें पूरी पृथ्वी पर जीवन को किसी तरह बचाने की चिंता आत्मगत है। अपनी मिट्टी और भाषा से कवि का राग इतना गहरा और लोक-प्रसूत है कि दुःख के कठिन समय में भी वह उससे अलगना नहीं 'कोड़ते-सोहते, ढ़ेला फोड़ते/धान, सरसों, गन्ना रोपते जिस मिट्टी में/मिल गए दादा भी/इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैं/जहाँ गरीबी और लाचारी/जैसे धरती पर दूब-मिट्टी, देह पर/जैसे सूरज की धूप/ इसी मिट्टी में जन्म लूँगा मैंकविता की दुनियामें कवि-कर्म की यह प्रतिबद्धता और अधिक पारदर्शी हो जाती है- 'और मेरी कविताएं, ठीक मेरी तरह/न उनमें अलंकारिक भाषा, न चमत्कार/न कलात्मकता का वैभव,/न बौद्धिकों के लिए यथेष्ट खुराक/तो मैं क्या करूँ!'- एक बात यह भी यहाँ दीगर है कि कवि के नदी का जल सूख चुका है, नदी के विलाप में पूरी प्रकृति और लोकजीवन का विलाप है। (इधर पूरे देश में पानी का हाहाकार सुनाई दे रहा, किसान आत्महत्या तक कर रहे।) सूक्ष्मता से, संकेत में इस जलाभाव को लक्ष्य करते हुए कवि ने लोकजीवन के सर्वग्रासी त्रास का जो बिम्ब इस कविता में रचा है, वह परिवेश की तात्कालिकता का अर्थगर्भी चित्रण है , देखिए इसका एक अंश- कविता : नदी का विलाप, : चिरई-चुरूँग उड़ना भूल/जैसे ठिठके पडे़ हैं पेड़ों पर..होने को है साँझ/और गाँव के सिवान पर/सन्नाटे में बरस रही है उदासी/रात्रि के प्रथम प्रहर में, करती है नदी रोज/धरती से गुहार/आज भी उसके रूदन से फटेगी धरती/आँसू पोंछते कहेगी वह कितनी असहाय/न कुदाल, न टै्रक्टर, न मजदूर, न किसान/कोई नहीं सुनता उसकी बात/ सभी काट-कोड़ उसे बना रहे खेत/हर दिन सूर्यास्त के साथ/हो रहा उसका अस्तित्व समाप्त... तुम्हें भरोसा है किताबों पर /पर, नदी पर नहीं/उस दिन समझोगे/जब नदी की आँखें, हो जाएगी कोटरलीन।'कवि अब भी अच्छे दिनों की आश में है, उसमें जीवन के वसन्त की अदम्य लालसा है और अनवरत खोज भी, एक चीत्कार भी है, एक पुकार भी –हा! वसंत!/हो! वसंत!/जो वसंत!/तुम कहाँ, किस अरण्य में/गये खो वसंत।
     हमें यह कहने में सकुचाहट नहीं कि युवा कवि राजकिशोर राजन का काव्य-परिवेश प्रकृति और मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के यथार्थ के मध्य दुर्निवार दुःख-तंत्र और उसके अंत:संघर्ष की वह काव्य-कथा है जो सहज भाषा में लोकजीवन की संश्लिष्ट और अविकल अर्थ-छवियाँ रचती हैं। इनसे होकर गुजरना लोक के समकालीन स्पंदन के बीच से गुजरते हुए लोक से अपने को पुनर्नवा करने जैसा है।


          संपर्क :  सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,

     एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004 मोबाईल ( 0 90067 40311 और 0 94313 10216)

दूसरा शनिवार में शिवदयाल (रपट): नरेंद्र कुमार









दिनांक 24.06.2017 शाम 5 बजे 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में साहित्य सुधीजन प्रिय कवि शिवदयाल को सुनने हेतु उपस्थित थे। गांधी मैदान का वातावरण मानो काव्य-पाठ के लिए ही आमंत्रित कर रहा था। गोष्ठी में अस्मुरारी नंदन मिश्र, राजकिशोर राजन, सुजीत वर्मा, प्रत्युष चंद्र मिश्र, हरेन्द्र सिन्हा, अरुण शाद्वल, मधुरेश नारायण, कुमार पंकजेश, मुकेश प्रत्यूष, अनिल विभाकर, भगवती प्रसाद द्विवेदी, जयेन्द्र सिंह, प्रभात सरसिज, डॉ निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, अशोक जंगबहादुर, राजेश शुक्ल, शिव पुरी, एवं नरेन्द्र कुमार सम्मिलित हुए। कवि ने 'नाव', 'खोज', 'कवि ने लिखी कविता', 'बेवजन', 'अपने को देखना', 'अकिलदाढ़', 'घोंघा', 'ताक पर दुनिया', 'अंत, अंत हे गर्दनीबाग', 'मीनू मैम का पर्स', 'मीनू मैम की हँसी', 'मीनू मैम की बिंदी', 'खरीददारी', 'आने वाले दिनों में', 'चादर', 'शरणार्थी बच्चा' एवं 'लिफाफा' शीर्षक से कविताएं सुनाई। कविताएं श्रोताओं से सीधे संवाद कर रही थीं।

काव्य-पाठ के बाद हुई चर्चा में सुजीत वर्मा का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं एक तेवर की नहीं हैं तथा उनमें गंभीरता के साथ संवेदनशीलता है। 'नाव' कविता संवेदनशील है, वहीं 'घोंघा' शीर्षक कविता अस्तित्ववादी है। 'खोज' शीर्षक कविता में यांत्रिक युग में मनुष्यता की खोज की बात कवि कहते हैं। विषयवस्तु, भाषा, संरचना एवं शैली के स्तर पर कविताएं लाजवाब हैं तथा उनमें चेतना का गंभीर अंतरप्रवाह स्पष्ट दिखता है। अरुण शाद्वल का कहना था कि शिवदयाल की कहानियों, उपन्यासों एवं कविताओं में आदमी का संघर्ष स्पष्ट दिखता है। इनकी रचनाएं सामान्य चीजों को विशेष बना देती हैं।




शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए डॉ निखिलेश्वर वर्मा का कहना था कि कविता के गुणों के साथ कवि पाठक तक पहुंचते हैं। विषय के हिसाब से शिल्प अपनाते हैं। अशोक जंगबहादुर का कहना था कि कवि की रचनाएं समाज का दर्पण है। आगे कुमार पंकजेश ने कहा कि कवि के लिए विषय ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। उनकी कविताएं समस्या के साथ समाधान की बात करती हैं। मुहल्लों और घर की चीजों से लगाव के कारण कवि 'गर्दनीबाग' एवं 'ओसारा' जैसी कविताएं रचते हैं। अपनी रचनाओं में कवि बिना लाग-लपेट अपनी बात कह जाते हैं।

अनिल विभाकर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कवि का ध्यान रोजमर्रे की चीजों पर है। झूठी शानो-शौकत पर कवि कटाक्ष करते हैं। संवेदना के स्तर पर कविताएं बढिया हैं, पर कुछ कविताओं को और खुलना चाहिये था। भगवती द्विवेदी का कहना था कि शिवदयाल मूलतः कवि हैं। सभी कविताएं अनुभूतिपरक लगीं...सीधे संवाद करती हुई। संवेदना को झकझोरती हुई कविता 'गर्दनीबाग' सांस्कृतिक क्षरणशीलता को व्यक्त करती है। प्रत्यूष चंद्र मिश्र ने कहा कि किसी रचनाकार की रचनाओं में स्मृतियों का कोलाज़ नहीं बनता है तो लगता है कि रचना में कुछ कमी रह गयी हैं। 'गर्दनीबाग' कविता में कवि अपनी निजी स्मृतियों को सामूहिक स्मृतियों में तब्दील कर देते हैं।


जयेन्द्र सिंह कविताएं सुनते हुए अभिभूत थे। उन्होंने कहा कि शिवदयाल कुल मिलाकर एक सजग साहित्यकार हैं और वे एक श्रोता। प्रभात सरसिज ने कहा कि कवि की रचनाओं में सम्यक दृष्टि है, करुणा है, बस गुस्सा नहीं है। कविताओं में अवधि-विस्तार दिखता है। राजेश शुक्ल का कहना था कि शिवदयाल की कविताएं मानस में अंकित रह जाती हैं। वे सही मायने में एक पूर्णकालिक लेखक हैं।

अस्मुरारी नंदन मिश्र ने कहा कि आज बहुत-कुछ छूटता जा रहा है। इस उपेक्षा से संवेदनशील मन में जो पीड़ा उपजती है, वह कवि की रचनाओं में आ गयी हैं। शिवदयाल ईमानदारी के चुकने की बात करते हैं तथा छूटती चीजों के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। उनकी कविताओं में जो व्यंग्य है, वह महीन है तथा भीतर तक प्रभावित करती हैं। हरेन्द्र सिन्हा का कहना था कि संवेदनहीनता आज सबसे बड़ा संकट है। शिवदयाल के व्यक्तित्व एवं रचनाकर्म में संवेदना समाहित है। इनकी कविताएं सुनने के पश्चात तनाव खत्म होता है।


मधुरेश नारायण ने कहा कि शिवदयाल की कविताएं पाठकों एवं श्रोताओं से सीधे जुड़ती हैं तथा घर के अंदर-बाहर की छोटी-छोटी चीजों पर बात करती हैं। मुकेश प्रत्युष ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि कवि सीधे अपना पॉलिटिक्स जाहिर करते हैं...कोई छुपाव नहीं। कवि का काम समाज के सत्य को सामने लाना है। समय के सत्य को उजागर करने से बचने की कोशिश में कितने कवि अप्रासंगिक होते चले जाते हैं। 'घोंघा' कविता में इसी अस्तित्व की असुरक्षा की बात कवि करते हैं।

 राजकिशोर राजन ने कहा कि समकालीन कविता दवाब में लिखी जा रही हैं। नये युवा कवि आलोचकों की पसंद पर कविताएं लिख रहे हैं। शिवदयाल की यात्रा कथा से कविता के बीच होती रहती है। उनकी कविताओं की भाषा, शिल्प और विषय अपने समकालीन कवियों से भिन्न है। यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कवि अपने रचनाकर्म को ले कर कितना गंभीर है। बिना लंबे संघर्ष के इस स्तर पर आप अलग से रेखांकित नहीं हो सकते। शिवदयाल जी की कहानियां भी शिल्प और कहन के स्तर पर हिंदी में अपनी अलग पहचान बनाती हैं। वहीं कुछ रचनाओं में वैचारिक दवाब के कारण हृदय पक्ष मौन हो गया है।नरेन्द्र कुमार ने शिवदयाल की कविताओं पर बात करते हुए कहा कि कवि विषय-वस्तु की तलाश में दूर नहीं जाते, बल्कि अपने आस-पास ही नजर दौड़ाते हैं। रचनाओं में कोई चमत्कार करने का प्रयास नहीं...भाषा की क्रीड़ाओं में उलझने की कोई इच्छा नहीं। उनकी कुछ लंबी कविताओं में उनकी औपन्यासिक प्रवृति स्पष्ट दिखती है।

शिवदयाल का अपनी कविताओं के संदर्भ में कहना था कि उन्होंने कहानी एवं उपन्यास के वनिस्पत कविताओं पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि चाहिए। आज कविताओं पर हुई चर्चा से मैं अभिभूत हूं। 'दूसरा शनिवार' के सद्प्रयासों के प्रति उन्होंने शुभकामनाएं व्यक्त की। अगली गोष्ठी में मुकेश प्रत्यूष के एकल काव्य-पाठ का निर्णय लिया गया। अंत में प्रत्यूष चंद्र मिश्र द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

शुक्रवार, 23 जून 2017

अनिरुद्ध सिंहा की कुछ गजलें

         
    अनिरुद्ध सिंहा की कुछ बेहतरीन गजलें


                 
   अनिरुद्ध सिन्हा

जाँ बदन से जुदा  है रहने दे
ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे

एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ
अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे

छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें
ये  फसाना  सुना  है  रहने दे

अपनी सूरत से मत डरा मुझको
सामने  आईना   है  रहने  दे

छेड़खानी  न  कर  वफ़ाओं से
वो अगर  बेवफ़ा  है  रहने दे

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राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते
जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते

नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू
दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते

कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में
देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर  देखते

बेबसी की  बाजुओं में  जाने  कब से क़ैद है
चंद लम्हों के  लिए  बाहर निकलकर देखते

उम्र भर जलते रहे  जो  रंजिशों की आग में
वो मुहब्बत के चिरागों  में भी जलकर देखते


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लोग  पीछे थे  मेरे  हाथ में पत्थर लेकर
मैं कहाँ  भागता  शीशे का बना घर लेकर

प्यास  सहरा  में  बुझा देंगे ये मेरे  आँसू
मैं तेरे  साथ हूँ  आँखों  में समुंदर  लेकर

ऐसे  हालात  में जज़्बात भी मर जाते  हैं
लोग मिलते  हैं जहाँ  हाथ में खंज़र लेकर

फिर चिरागों को बुझा दे न हवाओं का जनून
घर में  बैठे रहे  सब  रात का ये डर  लेकर

ये मुहब्बत का सफ़र तन्हा सफ़र  रहता  है
कौन चलता है यहाँ साथ  में  लश्कर लेकर


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रगों  में रेत  भरकर  रोज़ घटता जा रहा है
वो दरिया तो किनारों  से लिपटता जा रहा है

मेरा ये दायरा  जब से सिमटता  जा रहा  है
मेरा किरदार भी अब मुझसे कटता जा रहा है

ये दुनिया तो हमेशा  की तरह रंगी  बहुत  है
न जाने  क्यों हमारा  दिल उचटता जा रहा है

नई तहजीब  अपना  क़द बढ़ाती  जा रही  है
पुराना  जो  है  धीरे-धीरे  हटता  जा रहा  है

वो जाहिल था वो जाहिल है वो जाहिल ही रहेगा
किताबों के  वो बस  पन्ने पलटता जा रहा  है


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जो आँसू पीके हँसना जानता है
मुहब्बत को  वही  पहचानता है

पड़े हैं पाँव में  जिसके भी छाले
सफ़र की वो हक़ीक़त जानता है

भरम  कल टूट जाएगा तुम्हारा
फ़रिश्ता कौन किसको मानता है

वो किसकी याद लेकर बस्तियों में
गली की ख़ाक हर दिन छानता है

शहर में फिर रहा हूँ अजनबी सा
कोई मुझको  कहाँ पहचानता  है


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इजहारे-मुहब्बत  की जो हिम्मत नहीं करते
वे  लोग  ज़माने  से  बगावत  नहीं करते

खुशबू से जिन्हें इश्क़ है लुट जाते हैं लेकिन
काँटों से किसी  हाल में  उल्फ़त नहीं करते

हर हाल  में रिश्तों  की  ये सांसें  रहे ज़िंदा
हम जुल्म तो सहते हैं शिकायत  नहीं करते

बेचैन  बहुत  होते  हैं  वो  रातों में अक्सर
जो अपने  उसूलों  की हिफाज़त नहीं  करते

सच-झूठ  का  अंदाज़  लगा लेते हैं हम भी
माना कि  अदालत  में  वकालत नहीं करते

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दिखाई दे न  जो उसका हिसाब क्या रखता
अँधेरी रात में  सूरज का ख़्वाब क्या रखता

हरेक बार  की  फूलों  से  जिसने गुस्ताखी
मैं उसके हाथ में दिल का गुलाब क्या रखता

वो मेरा दोस्त था हमदम था जाँनिसार भी था
मैं उसके सामने कोई  हिजाब  क्या  रखता

किसी चिराग की लौ में न ख़ुद को पहचाना
सियाह रात में रुख पर नकाब  क्या रखता

हरेक  सिम्त  की  मजबूरियों  के  घेरे में
हवा के रुख पे ग़मों की किताब क्या रखता


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उलझनों से  तो कभी प्यार से कट जाती है
ज़िंदगी वक़्त की  रफ्तार से  कट  जाती है

मैं   तो   क्या   हूँ   मेरी   परछाई  भी
रोज़  उठती  हुई दीवार  से  कट  जाती है

यूँ तो मुश्किल है बहुत इसको मिटाना साहब
दुश्मनी प्यार  की  तलवार से कट  जाती है

सारी  बेकार  की  खबरें  ही छपा करती  हैं
काम की बात तो अखबार से कट  जाती है

इतना  आसान नहीं प्यारे मुहब्बत   करना
ये वो गुड़िया है जो बाज़ार से कट जाती है

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परिचय
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नाम –अनिरुद्ध सिन्हा
जन्म -2 मई 1957
शिक्षा –स्नातकोत्तर
प्रकाशित कृतियाँ
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-(1)नया साल (2)दहेज (कविता-संग्रह )(3)और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह) (4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (ग़ज़ल-संग्रह)(9)हिन्दी-ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (10)हिन्दी-ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन(11)उद्भ्रांत की ग़ज़लों का सौंदर्यात्मक विश्लेषण(12)हिन्दी ग़ज़ल परंपरा और विकास (13)हिन्दी ग़ज़ल का नया पक्ष (आलोचना )
सम्पादन-
साहित्यिक पत्रिका “समय  सुरभि” और ”,जनपथ “ के ग़ज़ल विशेषांक का सम्पादन
“किसी-किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है(अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें)तथा बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार का सम्पादन ।
देश के तमाम स्तरीय पत्र/पत्रिकाओं में निरंतर ग़ज़लों और आलेखों का प्रकाशन
सम्मान  
बिहार उर्दू अकादेमी,राजभाषा,विद्यावाचस्पति,नई धारा का रचना सम्मान,आचार्य लक्ष्मीकान्त मिश्र स्मृति सम्मान के अतिरिक्त दर्जनों साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
सदस्य-बिहार फिल्म विकास एवं वित्त निगम
संप्रति –स्वतंत्र लेखन
संपर्क- गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार )811201
Email-anirudhsinhamunger@gmail.com
Mobile-09430450098  

             

बुधवार, 21 जून 2017

शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना उन्हीं की जुबानी

शत्रुघ्न सिन्हा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति के उम्मीदवारी के लिए बधाई देने के बाबजूद जिस तरीके से बयान दिया उसमें नया कुछ भी नहीं है. वे भाजपा में रहते हुए भी पार्टी के खिलाफ ही बयानबाजी नहीं करते रहे हैं बल्कि वे जन्म से ही अख्खड़ साहसी हैं. उनके बागी रूप को भारती एस प्रधान की लिखी एनिथिंग बट खामोश में भी बखूबी पढ़ा जा सकता है. आइए पढ़ते हैं शत्रुघ्न सिन्हा के कॉलेज की एक घटना को उन्हीं की जुबानी. जिसे आपलोगों के लिए हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है – सुशील कुमार भारद्वाज




वे एक खास घटना के बारे में बताये. “एक दिन पटना साइंस कॉलेज के लड़के लड़कियों को प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ककोलत, पटना से सत्तर से अस्सी किलोमीटर दूर पर्वतीय इलाके में घुमाने की तैयारी की गई. मेरी छवि की वजह से मुझे उस कार्यक्रम से अलग रखा गया, जो मुझे मंजूर नहीं था. उनलोगों ने मेरे बगैर जाने की बात कैसे सोच ली? मैंने तय किया कि बाबजूद इसके मैं इस कार्यक्रम का हिस्सा बनूँगा.
“मेरे एक दोस्त ध्यान देव शर्मा, जो कि मुझे बहुत चाहता था, मुझे आधे रास्ते में बख्तियारपुर बस अड्डे के पास मिला और मुझे अपने साथ रिक्शे से ले गया, रिक्शा को वह खुद चला रहा था. जलती गर्मी में धूल भरी लंबी यात्रा से हमलोग ककोलत पहुंचे लेकिन बस लौटने ही वाली थी. प्रभारी प्रोफेसर श्री डीएन सिंह, जो कि मुझे बिल्कुल ही पसंद नहीं करते थे, को बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने वहां पहुंचने की गुस्ताखी की थी. उन्होंने जब मुझे बस के अंदर बैठे देखा तो उन्होंने इसे अपने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लिया और वे नीचे उतर गए. उन्होंने कहा, ‘ये बस पटना वापस नहीं जाएगी. तुम्हें इस परिभ्रमण में शामिल नहीं किया गया था इसलिए जब तक तुम बस से बाहर नहीं निकलोगे, यह हिलेगी नहीं.’ अंधेरा हो रहा था और मैं जंगल में अकेला नहीं रहना चाहता था. लेकिन इसी समय मुझे बस से बाहर निकलना था. प्रोफेसर के जानकारी के बिना कुछ दोस्तों ने मुझे बस के उपर चढ़ने में मदद की. बस के उपर में लेटे हुए छड को पकडे रहा. बस के उपर में बड़े बड़े बर्तन और पिकनिक का सामान रखा हुआ था. बाहर कर दिए जाने के कारण मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, और बस भी इतने खराब तरीके से चलाया जा रहा था कि मेरा पूरा शरीर उपर –नीचे उछल रहा था. बस के अंदर बैठे प्रोफेसर और अन्य को आभास भी नहीं हुआ कि बस के उपर इतना उछल कूद मचाने वाला मैं था, उनलोगों को लगा कि ये आवाज बस के उपर रखे बर्तन की है. रास्ते में कुंठा के कारण बर्तन और प्लेट को फेंकता रहा. यह मुझे परपीडन की खुशी देती रही. अब मैं महसूस कर रहा हूं कि उस तरह का काम कलाबाजी दिखाने वाले का था लेकिन वह मजबूत इरादा ही था जिसकी वजह से बख्तियारपुर पहुंचने तक उपर में ही जमा रहा. जब बस चाय–नाश्ता के लिए रूकी, तो मैं नीचे आया और सिगरेट जलाकर धुआं प्रोफेसर के सामने उड़ाने लगा. सब कोई चकित था कि मैं वहां पहुंचा कैसे? कुछ लड़कियां मेरे इस साहसी कारनामें को देखकर बहुत खुश हुई. उस दिन, प्रोफेसर के चेहरे पर छाये नफरत की अभिव्यक्ति को मैं नहीं भूल सकता.
“लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई. मेरे दोस्त ध्यान देव के कुछ प्रभावी मित्र परिवहन विभाग में थे. हमलोगों ने ऐसी स्थिति बना दी कि बस खुल ही नहीं सकती थी. उन्होंने बहाना बनाया कि बस में कुछ खराबी है. लेकिन 11:30 बजे रात तक मैं ही चलने के लिए उतावला होने लगा. मुझे लगा कि लड़कियों के बस के साथ हमलोगों को आगे बढ़ना चाहिए. हमारे चेहरे पर भयंकर मुस्कुराहट देखकर प्रोफेसर ऐंठ कर रह गए. अठारह साल के लड़के के इरादे के सामने अधिकारी के चेहरे पर इतनी शर्मिंदगी और बेबसी छाई थी कि हमलोगों ने बस को आगे बढ़ाने और दूसरे रास्ते से पटना पहुंचने का निश्चय किया.



उनकी खासियत है कि शस इस तरह के शरारत के बारे में कहने से हिचकते नहीं हैं भले ही इसमें उनको कोई फायदा न हुआ हो.
“मैं जनता हूं कि इस तरह का बचकाना हरकत करना बेकार था. मुझे नहीं करना चाहिए था.” वे माने, “मैंने उस प्रोफेसर के लिए कोई ईर्ष्या नहीं रखा. यदि मैं आज उनकी जगह होता तो मैंने भी वही किया होता. लेकिन मुझे ध्यान देव के लिए बहुत प्यार और दुलार है, जिसने उसदिन मेरी मदद की. मैंने इस घटना के बारे में जीवन के इस पड़ाव पर सुनाया सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं आमदा हो जाने पर क्या कर सकता हूं. आज यह बेकार लग सकता है, दुस्साहसी लग सकता है लेकिन सतरह और अठारह की उम्र में इस तरीके के कार्यों को कर पाना बहत ही मुश्किल था और इरादे का मजबूत होना जरूरी था. उसदिन मुझे कुछ भी हों सकता था.”
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मंगलवार, 20 जून 2017

लालकृष्ण आडवाणी के साथ जो हो रहा है वैसा ही उन्होंने भाजपा में किया भी

 शत्रुघ्न सिन्हा के शब्दों में कहें तो “भाजपा पहले एक अलग पार्टी थी लेकिन अब यह अलग-अलग की पार्टी हो गई है”. आज जब राष्ट्रपति के रूप में लाल कृष्ण आडवाणी को दरकिनार करते हुए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को आगे किया गया है तो भाजपा की कार्यशैली फिर से चर्चा में आ गई है. भाजपा और खुद लाल कृष्ण आडवाणी के कार्य पद्धति को शत्रुघ्न सिन्हा की जीवनी “एनिथिंग बट खामोश” से समझा जा सकता है. भारती एस प्रधान की अंग्रेजी में लिखी इस किताब के कुछ पन्नों को हिन्दी में अनुवाद करने की कोशिश मैंने की है. आप भी इसे पढकर देखें. – सुशील कुमार भारद्वाज



“जब आडवाणीजी ने लोकसभा सीट से लड़ने की बात कही, तो मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब मैं राज्यसभा में जाने का अनिच्छुक था तब उन्होंने और पार्टी ने समझाया कि मैं उपरी सदन के लिए बहुमूल्य रहूँगा; हमलोगों को वहां अपनी पार्टी को मजबूती देने की जरूरत है. तब उन्होंने सुविधा का तर्क दिया कि पार्टी नियम के अनुसार दो से अधिक कार्यकाल नहीं दिया जा सकता.” शस ने कुछ गौरतलब अपवाद की ओर ध्यान खींचा. “पार्टी के अनेक नेता जैसे अरुण जेटली, और मेरे दोस्त रवि शंकर प्रसाद एवं वेंकैयानायडू को राज्यसभा में तीसरी बार भी मौका दिया गया.”
शस के चुनाव के समय तक राज्यसभा में रहने के अपने कारण थे.
2009 के चुनाव होने में एक साल का समय शेष था. मुझे दिल्ली का अपना घर छोड़ कहीं और अपनी व्यवस्था करनी थी.” उन्होंने व्यवहारिक रूप से कहा. “इसलिए मैंने सलाह दिया कि मुझे दो साल राज्यसभा में रहने दिया जाए ताकि मैं दिल्ली में चुनाव और उसके बाद भी रह सकूं, मैं सीट को छोड़ लोकसभा जा सकता था.” यह होशियारी की सलाह थी क्योंकि यदि वे लोकसभा में हार भी जाएंगें तो राज्यसभा की सीट बची रहेगी.
यह विकल्प पार्टी के नेताओं को पसंद नहीं आया.
शस बोले, “मैं क्यों कहता हूं कि उस दिन मैंने आडवाणीजी में राजनेता को देखा क्योंकि वे बार बार हाथ धो रहे थे और तब कहा, ‘इस बार राज्यसभा में जाना आसान नहीं होगा और लोकसभा का चुनाव लडूं. यह मेरे छवि के साथ न्याय नहीं होगा’”
कोई उपाय नहीं बचा था सिवाय पार्टी के निर्णय को स्वीकार करने के. “इसके अलावे, आडवाणीजी की इच्छा मेरे लिए निर्देश था. लेकिन मैं चकित था कि जैसे राजेश खन्ना से हारने के बाद निसहाय हो गया था, वैसे ही फिर से खुद पर आ गया,” उन्होंने उदासीनता से चिढ़ कर कहा. “मेरे कहीं ठहरने के लिए न ही कोई मदद में आया न ही किसी ने अपनी कार दी.”
सौभाग्य से, शस खुद एक सफल इंसान थे. “एक साल के लिए किराये पर रहकर खुद को बचाया,” कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए. “तब जसवंत सिंह ने मेरी मदद उस समय की जब उन्होंने आवास समिति को पत्र लिखकर कहा कि जो मेरे साथ हो रहा है वह ठीक नहीं है.”
एक साल तक बीहड़ राजनीति में विचरण करते हुए, उन्होंने महसूस किया कि पार्टी के द्वारा निस्संकोच भाव से एक तरफा नीतियों का पालन किया जा रहा है.
“इसी बीच, राजीव प्रताप रूडी, जो कि उस समय मेरे अच्छे दोस्त थे, को दो साल के लिए राज्यसभा भेजा गया और लोकसभा का चुनाव लड़ने को कहा गया जबकि मैं वहीं था. जो राम के लिए गलत है वह श्याम के लिए सही कैसे हो सकता है?” उन्होंने सवाल किया. “लेकिन उसका कोई मतलब नहीं रहा और मैंने महसूस किया कि बहस थी कि ‘तुम मुझे आदमी बताओ मैं तुम्हें नियम दिखाता हूं.’ दुर्भाग्य से रूडी हार गए और रूडी की राज्यसभा सीट बरकरार रही. मैं वह नहीं कर सका.”
लगता है शस को इससे अधिक चोट लगी कि उन्हें कहा गया था कि उनका तीसरा सत्र रखा हुआ है जिसका मतलब हुआ कि यह उनके हाथ से अंतिम समय में राजनीति के छद्म खेल के कारण निकला.
उन्होंने कहा, “तीसरे सत्र के आने से पहले, मैं जसवंत सिंह के कार्यालय में राजनाथ सिंह से मिला था. उन्होंने मुझसे बाहर आकर बात करने का आग्रह किया और तब उन्होंने मुझसे पूछा कि राज्यसभा की दूसरी सीट जो खाली हो रही है उसके लिए कौन सही होगा. मैंने सीपी ठाकुर की सलाह दी. मैंने कहा, ‘वे अच्छे आदमी हैं लेकिन पहली सीट के बारे में क्या विचार है?’ उन्होंने सुस्पष्ट मुझसे कहा, ‘पहली सीट आपकी है उसपर कोई सवाल ही नहीं है.’ इसका मतलब है कि  आडवाणीजी ने जो मुझसे कहा उसके बाबजूद, तीसरी बार मुझे वह सीट देने का निर्णय लिया गया था. इस प्रकार एक राजनीति मेरे साथ लम्बे समय से खेली जा रही थी. मेरी अच्छी दोस्त सुषमाजी ने टेलिविजन पर कहा था कि शत्रुघ्न सिन्हा राज्यसभा में रहेंगें, वे हमारी पार्टी की संपत्ति हैं. मुझे विश्वास है कि 11:30 बजे सुबह तक उन्हें आश्वस्त किया गया था कि वह सीट मेरी है. लेकिन शाम में दो अलग लोगों को वे सीटें दे दी गईं. पार्टी में मतभेदों ने अपना सिर फिर से उठाया.”


कुछ समय के लिए, वे अस्थायी रूप से नरम हो गए जब, “आडवाणीजी ने मुझसे कहा कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए देश भर में किसी भी सीट को चुनने का हक होगा.”
लेकिन जब 2009 में टिकट बांटे जा रहे थे, तो उनके रास्ते में रोड़ा अटकने लगा. “सामान्यरूप से,” शस ने टिप्पणी दी. “मुझे बताया गया कि पार्टी के प्रख्यात नेता और वकील पटना-साहिब से चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन राज्यसभा में तीसरी बार जाने से जिस बुरी तरीके से रोका गया था कि उसकी वजह से वे इस बार किसी भी दबाब में झुकने को तैयार नहीं थे.”
शस ने सुविदित रूप से मामले को अपने हाथों में लिया और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पटना साहिब को अपनी सीट घोषित कर ली. “पार्टी कोई घोषणा करती उससे पहले ही सम्पतचक में, मैंने अपना प्रसिद्ध बयान दिया, ‘पटना साहिब मेरी पहली पसंद है, पटना साहिब मेरी दूसरी पसंद है और पटना साहिब मेरी आखिरी पसंद है.’”
इसकी वजह से पार्टी के अंदर खूब बबाल हुआ. यह कभी नहीं सुना गया था कि किसी उम्मीदवार ने अपने सीट का चयन और उसकी घोषणा बगैर पार्टी की सहमति और हरी झंडी मिले ही कर दी हो. “कुछ नीति-निर्धारकों को बुरा लगा कि बगैर कुछ कहे सुने ही मैंने अपने सीट की घोषणा कर दी.” उन्होंने ताना मारा.
नतीजा का प्रवाह किए बगैर, उन्होंने तेजी से आए प्रतिक्रियाओं का बखान किया. “उस समय राजनाथ सिंह ने मेरा समर्थन किया लेकिन खुलकर नहीं आए क्योंकि वे मौसमी राजनेता हैं जो कि अपना दांव चलने के लिए कुछ बचा कर रखते हैं. लेकिन सुषमा स्वराज उदारता से उनके समर्थन में आईं. उन्हें मेरे बारे में पता था जब वो टीवी पर कही, ‘हां, पार्टी ने उनसे वादा किया था कि वे अपनी पसंद से कोई भी सीट चुन सकते हैं. और यदि शत्रुघ्न सिन्हा ने पटना साहिब चुना तो पटना साहिब उनका है.’”
शस ने सुषमा स्वराज और उनके पति के प्रति अपने खास लगाव को स्वीकारा. “जब सुषमाजी और मैंने एक साथ फोटो खिंचवाई, हमलोग एक दूसरे को ज्यादे जानते थे और भाजपा को कम,” वे हँसे.
लेकिन संक्षिप्तता अधिक परिपक्व है,” वे किस तरह लगातार कमतर माने गए उसपर निगाह डालने से पहले उन्होंने स्वीकारा. “मुझे पटना साहिब सीट ना मिले इसके लिए काफी हाथ आजमाए गए लेकिन मैं कठोर बना रहा.”
2009 में उन्हें दिल्ली से टिकट देने की व्यवस्था की जा रही थी. “वे मुझे वहां से खड़ा करना चाह रहे थे जहां पार्टी दो लाख से अधिक वोट से हारी थी. आडवाणीजी ने भी मेरी पत्नी प्रोमि से कहा, ‘यदि वह पटना से खड़ा होगा तो हार जाएगा.’”
सच्चाई कुछ और थी.
2009 में भाजपा खुद सत्ता से बाहर हो गई लेकिन पटना साहिब में नहीं.

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संजय कुमार कुंदन की कुछ नई गजलें

शहर के चर्चित शायर संजय कुमार कुन्दन की गजलों में भाषा की जो रवानी है वो आपको अपनी ओर खींचती है तो संप्रेषित भाव आपको काफी कुछ सोचनें को विवश करती है। इनकी 'बेचैनियाँ', 'तुम्हें क्या बेकरारी है' और 'एक लड़का मिलने आता है' जैसे तीन गजल संग्रह पहले ही से राजकमल प्रकाशन से छप कर लोगों के बीच पहुँच चुकी है। अब इनकी चौथी गजल संग्रह "भले तुम और भी नाराज हो जाओ" जल्द ही छपकर आने वाली है। संजय कुमार कुंदन का यह संग्रह निरंकुश सत्ता के विरूद्ध बिगूल फूंक रही है। आइए पढ़ते हैं संग्रह की कुछ बेहतरीन गजलों को।



माफ़ करना मेरे आक़ा

आज सोचा था ग़मे-रोज़गार की ख़ातिर
रोज़ की तरह् ही बेजान मशक़्क़त में लगूँ
करके तब्दील पसीने में ये रग-रग का लहू
अपने आक़ाओं की इशरत का मददगार बनूँ

 आज सोचा था के अजदाद की तरह मैं भी

ज़िन्दा रहने की तगो-दौ में ही हलकान रहूँ
ऐसी दुनिया में न राहत की तमन्ना पालूँ
जबके रहना है परेशाँ तो परेशान रहूँ
ज़ीस्त के कैसे हैं आदाब के बहरूप यहाँ
अस्ल सूरत की तरह चस्पाँ है सबके रुख़ पे
चंद लोगों के यहाँ रह्न है हम सब की हयात
अपने जीने पे कई शर्ते हैं, कितने पहरे

 ख़ूबसूरत से सभी लफ़्ज़ हैं उनकी ख़ातिर
हुस्न उनका है, अदा उनकी, ज़माना उनका
सारी हस्ती की नफ़ासत-ओ- लताफ़त उनकी
ख़म ,गुदाज़ और हलावत का फ़साना उनका

 जो भी मक़रूह है, बदशक़्ल है, बेरौनक़ है
वो सभी अपनी ही गलियों के तो बाशिन्दे हैं
हम कहाँ सीखते शाइस्तामिज़ाजी के हुनर
हम तो वहशी हैं, ग़लाज़त से भरे, गन्दे हैं
हाकिमे-शह्र की रहमत के घिसटते हों भले
कम-से-कम मौत के साए में तो ज़िन्दा है रखा
ज़ह्न को क़ैद किया जिस्म रखा है आज़ाद
उसके हैं लौहो-क़लम जो भी लिखे उसकी रज़ा
आज सोचा तो था तारीख़ की तक़लीद करूँ
दिन तो कल ही की तरह गुज़रे यही सोचा था
माफ़ करना मेरे आक़ा, के ज़रा मैं बहका
तेरे क़ब्ज़े से मेरा ज़ह्न ज़रा- सा फिसला
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अजदाद – पूर्वज, ज़ीस्त-जीवन, आदाब- शिष्टाचार, चस्पाँ- चिपका हुआ, हयात- जीवन, नफ़ासत-ओ- लताफ़त- स्वच्छता और कोमलता, ख़म- झुकाव, गुदाज़- मांसलता, हलावत- मिठास, मक़रूह- गंदा और ख़राब, शाइस्तामिज़ाजी- शिष्टता, लौहो-क़लम- स्लेट और कलम, तारीख़- इतिहास, तक़लीद- अनुसरण.
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इक तख़्तनशीं आज भी इतराया  हुआ है
वो ही ख़ुदा है सबको ये समझाया हुआ है
उसके  मुसाहिबों की यहाँ  भीड़  लगी  है
उसके क़सीदाख़्वाँ ने ग़ज़ब ढाया हुआ है
सच बोलने पे पड़ते हैं उसकी जबीं पे बल
परचम अभी तो झूठ का लहराया हुआ है
फ़रमान लिए फिरते  सकाफ़त  के ठेकेदार
हम पहनेंगे- खाएँगे क्या,लिखवाया हुआ है
हम एक ही जैसे हैं  मगर कहिए अलग हैं
उसकी  नसीहतों का  नशा  छाया हुआ है
बाशिन्दे इसी मुल्क के उसके भी थे अजदाद
कहते हैं, वो  बाहर  कहीं  से  आया  हुआ है
अब शायरी इसको भले कहते न हों 'कुन्दन'
महसूस किया  बस वही  फ़रमाया  हुआ  है
  ##########

मुसाहिब- राजा के नौकर ,क़सीदाख़्वाँ- क़सीदा पढ़नेवाला, चापलूस, सकाफ़त-संस्कृति,अजदाद- पूर्वज .
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सदाएँ दो
अजब से इक मक़ाम पे मैं आ के हो गया खड़ा
सुराग़ मिल सके तो तुम सदाएँ दो, पुकार लो
जिधर भी ढूँढती नज़र सिवाय गर्दे - ख़ामुशी
समाअतों में कुछ नहीं, के आ के तुम उतार लो
बुझी हुई नज़र में गो कठिन से चंद ख़्वाब थे
मुख़ालिफ़ इन फ़ज़ाओं में बहल-बहल के पल गए
जो ख़्वाब के असर में कुछ उगे थे नर्म -नर्म फूल
वो ज़िन्दगी की गर्मियों से रफ़्ता-रफ़्ता जल गए
ये हक़ का इक थका हुआ सा चेहरा है के देख लो
तमाँचों के निशाँ भी हैं जो जड़ दिए हैं झूठ ने
हज़ार मसअलों से हैं घिरे हुए ये रोज़ो--शब
के क्या दिखाएँ नाज़ ये, कहाँ पे जाएँ रूठने
जो मुल्क के हैं हुक्मराँ, ये मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाँ
अज़ीम गाड़ियों के क़ाफ़िलों में छुप के जा रहे
उम्मीद दीद की लिए जो लोग हैं क़तार में
सिपाहियों के डंडों से हैं अपने सर बचा रहे
समझ में आ नहीं रहा के क्या करूँ मैं शायरी
लताफ़तें लबों की गुम, कशिश वो हुस्न की गई
नए अहद की आस में बचे ये दिन गुज़ार लो
सुराग़ मिल सके मेरा तो मुझको  तुम  पुकार लो
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समाअत- श्रवणशक्ति, अहद- युग.
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एक अंजाम से निकला हुआ आग़ाज़ तो है
पर नहीं पास  मगर  हसरते-परवाज़  तो है
हो  ये चेहरे पे भले चस्पाँ  मगर  राज़  तो है
तेरे खुल जाने में छुपने का इक अंदाज़ तो है
तुम  दबाते रहे उसको  सरो-सामाँ के  तले
एक मद्धम सी मगर रूह की आवाज़ तो है
सब्र  इतना  ही  नहीं  है  के  पिसे  जाते  हैं
ख़ुश हुए जाते हैं सर पर कोई मुमताज़ तो है
सुर तो सधते हैं अगर दर्द की लय हो हमराह
हाकिमे-शह्र  है  नाज़ाँ  के  उसे  साज़  तो  है
शाहे-कमअक़्ल के एकराम का मोहताज नहीं
वो  ख़स्ताहाल  है पर  ख़ुद पे उसे नाज़ तो है
हो वो ग़ालिब का बिरमहन के शहंशाहे-वक़्त
अच्छे दिन आएँगे  कहने का ये अंदाज़ तो है
कोई कोताही न की ग़म को बड़े दिल से दिया
माना ग़ुरबत में हैं पर ज़िन्दगी फ़ैयाज़ तो है
सुना  है,  उसकी  इनायत  है  बेहयाओं  पर
चलो ये शुक़्र है  'कुन्दन'  से  वो नाराज़ तो  है।
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हसरते-परवाज़- उड़ान की इच्छा, चस्पाँ- चिपका हुआ, मुमताज़- माननीय, एकराम- कृपा, फ़ैयाज़- उदार  .
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कैटवॉक
मुक़ाबिल आईने के
मेकअप के लिए मसरूफ़
ये दुनिया
ये नस्लो-ज़ात के मेकअप
ये मज़हब का भड़कता तुन्द ख़ू ग़ाज़ा
अजब मेकअप के जो इन्सान की
सूरत बदल दे
और फिर
फ़सादों के इन्हीं स्टेजों पर
मुनक़्क़द हों कई फ़ैशन परेड
और फिर फैशन परेडों के
ये संजीदा से जज
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये देखें रैंप पर ये कैट वॉक
के जिसमें मुल्क के हर गोशे से
आए नुमाइन्दे
असलहे हाथों में लेकर
कई चौंकानेवाले पैरहन में
के जिनपे ख़ून के धब्बे हों
हाँ, उसी मासूम ख़ूँ के
जो बहते थे कभी
किसी मासूम बच्चे,किसी पुर मामता माँ,
सजीले से जवाँ, किसी लाग़र से बूढ़े की
रगोँ में
बड़ी मेहनत हुई होगी,
अजब फ़नकारी की होगी
खेंच कर ऐसा लहू पैरहन को
अपने रंगने में
सिला इसका तो देंगे
ये मुन्सिफ़
यही पंडित,यही मुल्ला,यही अपने सियासत दाँ
ये जन्नत बख़्श देंगे , खोल देंगे स्वर्ग के दर
ओहदे भी देंगे ,
हुब्बुलवतनी के कई एजाज़ देंगे
मगर मैं सोचता हूँ
ये घबराई हुई दुनिया
हज़ारो ही मसाइल सर पे ले के
खुली सड़कों पे
अजब इक बदहवासी में
लिए चेहरे पे दीवाना तआस्सुर
बस इक रोटी के पीछे
दौड़ती और भागती दुनिया
भला कब तक
अपने ख़ूँ के क़तरे-क़तरे को
इन्हीं फैशन परेडों में रंग भरने
के लिए बिना कुछ सोचे समझे
अता करती रहेगी
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मसरूफ़- व्यस्त, तुन्द- ख़ू उग्र प्रकृति का, ग़ाज़ा- पाऊडर, मुनक़्क़द- आयोजित, सियासत दाँ- राजनीतिज्ञ  , असलहे- हथियार, पैरहन- वस्त्र, लाग़र- दुर्बल, हुब्बुलवतनी- देशप्रेम, एजाज़- पुरस्कार, मसाइल- समस्याएँ, तआस्सुर- भाव.
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सरमाया के ताज में तो अलमास जड़े है मज़दूरी
फिर अपनी मजबूरी से दिन-रात लड़े है मज़दूरी
चलते-चलते इन राहों पे हमको ये एहसास हुआ
मंज़िल गिरवी और कहीं है पाँव करे है मज़दूरी
हम लोगों का हाल सुनाकर रहबर तो आबाद हुआ
उसकी बरकत का चर्चा है कहाँ बढ़े है मज़दूरी
दो लोगों के बीच का रिश्ता सीधे तय नहीं होता है
रुसवाई की सूरत में एहसास भरे है मज़दूरी
रहना है हर हाल में ज़िन्दा ये जावेद क़बीला है
मरते हों मज़दूर भले ही कहाँ मरे है मज़दूरी
गुमनामी में, ख़ामोशी से देती है लम्हा लम्हा
कहाँ कभी कुछ पाने ख़ातिर पाँव पड़े है मज़दूरी
पूरा करने की कोशिश में थोड़ी सी महरूमी को
'कुन्दन' को क्या चारा है, दिन-रात करे है मज़दूरी

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सरमाया- पूँजी, अलमास- हीरा, रहबर- पथ प्रदर्शक, जावेद- अमर, महरूमी- अभाव.
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ज़िन्दगी,  तुझसे मुसलसल फ़रेब खाए हुए हैं
फिर भी उम्मीद हम तुझसे ही तो लगाए हुए हैं
कहो तो अपनी ज़मीं से ही बेदख़ल हो जाएँ
हम अपनी ख़ानाबदोशी को आज़माए हुए हैं
जो जी में आए तो दर पर तुम्हारे आ जाएँ
तुम न घबड़ाओ के ठोकर हज़ार खाए हुए हैं
तुम सताते भी रहो और तवक़्क़ो ये भी करो
हम ये कहते फिरें तुमसे कहाँ सताए हुए हैं
वो जिनके दम से ज़माना है हर घड़ी बेदम
वो अपने हाथों में दोनों जहाँ उठाए हुए हैं
हम समझ सकते हैं मतलब तेरे तबस्सुम का
मिला था ग़म तो कभी हम भी मुस्कुराए हुए हैं
अब ख़रीदार न आए कोई 'कुन्दन' हम भी
इतनी मंदी थी के दूकाने - दिल बढ़ाए हुए हैं
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मुसलसल- लगातार, तवक़्क़ो- अपेक्षा.
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दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

मैं जानता हूँ अभी नहीं है वो वक़्त
के हम फ़साना गढ़ लें
मैं जानता हूँ अभी न आया है
ऐसा मौसम
जो सर्दो-गर्म आज चल रहा है
जहाँ को उससे निजात दे  दें
अभी तो दौर है वो
के शीर को भी तरसते बच्चों
को जब भी चाहा हलाक कर दें
अभी तो इन्साँ छुपा हुआ है
अभी तो हैवाँ मचल रहा है
मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
कुछ ऐसे दोपहर में
किसी शजर के ज़रा-सा साया
के मुन्तज़िर हों
दरख़्त सारे झुलस रहे हैं
हमारी ख्वाहिश पे कितने पहरे
हमारी हसरत पे बंदिशें हैं
यही है हुक्म हाकिमे-शह्र का
के इंसानियत की वुसअतों को
बस एक नुक्ते-भर की
जगह अता हो
जहाँ से राजा निकल रहा है
वहाँ पे है सरनिगूं  रियाया
वहाँ बनाई गयी हैं  देखो
कितनी हमवार-सी फज़ाएँ
वहाँ पे शोरे-ज़िंदाबाद हर सू
वहाँ पे ऐसे इन्कलाबों
के नारे कितने मचल रहे हैं
जिन्हें किसी ने कभी न देखा
के सारे अखबार, हरूफ़ उनके
के जितने भी कैमरे मयस्सर
सब इक जगह पे अटक गए हैं

मैं जानता हूँ अभी नहीं है
वो वक़्त के हम
ज़ुबां के तालों को तोड़ डालें
मगर इसी तप रही फ़ज़ा में
मगर इसी गर्म-सी हवा में
वो गुलमोहर इक खड़ा है कैसे
अगरचे पत्ते हरे हैं फिर भी

गुलों में शोला दहक रहा है
मताला कर लो जो गुलमोहर का
किसी मुक़द्दस किताब जैसा
तो जैसे कोई वही हो नाज़िल
मिलेंगे शायद छुपे इशारे
के वक़्त का ही फेर है यह
ज़रूर लेगा ये एक करवट
दहक उठेगा ये गुलमोहर फिर

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शीर- दूध, मताला- अध्ययन, मुक़द्दस- पवित्र, वही हो नाज़िल- देववाणी का उतरना.
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संपर्क:-  91-9835660910, 8709042189
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रविवार, 18 जून 2017

लेखक की पहचान का संकट:अमरेंद्र मिश्र

बदलते समय में बहुत सारी चीजें बदलती जा रही हैं। लोग सिमटते जा रहे हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में पड़ोसी तक से मिलने-बात करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यिक गतिविधि तक भी अपने अलग ढंग और तेवर में हो रहे हैं फिर पहचान की संकट क्यों नहीं हो? फिर, जब जमाना सेल्फ प्रमोशन का हो, तब भी यदि आस-पास के लोग आपको नहीं पहचानते हैं। तो  स्थिति सचमुच में भयावह है। फिर भी क्योंकर तो दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि कहीं -न-कहीं लेखक स्वयं भी इसके लिए जिम्मेवार हैं। खैर, आइये पढ़ते हैं साहित्यिक संपादक अमरेंद्र मिश्र के संस्मरण को और जानते हैं उनके अनुभव।



लेखक की पहचान का संकट
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एक लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए है कि उसकी किताब जिन पाठकों तक पहुँच रही है, वे 'नोटिस' नहीं ले रहे हैं, या इसलिए कि वह जहाँ रहता है, वहाँ से थोड़ी ही दूर पर स्थित जो लोग रह रहे हैं, वे उसे नहीं जानते ! या लेखक ही आज के समय में अकेला हो गया है ? क्या कारण है कि एक लेखक की अपनी पहचान उसके आसपास ही नहीं बन रही ?

हाल ही में मैं हिंदी के एक वरिष्ठ कथाकार से मिला।उनके आवास तक तो मैं पहुँच गया लेकिन फ्लैट का नंबर भूल गया।जो नंबर मोबाइल पर लिया था वह भी कहीं खो गया।लेकिन उनसे मिलना चूँकि पच्चीस वर्षों बाद हो रहा था, इसलिए मुझे पक्का विश्वास था कि उनके फ्लैट को तो मैं पलक झपकते ही पहचान लूँगा।और फिर इतने बड़े लेखक हैं तो कोई भी चायवाला, पानवाला, पटरी लगाने वाला जरूर उनका फ्लैट बता देगा।

उस पार्क की एक बेंच पर बैठा-बैठा अपने सामने के तमाम फ्लैट देखता मैं सोचता रहा-सामने वाले फ्लैट से थोड़ा हटकर हल्के पीले और गाढ़े भूरे रंग का फ्लैट ही विभूति बाबू का हो सकता है।पार्क की बेंच पर बैठे-बैठे इतना इतमीनान कर लेने के बाद मैं उठा और सामने की सड़क पार कर उनके फ्लैट के पास पहुँच गया।कुछ देर तो उनके नाम से ही उन्हें खोजता रहा पर किसी ने भी आदरपूर्वक यह नहीं बताया कि विभूति प्रसाद जी, जो एक मशहूर लेखक हैं, वह पास के किस फ्लैट में रहते हैं ?मैं जिस फ्लैट को पहचानता उनके उस संभावित फ्लैट तक पहुँचना चाहता था, वह तो उनका था ही नहीं।पुरानी स्मृति में बार-बार लौटते मैं हताश हो चुका था और लगभग लौट जाना चाहता था कि इस बीच विभूति प्रसाद जी सामने से आते दिखे।उनके साथ मैं उनके फ्लैट तक पहुँच गया।उसी फ्लैट में जिसका मैंने पार्क में बैठे-बैठे संभावित अनुमान लगाया था।अंतर बस इतना-सा था कि प्रवेश-द्वार का रास्ता बदल गया था।

''आपको परेशानी हुई, यहाँ तक आने में ?''
मैं कुछ कहने को तैयार हो ही रहा था कि वह फिर कह बैठे-''देखिए, अब वह समय तो रहा नहीं कि आप लेखक हैं तो आपको पूरा शहर पहचानता है।टोले-मोहल्ले के लोग आपको सर आंखों पर बिठाये हुए हैं ! समय तेजी से बदल रहा है।एक वक्त था जब मेरा या मेरे जैसे लेखक का पता तो नीचे रहने वाले या आसपास के लोग ही बता देते थे।और तो और,आये हुए आगंतुक को मेरे फ्लैट तक छोड़ भी जाते थे।डाकिया रोज दस-बारह पत्र और तीन-चार पत्रिकायें दे जाता था।कहता था,''-आपका सिर्फ नाम पढ़ता हूँ, फ्लैट का नंबर तो पढ़ने की जरूरत ही नहीं होती।''

मैं सोचता रहा,''जितना कहना चाहते हैं, कह लें, तब मैं अपनी बात उनके समक्ष रखना चाहूँगा।वे फिर शुरू हो गये-''भाई, स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।आज से चार साल पहले कोलकाता में जो इलाज करवाया था, वह अबतक याद है।मैं अपने पुत्र रोहित के साथ एक-एक डाक्टर से अपनी परेशानी सुनाता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।इसी बीच एक नौजवान डाक्टर मेरे पास आया, मेरे चरण स्पर्श करते कहा-''सर, आप यहाँ कैसे ?''
''मैं आश्चर्य में पड़ा उसकी ओर देखता कह गया-''क्या आप मुझे पहचानते हैं ?''
''सर, आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी फोटो किताब पर देखी थी।आप विभूति जी हैं।आपकी लगभग सभी किताबें पढ़ गया हूँ।विशेषकर आपका वह उपन्यास 'सागर तीरे'।क्या गजब लिखा है सर आपने।''
मैं लगभग भावुक होता सिर्फ' धन्यवाद' कह पाया।

मेरी चिकित्सा व्यवस्था में बेहतरीन  सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयीं।एक सुखद अनुभूति के साथ घर लौटते मैं सोचता रहा-''ऐसा कभी-कभी ही होता है।ऐसे प्यारे लोग कभी कभार कहीं मिल जाते हैं और मेरा 'लेखक' उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर लेता है।''

अब न तो वह समय रहा, न वे लोग रहे, न पाठक।कुछ भी तो नहीं रहा ! अब तो सौ पृष्ठों का लिखा कथानक उपन्यास बन जाता है और कहानी 'लघुकथा' में सिमट गयी है।जिस तरह हिंदी फ़िल्म के कलाकार अपनी अभिनीत फिल्म का प्रचार स्वयं ही करते हैं, ठीक उसी प्रकार लेखक भी अपनी किताबों का प्रचार ख़ुद ही करता है।उसे तनिक धैर्य नहीं कि उसकी किताब पर उसे पाठकों के विचार जानने चाहिए।इंतजार करना चाहिए।क्या यह पहचान का संकट नहीं ?''

वे कहीं गहरे खो गये और शायद अपने बीते दिनों में लौट आये।

''लेखक की पहचान का संकट क्या इसलिए भी नहीं की उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक...''

''किस किताब की बात कर रहे आप''?वे गुस्सा हो आए।फिर तनिक सहज होते कहा- "लेखक जब खुद ही प्रकाशक का काम करने लग जाये तो फिर कैसे कह सकते हैं कि उसकी किताब अधिक से अधिक पाठकों तक नहीं पहुँच पाती ?लेखक पहले अपने व्यक्तित्व का निर्माण तो करे, फिर देखिए, यह संकट कुछ कम हो।''

कारण जो भी हो पर इतना तय है कि लेखक की पहचान का संकट इन दिनों जटिल होता जा रहा है।समाज उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहता है, जो उसे प्रिय है।उसकी अपनी पसंद-नापसंद है।उसके परिचय और 'पहचान' की परिधि में अब न तो वह पुराना समय है, न पुराने लोग, न उनकी प्रसिद्धि, न प्रतिष्ठा।

एक एकाकीपन तन गया है हमारे आपसी सरोकारों के बीच।लेखक की पहचान का संकट उतना ही अहम् है जितना परिवार और समाज में व्यक्ति के खुद की पहचान का संकट।यही कारण है कि बदलते समय में आज आदमी अकेला रह गया है।सच यह भी है कि जिस लेखक को आज का समाज पहचान नहीं पा रहा-वह उन्हीं को बेहद आत्मीयता के साथ जाने कब से रोज देखता-पहचानता आ रहा है !
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अमरेंद्र मिश्र
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फेसबुक वॉल से साभार।