दुर्गापूजा का आज हो गया है आगाज। लेकिन एक दिन पहले से ही है #पटना पानी में बेहाल। लक्षण देखकर तो मान लिया था कि इस बार दुर्गा पूजा में घूमना होगा थोड़ा मुश्किल, लेकिन ये ना सोचा था कि लोग शाम में आरती दिखाने के लिए भी जाएंगे तरस? कहाँ ढ़ूढ़ेंगें वे उन आस्था की मूर्तियों को आसपास में? गर जो याद भी आई पत्थर की मूर्तियों से सजे मंदिर की, तो कौन जाएगा इतनी दूर डूब कर छाती भर पानी में? भक्ति दिखाने के लिए मन चंगा तो कठौती में गंगा भी काफी है।
लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज
लेकिन बात यहीं रूकती तो नहीं! दो दिन बाद लोग क्या खाएंगे-पीएंगे? सब्जी और फल यूँ ही दुर्गापूजा के नाम पर महँगा होता, अब तो सोचना ही नहीं है। सोचता हूँ तो बस इतना कि जिस शहर को स्मार्ट बनाने के लिए अरबों रूपये उड़ाये गये वो एक दिन की बारिश को भी थाम न सका। और चुप्पी लादे बैठे हैं सारे आला-अधिकारी। जो कोई चूँ चाँ कर रहे हैं तो सिर्फ अगली लूटपाट की तरकीबों की तलाश में।
शर्म मगर आती नहीं उन बेहूदा मंत्रियों और अय्याश अधिकारियों को। वे फिर सक्रिय नजर आएंगे उपचुनाव वाले क्षेत्र में। फिलवक्त तो विधायक और नेता खुद लगे हैं अपनी जान बचाने को। नंगे को कोई कितना नंगा करेगा? इसीलिए चुप्पी में कोई पूछ भी नहीं रहा कि गंगा खतरे के निशान से कितना ऊपर है? कोई नहीं जानना चाह रहा कि बीच गंगा के पेट में खड़े आलीशान भवनों के नाले से शहर को कोई खतरा तो नहीं। पूछ कर ही क्या करना है जब वे बारिश की ही पानी में डूब रहे हैं। जनता की तो यही नियति है लेकिन राजा भी डूबा है सत्ता के नशे में। बोलता है यूँ जैसे कि वही ईश्वर हो। लेकिन बेशर्म राजा को गाली देना भी तो खुद की ही तौहीन है।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज












