लोहियाजी का हिन्दी
का सपना अधूरा ही रह गया
-सुशील कुमार
भारद्वाज
भारत के स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर चिन्तक एवं समाजवादी राजनेता डॉ राम मनोहर लोहिया बहुमुखी प्रतिभा के धनी
व्यक्ति थे। जब से इन्होंनें होश संभाला तब से ही देश और समाज के लिए समर्पित
हो गए. बचपन में ही माँ(चन्दा देवी) का हाथ हमेशा के लिए छूटने के बाद वे अपने पिता हीरालाल के साथ गांधीजी से मिलने जाने लगे। और गांधीजी के विराट
व्यक्तित्व ने इन्हें काफी प्रभावित भी किया। लेकिन गांधीजी, नेहरूजी आदि से
मिलने-जुलने और विचार–विमर्श के बाबजूद इन्होंने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप खुद के
लिए अपना एक नया रास्ता बनाया। कांग्रेस में विदेश प्रभाग को देखते हुए इन्होंने
बहुत सारे विदेशी घटनाओं को करीब से देखा और उस पर विचार-मंथन किया। अपने समृद्ध अनुभव की ही वजह से लोहियाजी एक ही
समय में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाजवाद की परिकल्पना करने में
सफल रहे। एक तरफ वे भारत-चीन,
पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, सिक्किम आदि के बीच अंतर्राष्ट्रीय विवाद एवं समस्या सुलझाने तथा
भाईचारा कायम करने की दिशा में पहल करते हुए हिमालय नीति की प्रस्तावना करते थे तो
दूसरी तरफ भारतीय समाज की मूल समस्याओं, वर्ण-व्यवस्था, भुखमरी, विषमता, गैरबराबरी, सांस्कृतिक दरिद्रता, गुलामी, सामंती उत्पीड़न पर विचार करते थे। और दाम बांधों, जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, नर-नारी समानता, चौखंभा राज, खेतिहर मजदूरों, किसानों, कारीगरों के लिए वैचारिक सांस्कृतिक आंदोलन आदि भी चलाते थे।
लोहियाजी 'भारतीय समाजवाद' की परिकल्पना में अंग्रेजी
भाषा को बाधा मानते थे। इन्होंनें तो लोकसभा में भी कहा कि-
“अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का
सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोकराज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही
चाहिए, उसकी जगह कौन-सी भाषा आती है, यह प्रश्न नहीं है। इस वक्त खाली यह
सवाल है, अंग्रजी खत्म हो और उसकी जगह देश की दूसरी भाषाएं आएं। हिन्दी और
किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटनी ही चाहिए और
वह भी जल्दी। अंग्रेज गए तो अंग्रेजी भी
चली जानी चाहिए” ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत जैसे
विशाल एवं बहुभाषी देश में शासन और राजकाज के लिए सरकार ने अंग्रेजी के पक्ष में
बहुत सारी दलीलें दीं लेकिन डॉ लोहिया ने सारी दलीलों से अपनी असहमति जताते हुए
स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंग्रेजी शोषण, गुलामी और भ्रष्टाचार की भाषा है। गरीब किसान और मजदूर न तो अंग्रेजी समझ पाएंगें
न ही वे कचहरी में न्याय मांगनें में सफल हो पाएंगें और न ही वे अंग्रेजी में लिखे
संविधान को आसानी से समझ पाएंगें। अंग्रेजी अन्याय की भाषा है।
हालांकि 1950 ई० में जब भारतीय संविधान लागू हुआ था तो यह
प्रावधान किया गया कि 1965 ई० तक सुविधानुसार अंग्रेजी का प्रयोग
किया जा सकता है लेकिन उसके बाद हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों एवं सरकारी
नौकरशाहों की व्यवस्था पर विचार करने के बाद लोहियाजी ने 1957 ई० में अंग्रेजी हटाओ मुहिम को सक्रिय आंदोलन में
परिणत कर दिया। लेकिन अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का सर्वाधिक विरोध दक्षिण
भारत खासकर तमिलनाडु में हुआ। हिंसक घटनाएं होनें लगी। बाबजूद इसके वे हैदराबाद और
मद्रास में सभाएं करते रहे। 1961ई० में मद्रास में उनकी सभा पर पत्थर भी बरसाए गए। 1962-63 में जनसंघ भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गया। कुछ छात्रों के आत्महत्या करने आदि की घटनाओं के
बाद उन्होंने आंदोलन को रोक दिया।
लोहियाजी 28जून 1962 को नैनीताल में कहते हैं- “अगर सन् 1947 या 48 में ही सरकार ने अंग्रेजी को हटा दिया होता, तो तटीय प्रदेश खुशी से उस नीति को मान लिए होते या कम से कम उनके
विरुद्ध नहीं लड़ते। मैं यह साफ कर दूँ कि यह समस्या उत्तर और दक्षिण के बीच की
नहीं है, बल्कि तटीय प्रदेशों और मध्य के प्रदेशों के बीच
की है। अपनी नीतियों के कारण भारत सरकार ने एक ऐसी स्थिति बना दी है कि जिसमें
तटीय और मध्य के प्रदेशों के बीच गड़बड़ हो सकती है। अब इसके सिवाय और कोई इलाज नहीं
बचा है कि दिल्ली का काम दो विभागों में बाँट दिया जाए- एक अंग्रेजी का विभाग, ताकि जो तटीय प्रदेश उसमें रहना चाहें तो वे उसमें
जाएँ, और दूसरा, हिन्दुस्तानी
का विभाग, जिसमें मध्य के प्रदेश रहें। इस तरह की नीति पर
चलने से मध्य के प्रदेश, और शायद गुजरात और महाराष्ट्र भी, अपने ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा में तेजी से उन्नति कर लेंगे और योजना
और उद्योगीकरण में कहीं ज्यादा प्रगति करेंगे। मुझे आशा है, बाद में, शायद 5 वर्ष के
अंदर, इससे तटीय प्रदेशों का भी मन ललचाएगा कि वे भी
हिन्दुस्तानी विभाग में आ जाएं और इस तरह समूचे देश के पैमाने पर वे अंग्रेजी का
माध्यम खत्म करने का इरादा कर लें। श्री नेहरू की नीतियों के कारण तो हरेक आदमी को
यकीन है कि तटीय क्षेत्रों और मध्य क्षेत्रों के बीच झगड़ा होकर रहेगा”
वहीं 'हिंदी के सरलीकरण की नीति (1962), भाषा (1966), हिन्दी बनाम अंग्रेजी, 'जाति, भाषा और दाम नीति', सामंती भाषा में लोकराज असंभव' आदि दर्जनों लेखों में लोहियाजी ने साबित करने की कोशिश की है कि अंग्रेजी
के पक्ष में दिए गए सारे तर्क कमजोर एवं निराधार हैं। लोहिया ने तात्कालिक आंकड़े
पेश करते हुए साबित किया कि ढाई अरब दुनिया में सिर्फ तीस करोड़ लोग अंग्रेजी जानते
हैं, तब फिर अंग्रेजी का ही इस्तेमाल क्यों? अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का क्यों नहीं? केवल शासकों की भाषा ही क्यों? उन्होंने
यह भी तर्क दिया कि जर्मनी, जापान, सोवियत रूस, दर्शन, विज्ञान, गणित, तकनीक, उद्योग धंधों आदि में विकसित हैं तो अपनी मातृभाषा
के कारण न कि अंग्रेजी के कारण। जहाँ तक अन्य भारतीय भाषाओं में अराजकता का सवाल
है तो यह बिल्कुल ही बकवास बात है क्योंकि हिंदी ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में
लोगों को जोड़ने का काम किया है। वे उदाहरण के तौर पर समझाते हुए कहते हैं कि सन् 1919-20 के आस-पास राष्ट्रीय आंदोलन इसलिए तीव्र हुआ
क्योंकि गाँधीजी का आगमन हुआ और उन्होंने भारतीय भाषाओं में आंदोलन को साकार रूप
दिया।
साथ ही वे हिन्दी का अन्य
भारतीय भाषाओं से किसी बैर की बजाय इसे आपस में एक-दूसरे की पूरक भाषा मानते हैं।
लोहिया हिंदी की जगह किसी भी तटीय प्रदेश की मातृभाषा को राजकाज की भाषा के रूप
में स्वीकारने को तैयार थे लेकिन हिंदी की जगह अंग्रेजी के
वर्चस्ववादी-साम्राज्यवादी रूप को स्वीकारने के पक्ष में नहीं थे। लोहिया
मैक्समूलर का हवाला देते हुए कहते हैं कि उसने वेदों के अध्ययन के लिए संस्कृत
सीखी लेकिन लिखा अपनी मातृभाषा जर्मन में। उसे मातृभाषा में चिंतन-मनन करने व
लिखने के कारण ख्याति मिली।
लोहिया इस आरोप को भी सिरे से खारिज करते हैं कि अंग्रेजी हटते ही
जनेऊधारी, चोटीधारी, दकियानूसी दाढ़ी वाले हावी
हो जाएँगे। वे इस कथन के सख्त खिलाफ थे कि अपनी भाषाएँ प्रतिक्रियावादी हैं और
विदेशी भाषा प्रगति की प्रतीक हैं। लोहिया सामंतवाद के चार आधार मानते हैं- सामंती
भाषा, सामंती-भूषा, सामंती-भोजन और सामंती-भवन।
उनकी दृष्टि में अंग्रेजी का इस्तेमाल सामंती जीवन का सबसे बड़ा खंभा है। भाषा का
संबंध सत्ता एवं राज्य के साथ केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक-आर्थिक मसले से भी जुड़ा होता है। लोहिया की अंतर्दृष्टि ने
मातृभाषा की शक्ति को पहचान लिया था।
इन सब के बाबजूद 1965 ई० की समयसीमा को देखते हुए दक्षिण भारत में अन्नादुरई के नेतृत्व
में डीएमके पार्टी ने “हिन्दी हटाओ” अभियान को और आक्रामक रूप दे दिया जिसकी वजह
से केंद्र सरकार को 1963 ई० में
संसद में राजभाषा कानून पारित करना पड़ा जिसके अनुसार 1965 के बाद भी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग
राजकाज में जारी रहेगा। और वह आज तक जारी है।
राममनोहर लोहिया के लिए
भाषा की समस्या जाति, वर्ण, गरीबी, विषमता और गुलामी से कम महत्वपूर्ण नहीं थी। इसलिए उन्होंने भारत की
भाषा नीति पर गंभीरता से विचार किया है। आजाद भारत की भाषा नीति कैसी हो? इसके लिए सबसे व्यवस्थित, मौलिक
एवं विचारोत्तेजक स्थापना लोहिया ने दी। हालांकि इसके लिए वे गाँधीजी की भाषा नीति
के भी ऋणी हैं। गाँधी जी ने ही भारतवासियों को यह शिक्षा दी कि देश की समृद्धि, उन्नति एवं विकास मातृभाषा में चिंतन-मनन एवं कार्य करने से संभव है।
साथ ही गाँधीजी यह भी कहते थे कि “मैं नहीं चाहता कि मेरे घर
के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियाँ बंद कर दी जाएँ। मैं चाहता
हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में चारों ओर से अधिक से अधिक
स्वतंत्रता के साथ बहती रहे। मगर मैं किसी के झोंके में उड़ नहीं जाऊँ"।
लेकिन
यह भी अजीब संयोग है कि डॉ लोहिया का सपना उनके असमय मृत्यु के साथ ही समाप्त हो
गया और आज भी हिन्दी वहीं है जहां वर्षों पहले थी और अंग्रेजी आज भी उसी स्वरूप
में है जिसके लिए डॉ लोहिया ने चेताया था।