समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं। पेश है समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणीः-

'बहुत दिनों के बाद' ( सुषमा सिन्हा ) : घर लौटने के सुख का ख़्वाब बुनने की एक अप्रत्याशित दुनिया
● शहंशाह आलम
आज जब आदमी से उम्मीदें, सपने, घर, रोशनियाँ, स्मृतियाँ सब छीनी जा रही हैं, बदले में नाउम्मीदी, ख़ौफ़, फुटपाथ, अँधेरा और भीषण उदासी से लबालब भरी दुनिया हमें दी जा रही है, कोई अपना है, जो हमारे घर लौटने का ख़्वाब अब भी बुन रहा है : हमने ही तो चाहा था जाना घर से दूर / ताकि बचा रहे घर लौटने का सुख / आज बहुत दिनों के बाद / लौटी हूँ अपने घर / एक सुकून के साथ / दरवाज़े ने हँस कर मेरा स्वागत किया / खिड़कियों ने खुलते-खुलते / आख़िर पूछ ही लिया / उस दुनिया के बारे / जो खिड़की से दिखती ही नहीं / रोशनदानों ने हुलस कर कहा- हमने बचा रखी है / तुम्हारे लिए उम्मीद की कई किरणें / तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा मुझे / और गले लगा कर रोईं बहुत / बहुत दिनों के बाद / घर के कमरे, दीवारें, छत, बालकनी / ख़ामोश हसरत भरी नज़रों से देख रहे हैं / मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज़ / तेज़ हो आई है / देखा कि ज़ख़्म अब भी हरे हैं / और दर्द आज भी / हर जगह बिखरा पड़ा है / हिम्मत कर के फिर से / समेटने लगी हूँ उन्हें / कि हरकत हुई है घर में / घर जो ख़त्म हो रहा था / मैंने उसे बचाना चाहा / बहुत दिनों के बाद ( 'बहुत दिनों के बाद', पृ. 13-14 )। यह सच है कि 'घर' शब्द उस लोकशब्द की तरह है, जिसमें आदमी का अपना पूरा लोक झलकता है, आदमी की अपनी गंध फैली मिलती है। समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं : देखती हूँ / जिस घर में नहीं होतीं / माँ, बहन, बेटियाँ / तरसते हैं उस घर के लोग / इन ख़ूबसूरत रिश्तों के लिए / फिर सोचती हूँ / जिस घर में होती हैं / माँ, बहन, बेटियाँ / कैसे हो सकते हैं / उस घर के लोग बलात्कारी / माफ़ी माँगना चाहती हूँ / उन तमाम बेटियों से / जिन्हें जन्म देने के बाद / हम उनकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाए / अफ़सोस करना चाहती हूँ / दुनिया की उन तमाम औरतों के लिए / जिनकी कोख से / इंसान की शक्ल में हैवान पैदा हुए / रोना चाहती हूँ / उन तमाम बहनों की क़िस्मत पर / जिनके भाइयों द्वारा / किसी माँ, बहन, बेटी के साथ / किया गया ऐसा घृणित कार्य / और पूछना चाहती हूँ / दुनिया के तमाम लोगों से / क्यों हो रहा किसी माँ का / दामन तार-तार / क्यों लुटी-पीटी-मारी जा रही हैं / हमारी जन्मी-अजन्मी बेटियाँ / क्या माँ होना गुनाह है / या फिर / माँ बनने लायक़ इंसान होना गुनाह है ( ' पूछना चाहती हूँ', पृ. 24-25 )।
सुषमा सिन्हा का पहला कविता-संग्रह 'मिट्टी का घर' नाम से 2004 में शिल्पायन, दिल्ली से आया था। एक दशक से थोड़ा अधिक समय के बाद उनका यह दूसरा कविता-संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' प्रकाशन संस्थान, दिल्ली से छप कर आना किसी घटना से कम नहीं है। पहले संग्रह से दूसरे संग्रह के बीच इस अंतराल का अर्थ यही है कि सुषमा सिन्हा ने इस अंतराल के बीच कविता के बोलने-बतियाने वाले बिम्बों को, कविता के सच्चे अभिप्रायों को काफ़ी हद तक पकड़ने-साधने का काम बख़ूबी किया है। इस बीच उन्होंने यह भी तय किया है कि कविता का जो सच्चा पक्ष है, उसे स्थगित नहीं किया जाए। इस दूसरे कविता-संग्रह की कविताओं की जीवनानुभूतियाँ इस प्रमाण हैं। इस नए संग्रह की कविताओं में कविता को पूरी महीनी से पकड़े रहने का गुण भी उन्होंने सीख लिया है और यह क़ाबिले-तारीफ़ है। ऐसा कविता के प्रति उनके भीतर आए गहरे आत्मविश्वास की वजह से भी होता दिखाई देता है। कविता का यह संतुलन समकालीन स्त्री-कविता का संतुलन कहा जाना यहाँ पर ज़्यादा उचित होगा। सुषमा सिन्हा का कविता-स्वर आधी आबादी का अपना स्वर है, जो पुरुष-समाज की चालाकी, धोखेबाज़ी, काइयाँगिरी के विरुद्ध ग़ुस्से, आक्रोश के साथ-साथ टूटन और घुटन को परदे से बाहर लाता है। इसका यह अर्थ नहीं निकाल जाना चाहिए कि ये कविताएँ किसी टूटी और घुटी हुई स्त्री के पक्ष का स्वर मात्र हैं बल्कि ये कविताएँ उन स्त्रियों की कविताएँ हैं, जिनमें लोहा लेने का हुनर आ गया है : जिस डर की आशंका से / काँप जाते हैं हम हमेशा / वक़्त बुरा हो तो / गुज़र जाता है वह हम पर / लेकिन बर्दाश्त करने की हमारी / ज़बर्दस्त है क्षमता / झेल कर वैसे लम्हों को भी / रह जाते हैं हम ज़िंदा / यूँ ही नहीं हम चलते हैं / नंगे पाँव जलते हुए अंगारों पर / नाचते हैं शीशे के टुकड़ों पर / गिर पड़ने की हद तक / चलते हैं पतली रस्सियों पर / मारते हैं कोड़े अपने बदन पर / दिखाते हैं अजीबो-ग़रीब करतब / जान पर खेल जाने का / ना जाने कितनी बार गुज़रते हैं हम / डर की हद से / कि डरते नहीं अब किसी भी बात से / दर्द की हद भी जानते हैं हम / और यह भी जानते हैं / कि मृत्यु से भी ज़्यादा / भयावह होती है भूख / यह भूख जब वक़्त बुरा हो तो / करवा ही लेती है हमसे / सभी तरह के काम / फिर भी नहीं होती है ख़त्म ( 'भूख', पृ. 15-16 )। दरअसल सुषमा सिन्हा की कविताएँ किसी ढोल की तरह डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक की या ढम-ढम-ढम की आवाज़ ना भी निकाल पाती हैं तब भी ये कविताएँ उस नदी की तरह ज़रूर हैं, जो जब तक शांत है, तभी तक ख़ामोश दिखाई देती है, लेकिन तेज़ हवाओं के मौसम में वबाल मचा देने का दमखम रखती है। मैं सुषमा सिन्हा की कविताओं की इन्हीं अदाओं पर मोहित हूँ। ये कविताएँ क्रांतिकारी नहीं भी हैं तब भी इन कविताओं में एक स्त्री की आग दबी हुई ज़रूर है : छोटी-सी मुनियाँ / खेला करती / लड़कों के ही सारे खेल / गोली, कंचे, गिल्ली-डंडे / पतंगें भी उड़ाती ख़ूब ऊँचे / ढेर सारे सपनों के साथ / पड़ोस की चाचियाँ / शिकायत करतीं अम्माँ से / बिगड़ रही है तुम्हारी बेटी / दिन-दुपहरिया घूमती रहती है / मुहल्ला भर के छोकरों के साथ / समझातीं ऊँच-नीच / किसे पता वही मुनिया / लड़कों से ही कर-कर के मुक़ाबला / जीत लेगी अपने हिस्से के सारे कंचे / गिल्ली-डंडे से मारते हुए / पा लेगी एक मुकाम / और पतंगों के साथ-साथ / पहुँच जाएगी एक ऊँचाई पर ( 'मुनियाँ', पृ. 32-33 )।
सुषमा सिन्हा की कविताएँ अपने आसपास के जीवन के लिए दुष्कर कुछ भी नहीं रचतीं बल्कि अपने शांत मिज़ाज के हिसाब से जीवन की कठिनाइयाँ दूर करने का भरसक प्रयास करती हैं। यहाँ ऐसा करते हुए सुषमा सिन्हा समकालीन कविता को शैली की कोई नवीनता अथवा प्रतीकों का कोई अनूठापन ना भी दे सकी हैं, लेकिन समकालीन कविता को नई गहराई और व्यापकता ज़रूर देने में सक्षम हुई हैं। एक स्त्री, जिसका जीवन सिर्फ़ अपना जीवन नहीं है, अगर रात के अपने एकांत से कविता के विश्व के लिए करवटें बदल-बदल कर कुम्हार के चाक-सा कुछ-कुछ बढ़िया रच रही हैं तो विश्व-कविता के लिए असंभव में संभव जैसा मैं मानता हूँ। सुषमा सिन्हा के इन्हीं प्रयासों को सराहते हुए समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल लिखते हैं, 'तमाम धूल-धक्कड़ और साहित्य लोक के आंतरिक प्रपंचों से दूर, सुषमा जी ने अपने कौटुम्बिक तथा प्रशासकीय दायित्वों का सफल निर्वाह हुए अपने ही आस-पड़ोस, घर-बार और चतुर्दिक जीवन को उत्तम कविता में बदला है। यहाँ कवि का निजी संसार तो है ही, साथ ही वह कठोर प्रस्तर-जीवन भी है जो झारखंड के आदिवासी-लोक का प्रतिनिधित्व करता है।' यह सच है कि सुषमा सिन्हा की आवाज़ एक नए मौसम के आने की आवाज़ है। यह आवाज़ ऐसी है जो बिना किसी अवरोध के हम तक पहुँचती है : हर रोज़ हम / ना जाने कितनी सीढ़ियाँ चढ़ते हैं / और ना जाने कहाँ-कितनी / उतर जाते हैं, अपने-आप / हर रोज़ हम / ना जाने कितने सपने बुनते हैं / और ना जाने कब कितने सपने / उधड़ जाते हैं, चुपचाप / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी बातें तुमसे करते हैं / और ना जाने कितनी चाहतें / छुपा जाते हैं, ख़ामोशी में / हर रोज़ हम / वक़्त की उँगली थाम / शुरू करते हैं चलना / और वक़्त अपनी उँगली छुड़ा / निकल जाता है हमसे बहुत आगे / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी कोशिशें / करते हैं जीने की / सहेजते रहते हैं जीवन को / सपनों को, तुमको और वक़्त को / जबकि यह जानते हैं हम / कि ख़त्म हो रहा है / धीरे-धीरे सब कुछ / बहुत ही ख़ामोशी से ( 'हर रोज़', पृ. 81-82 )।
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| शहंशाह आलम |
सुषमा सिन्हा का लहज़ा यानी बोलने का, बातचीत करने का ढंग अपना है, ख़ास है, सलीके वाला है। यही तमीज़, यही शऊर उनकी कविताओं ने उन्हीं से सीख रखा है। एक ख़ास बात यह भी नोट करने वाली है कि सुषमा सिन्हा की आत्मा जितनी पाक-साफ़ है, उनकी कविताएँ उन्हीं की आत्मा जैसी हैं। इसलिए कि सुषमा सिन्हा जिस लफ़्ज़ को छू भर देती हैं, वह नया हो जाता है। इसीलिए मैंने यहाँ लिखा कि सुषमा सिन्हा की आत्मा उनके एक-एक शब्द में छुपी दिखाई मुझे देती है। इसीलिए उनकी कविताएँ अपने पाठ किए जाते समय किसी को तोड़ती नहीं, जोड़ती हुई चलती हैं : अपने घर को, अपने प्रेम को, अपने आस-पड़ोस को, अपने संघर्ष को, अपने अतीत-वर्तमान को और हमारे जीवन के खंडहर को भी। ये कविताएँ बारिश के बाद धुल कर साफ़ हुए मकान की तरह हैं। संग्रह की 'अच्छे दिनों को याद करते हुए', 'रेस', 'एहसास', 'विनाश', 'तुम्हारा सपना', 'संभावनाएँ', 'चौराहा', 'इच्छा', 'सपने', 'माँ' ( दो कविताएँ ), 'घर', 'यादें', 'पानी', 'रास्ता', 'मदद', 'चूल्हा-रोटी-औरत', 'हिम्मत', 'अँधेरा', 'चाहत', 'भीड़', 'सच', 'शक', 'प्रेम का अर्थ', 'डर तो होता है', 'बदलाव', 'ख़बरें', 'आख़िर कब तक', 'रोक', 'असंभव', 'ख़ुशियाँ', 'मृत्यु' आदि कविताएँ हमारे समय को बग़ैर किसी संशय के प्रकट करती हैं और प्रेरित भी। सुषमा सिन्हा अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन का पुनर्संयोजन जिस तरह करती हैं, यह उनके कविता-समय का भी पुनर्संयोजन है। ऐसा इसलिए भी है कि कविता मनुष्य को उसके कठिन दिनों से मुक्ति दिलाने का माध्यम भी है : रेगिस्तान में ओस की बूँद / आँधियों में थरथराता दीया / काली-अँधेरी रात का ध्रुवतारा / हिम्मत देता हुआ / अनजानी-अनचाही / आवाज़ों के बीच / ठहरी-सी एक आवाज़ / घने जंगल से गुज़रती हुई / पतली-सी एक राह / भागते-दौड़ते रास्ते पर / मील का एक पत्थर / एक सुकून देता हुआ / 'जीवन में प्रेम' / बस ऐसा ही तो है ( 'जीवन में प्रेम', पृ. 116 )।
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बहुत दिनों के बाद ( कविता-संग्रह ) / कवि : सुषमा सिन्हा / प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान / 4268/B-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 / मूल्य ₹ 250
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