गुरुवार, 8 सितंबर 2016

राहुल राजेश की क्या हुआ जो पर शहंशाह आलम की टिप्पणी


'क्या हुआ जो' ( राहुल राजश ) : एक नए प्रदेश के नए घर में लिखीं नए महत्व की कविताएँ

● शहंशाह आलम

हिंदी कविता की नई ज़मीन जिस तेज़ी से बड़ी हो रही है, विकसित हो रही है, यह देखकर कविता के इतिहासकारों को प्रसन्नता ज़रूर होनी चाहिए, कविता के उन इतिहासकारों को, जो कविता-इतिहास-लेखन के समय ईमानदार बने रहते हैं। मेरे विचार से कविता की ऐतिहासिकता इसी बात में है कि इसकी नई ज़मीन जितनी उर्वर होगी, हरी-भरी होगी, जितनी कविता के मेहनतकश कवियों की विशिष्टा से पटी होगी, हिंदी कविता का फ़लक भी उतना ही विस्तृत होगा। हिंदी कविता के विकास की यह लयात्मकता कविता के क्षेत्र में दिखाई देती है, सुंदर भी है, अद्भुत भी है और क्रान्तिकारी भी है। मेरे विचार युवा कवि राहुल राजेश का हिंदी कविता में प्रवेश इसी उद्भव का प्रमाण है। हिंदी कविता में राहुल राजेश का यह उद्भव नया नहीं है, तब भी राहुल राजेश जिस गुपचुप तरीक़े से, अपना स्थान हिंदी कविता में बनाते चले जा रहे हैं। राहुल राजेश के इस गुपचुप तरीक़े का महत्व अतिमहत्वपूर्ण है, विशिष्ट भी और प्रभावकारी भी। राहुल राजेश का पहला कविता-संग्रह 'सिर्फ़ घास नहीं' सन् 2013 में साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से छपकर आया था। अब राहुल राजेश की कविताओं का नया संग्रह 'क्या हुआ जो' ज्योतिपर्व प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद से छपकर इसी वर्ष यानी सन् 2016 में आया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि 'क्या हुआ जो' की कविताओं में राहुल राजेश की कविता-चेतना अपने उद्देश्य को पाती दिखाई देती है। राहुल राजेश अपनी कविताओं के माध्यम से कविता के जिस नए प्रदेश के जिस नए घर में अपने पाठकों को लिए चलना चाहते हैं, नए प्रदेश के नए घर की यह यात्रा पहले के नए प्रदेश के नए घर से अधिक महत्व की है। कविता के इस नए प्रदेश में नया-नवेला होने की यह अवस्था, यह भाव अपनी नई महत्ता, नई गुरुता लिए इस कारण भी है कि राहुल राजेश दुमका, झारखंड के छोटे-से गाँव अगोइयाबाँध से निकलकर पहले पढ़ने के लिए और जीवन-संघर्ष के लिए पटना, बिहार आते हैं। फिर जीवन-संघर्ष को बड़ा आयाम देने के लिए अहमदाबाद, गुजरात और अब कोलकाता, बंगाल।

     राहुल राजेश हिंदी कविता के उन युवा कवियों में हैं, जिनकी कविताएँ कविता की नई पृथ्वी को सही अर्थ दे रही हैं। राहुल राजेश दरअसल जीवन के उस उद्देश्य के कवि हैं, जो अपनी कविताओं में हमारे जीवन के आत्मीय पक्ष को गहरी आत्मीयता से प्रकट करते हैं। इनका शब्द-संकेत मनुष्य के उन गुणों की तरफ़ अधिक रहता है, जिसमें मनुष्य का जीवन किसी पार्टी के मुखपत्र की घोषणा की तरह न होकर संवेदनात्मक है। राहुल राजेश संग्रह की पहली ही कविता में यह स्पष्ट भी कर देते हैं : किसी वाद से / बँधा नहीं हूँ / कवि हूँ / अँधा नहीं हूँ ( 'कवि हूँ', पृ. 23 )। यही सच है, किसी रूढ़, किसी प्रथा से बँधा-बँधाया कवि भाग ही कितनी दूर सकता है। रूढ़ परंपराएँ वैसे भी मनुष्य-समाज को कमज़ोर ही करती रही हैं। इसीलिए सारे 'वाद' ढहते दिखाई देते हैं। ऐसे में जो कवि सजग है, वह उन संगठनों के वाद में कैसे बँधेगा, जो संगठनें मनुष्य को मनुष्य से विलग करती आई हैं। यह विलगाव एक घातक अनुबंध जो रहा है :

          पहाड़-सा समय
          पहाड़-सा बोझ
          पहाड़-सी ज़िंदगी...

          यदि सबकुछ
          पहाड़-सा हमारे लिए
          तो आइए
          पहाड़ से पूछें--

          कैसा तुम्हारा समय
          कैसा तुम्हारा बोझ
          कैसी तुम्हारी ज़िंदगी ( 'पहाड़', पृ. 31 )।

     यह सुखद संयोग है कि राहुल राजेश इस संदिग्ध समय में असंदिग्ध रहकर स्वयं को कवितारत रखे हुए हैं। इनकी कविता-खोज की दिशा उन विविधताओं को लेकर है, जिसमें मनुष्य अपने अलावे दूसरों की चिंता भी कर रहा होता है। यानी राहुल राजेश सिर्फ़ अपने बारे में सोचकर चुप बैठ जानेवाले कवियों में नहीं हैं जैसा कि आज के बहुत सारे कवि अपने भीतर रह गई संकीर्णता के कारण करते हैं। राहुल राजेश का मार्ग सीधे-सीधे उन आदमियों तक पहुँचता है, जो अपनी पहाड़ जैसी ज़िंदगी ढोता फिरता है और उन आदमियों को ख़ुद के लिए सही निष्कर्ष चाहिए होता है। राहुल राजेश ऐसे पहाड़ ढोऊ आदमियों की फ़िक्र भी करते हैं और इनके विरुद्ध चल रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ भी लगाते हैं :

          नगरपालिका की टोंटी पर
          नागरिकों का जमघट है
          बूँद-बूँद के लिए हाहाकार है
          और लंबी कतार है
          ख़ाली डब्बा, ख़ाली बाल्टी
          ख़ाली कनस्तर, ख़ाली घट है
          और बस जीने का हठ है

          यह भीड़ है, वोट बैंक है
          शहर की तलछट है
          रोज़-रोज़ का यह दृश्य
          देश का चित्रपट है ( 'चित्रपट', पृ.92 )।

     वैसे संपूर्णता में कहें, तो राहुल राजेश प्रणय-निवेदन के अनोखे कवि कहे जा सकते हैं। ऐसा इसलिए है कि प्रणय-संबंध मनुष्य-जीवन का अभिन्न अंग है। फिर कोई जीवन-संघर्ष भी कर रहा हो और प्रेम भी, तो यह स्थिति कवि के सोच को व्यापक ही बनाती है। फिर यह राहुल राजेश की अपनी अदा है कि ये अपना जीवन-संघर्ष ऐसे ही जीतते हैं। इससे इनकी प्रगतिशीलता भंग नहीं होती। इसलिए कि मनुष्य का सामाजिक जीवन बिना किसी लक्ष्य के पूर्ण भी नहीं होता। 'क्या हुआ जो' कविता-संग्रह की कविताएँ मनुष्य के सामाजिक जीवन की कविताएँ कही जा सकती हैं। हालाँकि कभी-कभी कवि को यह भी लगता है कि प्रेम-व्रेम फ़ालतू चीज़ है, जैसे निराशा के समय आदमी को लगता है कि यह जीवन-बीवन बेकार है। तब भी आदमी इस जीवन को जीता है और अपने जीवन-लक्ष्य तक पहुँचता है। वैसे ही इस कवि को प्रेम के बारे में कभी-कभी निगेटिव एहसास होता है, परंतु कवि प्रेम करना छोड़ नहीं देता, इसलिए कि कवि को यह पता है कि प्रेम कसकर पकड़े रहने की चीज़ है। इस तरह राहुल राजेश जो भी अर्थ और आशय ढूँढ़ना चाहते हैं, ढूँढ़ ही लेते हैं। ऐसा इसलिए है कि इन्हें अपने लक्ष्य का पता है। ऐसा इसलिए भी है कि इनके भीतर प्रकृति पूरी तरह पैबस्त है। 'क्या हुआ जो' में राहुल राजेश की लगभग नब्बे कविताएँ संगृहीत की गई हैं। ये कविताएँ ऐसी हैं, जो अपने पाठ के वक़्त बिजली की तरह चमकती हैं। यहाँ मेरा आशय यह है कि ये कविताएँ आदमी के घटाटोप अँधेरे जीवन में रौशनी की तरह हैं। यानी एक आदमी जब अपनी चारों तरफ़ फैले अँधेरे से घिर जाता है, तो ये कविताएँ आदमी के इर्द-गिर्द फैले अँधेरे को मार भगाने की ताक़त रखती हैं। यही राहुल राजेश की कामयाबी का द्योतक है :

          तुम्हारी गोद में सिर धरता हूँ
          तो हो जाता हूँ आकाश

          होंठों पर होंठ
          तो समुद्र

          आँखों में आँख
          तो बादल

          बाहों में बाँह
          तो इंद्रधनुष

          जिस क्षण मैं बदलता हूँ
          इन सब चीज़ों में

          तुम किन-किन चीज़ों में
          बदलती हो

          जिस क्षण तुम बदलती हो
          उन-उन चीज़ों में
          किसमें बदलते हैं मेरे दुःख

          किसमें बदलती है पृथ्वी
          किस्में बदलता है समय

          कौन-से शिल्प में उतरती है दुनिया
          कौन-सी दुनिया में देह ( 'जिस क्षण मुक्त होता हूँ स्वयं से', पृ. 82 )।
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'क्या हुआ जो' ( कविता-संग्रह ) / कवि : राहुल राजेश / प्रकाशक : ज्योतिपर्व प्रकाशन, 99, ज्ञान खंड-3, इंदिरापुरम्, ग़ाज़ियाबाद-201 012 / मोबाइल संपर्क : 09429608129 / मूल्य : ₹199
शहंशाह आलम

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800 015 / मोबाइल : 09835417537
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बुधवार, 31 अगस्त 2016

शहंशाह आलम की कविता यक्षिणी

 मेरा एकांत उस समय भी मेरा था जब तुम नहीं थे
मेरा एकांत अब भी मेरा है जब तुम हो
इसलिए कि यह एकांत मेरी आत्मा की तरह है
जिसमें तुम नृत्य करते हो बिना थके बिना मुझे हारे

शहंशाह आलम के इन शब्दों में यथार्थ, दर्शन और आध्यात्म का मर्म एक ही साथ परिलक्षित हो रहा है। जो कि कवि की वैचारिकी एवं गहनता का भी परिचायक है। तो पढते हैं कवि शहंशाह आलम की यक्षिणी की कुछ कविताएं और समझने की कोशिश करते हैं कविता में अभिव्यक्त उनके विचारों को।
शहंशाह आलम

यक्षिणी : छह कविताएँ
     ● शहंशाह आलम

एक /

यह आकाश जो कोरा है
तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में
शताब्दियों-शताब्दियों से

अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर
अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर
तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ
और बादलों को सियाही बनाकर
लिखते हो कोरे आकाश पर
प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए

अपार दिनों से पसरा
मेरे चेहरे का सन्नाटा
छू हो जाता है पल में

दो /

तुमने बताया तुम्हारा घर
मेरी खिड़की के बाहर अनंत में है
जैसे मेरा घर पृथ्वी पर हुआ करता है
इस देह के बचे रहने तक

तुमने सच की तरह सच कहा
मेरा घर ढह जाता है वक़्त के साथ
छप्पर उड़ जाता है बिजलियों की कड़क से
ज़रा-सी तेज़ आँधी-बारिश के आते ही

तुम्हारे घर के बारे में
तुम्हारा ख़्याल था
कि तुम्हारा घर रत्न-जड़ित है
अजर है अमर है सज्जित है आकाशगंगा से
जैसे तुम अजर-अमर हुआ करते हो

तब भी मेरा घर ढूँढ़ निकालते हो तुम
आँधियों बारिशों के गुज़र जाने के बाद
मेरे घर को अपना घर मानते हुए

तीन /

तुम स्वर्ग की चौपाइयाँ सुनाते हो
जब अपनी धुन में मगन
मेरे आँगन में उग आईं
वनस्पतियों की हज़ार-हज़ार क़िस्में
पुरखों की तरह मुझे आकर दुलारती हैं
मेरी इस योनि को अपनी औषधि से चमकाते

तुम्हें लगता है मैं ही यक्ष हूँ तुम्हारा
तुम्हारी ही तरह मृत्यु को पराजित करता हुआ

चार /

मूँद लेता हूँ पलकें तुम्हारे कहने से
खोलता हूँ जब अपनी मूँदी पलकें
पाता हूँ तुम्हें इस अजब-ग़ज़ब कालखंड को
एक नए आकार में साकार करते
अपने देवचिह्न में रंग भर-भरकर
किसी शुद्ध कलाकार की तरह

सुनो, यक्षिणी! भूले हुए सारे शब्द
लौट रहे हैं तुम्हारी नाभि की तरफ़
मेरे हाथों ढले जलकुंड में नहा-धोकर

पाँच /

तुमने कहा नर्तक अपने इस समय से बतियाते
कि यक्ष-प्रश्न कठिन होते हैं चट्टानों की तरह

प्रश्न तो अकसर कठिन ही होते हैं
मेरे मनुष्य-जीवन के और तुम्हारे यक्ष-प्रेम के

तुम्हें पाने के लिए पृथ्वी पर नक्षत्रों को छितराते
युधिष्ठिर जैसा हर यक्ष-प्रश्न के लिए तैयार हूँ तब भी

छह /

मेरा एकांत उस समय भी मेरा था जब तुम नहीं थे
मेरा एकांत अब भी मेरा है जब तुम हो
इसलिए कि यह एकांत मेरी आत्मा की तरह है
जिसमें तुम नृत्य करते हो बिना थके बिना मुझे हारे

और यह अंतरिक्ष रोज़ अनथक गाता है तुम्हारी इस देह को
मेरी देह से मिलाता किसी प्राचीन लिपि को स्वर देता हुआ।
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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

दलित और साहित्य (आलेख) सुशील कुमार भारद्वाज

                                                 दलित और साहित्य
सुशील कुमार भारद्वाज

सुशील कुमार भारद्वाज

साहित्य का एक ऐसा दौर जब दलित रचना के केंद्रबिंदु में आ गया. दलित तो दलित गैर–दलित रचनाकारों ने भी खूब कागज के पन्नों को स्याही से काला किया. लगने लगा जैसे पूरा का पूरा साहित्य ही दलितमय हो गया हो. लोगों को पंख लगने लगे. लोगों की सोच बदलने लगी. एहसास होने लगा कि सदियों से चला आ रहा दमन का भयावह समय समाप्त होने वाला है. दलितों को इज्जत –सम्मान मिलने लगा. उन्हें बड़े बड़े सभा सम्मेलनों में मंचों पर प्रतिष्ठित किया जाने लगा. सवर्णों के इस साथ ने उनका मनोबल बढ़ाया लेकिन दशकों बीत जाने के बाबजूद जब जमीन पर परिवर्तन होकर भी वैसा परिवर्तन नहीं दिखा जिसकी परिकल्पना वे करते थे तब उन्हें एहसास हुआ कि गैर–दलित रचनाकार उन्हें सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं. वे उन पर लिख रहे हैं, उनके दुःख–दर्द को बयां कर रहे हैं लेकिन उनकी खातिर नहीं, बल्कि स्वयं की खातिर. गैर–दलित साहित्य में सहानुभूति के शब्दों को जगह दे रहे हैं. वे दलितों के पक्षधर के रूप में दिखकर वाह-वाही लुट रहे हैं. ब्राह्मणवादी होते हुए भी उदारता का रूप दिखला रहे हैं. मंचों और सभाओं में वे यथोचित इज्जत नहीं दे रहे हैं बल्कि वे अपना व्यापार कर रहे हैं. आयोजन के बहाने मोटी कमाई कर रहे हैं. दलितों के नाम पर सम्मेलन हो रहे हैं, नारे लग रहे हैं, बड़े बड़े वादे हो रहे हैं, आरक्षण के नाम पर खुली बहसें हो रही हैं, हितैषी ही नहीं दलित बन जाने की हद तक का व्यवहार वे कर रहे हैं लेकिन स्थिति में तो बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है. क्या दलित बाज़ार की एक वस्तु बन कर रह गया है? दलित सबसे अधिक बिकने वाला विषय बन गया है? दलित चर्चा और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन कर रह गया है? कहीं यह ब्राह्मणवादियों की सोची –समझी साजिश तो नहीं कि दलित दलित इतना चिल्लाओं कि दलित की वास्तविकता ही संदेह के घेरे में आ जाए. उनके मूल प्रश्नों और समस्याओं को शोर में दबा दो. दलितों को दलित –महादलित आदि छोटे-छोटे इतने टुकड़ों में बाँट दो कि एक दमदार आवाज की उपस्थिति के पहले ही वे आपस में उलझकर –लड़कर दम तोड़ दें.
उनके सवाल उठने लगे कि हमलोगों का नाम दलित क्यों? हमारा साहित्य दलित साहित्य क्यों? ब्राह्मण साहित्य, भूमिहार साहित्य, राजपूत साहित्य, लाला साहित्य, यादव साहित्य आदि जब नहीं लिखा जाता तो हमें क्यों इस परिधि में बांधा गया है? हमें साहित्य में दोयम दर्जे का स्थान क्यों दिया गया है? हमसे ही अमानवीय और तुच्छ कार्य क्यों करवाये जाते हैं? किस साहित्य में हमें इज्जत –प्रतिष्ठा के साथ प्रस्तुत किया गया है? ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बारे में ऐसा क्या बताएं जिससे उनका सिर गर्व के साथ ऊँचा उठ सके? साहित्यिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल और द्विवेदीजी ही क्यों? कोई आंबेडकर को मानने वाला क्यूँ नहीं? उनका काल विभाजन का तरीका हमें उपेक्षित या अपमानित करने वाला क्यों? सिर्फ इसलिए की पढाई –लिखाई और छपाई के साथ-साथ जनसंचार के सारे माध्यमों पर सवर्णों का कब्ज़ा है? जिसके कारण सवर्ण एक विजेता की तरह मनमाफिक इतिहास लिखकर आने वाली पीढ़ियों को पढ़ने के लिए प्रस्तुत करते रहें?
और ऐसे ही सवालों के जबाब ढूंढते ढूंढते उन्होंने तय किया कि दलित पर लिखे कोई भी, क्योंकि किसी को लिखने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन हमारा साहित्य यानि दलितों का साहित्य सिर्फ वही होगा जो सिर्फ दलितों द्वारा लिखा जाएगा. ठीक वैसे ही जैसे, “बच्चे को एक छटांक भर दूध पिलानेवाली माँ, माँ ही रहती है लेकिन पूरी जिंदगी दूध पिलानेवाला ग्वाला, ग्वाला ही होता है.”
आज स्थिति इतनी भयावह हो रही है कि उनके प्रतिकार, इंकार और आक्रामक स्वरूप बदले की भावना से प्रेरित लगती है लेकिन वे इसे अपना हक मानते हैं, न्याय मानते हैं. और सबसे गौरतलब बात है कि ये भाषा किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि लगभग हर दलित रचनाकार की है. वे आगे –पीछे कुछ नहीं बल्कि अपने पांच हज़ार साल के हिसाब की बात करते हैं. उनकी आक्रामक भाषा लोगों को कई बार आतंकित करती है. यह आक्रोश हाल के वर्षों में ही इतना आक्रामक क्यों हुआ? इसका जबाब शायद सबके पास है या किसी के पास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उन्हें कोई शक्ति, अपने नफ़रत को उगलने के लिए प्रेरित जरूर कर रही है. ऐसी विषम परिस्थिति में शांति और सामंजस्य काफी कठिन मालूम होता है जब वे सिर्फ अपनी शर्तों पर बात करने को तैयार होते हैं वर्ना कुछ भी नहीं. अराजकता का एक पूरा माहौल स्पष्ट रूप से दिखने लगता है. लेकिन सोचने वाली बात है कि इस समस्या का समाधान बगैर मिलजुल के बैठकर बात किए बिना संभव है? क्या सिर्फ आवेश में बात करने से समस्या का समाधान होगा? क्या हम हिंसक भाषा अथवा हिंसक व्यवहार से समाज में अमन की आशा कर सकते है? क्या यह टकराव एक विनाश को आमंत्रण नहीं है? शायद यह रास्ता शिक्षितों द्वारा लिया गया सबसे गलत चयन हो. संघर्ष ब्राह्मणवाद से होना चाहिए ब्राह्मणों से नहीं. और संभव है जिस पांच हज़ार साल का हिसाब सामने वाले से माँगा जा रहा है वहां न तो वर्तमान में शोषक है न ही शोषित, फिर निर्दोषों को सजा देने का क्या मतलब? क्या साहित्य का यही उद्देश्य है?
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रविवार, 28 अगस्त 2016

विनय कुमार की कविता डेड मॉल






डॉ विनय कुमार यूं तो पेशे से चिकित्सक हैं लेकिन वे साहित्य में भी अपनी पहचान रखते हैं. उनकी रचनाएं न सिर्फ यथार्थ के दर्शन हैं बल्कि वे समाज में फैली बीमारी को भी करीने से पकड़ते हैं. पढ़ते हैं उनकी कविता डेड मॉल 

 
डॉ विनय कुमार


डेड मॉल
.............
मॉल बड़ा और भव्य है
दुकानें भी एक से एक
सबकी भवें ऊँची
मगर ख़रीदार कम होते जा रहे हैं
और सामान ए तिज़ारत के बीच
उदासी फैलने लगी है
जूते लात खाने को बेचैन हैं
गद्दे थकी देहों के साथ सोने को
क़मीज़ों का बदन टूट रहा है
पतलूनों के पाँव अकड़े हैं
और साड़ियाँ अपने नंगेपन से शर्मसार
बेक़रार कि पहन लें कोई देह जल्द से जल्द
मालिकान को फ़िक्र तो बहुत
कि धंधा ठीक नहीं चल रहा
मगर उलट-फेर जोड़-घटाव जुगाड़-सुगाड
और दारू-सारू से फ़ुर्सत मिले तब तो
मगर एक दिन अचानक
दुकानों में सजे माल से
मृत्यु की गंध आने लगती है
साहिबान
जब किसी मॉल की मौत क़रीब होती है
तो सबसे पहले
उसमें रखीं चीज़ें मरने लग जाती हैं
जहाँ ज़्यादा चीज़ें
वहाँ मृत्युगंध ज़्यादा तेज़
और मालिकान समझ जाते हैं
कि यह डूबते जगह को छोड़कर भागने का
आख़िरी मौक़ा है
वे मातहतों को हुक्म देते हैं -
कपड़े और गहने उतार लो
सिंगारदानियाँ ख़ाली कर दो
सुगंध की सीसियाँ छीन लो
ब्रेड चीज़ फलों और सब्ज़ियों की
की थालियाँ हटा लो
और घड़ियों के भीतर-बाहर बचे समय को बुहार लो
मातहत हुक्म की तामील करते रहते हैं
और ऐंकर स्टोर के अंग बारी-बारी से मरते रहते हैं
और एक दिन शेष बचता है
मीना बाज़ार का सूखा हुआ अस्थिपंजर
और कुछ मैनेक्विन नंग धड़ंग
बेग़ैरत
जो न आदमी न औरत
साहिबान वह ऐंकर स्टोर
जहाँ क़दमों की थाप से ड्रम सा बजता था अटूट
और जिसके शीशे में ख़्वाहिशों की फ़िल्म-सी चलती थी
एक ख़ौफ़नाक भूतडब्बे में बदल जाता है
ऐंकर स्टोर तो मर जाता है
मगर उसके क़ातिल जरासीम नहीं मरते
मॉल के हर कोने से उठने लगती है मृत्युगंध
और आहिस्ता-आहिस्ता एक महामारी फैल जाती है
इसे सेल कहते हैं
औने-पौने आधे तिहाई चौथाई
ले जाओ भाई
कौन कहता है
कि हम लुटेरे हैं
आओ देखो कि हम कितने दिलेर हैं
पब्लिक सब समझती है
कि यह दिलेरी नहीं मज़बूरी है
शायद चाल
मगर क़दम फिर भी पड़ते हैं
कि मरनेवाले की
आख़िरी ख़्वाहिश हो
या आख़िरी ज़रूरत
या आख़िरी रस्म
कोई भी तहज़ीब मुँह नहीं मोड़ती
माल बिकते जाते हैं
दुकानें ख़ाली होती जाती हैं
और एक दिन
पूरा मॉल इतिहास हो जाता है
मगर जीवित रहते हैं
वे लोग जो वहाँ गए
वे मुलाक़ातें जो दोस्ती में बदलीं
वे प्रेमकथाएँ जो वहाँ शुरू हुईं
वे धोखे जो खाए-खिलाए गए
उन चीज़ों की कहानियाँ
जिनके ख़रीदे जाने से कुछ हुआ
या जो होना था वो न हुआ
वह मॉल
इन कहानियों में
कभी जुगनू की तरह दमकता है
तो कभी किसी भुतहा साये की तरह
नुमायां होते ही फ़ना हो जाता है
आहिस्ता आहिस्ता लोग भूल जाते हैं
कि वह मॉल बना क्यों था
उसकी वास्तुकला क्या थी
उसकी यू एस पी क्या थी
या कि कोई मॉल भी था वहाँ
जहाँ आज
एक नाजायज़ जंग में मारे गए
सिपाहियों की क़ब्रें हैं
साहिबान
कोई मॉल जब मरता है
तो सिर्फ़ प्रदर्शन नहीं
एक दर्शन भी मरता है
न सही पूरा का पूरा मगर काफ़ी कुछ

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

संजय कुमार कुंदन की गजलें

साहित्य की विभिन्न विधाओं में गजल का एक महत्वपूर्ण स्थान है। गजल सुनना जितना अच्छा लगता है लिखना उतना ही श्रमसाध्य। साथ ही गजल की सफलता तभी मानी जाती है जब वह न सिर्फ सुनने वाले को सम्मोहित कर ले बल्कि अपने संवाद को भी उद्देश्यपूर्ण तरीके से लोगों के मन-मस्तिष्क में बैठा सके। तो आज आनंद लेते हैं ख्यात गजलगो संजय कुमार कुंदन की कुछ गजलों का।
संजय कुमार कुंदन


ग़ज़ल

गरचे  दुनिया में  हैं  हम जैसे  गुनहगार  कहाँ
हमको तुझ जैसे मसीहाओं की  दरकार कहाँ

ज़िन्दगी, तेरे  ही तानों से  तो आजिज़ होकर
ख़ुद  को  हम  बेचने आए  हैं, ख़रीदार  कहाँ

शह्र में  अब तलक  गरचे  है वही  रस्मे-सितम
दिल को जो लुत्फ़ दें अब वैसे सितमगार कहाँ

तेज़  था  शौक़  का  व्योपार,  सुना  तो  आए
बढ़  गईं  सारी दुकाँ, गुम  हुआ  बाज़ार  कहाँ

हमने सोचा था  सुकूँ में  कहेंगे  हम  भी  कुछ
एक   लम्हे  के  लिए  भी  मिला   क़रार  कहाँ

शाम  भी  अब  ज़रा  कतरा के गुज़र जाती  है
दिन को भी  शाम का रहता है  इन्तज़ार  कहाँ

साथ   उजड़े   हुए  लोगों  के  रहा  है   कबसे
हाकिमे-शह्र,  वो    तेरा   है   वफ़ादार    कहाँ

किस  अदा  से  वो  कहे  झूठ के दीवाना करे
कर ले तू  शायरी,  उससे  बड़ा फ़नकार कहाँ

तू भी  आलम  पे  भला  छाएगा  कैसे  'कुन्दन'
तू   तो   सादा  है  तेरी  ज़ात   गिरहदार   कहाँ

##############

अब तो यक़ीं भी लगते हैं हमको  क़यास से
हर  शै  को  छू  लिया है  इतना  ही पास  से

शीशा-ए-तबस्सुम की फ़क़त किर्चियाँ मिलीं
हँसते  हुए  वो   चेहरे   मिले  हैं   उदास   से

हम उसके  इंतज़ार  में  इस  दरजा  मह्व  थे
हम देख  न  पाए  उसे  गुज़रा  वो  पास  से

इक रात  में क्या क्या नहीं उसपे गुज़र गया
आँखें  बहुत  ही आम, मनाज़िर थे ख़ास से

महफ़िल में तो 'कुन्दन जी' बड़े ख़न्दाज़न दिखे
छुपकर   उन्हें   जो   देखा   लगे   मह्वे-यास से

                    ########

क़यास- अनुमान, शीशा-ए-तबस्सुम- मुस्कान का दर्पण, मह्व-- तल्लीन, ख़न्दाज़न- हँसता हुआ, मह्वे-यास--दुःख में तल्लीन

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तुझको ग़लतफ़हमी थी ऐसी साथ निभाना  मुश्किल था
लेकिन तुझको उस हालत में छोड़ के जाना मुश्किल था

तानों में  इलज़ाम   थे  तेरे    मेरी  शहादत ख़्वाबों पर
एक मुनासिब हल पे इन हालात में आना मुश्किल था

टूट  नहीं  पाएगा   रिश्ता  इसपे   यक़ीं  होने  के  बाद
हम दोनों  के बीच  लड़ाई का  थम जाना मुश्किल था

तीरन्दाज़ी  की   यह  तेरी  मश्क़ बहुत  नौख़ेज़  लगी
सख़्त  मेरे  सीने  पे  तेरा  तीर  चलाना  मुश्किल  था

कितना तू बेबस था उस दम  जब तीखे अल्फ़ाज़ कहे
उन  झूठे  इलज़ाम  पे  मेरा तैश में आना मुश्किल  था

ज़िन्दा रहने की ख़ातिर जब फिरने लगा मैं  शह्र-ब-शह्र
यादों की गलियों में पलट कर आना-जाना मुश्किल  था

जिसका दावा था कितनों को  ज़ेरे-अदब ले  आया था
मान लिया उसने 'कुन्दन' को राह पे लाना मुश्किल  था

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दिल  की  ही बातें   लिखनी थीं   लेकिन  तूफाँ   उतर गया
आज की उलझन कल की मुश्किल का नज़्ज़ारा उभर गया

नर्म , मुलायम  उन  जज़्बों  का  एक अजब  ये  हाल हुआ
कारगहे- दुनिया  में   उनमें   पत्थर- सा  कुछ   उतर   गया

अपनी  वो  औक़ात  कहाँ  है  फ़ुरसत  के  कुछ लम्हें  हों
इक लम्हा  ख़ाली  जो गुज़रा  ख़ौफ़ सा कोई  उभर  गया

हम   बेढंगे   लोग  से  उसको   दौलत  ने  यूँ   खेंच  लिया
ख़द्दो-ख़ाल तो  हम जैसे  थे  लेकिन  कितना निखर गया

उसको   ये   ख़ुशफ़हमी  है   के  वो  आज़ाद  परिन्दा  है
वक़्त  बहुत  हुशियारी से  बस   उसका  पर  है कतर  गया

अब तो  जिधर भी  देखते हैं बस  ज़िल्लत  के  ही  सामाँ हैं
अब तो  इन  हालात  के हाथों  सारा  जादू   बिखर   गया

क्या दोगे 'कुन्दन' को तवज्जो, क्यूँ तुम उसका मान रखो
बेेमक़सद  कुछ  वक़्त  गुज़ारा,  ख़ामोशी  से  गुज़र  गया
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संपर्क:-
संजय कुमार कुंदन
मो०-  9835660910

रविवार, 21 अगस्त 2016

शंभु पी. सिंह की जनता दरबार पर शहंशाह आलम की टिप्पणी

शंभु पी. उस कैफ़ियत के कथाकार हैं, जिस कैफ़ियत में कोई जब तक अपने भीतर हाहाकार मचा रहे विचारों को बाहर नहीं निकाल लेता, लिखकर क़लमबंद नहीं कर लेता, उसे सुकून हासिल नहीं होता। इसीलिए शंभु पी. सिंह ऊर्जा संपन्न कथाकारों की फ़ेहरिस्त में रखे जाते हैं। यह ऊर्जा संपन्नता इनकी कहानियों में साफ़-साफ़ दिखाई भी देती है। शंभु पी. सिंह दीर्घकालिक समय तक कथा-समय में बने रहने वाले कथाकर हैं। कथाकार शंभु पी. सिंह के पास कहानी कहने का अपना ढंग है, अपनी शैली है, अपना रंग है। शंभु पी. सिंह की जो ख़ासियत मुझे प्रभावित करती है, वह यह कि ये शांत रहकर कथारत रहते हैं और कई असाधारण कहानियाँ हमें सौंपते हैं। इनकी कहानियों में ख़ुद इन्हीं का समय बोलता-बतियाता है और इनके पात्रों का समय रेखांकित करता है। यही वजह है कि डा. खगेंद्र ठाकुर जैसे महत्वपूर्ण आलोचक इनकी कहानियों को 'पैने यथार्थ-बोध की कहानियाँ' कहते हैं और 'नई धारा' के संपादक डा. शिवनारायण ने इन्हें 'अपने पाठकों में प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देता है', का कथाकार कहते हैं। शंभु पी. सिंह जिस सहजता, विनम्रता, व्यावहारिकता के पैरोकार हैं, यह सबकुछ पूरी कुशलता से अपनी कहानियों में दर्ज भी करते जाते हैं।
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आदमी के युगपत से मुठभेड़ करातीं शंभु पी. सिंह की कहानियाँ
● शहंशाह आलम

यह स्पष्ट है कि आदमी का वर्तमानकाल जितना जटिल है, उतना ही संदिग्ध भी है। आदमी का आज इन्हीं अटकलों में बीत जा रहा है कि कल का दिन नितान्त अभाव से भरा था लेकिन आज का दिन ज़रूर ख़ुशियों भरा गुज़रेगा। इसे आदमी की ऐतिहासिक परंपरा कही जा सकती है कि हर आदमी कुछ ऐसा ही सोच-सोचकर अपना जीवन जीए चला जाता है। कथाकार शंभु पी. सिंह की कहानियों का संग्रह 'जनता दरबार' की कहानियाँ पढ़ते हुए मैं आदमी की इसी सच्चाई से गुज़रा। ये कहानियाँ पढ़कर पाठक को अपना मौन तोड़ना पड़ता है। ये आदमी के चमत्कारात्मक जीवन की कहानियाँ न होकर आदमी के अद्भुत जीवंत जीवन की कहानियाँ हैं। इसलिए कि यहाँ मैं जिस आदमी के बारे में बार-बार बके जा रहा हूँ, वह आदमी कोई धन्ना सेठ नहीं है जो अपना चमत्कारों से भरा ख़ुशरंग जीवन जीते हुए बाक़ी बचे हुए आदमी को संदेहास्पद दृष्टि से देखता है। हालाँकि इन कहानियों का अंतर्कथन लिखते हुए प्रसिद्ध आलोचक डा. खगेंद्र ठाकुर मानते हैं कि संग्रह की अधिकतर कहानियाँ पति-पत्नी-प्रेम, स्त्री-पुरुष-संबंध या यौन-आकर्षण से संबंधित हैं। यहाँ मेरा प्रश्न इतना-सा खड़ा होता है कि क्या जो यौन-आकर्षण से संबंधित कहानियाँ होती हैं, उन कहानियों के पात्रों का जीवन-संघर्ष अथवा जीवन-यथार्थ नहीं होता? अब संग्रह की पहली ही कहानी 'एक्सीडेंट' को लीजिए। इस कहानी में कथाकार शंभु पी. सिंह ने एक्सीडेंट के बाद की त्रासद स्थिति का सफल चित्रण किया है। यह कहानी एक्सीडेंट की घटना तक आकर रुक नहीं जाती है बल्कि अपने देश में आम हो चुके सांप्रदायिक दंगे का मार्मिक चित्रण भी करती है। इसलिए यह कहानी किसी यथार्थवादी कहानी की तरह ग्रहणीय है : 'मैं आपका ऋण न चुका सकूँगी, शायद कभी नहीं।' वह दोनों हाथ जोड़ रूआंसी होकर बोली। तब तक रीतेश कमरे से बाहर हो चुका था। बड़ी तेज़ी से हम दोनों सड़क तक आए। बिना कुछ बोले बहुत दूर तक चलते रहे। हम किसी होटल की तलाश में थे। तभी रीतेश बोल उठा, 'यार, एक बात बताओ, इस देश में क्या सिर्फ़ हिन्दू और मुसलमान ही रहेंगे, तो फिर इंसान कहाँ रहेगा?' ( 'एक्सीडेंट', पृ. 20)। इस कहानी का परीक्षण यह सिद्ध करता है कि आज समाज को इंसानियत की कितनी ज़रूरत है। यहाँ कथाकार का उदय एक महामानव के रूप में होता दिखाई देता है। शायद इसलिए कि कथाकार का महामानव हमारे भीतर के अतिविशिष्ट मानवीय लक्षण को अपनी इस कथा के बहाने बचाए रखना चाहता है।
शंभु पी. सिंह

     यह आवश्यक है कि हर कथाकार की कथा-रचना को व्यापक दृष्टि से देखा-परखा जाए। शंभु पी. सिंह की सारी कहानियाँ अपने परीक्षण के लिए इसी व्यापक दृष्टि की माँग अपने पाठ के समय करती हैं। इसलिए कि शंभु पी. सिंह ने मनुष्य के जीवन को बेहद क़रीब से देखा-परखा है। मनुष्य-जीवन को देखने-परखने का इनका अपना तरीक़ा है। अब इनकी कहानी 'मर्द' को ही लीजिए। यह झालो दाय की जीवन-कथा है। यह कहानी उस झालो दाय की है, जिसका चीर-हरण ख़ुद उसके चचेरे भाई ने किया है। फिर जिसे झालो के दूर के चाचा, जिसे वह रघु चाचा कहती थी, उस चाचा ने भी झालो का चीर-हरण किया। यह कहानी मर्दजाति की स्त्रीजाति के साथ सदियों से चली आ रही चीर-हरण-परंपरा की कहानी है और झालो बेचारी इस अनूठी परंपरा की साक्षी। यही सच है कि पुरुष का मन किसी स्त्री को लेकर आज भी 'शुद्ध' नहीं हुआ है। पुरुष द्वारा अपने 'शुद्ध मन' की घोषणा बार-बार की जाती रही है ताकि एक स्त्री पुरुष की इस घोषणा से बार-बार छली जाती रहे : पिछली बार तक तो हम तीनों भाई-बहन कमरे में ही सोते थे और मामा-मामी बरामदे पर पड़े दो खाट पर। इस बार थोड़ा परिवर्तन दिखा। मामी ने बरामदे के एक खाट मेरा बिछावन लगा दिया और दूसरा शायद अपने लिए। लेकिन मेरे से बातें करते-करते भाई भी अपनी माँ की खाट पर सो गया। अपने बेटे का प्रतिरोध करना मामी के बस में नहीं था। मामा-मामी घर के अन्दर सोने चले गए। देर तक हम दोनों बचपन के संगी-साथियों की चर्चा करते रहे। नींद ने कब अपना साम्राज्य फैला दिया, पता ही नहीं चला। अचानक मैं एक भारी वज़न से अपने-आपको दबा पाई। आँखें खुलीं, जब तक कुछ बोल पाती, दरिंदे के पंजे ने मुझे इस क़दर जकड़ रखा था कि मैं छटपटाती रह गई, लेकिन न तो एक शब्द मुँह से निकल पाया और न ही मैं उसके पंजे से मुक्त हो पाई ( 'मर्द', पृ. 25-26)। आप इस कहानी को पढ़कर यह महसूस सकते हैं कि झालो जैसी कितनी ही लड़कियाँ दरिंदे रूपी पुरुष के पंजे में घड़ी की टिकटिक के साथ छटपटाती हैं और विडंबना देखिए कि इसका इल्ज़ाम उस पुरुष दरिंदे पर न जाकर सामाजिक पंचायतें झालो जैसी लड़कियों पर ही डाल देती हैं और पुरुष दरिंदा किसी और झालो दाय का शिकार करने निकल पड़ता है, बिना डरे, बिना झिझके, बिना आत्मग्लानि के। लेकिन एक स्त्री जब विरोध पर उतारू हो जाए, आमादा हो जाए, उद्यत हो जाए तो पहलवान-से-पहलवान आदमी भी उस स्त्री के सामने घिघयाने लगता है। इस कहानी में झालो अंतत: यही करती है और पुरुष दरिंदा झालो के आगे अपनी नापाक ज़िंदगी की भीख माँगता दिखाई देता है। संग्रह की एक और कहानी 'बायोलॉजिकल नीड्स' की प्रज्ञा ने अपने से अधिक उम्र के प्रोफ़ेसर अनुपम की देह का इस्तेमाल अपनी देह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए किया। शंभु पी. सिंह का यह कथन, 'कि कथा-कहानियों, सरकारी घोषणाओं, न्यायायिक व्यवस्थाओं में आज तक सिर्फ़ स्त्री-देह के दोहन की बातें ही अनुपम के ज़ेहन में थीं, लेकिन पहली बार वह ख़ुद ही इसका मोहरा बन चुका था। पुरुष तो आख़िर पुरुष है, न तो मर्यादा लाँघते देर लगती है और न ही स्खलित होते ( 'बायोलॉजिकल नीड्स', पृ. 35)।' इस यथार्थ के बावजूद मनुष्य-समाज में झालो दाय की सँख्या अनगिन है और प्रज्ञा जैसी स्त्री की कुछेक। परन्तु शंभु पी. सिंह का यह कमाल है कि इस कुछेक संख्या वाले स्त्री-समूह तक पर अपनी पैनी दृष्टि रखते हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। शंभु पी. सिंह की कहानियों का विशेष महत्व इस अर्थ में भी है कि इनकी कहानियाँ समय के साथ चलती हैं। यह कहानियाँ आत्मतोष के लिए लिखी गई कहानियाँ नहीं हैं। संग्रह की अन्य कहानियों, यथा- 'जनता दरबार', 'कफ़न के बाद', 'खेल-खेल में', 'तृष्णा', 'तोहफ़ा', 'मिस्ड कॉल के इंतज़ार में', 'सिलवट का दूध', 'भूख', 'इजाज़त', 'अगली बार', का यथार्थ उतना ही मारक है, जितना कि हम 'एक्सीडेंट', 'मर्द' और 'बायोलॉजिकल नीड्स' कहानियों में पाते हैं। इन कहानियों में शंभु पी. सिंह एक सजग, एक सच्चे, एक अनुभवी कथाकार के रूप में स्पष्ट प्रकट होते हैं।

     'कफ़न के बाद' शीर्षक कहानी मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'कफ़न' के बाद के परिवेश पर फ़ोकस करती है। शंभु पी. सिंह अपनी इस कहानी के माध्यम से यह बताने की कोशिश करते हैं कि समय ज़रूर बदला है, लोगों का रहन-सहन भी बदला, पर समस्याएँ जस-की-तस वैसी ही बनी हुई हैं। लोगों की ईमानदारी अब भी उतनी ही ख़तरे में पड़ी दिखाई देती है, जितनी मुंशी प्रेमचंद के ज़माने में ईमानदारी ख़तरे में पड़ी हुई थी। यानी बेईमानी एक ऐसी परंपरा है, जो इस पृथ्वी के बचे रहने तक ख़त्म नहीं होने वाली। इसलिए कि बेईमानी व्यवस्थाजनित है और जब व्यवस्था ख़ुद बेईमानी कर-करके अपने को जीवित रखती है, तो इस व्यवस्था का हिस्सा बने राजनेता, अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, व्यवसायी ख़ुद को ईमानदार बनाए रखकर क्या करेंगे और क्यों करेंगे भला? भाई मेरे, ईमानदारी घाटे का सौदा जो है। फिर सारा पाप धोने के लिए बेचारी गंगा अविरल बहती चली आ ही रही है...गंगा में कुछ डुबकियाँ मारो और आपके सारे पाप ग़ायब! इस संग्रह की कहानी 'खेल-खेल में' भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के समय अपने सहिष्णु देश की जो हालत हो जाती है, कथाकार ने उसी सहिष्णुता का वीभत्स चित्रण किया है, एकदम बेबाक होकर। जबकि 'तृष्णा' कहानी का ताना-बाना प्रेम के त्रिकोण पर है। यह संग्रह की लंबी कहानी है। यह उस प्रेम की कहानी है, जिस प्रेम में प्रेम की तृष्णा बाक़ी रह जाती है। 'तोहफ़ा' कहानी भी अधूरे प्रेम की कहानी है। 'मिस्ड कॉल के इंतज़ार में', 'सिलवट का दूध', 'इजाज़त' आदि कहानियाँ पठनीय हैं। 'जनता दरबार' शीर्षक कहानी, जो संग्रह का भी शीर्षक है, वर्तमान व्यवस्था पर गहरे जाकर चोट करती है। पूरा सच यही है कि जो व्यवस्था सर्वहारा के लिए बनती है, वही व्यवस्था सर्वहारा वर्ग को लूटकर, पीटकर और पटककर अपने ज़िंदा होने का आभास कराती रहती है। हमारा आज का परिवेश ऐसा ही है और हम जिस परिवेश को जीते चले जा रहे हैं, इसकी पहचान ऐसी ही है, जिसमें आज की व्यवस्था हमें रोज़ मारती है, रोज़ हमारा अस्तित्व धूमिल करती है, रोज़ हमारी धज्जियाँ उड़ाती है। शंभु पी. सिंह की कहानियों में यही सब चित्रित हुआ है। वह भी बिलकुल किसी आईने की तरह साफ़।

     दरअसल शंभु पी. उस कैफ़ियत के कथाकार हैं, जिस कैफ़ियत में कोई जब तक अपने भीतर हाहाकार मचा रहे विचारों को बाहर नहीं निकाल लेता, लिखकर क़लमबंद नहीं कर लेता, उसे सुकून हासिल नहीं होता। इसीलिए शंभु पी. सिंह ऊर्जा संपन्न कथाकारों की फ़ेहरिस्त में रखे जाते हैं। यह ऊर्जा संपन्नता इनकी कहानियों में साफ़-साफ़ दिखाई भी देती है। शंभु पी. सिंह दीर्घकालिक समय तक कथा-समय में बने रहने वाले कथाकर हैं। कथाकार शंभु पी. सिंह के पास कहानी कहने का अपना ढंग है, अपनी शैली है, अपना रंग है। शंभु पी. सिंह की जो ख़ासियत मुझे प्रभावित करती है, वह यह कि ये शांत रहकर कथारत रहते हैं और कई असाधारण कहानियाँ हमें सौंपते हैं। इनकी कहानियों में ख़ुद इन्हीं का समय बोलता-बतियाता है और इनके पात्रों का समय रेखांकित करता है। यही वजह है कि डा. खगेंद्र ठाकुर जैसे महत्वपूर्ण आलोचक इनकी कहानियों को 'पैने यथार्थ-बोध की कहानियाँ' कहते हैं और 'नई धारा' के संपादक डा. शिवनारायण ने इन्हें 'अपने पाठकों में प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देता है', का कथाकार कहते हैं। शंभु पी. सिंह जिस सहजता, विनम्रता, व्यावहारिकता के पैरोकार हैं, यह सबकुछ पूरी कुशलता से अपनी कहानियों में दर्ज भी करते जाते हैं। और किसी कथाकार में यह सब गुण कथाकार के सर्वगुण-संपन्न होने का द्योतक भी है। उल्लेखनीय है कि शंभु पी. सिंह अपने समय के जिस कठिन दौर को जी रहे हैं, उस कठिन दौर को परदे से बाहर भी ला रहे हैं। शंभु पी. सिंह अपनी कहानियों के माध्यम से जहाँ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध तीखा प्रहार करते हैं, वहीं उनका नायक प्रेम को भी बचाने का प्रयास करता है और इनकी नायिका पुरुष-वर्चस्व का विरोध दर्ज करती हैं। यह सब मिलकर शंभु पी. सिंह को एक नायाब प्रखर कथाकार घोषित करता है, इसमें संदेह नहीं।
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शहंशाह आलम
'जनता दरबार' ( कहानी-संग्रह ) / कथाकार : शंभु पी. सिंह / प्रकाशक : संस्कृति प्रकाशन, प्रथम मंज़िल, मिश्रा कॉम्प्लेक्स, ईशाकचक, नज़दीक भोलानाथ पुल, भागलपुर-812001, बिहार / मोबाइल : 09334166909 / मूल्य : ₹300

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, कमरा सँख्या : 17, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800015 / 09835417537
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