दलित और साहित्य
सुशील कुमार भारद्वाज
साहित्य का एक ऐसा दौर जब दलित रचना के केंद्रबिंदु में आ गया. दलित तो दलित गैर–दलित रचनाकारों ने भी खूब कागज के पन्नों को स्याही से काला किया. लगने लगा जैसे पूरा का पूरा साहित्य ही दलितमय हो गया हो. लोगों को पंख लगने लगे. लोगों की सोच बदलने लगी. एहसास होने लगा कि सदियों से चला आ रहा दमन का भयावह समय समाप्त होने वाला है. दलितों को इज्जत –सम्मान मिलने लगा. उन्हें बड़े बड़े सभा सम्मेलनों में मंचों पर प्रतिष्ठित किया जाने लगा. सवर्णों के इस साथ ने उनका मनोबल बढ़ाया लेकिन दशकों बीत जाने के बाबजूद जब जमीन पर परिवर्तन होकर भी वैसा परिवर्तन नहीं दिखा जिसकी परिकल्पना वे करते थे तब उन्हें एहसास हुआ कि गैर–दलित रचनाकार उन्हें सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं. वे उन पर लिख रहे हैं, उनके दुःख–दर्द को बयां कर रहे हैं लेकिन उनकी खातिर नहीं, बल्कि स्वयं की खातिर. गैर–दलित साहित्य में सहानुभूति के शब्दों को जगह दे रहे हैं. वे दलितों के पक्षधर के रूप में दिखकर वाह-वाही लुट रहे हैं. ब्राह्मणवादी होते हुए भी उदारता का रूप दिखला रहे हैं. मंचों और सभाओं में वे यथोचित इज्जत नहीं दे रहे हैं बल्कि वे अपना व्यापार कर रहे हैं. आयोजन के बहाने मोटी कमाई कर रहे हैं. दलितों के नाम पर सम्मेलन हो रहे हैं, नारे लग रहे हैं, बड़े बड़े वादे हो रहे हैं, आरक्षण के नाम पर खुली बहसें हो रही हैं, हितैषी ही नहीं दलित बन जाने की हद तक का व्यवहार वे कर रहे हैं लेकिन स्थिति में तो बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है. क्या दलित बाज़ार की एक वस्तु बन कर रह गया है? दलित सबसे अधिक बिकने वाला विषय बन गया है? दलित चर्चा और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन कर रह गया है? कहीं यह ब्राह्मणवादियों की सोची –समझी साजिश तो नहीं कि दलित दलित इतना चिल्लाओं कि दलित की वास्तविकता ही संदेह के घेरे में आ जाए. उनके मूल प्रश्नों और समस्याओं को शोर में दबा दो. दलितों को दलित –महादलित आदि छोटे-छोटे इतने टुकड़ों में बाँट दो कि एक दमदार आवाज की उपस्थिति के पहले ही वे आपस में उलझकर –लड़कर दम तोड़ दें.
उनके सवाल उठने लगे कि हमलोगों का नाम दलित क्यों? हमारा साहित्य दलित साहित्य क्यों? ब्राह्मण साहित्य, भूमिहार साहित्य, राजपूत साहित्य, लाला साहित्य, यादव साहित्य आदि जब नहीं लिखा जाता तो हमें क्यों इस परिधि में बांधा गया है? हमें साहित्य में दोयम दर्जे का स्थान क्यों दिया गया है? हमसे ही अमानवीय और तुच्छ कार्य क्यों करवाये जाते हैं? किस साहित्य में हमें इज्जत –प्रतिष्ठा के साथ प्रस्तुत किया गया है? ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बारे में ऐसा क्या बताएं जिससे उनका सिर गर्व के साथ ऊँचा उठ सके? साहित्यिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल और द्विवेदीजी ही क्यों? कोई आंबेडकर को मानने वाला क्यूँ नहीं? उनका काल विभाजन का तरीका हमें उपेक्षित या अपमानित करने वाला क्यों? सिर्फ इसलिए की पढाई –लिखाई और छपाई के साथ-साथ जनसंचार के सारे माध्यमों पर सवर्णों का कब्ज़ा है? जिसके कारण सवर्ण एक विजेता की तरह मनमाफिक इतिहास लिखकर आने वाली पीढ़ियों को पढ़ने के लिए प्रस्तुत करते रहें?
और ऐसे ही सवालों के जबाब ढूंढते ढूंढते उन्होंने तय किया कि दलित पर लिखे कोई भी, क्योंकि किसी को लिखने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन हमारा साहित्य यानि दलितों का साहित्य सिर्फ वही होगा जो सिर्फ दलितों द्वारा लिखा जाएगा. ठीक वैसे ही जैसे, “बच्चे को एक छटांक भर दूध पिलानेवाली माँ, माँ ही रहती है लेकिन पूरी जिंदगी दूध पिलानेवाला ग्वाला, ग्वाला ही होता है.”
आज स्थिति इतनी भयावह हो रही है कि उनके प्रतिकार, इंकार और आक्रामक स्वरूप बदले की भावना से प्रेरित लगती है लेकिन वे इसे अपना हक मानते हैं, न्याय मानते हैं. और सबसे गौरतलब बात है कि ये भाषा किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि लगभग हर दलित रचनाकार की है. वे आगे –पीछे कुछ नहीं बल्कि अपने पांच हज़ार साल के हिसाब की बात करते हैं. उनकी आक्रामक भाषा लोगों को कई बार आतंकित करती है. यह आक्रोश हाल के वर्षों में ही इतना आक्रामक क्यों हुआ? इसका जबाब शायद सबके पास है या किसी के पास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उन्हें कोई शक्ति, अपने नफ़रत को उगलने के लिए प्रेरित जरूर कर रही है. ऐसी विषम परिस्थिति में शांति और सामंजस्य काफी कठिन मालूम होता है जब वे सिर्फ अपनी शर्तों पर बात करने को तैयार होते हैं वर्ना कुछ भी नहीं. अराजकता का एक पूरा माहौल स्पष्ट रूप से दिखने लगता है. लेकिन सोचने वाली बात है कि इस समस्या का समाधान बगैर मिलजुल के बैठकर बात किए बिना संभव है? क्या सिर्फ आवेश में बात करने से समस्या का समाधान होगा? क्या हम हिंसक भाषा अथवा हिंसक व्यवहार से समाज में अमन की आशा कर सकते है? क्या यह टकराव एक विनाश को आमंत्रण नहीं है? शायद यह रास्ता शिक्षितों द्वारा लिया गया सबसे गलत चयन हो. संघर्ष ब्राह्मणवाद से होना चाहिए ब्राह्मणों से नहीं. और संभव है जिस पांच हज़ार साल का हिसाब सामने वाले से माँगा जा रहा है वहां न तो वर्तमान में शोषक है न ही शोषित, फिर निर्दोषों को सजा देने का क्या मतलब? क्या साहित्य का यही उद्देश्य है?
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सुशील कुमार भारद्वाज
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| सुशील कुमार भारद्वाज |
साहित्य का एक ऐसा दौर जब दलित रचना के केंद्रबिंदु में आ गया. दलित तो दलित गैर–दलित रचनाकारों ने भी खूब कागज के पन्नों को स्याही से काला किया. लगने लगा जैसे पूरा का पूरा साहित्य ही दलितमय हो गया हो. लोगों को पंख लगने लगे. लोगों की सोच बदलने लगी. एहसास होने लगा कि सदियों से चला आ रहा दमन का भयावह समय समाप्त होने वाला है. दलितों को इज्जत –सम्मान मिलने लगा. उन्हें बड़े बड़े सभा सम्मेलनों में मंचों पर प्रतिष्ठित किया जाने लगा. सवर्णों के इस साथ ने उनका मनोबल बढ़ाया लेकिन दशकों बीत जाने के बाबजूद जब जमीन पर परिवर्तन होकर भी वैसा परिवर्तन नहीं दिखा जिसकी परिकल्पना वे करते थे तब उन्हें एहसास हुआ कि गैर–दलित रचनाकार उन्हें सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं. वे उन पर लिख रहे हैं, उनके दुःख–दर्द को बयां कर रहे हैं लेकिन उनकी खातिर नहीं, बल्कि स्वयं की खातिर. गैर–दलित साहित्य में सहानुभूति के शब्दों को जगह दे रहे हैं. वे दलितों के पक्षधर के रूप में दिखकर वाह-वाही लुट रहे हैं. ब्राह्मणवादी होते हुए भी उदारता का रूप दिखला रहे हैं. मंचों और सभाओं में वे यथोचित इज्जत नहीं दे रहे हैं बल्कि वे अपना व्यापार कर रहे हैं. आयोजन के बहाने मोटी कमाई कर रहे हैं. दलितों के नाम पर सम्मेलन हो रहे हैं, नारे लग रहे हैं, बड़े बड़े वादे हो रहे हैं, आरक्षण के नाम पर खुली बहसें हो रही हैं, हितैषी ही नहीं दलित बन जाने की हद तक का व्यवहार वे कर रहे हैं लेकिन स्थिति में तो बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है. क्या दलित बाज़ार की एक वस्तु बन कर रह गया है? दलित सबसे अधिक बिकने वाला विषय बन गया है? दलित चर्चा और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बन कर रह गया है? कहीं यह ब्राह्मणवादियों की सोची –समझी साजिश तो नहीं कि दलित दलित इतना चिल्लाओं कि दलित की वास्तविकता ही संदेह के घेरे में आ जाए. उनके मूल प्रश्नों और समस्याओं को शोर में दबा दो. दलितों को दलित –महादलित आदि छोटे-छोटे इतने टुकड़ों में बाँट दो कि एक दमदार आवाज की उपस्थिति के पहले ही वे आपस में उलझकर –लड़कर दम तोड़ दें.
उनके सवाल उठने लगे कि हमलोगों का नाम दलित क्यों? हमारा साहित्य दलित साहित्य क्यों? ब्राह्मण साहित्य, भूमिहार साहित्य, राजपूत साहित्य, लाला साहित्य, यादव साहित्य आदि जब नहीं लिखा जाता तो हमें क्यों इस परिधि में बांधा गया है? हमें साहित्य में दोयम दर्जे का स्थान क्यों दिया गया है? हमसे ही अमानवीय और तुच्छ कार्य क्यों करवाये जाते हैं? किस साहित्य में हमें इज्जत –प्रतिष्ठा के साथ प्रस्तुत किया गया है? ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हम अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बारे में ऐसा क्या बताएं जिससे उनका सिर गर्व के साथ ऊँचा उठ सके? साहित्यिक इतिहासकार आचार्य शुक्ल और द्विवेदीजी ही क्यों? कोई आंबेडकर को मानने वाला क्यूँ नहीं? उनका काल विभाजन का तरीका हमें उपेक्षित या अपमानित करने वाला क्यों? सिर्फ इसलिए की पढाई –लिखाई और छपाई के साथ-साथ जनसंचार के सारे माध्यमों पर सवर्णों का कब्ज़ा है? जिसके कारण सवर्ण एक विजेता की तरह मनमाफिक इतिहास लिखकर आने वाली पीढ़ियों को पढ़ने के लिए प्रस्तुत करते रहें?
और ऐसे ही सवालों के जबाब ढूंढते ढूंढते उन्होंने तय किया कि दलित पर लिखे कोई भी, क्योंकि किसी को लिखने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन हमारा साहित्य यानि दलितों का साहित्य सिर्फ वही होगा जो सिर्फ दलितों द्वारा लिखा जाएगा. ठीक वैसे ही जैसे, “बच्चे को एक छटांक भर दूध पिलानेवाली माँ, माँ ही रहती है लेकिन पूरी जिंदगी दूध पिलानेवाला ग्वाला, ग्वाला ही होता है.”
आज स्थिति इतनी भयावह हो रही है कि उनके प्रतिकार, इंकार और आक्रामक स्वरूप बदले की भावना से प्रेरित लगती है लेकिन वे इसे अपना हक मानते हैं, न्याय मानते हैं. और सबसे गौरतलब बात है कि ये भाषा किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं बल्कि लगभग हर दलित रचनाकार की है. वे आगे –पीछे कुछ नहीं बल्कि अपने पांच हज़ार साल के हिसाब की बात करते हैं. उनकी आक्रामक भाषा लोगों को कई बार आतंकित करती है. यह आक्रोश हाल के वर्षों में ही इतना आक्रामक क्यों हुआ? इसका जबाब शायद सबके पास है या किसी के पास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उन्हें कोई शक्ति, अपने नफ़रत को उगलने के लिए प्रेरित जरूर कर रही है. ऐसी विषम परिस्थिति में शांति और सामंजस्य काफी कठिन मालूम होता है जब वे सिर्फ अपनी शर्तों पर बात करने को तैयार होते हैं वर्ना कुछ भी नहीं. अराजकता का एक पूरा माहौल स्पष्ट रूप से दिखने लगता है. लेकिन सोचने वाली बात है कि इस समस्या का समाधान बगैर मिलजुल के बैठकर बात किए बिना संभव है? क्या सिर्फ आवेश में बात करने से समस्या का समाधान होगा? क्या हम हिंसक भाषा अथवा हिंसक व्यवहार से समाज में अमन की आशा कर सकते है? क्या यह टकराव एक विनाश को आमंत्रण नहीं है? शायद यह रास्ता शिक्षितों द्वारा लिया गया सबसे गलत चयन हो. संघर्ष ब्राह्मणवाद से होना चाहिए ब्राह्मणों से नहीं. और संभव है जिस पांच हज़ार साल का हिसाब सामने वाले से माँगा जा रहा है वहां न तो वर्तमान में शोषक है न ही शोषित, फिर निर्दोषों को सजा देने का क्या मतलब? क्या साहित्य का यही उद्देश्य है?
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