शनिवार, 30 दिसंबर 2017

लोहियाजी का हिन्दी का सपना अधूरा ही रह गया -सुशील कुमार भारद्वाज

लोहियाजी का हिन्दी का सपना अधूरा ही रह गया
-सुशील कुमार भारद्वाज

भारत के स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर चिन्तक एवं समाजवादी राजनेता डॉ राम मनोहर लोहिया बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे जब से इन्होंनें होश संभाला तब से ही देश और समाज के लिए समर्पित हो गए. बचपन में ही माँ(चन्दा देवी) का हाथ हमेशा के लिए छूटने के बाद वे अपने पिता हीरालाल के साथ गांधीजी से मिलने जाने लगे। और गांधीजी के विराट व्यक्तित्व ने इन्हें काफी प्रभावित भी किया। लेकिन गांधीजी, नेहरूजी आदि से मिलने-जुलने और विचार–विमर्श के बाबजूद इन्होंने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप खुद के लिए अपना एक नया रास्ता बनाया। कांग्रेस में विदेश प्रभाग को देखते हुए इन्होंने बहुत सारे विदेशी घटनाओं को करीब से देखा और उस पर विचार-मंथन किया। अपने समृद्ध अनुभव की ही वजह से लोहियाजी एक ही समय में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाजवाद की परिकल्पना करने में सफल रहे। एक तरफ वे भारत-चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, सिक्किम आदि के बीच अंतर्राष्ट्रीय विवाद एवं समस्या सुलझाने तथा भाईचारा कायम करने की दिशा में पहल करते हुए हिमालय नीति की प्रस्तावना करते थे तो दूसरी तरफ भारतीय समाज की मूल समस्याओं, वर्ण-व्यवस्था, भुखमरी, विषमता, गैरबराबरी, सांस्कृतिक दरिद्रता, गुलामी, सामंती उत्पीड़न पर विचार करते थे। और दाम बांधों, जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, नर-नारी समानता, चौखंभा राज, खेतिहर मजदूरों, किसानों, कारीगरों के लिए वैचारिक सांस्कृतिक आंदोलन आदि भी चलाते थे।
लोहियाजी 'भारतीय समाजवाद' की परिकल्पना में अंग्रेजी भाषा को बाधा मानते थे। इन्होंनें तो लोकसभा में भी कहा कि-
“अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोकराज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिए, उसकी जगह कौन-सी भाषा आती है, यह प्रश्न नहीं है। इस वक्त खाली यह सवाल है, अंग्रजी खत्म हो और उसकी जगह देश की दूसरी भाषाएं आएं। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटनी ही चाहिए और वह भी जल्दी। अंग्रेज गए तो अंग्रेजी भी  चली जानी चाहिए” ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत जैसे विशाल एवं बहुभाषी देश में शासन और राजकाज के लिए सरकार ने अंग्रेजी के पक्ष में बहुत सारी दलीलें दीं लेकिन डॉ लोहिया ने सारी दलीलों से अपनी असहमति जताते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंग्रेजी शोषण, गुलामी और भ्रष्टाचार की भाषा है। गरीब किसान और मजदूर न तो अंग्रेजी समझ पाएंगें न ही वे कचहरी में न्याय मांगनें में सफल हो पाएंगें और न ही वे अंग्रेजी में लिखे संविधान को आसानी से समझ पाएंगें। अंग्रेजी अन्याय की भाषा है।

हालांकि 1950 ई० में जब भारतीय संविधान लागू हुआ था तो यह प्रावधान किया गया कि 1965 ई० तक सुविधानुसार अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन उसके बाद हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों एवं सरकारी नौकरशाहों की व्यवस्था पर विचार करने के बाद लोहियाजी ने 1957 ई० में अंग्रेजी हटाओ मुहिम को सक्रिय आंदोलन में परिणत कर दिया। लेकिन अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का सर्वाधिक विरोध दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु में हुआ हिंसक घटनाएं होनें लगीबाबजूद इसके वे हैदराबाद और मद्रास में सभाएं करते रहे 1961ई० में मद्रास में उनकी सभा पर पत्थर भी बरसाए गए 1962-63 में जनसंघ भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गया। कुछ छात्रों के आत्महत्या करने आदि की घटनाओं के बाद उन्होंने आंदोलन को रोक दिया
लोहियाजी 28जून 1962 को नैनीताल में कहते हैं- “अगर सन्‌ 1947 या 48 में ही सरकार ने अंग्रेजी को हटा दिया होतातो तटीय प्रदेश खुशी से उस नीति को मान लिए होते या कम से कम उनके विरुद्ध नहीं लड़ते। मैं यह साफ कर दूँ कि यह समस्या उत्तर और दक्षिण के बीच की नहीं हैबल्कि तटीय प्रदेशों और मध्य के प्रदेशों के बीच की है। अपनी नीतियों के कारण भारत सरकार ने एक ऐसी स्थिति बना दी है कि जिसमें तटीय और मध्य के प्रदेशों के बीच गड़बड़ हो सकती है। अब इसके सिवाय और कोई इलाज नहीं बचा है कि दिल्ली का काम दो विभागों में बाँट दिया जाए- एक अंग्रेजी का विभागताकि जो तटीय प्रदेश उसमें रहना चाहें तो वे उसमें जाएँऔर दूसराहिन्दुस्तानी का विभागजिसमें मध्य के प्रदेश रहें। इस तरह की नीति पर चलने से मध्य के प्रदेशऔर शायद गुजरात और महाराष्ट्र भीअपने ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा में तेजी से उन्नति कर लेंगे और योजना और उद्योगीकरण में कहीं ज्यादा प्रगति करेंगे। मुझे आशा हैबाद मेंशायद वर्ष के अंदरइससे तटीय प्रदेशों का भी मन ललचाएगा कि वे भी हिन्दुस्तानी विभाग में आ जाएं और इस तरह समूचे देश के पैमाने पर वे अंग्रेजी का माध्यम खत्म करने का इरादा कर लें। श्री नेहरू की नीतियों के कारण तो हरेक आदमी को यकीन है कि तटीय क्षेत्रों और मध्य क्षेत्रों के बीच झगड़ा होकर रहेगा”
वहीं 'हिंदी के सरलीकरण की नीति (1962), भाषा (1966), हिन्दी बनाम अंग्रेजी, 'जाति, भाषा और दाम नीति', सामंती भाषा में लोकराज असंभव' आदि दर्जनों लेखों में लोहियाजी ने साबित करने की कोशिश की है कि अंग्रेजी के पक्ष में दिए गए सारे तर्क कमजोर एवं निराधार हैं। लोहिया ने तात्कालिक आंकड़े पेश करते हुए साबित किया कि ढाई अरब दुनिया में सिर्फ तीस करोड़ लोग अंग्रेजी जानते हैंतब फिर अंग्रेजी का ही इस्तेमाल क्योंअन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का क्यों नहींकेवल शासकों की भाषा ही क्योंउन्होंने यह भी तर्क दिया कि जर्मनी, जापान, सोवियत रूस, दर्शन, विज्ञान, गणित, तकनीक, उद्योग धंधों आदि में विकसित हैं तो अपनी मातृभाषा के कारण न कि अंग्रेजी के कारण। जहाँ तक अन्य भारतीय भाषाओं में अराजकता का सवाल है तो यह बिल्कुल ही बकवास बात है क्योंकि हिंदी ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में लोगों को जोड़ने का काम किया है। वे उदाहरण के तौर पर समझाते हुए कहते हैं कि सन्‌ 1919-20 के आस-पास राष्ट्रीय आंदोलन इसलिए तीव्र हुआ क्योंकि गाँधीजी का आगमन हुआ और उन्होंने भारतीय भाषाओं में आंदोलन को साकार रूप दिया।
साथ ही वे हिन्दी का अन्य भारतीय भाषाओं से किसी बैर की बजाय इसे आपस में एक-दूसरे की पूरक भाषा मानते हैं। लोहिया हिंदी की जगह किसी भी तटीय प्रदेश की मातृभाषा को राजकाज की भाषा के रूप में स्वीकारने को तैयार थे लेकिन हिंदी की जगह अंग्रेजी के वर्चस्ववादी-साम्राज्यवादी रूप को स्वीकारने के पक्ष में नहीं थे। लोहिया मैक्समूलर का हवाला देते हुए कहते हैं कि उसने वेदों के अध्ययन के लिए संस्कृत सीखी लेकिन लिखा अपनी मातृभाषा जर्मन में। उसे मातृभाषा में चिंतन-मनन करने व लिखने के कारण ख्याति मिली।
लोहिया इस आरोप को भी सिरे से खारिज करते हैं कि अंग्रेजी हटते ही जनेऊधारी, चोटीधारी, दकियानूसी दाढ़ी वाले हावी हो जाएँगे। वे इस कथन के सख्त खिलाफ थे कि अपनी भाषाएँ प्रतिक्रियावादी हैं और विदेशी भाषा प्रगति की प्रतीक हैं। लोहिया सामंतवाद के चार आधार मानते हैं- सामंती भाषा, सामंती-भूषा, सामंती-भोजन और सामंती-भवन। उनकी दृष्टि में अंग्रेजी का इस्तेमाल सामंती जीवन का सबसे बड़ा खंभा है। भाषा का संबंध सत्ता एवं राज्य के साथ केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक-आर्थिक मसले से भी जुड़ा होता है। लोहिया की अंतर्दृष्टि ने मातृभाषा की शक्ति को पहचान लिया था।
इन सब के बाबजूद 1965 ई० की समयसीमा को देखते हुए दक्षिण भारत में अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके पार्टी ने “हिन्दी हटाओ” अभियान को और आक्रामक रूप दे दिया जिसकी वजह से केंद्र सरकार को 1963 ई० में संसद में राजभाषा कानून पारित करना पड़ा जिसके अनुसार 1965 के बाद भी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग राजकाज में जारी रहेगा और वह आज तक जारी है
राममनोहर लोहिया के लिए भाषा की समस्या जातिवर्णगरीबीविषमता और गुलामी से कम महत्वपूर्ण नहीं थी। इसलिए उन्होंने भारत की भाषा नीति पर गंभीरता से विचार किया है। आजाद भारत की भाषा नीति कैसी हो?  इसके लिए सबसे व्यवस्थितमौलिक एवं विचारोत्तेजक स्थापना लोहिया ने दी। हालांकि इसके लिए वे गाँधीजी की भाषा नीति के भी ऋणी हैं। गाँधी जी ने ही भारतवासियों को यह शिक्षा दी कि देश की समृद्धिउन्नति एवं विकास मातृभाषा में चिंतन-मनन एवं कार्य करने से संभव है। साथ ही गाँधीजी यह भी कहते थे कि मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियाँ बंद कर दी जाएँ। मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में चारों ओर से अधिक से अधिक स्वतंत्रता के साथ बहती रहे। मगर मैं किसी के झोंके में उड़ नहीं जाऊँ"।
     

लेकिन यह भी अजीब संयोग है कि डॉ लोहिया का सपना उनके असमय मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गया और आज भी हिन्दी वहीं है जहां वर्षों पहले थी और अंग्रेजी आज भी उसी स्वरूप में है जिसके लिए डॉ लोहिया ने चेताया था

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब
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आज जब राजेंद्र नगर से लौटते हुए पटना जंक्शन से गुजर रहा था तो थोड़ा अजीब लग रहा था। भीड़ थोड़ी कम लग रही थी। शायद मौसम का असर रहा हो। फिर लगा कि शायद अतिक्रमण हटाया गया हो क्योंकि आज मीठापुर और चिड़ीयांटांड फ्लाईओवर को जोड़नेवाले नए पुल का भी उद्घाटन है। तीसरी बात कि ऑटो वाले को भी वहां से हटाकर बगल वाले मल्टिपार्किंग कम्पलेक्स में शिफ्ट कर दिया गया है।
इन सभी कारणों को सोच ही रहा था कि जंक्शन के ठीक सामने आते ही गोलम्बर में चमकते बुद्ध की मूर्ति पर नजर पड़ी। कभी इस गोलम्बर में एकलौते नेहरूजी की प्रतिमा चमकती नजर आती थी। लेकिन आज उनकी स्थिति देखकर थोड़ा दुख हुआ। बेचारे धूल-गंदगी में नहाए हुए थे जबकि बुद्ध यूँ चमकते हुए मुस्कुरा रहे थे कि लगा उन्हें अभी-अभी ही ग्यान की प्राप्ति हुई हो।खैर, महावीर मंदिर के ठीक सामने पुल पर ही मंच सज कर तैयार था। आगे बढ़ा तो जीपीओ गोलम्बर के पास आते ही लोहिया जी की याद आई। गोलम्बर तो ज्यों का त्यों ही है बस बेचारे लोहिया जी की मूर्ति वहां नहीं थी। कुछ वर्ष पहले ही वहां से हटा दिया गया था। हटाने की वजह क्या थी?- ये बात तो राजनेता ही बेहतर जानें! हम तो बस इतना ही जानते हैं कि एक छोड़ पर नेहरूजी मार्ग दिखा रहे थे तो आर ब्लॉक में चौराहा पर बाबू वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर तलवार लहराते नजर आते थे तो बीच में लोहिया जी ही गरीबों -मजदूरों को पनाह देते थें। वहीं लोग सब्जी, पान, आदि की दुकान सजाए नजर आते थे।
जब आर ब्लॉक पहुंचा तो देखा कि बाबू वीर कुवंर सिंह भी धूल-गर्द में सने हुए थे। फ्लाईओवर बनाने में लगे मजदूर उनकी मूर्ति के चारों ओर इतने गड्ढे बना दिए हैं कि कभी-कभी डर लगने लगता है कि बेचारे का घोड़ा न कहीं लुढ़क जाए।
खैर, पटना बदल रहा है। पटना की आबोहवा बदल रही है। राजनीति बदल रही है फिर नेहरूजी को थोड़ा गंदगी से एलर्जी की बीमारी थोड़े ही न हो जाएगी! रही बात बाबू वीर कुवंर की तो स्वतंत्रता सेनानियों को अब कौन पूछता है? अब तो ये भी नहीं पता चलता साफ-साफ कि उनकी महत्ता किसी दल के लिए मायने भी रखता है?
★★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

सुरेन्द्र स्निग्ध और विनय कंठ को प्रलेस द्वारा श्रद्धांजलि एवं काव्य-गोष्ठी




गत दिनों पटना में कवि, उपन्यासकार, संपादक एवं अध्यापक प्रो सुरेन्द्र स्निग्ध की गंभीर बीमारी की वजह से असमय मृत्यु हो गई. शोकसंतप्त साहित्यकार, रंगकर्मी एवं अध्यापक समेत सभी संबद्ध लोग विभिन्न बैनर तले देश के विभिन्न हिस्से में अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ की पटना इकाई के तत्वाधान में आज 25 दिसंबर 2017 को लेखराज परिसर, पटेल नगर में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा तथा काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया. समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रभात सरसिज तथा संचालन प्रलेस की सचिव डॉ रानी श्रीवास्तव ने किया. इस अवसर पर जहां रानी श्रीवास्तव ने सुरेन्द्र स्निग्ध की दो कविताओं 'अंतिम एकांत' तथा 'वर्षा' का पाठ किया वहीं वरिष्ठ कवि एवं कथाकार डॉ शिवनारायण ने सुरेन्द्र स्निग्ध के संस्मरण सुनाते हुए उनके प्रारंभिक जीवन से अब तक के संघर्ष एवं उनके व्यक्तित्व पर चर्चा की.



दूसरे सत्र में कवि शिवनारायण, शहंशाह आलम, समीर परिमल, रबिन्द्र के दास, अनिल विभाकर, राजकिशोर राजन, विजय प्रकाश, सुजीत वर्मा, ज्योति स्पर्श, नवनीत कृष्ण, गणेशजी बाग़ी, इति मानवी, राजेश कमल आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया. जबकि सुशील कुमार भारद्वाज ने एक लघुकथा सुनाई.



काव्य-गोष्ठी के बीच ही खबर मिली कि बिहार इप्टा के संरक्षक मंडल के सदस्य व जनपक्षधर शिक्षाविद प्रो विनय कुमार कंठ का भी आज असमय निधन हो गया. जिसके बाद अध्यक्ष से बातचीत के बाद दोनों ही कलाप्रेमी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए एक साथ दो मिनट का मौन रखा गया. सभा का समापन गौरव के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ.


सोमवार, 11 दिसंबर 2017

पटना पुस्तक मेला 2017 का ज्ञान भवन में खुशनुमा अनुभव : सुशील कुमार भारद्वाज

पटना पुस्तक मेला 2017 का ज्ञान भवन में खुशनुमा अनुभव
-सुशील कुमार भारद्वाज



पटना पुस्तक मेला 2017 कई कारणों से इस बार चर्चा में रहा. यह मेला न सिर्फ ऐतिहासिक रूप से पहली बार ज्ञान भवन में आयोजित हुआ बल्कि इसकी सजावट की वजह से इसका कुछ लोगों ने तंज कसते हुए “पटना पुस्तक मॉल” तक का नया नामकरण कर दिया. इसे साहित्य के शिफ्टिंग के रूप में भी देखा गया. कहा गया कि जैसे साहित्य आम जनों से कटकर कुछ खास लोगों तक सिमट गया है ठीक उसी तरीके से मेला को भी शिफ्ट करके हाइजैक किया जा रहा है. यह वातानुकूलित माहौल वालों के लिए ही रह जाएगा. दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाला मेला से तुलना करते हुए कहा गया कि वहां का भी मेला कुछ इसी तरीके का होता है लेकिन है तो वह मैदान ही न? जहां थोड़ा खुलापन भी है. आम जन तो कंक्रीट के इस भव्य भवन को देखकर ही अंदर आने से पहले कई बार सोचेंगें कि जाया जाय या नहीं? लेकिन पटनावासियों ने इन सभी गलत धारणाओं को ध्वस्त करते हुए मेले का तहेदिल से स्वागत किया और मेले में अपनी उपस्थिति से मेले का रौनक बढ़ाया.


सच बात तो ये है कि इस बार का मेला आयोजकों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं था. यह आयोजकों के द्वारा तय किया गया जगह नहीं था बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के आग्रह का सम्मान मात्र था. पटना पुस्तक मेला अपने 32 वर्षों के सफर में गाँधी मैदान से अलग सिर्फ पाटलिपुत्रा के मैदान में ही लगा था जहां का अनुभव भी बहुत ही रोमांचकारी नहीं रहा था. सीआरडी के अध्यक्ष श्री रत्नेश्वर सिंह हमेशा कहते रहे- “हमलोगों के लिए भी यह पहला अनुभव है. हमलोग भी फीडबैक ले रहे हैं और मुख्यमंत्री जी को इससे अवगत कराएंगे. उसके बाद देखा जाएगा कि अगली बार मेले का आयोजन गाँधी मैदान में होगा या कहीं और?”.



लेकिन 24वें पटना पुस्तक मेला 2017 में भी पहले की परम्परा को बरकरार रखते हुए न सिर्फ विभिन्न कला क्षेत्रों में युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए पुरस्कारों की घोषणा की गई बल्कि कविता कार्यशाला का भी आयोजन प्रसिद्ध शायर संजय कुंदन और कवि आलोक धन्वा के नेतृत्व में करवाया गया. एक तरफ ज्वलंत मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक से जागरूकता फ़ैलाने की कोशिश की गई तो हर दिन विभिन्न समसामयिक एवं जरूरी मुद्दों पर चर्चा-परिचर्चा का भी आयोजन किया गया. जिसमें बिहार के स्थानीय साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं विचारकों के अलावे देश के विभिन्न राज्यों से आए लब्धप्रतिष्ठित एवं ख्यातिप्राप्त विद्वतजन भी शरीक हुए. अल्पना मिश्र, प्रेम भारद्वाज, अनंत विजय, उर्मिलेश, केदारनाथ सिंह, लीलाधर मंडलोई, सुधीश पचौरी, शिवमूर्ति, आदि समेत विभिन्न लोग इस मेला के साक्षी बने तो बिहार के पद्मश्री उषाकिरण खान, अरुण कमल, वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर, हृषिकेश सुलभ, कर्मेन्दु शिशिर, अवधेश प्रीत, सत्यनारायण जी, आशा प्रभात, गीताश्री, लन्दन से वर्षों बाद पटना आईं शिखा वार्ष्णेय, संतोष दीक्षित, शिवदयाल, प्रेमकुमार मणि, संजीव चन्दन, भावना शेखर, निवेदिता शकील, नीलिमा सिंह, सुनीता गुप्ता, स्मिता, रामधारी सिंह दिवाकर, विनय कुमार, अरविन्द पासवान, श्रीकांत, व्यासजी, दीवानजी, अनिल विभाकर, अनीस अंकुर, पुष्यमित्र, समेत कई गणमान्य लोग लगभग हर दिन मेला की शोभा बने. आयोजकों ने अपनी परम्परा को बरक़रार रखते हुए मनीषा कुलश्रेष्ठ को पहली बार पटना बुलाया. जो कि इस बार के मेला थीम- “लड़की को सामर्थ्य दो, दुनियां बदल देगी” के भी अनुकूल रहा.




पटना पुस्तक मेला 2017 में यदि लोगों को स्टालों के बीच खाने-पीने की चीजों के लिए तरसना पड़ा. खिली धूप में हरी घास पर बैठकर ठहाके लगाने और मस्ती करने से महरूम रहना पड़ा तो चकमक करती फर्श पर उन्हें कहीं भी धूलकण नहीं मिला. ठंडी–गर्मी के मौसमी एहसास से दूर रहे और सबसे बड़ी बात की शौचालय आदि की आधुनिकता का एहसास कराती सारी सुविधाएं मौजूद थीं. मेला परिसर को साफ़-सुथरा रखने के उद्देश्य से चाट-समोसा आदि का ठेला लगाने वालों को ज्ञान भवन और बापू सभागार के बीच वाले इलाके में जगह दिया गया जिस पर लोगों की निगाह मेले से बाहर निकलते वक्त पड़ती थी. फिर भी काफी लोग गाँधी मैदान के खुलेपन को याद कर रहे थे तो इसे भदेस गंवई और आधुनिकता की सांस्कृतिक लड़ाई मानी जा सकती है. कुछ लोगों का कहना था कि अचानक से आया बदलाव तुरंत रास नहीं आता है. एक-दो साल यहां आयोजन हो जाएगा तो लोग गाँधी मैदान की बात लोग भूल जाएंगें. जबकि कुछ लोगों का स्पष्ट विचार था कि दोनों का अनुभव अपनी –अपनी जगह पर सही है किसी को खराब या बेहतर नहीं कहा जा सकता है.



कुछ प्रकाशकों की शिकायत थी कि किराया जिस हिसाब से आयोजकों ने लिया है उस हिसाब से रैक आदि की सुविधा नहीं दी गई है. जबकि कुछ का कहना था कि प्रवेश शुल्क हटा लिया जाना चाहिए. राजकमल प्रकाशन के अलिंद महेश्वरी कहते हैं- “इन्हें बाहर में भी प्रकाशकों का बोर्ड –बैनर लगाने की सुविधा देनी चाहिए या आयोजक अपने स्तर से ही लगाएं ताकि लोग जान सकें कि कौन-कौन आएं हैं और किस स्टाल पर हैं?” अन्तराष्ट्रीय मेला के आयोजन के संबंध में अलिंद कहते हैं- “इन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर में थोड़ी सुधर करने की जरूरत है. शैक्षणिक संस्थान आदि जैसे स्टालों को यदि अलग फ्लोर पर कर दिया जाए तो कुछ संभव है.” वहीं वाणी प्रकाशन की अदिति महेश्वरी का मानना है कि- “अन्तराष्ट्रीय मेला का आयोजन यहां करवा पाना थोड़ी जल्दबाजी कही जा सकती है. ये हिन्दी बेल्ट है. अंग्रजी के प्रकाशक आने के लिए शायद तैयार आसानी से न हों. एक प्रकाशक की बात अलग कर दी जाए तो अंग्रेजी के कितने प्रकाशक और कितनी किताबें हैं? फिर दूतावास से संपर्क आदि प्रक्रिया बिना सरकारी सहयोग के कितना संभव है?” कुछ प्रकाशक उल्टे सवाल पूछ रहे थे कि- “मेला में बिहार सरकार की सहभागिता का क्या मतलब है जब किराया इतना वसूला ही जा रहा है?”



जबकि दूसरी ओर मेले में प्रवेश शुल्क भी पहले ही की तरह दस रूपया रखा गया जिससे कि लोगों को कोई कठिनाई नहीं हुई. हां, इस बार के मेले में गाँधी मैदान में यूं ही मंडराने वाले लोग कम ही दिखे. अधिकांश साहित्यप्रेमी, लेखक या जरूरतमंद ही थे जबकि कुछ युवा यूं ही सेल्फी का मजा ले रहे थे जिनको आयोजक प्रोत्साहित भी कर रहे थे ताकि वे सोशल मीडिया पर चर्चा में बने रहें. यहां तक की मेले के अंत में बेस्ट सेल्फी वालें को पुरस्कृत करने की भी बातें हो रही थी.


कुछ लोगों की शिकायत थी कि ज्ञानपीठ, सामयिक आदि जैसे प्रकाशक नहीं आ पाए हैं जहां से सस्ती और जरूरी किताबें मिल जाती थी. लेकिन गौरतलब है कि प्रतिश्रुति जैसे कई प्रकाशक भी पटना पुस्तक मेला में पहली बार आएं हैं. हां, इस बार मिथिला, राजस्थान, गोंड, बंगाल, आदि से आने वाले हस्तशिल्प कला आदि के स्टालों का पूर्ण अभाव था लेकिन आध्यात्म, ज्योतिष कला से संबंधित किताबों, पत्थरों आदि के स्टाल जरूर नज़र आए. हिन्दी की ही तरह उर्दू भाषा की कुछ आध्यात्मिक-गैर-आध्यात्मिक स्टाल भी नज़र आए तो अकादमिक एवं बच्चों के लिए भी किताबों और स्टेशनरी की भी स्टालें जमी हुईं थीं. सरकार की ओर से आपातकालीन स्थिति से निपटने और मद्यपान निषेध जागरूकता के लिए भी स्टाल लगाए गए थे तो शैक्षणिक संस्थानों के भी.



इस बार भी गत वर्षों की तरह मेले में पाखी परिचर्चा का आयोजन हुआ हुआ जहां आशा प्रभात और अमीश त्रिपाठी की अनुपस्थिति में उनकी किताबों के बहाने राम और सीता के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर जम कर चर्चा हुई. जहां अमीश की किताब को ख़ारिज करते और आशा प्रभात की किताब का समर्थन करते ही अधिकांश वक्ता नज़र आए. आयाम, जनशब्द आदि के बैनर तले कविता पाठ हुए तो शेरो-शायरी का भी दौर चला. साथ-ही-साथ नए-नए युवा कवि-कवित्रियों ने भी अपने जलवे दिखलाए. मेला में सिर्फ स्त्री-पुरूष को ही मंच नहीं मिला बल्कि किन्नरों ने भी कस्तूरबा मंच पर निवेदिता शकील से बात करते हुए अपनी भावनाएँ व्यक्त की अपने हक की बात की.


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मेला के उद्घाटन सत्र में सरयू राय की समय की लेख और रत्नेश्वर सिंह की रेखना मेरी जान के लोकार्पण समारोह में अपने सात-निश्चय और दहेजबंदी और शराबबंदी आदि जैसे  सामाजिक जागरूकता के बहाने राजनीति करने की शुरुआत की तो पूर्व सांसद अली अनवर की किताब का लोकार्पण करते समय रशीदन बीबी मंच से ही शिवानंद तिवारी और पूर्व मुख्यमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी नीतीश कुमार और भाजपा को अपने निशाने पर लिया. लालूजी के भाषण से पहले उनके एक प्रशंसक ने उसी मंच से “भाजपा भगाओं देश बचाओं” के तान पर एक गीत भी सुनाया.


हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मेले में लगभग हर दिन औसतन चार किताब का लोकार्पण किया गया. गीताश्री का पहला उपन्यास  हसीनाबाद, निवेदिता शकील की कविता संग्रह प्रेम में डर, सुजीत वर्मा का पहला अंग्रेजी उपन्यास ‘वाकिंग ओन द ग्रीन ग्रास, भावना शेखर की कविता संग्रह मौन का महाशंख, कथाकार कमलेश का पहला कहानी संग्रह दक्खिन टोला, प्रत्युष चंद्र मिश्र का कविता संग्रह पुनपुन और  अन्य कविताएं, बाढ़ और सरकार, रानी पद्मावती आदि प्रमुख रहीं. जबकि राजकमल प्रकाशन की ओर से रविवार के दिन एक साथ तीन-तीन किताब का लोकार्पण कस्तूरबा मंच पर लीलाधर मंडलोई, और अरुण कमल आदि की उपस्थिति में किया गया. जिसमें अवधेश प्रीत की बहुप्रतीक्षित छात्र-युवा राजनीति पर केंद्रित पहला उपन्यास ‘अशोक राजपथ’ थी. तो पुष्यमित्र की चम्पारण सत्याग्रह पर केंद्रित चम्पारण 1917 और विकास कुमार झा की किताब गया-बोधगया पर केंद्रित ‘गयासुर संधान’ रही. जहां सभी वक्ताओं ने सभी लेखकों को शुभाशीष देते हुए उनकी रचनाओं की चर्चा की वहीं प्रभात खबर में ही चम्पारण पर लेख लिखने वाले एक वक्ता ने पुष्यमित्र की रचना की मंच से ही टांग खिंचाई करनी शुरू कर दी.

इस तरीके से सामरिक रूप में देखा जाय तो सम्राट अशोक कन्वेंशन केंद्र में आयोजित पटना पुस्तक मेला 2017 सबों के लिए एक सफल अनुभव रहा. मेला के कन्वेनर अमित झा के शब्दों में- “इस बार के मेला से मैं बहुत खुश हूँ.” हिन्दी के ख्याति प्राप्त कवि अरुण कमल कहते हैं- “मेला यहाँ हुआ इसलिए मैं लगभग हर दिन यहां आ पा रहा हूँ और इतने लोकार्पण और चर्चाओं को सुन पा रहा हूँ वर्ना गाँधी मैदान के धूल में यह कहां संभव था?” दोनों शनिवार और रविवार को मेले में पैर रखने की भी जगह नहीं थी लेकिन यह भीड़ ग्राहक भी बनी इसकी सही जानकारी तो सिर्फ और सिर्फ प्रकाशक ही दे सकते हैं. 
सम्पर्क :- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com
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