मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

आज के दौर में रावण वध

दशहरा के अंतिम बेला में अब रावण-वध होगा। अजी, रावण का वध क्या होगा? उसे तो जलाया जाएगा और लोग खुश होंगें कि रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले में लगे पटाखों की गूँज दूर तक जाएगी और एक अलग माहौल बनेगा।




ये सिर्फ पटना में होता है ऐसी बात नहीं है। अब तो ये छोटे -छोटे गाँवों में भी आयोजित होने लगा है, शहरों और महानगरों की कौन पूछता है?

सबसे अजीब लगता है कि पर्यावरण को काफी नुकसान पहुँचा करके भी लोग आह्लादित होते हैं। लोग भीड़ में नुकसान सहकर भी मजा लेंतें हैं। और तो और, रावण के रूप में रूपये को जलाकर खुश हो लेते हैं और असली रावण को समाज में जब-तब देखकर घिघी बँध जाती है। जबकि लोगों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए। आत्मबल और आत्मविश्वास को बढ़ाना चाहिए। अपने अंदर और आसपड़ोस में घर जमाये बुराई को फौरन बाहर निकाल देना चाहिए। समाज में मिलने वाले रावण का प्रतिकार और वहिष्कार करना चाहिए।

लेकिन अफसोस कि इस पूँजीवादी युग में हर चीज का सीधा संबंध पूँजी और किसी के पेट से जुड़े रोजी-रोटी से होता है। अच्छा है बुरा है- सोचने की जरूरत ही नहीं है। जबकि पूजा-पाठ पूर्णतः आस्था की बात है। इसे फालतू के बाह्याडंबर से दूर रखना चाहिए नहीं तो आनेवाली पीढ़ी जरूर खुद को इससे दूर करने लगेगी। वैसे भी नये जमाने के लोग पर्व-त्योहार को इवेंट के रूप में सेलिब्रेट करने लगे हैं आस्था की बजाय।

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सुशील कुमार भारद्वाज

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

पटना बाढ़ डायरी : सरकार मस्त जनता पस्त

आज फिर शनिवार आ गया। वह दिन भी शनिवार ही था जब पहली बार बीच शहर में पानी जमा था। नहीं पटना शहर का कुछ हिस्सा एक दिन की बारिश में  ही डूब गया था।




साजिश थी या नहीं ये तो कोई नहीं बता सकता क्योंकि बहत्तर घंटा पहले भारी बारिश की संभावना व्यक्त की गई थी और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। नाले की सफाई आदि की बात बहुत घिसीपिटी है। सरकार की नाकामी की बात करना, किसी निर्लज्ज को महत्त्वपूर्ण बनाना है।

महत्त्वपूर्ण महज इतना है कि नुकसान हुआ जनता का और मालामाल हुई सरकार। जो कष्ट जलकैदी बन लोगों ने भोगे उसके बदले में कोई राहत तो संभव ही नहीं। जिन सामानों का नुकसान हुआ उसका मुआवजा सरकार तो देगी नहीं। लेकिन भिखमंगे की तरह राहत कोष में दान के नाम पर पोस्टर-बैनर पहले जारी कर दिये सरकार ने। साथ-ही-साथ केंद्र सरकार से भी माँगने पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि झोली में कुछ न कुछ आनी ही है।

और सबसे बड़ी बात की राहत कार्य आदि का लेखा-जोखा रखने का रिवाज ही नहीं है। जो है सो घर भरने से ही मतलब है। एक बार लेखा-जोखा भी हुआ तो पटना के डीएम बेचारे गौतम गोस्वामी जी असमय ही जेल में रहते हुए ही दूसरी दुनिया को कूच कर गये।

खैर, अंतिम बात यही कि अमूमन सरकार बाढ़-सुखाड़ का इंतजार ही करती है ताकि घर में हरियाली और चमक-धमक बनी रहे।

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सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

बाढ़ रूपी जल समस्या से पीड़ित पटना

क्या यह मान लिया जाय कि #नीतीश_कुमार का अंत आ गया है? प्रकृति ही उनके अहम को तोड़ेगी उनकी नाकामियों की बदौलत? यह आश्चर्य नहीं कि शुक्रवार की रात शुरू हुई समस्या अभी भी बदस्तूर जारी है। दो दिन से बारिश भी बंद है लेकिन सोमवार की रात बीतने को है और पानी जस की तस है। जलकैदी बने लोग कालापानी को याद कर रहे हैं। वे परिकल्पना कर रहे हैं कि कालापानी की सजा भी कुछ ऐसी ही होती होगी। कोई मदद नहीं। खुद के बूते जिओ जब तक कर सकते हो संघर्ष। बिजली, पानी और भोजन के अभाव में आप जिंदगी की परिकल्पना मात्र कर सकते हैं। सरकारी व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार है वह सरेआम इस मुसीबत में भी है। जो रक्षक हैं वे भी चंद रूपयों की खातिर अपनी मानवता बेच चुके हैं। शायद गलती उनकी नहीं, उनकी मानसिकता की है जो धीरे धीरे कई वर्ष में उन्हें पत्थरदिल स्वार्थी बना गया है। जिंदगी मशीन की तरह हो गई है तो फिर मानवता और इंसानियत की बात भी तो बेईमानी ही लगती है। जैसे डॉक्टर आपकी मजबूरियों को समझने की बजाय आपके शरीर से धीरे धीरे खून निकालते रहता है, वैसा ही तो आज पूरा समाज हो गया है।



ज्यों ज्यों दिन बीतते जा रहा है लोगों के मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सहायता तो दूर सहानुभूति के भी शब्द कहीं से सुनाई नहीं पड़ रहा है। न मुख्यमंत्री न कोई और मंत्री कुछ भी स्पष्ट रूप में बोलने की स्थिति में है। सबको काठ मार गया है। शुक्र है कि अभी चंद सीटों के लिए ही उपचुनाव होना है फिलवक्त। लेकिन इसी समय अगली वर्ष नेता जनता के सामने वोटों की भीख माँग रहे होंगें।
हालांकि सच्चाई तो आनेवाला समय बताएगा कि लोग जाति-धर्म से उठकर कुछ विचार कर पाते हैं या अपनी दकियानूसी विचारों में खोकर ही अपने दर्द को दबा लेंगें? विकल्प है कि नहीं? यह विचार का विषय नहीं है क्योंकि इसी कमजोरी का फायदा सामनेवाला उठाता है। आज जिसे आप विकल्प मानते हैं, वर्षों पहले भी तो वह नहीं था। बदलाव या परिवर्तन ही समाज और देश को जागरूक करता है। लेकिन देखना यह भी होगा कि जनता अपने लिए क्या तय करती है और किससे वह संतुष्ट है? हमारे और आपके विचारों से उन्हें कोई लेना देना नहीं है।
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सुशील कुमार भारद्वाज