रविवार, 19 फ़रवरी 2017

वेद प्रकाश शर्मा और उनकी लोकप्रियता

वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफन तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 176 उपन्यास और इंटरनेशनल खिलाड़ी, सबसे बड़ा खिलाड़ी समेत कई फिल्मों के लेखक वेद प्रकाश शर्मा आखिरकार 17 फरवरी 2017 को करीबन एक साल से कैंसर से जूझते हुए अपने पाठकों को अपना अंतिम अलविदा कह गये. साल में दो-तीन नॉवेल लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून, 1955 को मेरठ में हुआ जो कि मूलत: मुजफ्फरनगर जिले के बिहरा गांव के रहने वाले थे.

लगातार आठ –आठ घंटे बिना किसी से मिले –जुले और बगैर कुछ खाए –पिए लिखने वाले वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था. उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई. उनकी पहली कहानी 1971 में पेनों की जेलस्कूल मैग्जीन में प्रकाशित हुई. वे उस पत्रिका के छात्र संपादक बनाए गए थे. लेकिन उपन्यासकार बनने की कहानी यह है कि 1972 में जब हाईस्कूल का पेपर देने के बाद गर्मी की छुट्टियों में वे अपने पैतृक गांव बिहरा गए जहां वे अपने साथ कई उपन्यास भी ले गए. दोस्तों के अभाव में उन्होंने सिर्फ पढ़ना और लिखना शुरू कर दिया. शुरू में तो जब पिता को मालूम पड़ी तो खूब खिंचाई हुई लेकिन जब उन्होंने उसे पढ़ा तो अचंभित हो गए. फिर उनके पिता ही स्क्रिप्‍ट लेकर प्रेस में कंपोजिंग सिखाने ले गए जहां नामी उपन्यासकारों के नकली उपन्यास छापने वाले लक्ष्मी पॉकेट बुक्स के मालिक जंग बहादुर वहां अपने किसी उपन्यास का प्रूफ देखने आए थे. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद वह पास में रखी स्क्रिप्‍ट को पढ़ने लगे. चंद पन्ने पढ़ने के बाद अपने साथ पूरा पढ़ने के लिए ले गए और तीन-चार घंटे बाद लौटे. वेद प्रकाश के पिता से उन्होंने पूछा, लिखा किसने है? जब उन्हें हकीकत का पता चला तो तो बोले, पहले बता देते. फिर जंग बहादुर ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाया. टेबल पर 100 रुपए रखते हुए कहा, और लिख, हर नॉवेल के 100 रुपए मिलेंगे. वेद प्रकाश ने सोचा कि राइटर को और क्या चाहिए, उपन्यास छपेगा, नाम के साथ फोटो छपेगी लेकिन जंग बहादुर ने उनकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया, फोटो तो बहुत दूर की बात नाम तक छापने से मना कर दिया. उन्होंने टेबल से स्क्रिप्‍ट उठाई और घर चले गए. दिसंबर, 1972 में वेद प्रकाश शर्मा को लगा कि जंग बहादुर सही कह रहे थे. और सीक्रेट फाइल नामक उपन्यास वेद प्रकाश कांबोज के नाम से छप गया. एक के बाद एक उपन्यास से नकली कांबोज की लोकप्रियता बढ़ने लगी. माधुरी प्रकाशन ने नाम छापा लेकिन पूरा नहीं. जंग बहादुर ने आग के बेटे (1973) के पहले पन्ने पर वेद प्रकाश शर्मा का पूरा नाम छापा लेकिन फोटो फिर भी नहीं छपी. लेकिन उसी साल ज्योति प्रकाशन और माधुरी प्रकाशन दोनों ने नाम के साथ इनका फोटो भी छापना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे उनके उपन्यास 50,000 और फिर एक लाख छपने लगी. उनके सौवें नॉवेल कैदी नं. 100 की 2,50,000 प्रतियां छपीं थी. इसके बाद उन्होंने 1985 में खुद अपना प्रकाशन तुलसी पॉकेट बुक्स के नाम से शुरू कर लिया. उनके कुल 176 उन्यासों में से 70 इसी ने छपे हैं. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा लोकप्रियता 1993 में वर्दी वाला गुंडा से मिली जिसके बारे में उनका दावा है कि 15 लाख प्रतियां पहली बार छापी गई थीं. मेरठ शहर के सभी बुक स्टॉल से नॉवेल घंटों में गायब थीं. प्री-ऑर्डर और अडवांस बुकिंग वाले आज के 'बेस्टसेलर' जमाने से पहले लोग पहले उनके नॉवेल अडवांस में बुक कराते थे. इनका आखिरी उपन्यास छठी उंगुली’  था जो 6 महीने पहले ही आया है.

वेदप्रकाश शर्मा ने करीब छह फिल्मों में स्क्रिन प्ले राइटर भी रहे. तीन नवंबर वर्ष-1993 को रिलीज हुई फिल्म अनाम की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी. इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था. इसके बाद 9 जून वर्ष-1995 को रिलीज हुई फिल्म सबसे बड़ा खिलाड़ी उनके उपन्यास लल्लू पर आधारित थी. इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था. इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 26 मार्च 1999 को रिलीज हुई थी. इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास केशव पंडित पर वर्ष-2010 में टीवी सीरियल भी बना.
उनके उपन्यास समाज से ही जुड़े हुए होते थे. समाज से जुड़े मुद्दे उनके उपन्यास में अक्सर झलकते थे. यूं कहिए मानवीय संवेदनाओं से उनके उपन्यास जुड़े रहते थे. 1985 में उन्होंने दहेज की समस्या को अपने उपन्यास बहू मांगे इंसाफ से उठाया था. बाद में इसी उपन्यास पर शशिलाल नायर के निर्देशन में बहू की आवाज फिल्म बनी. इसके अलावा दहेज में रिवाल्वर, विधवा का पति नामक उपन्यास से भी उन्होंने सामाजिक समस्याएं उठाईं. 

वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष-1992 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड,  वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष-2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया. इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले.
भले ही गंभीर साहित्य वाले हिन्दी के इस लोकप्रिय लेखक की रचना पर विशेष गौर नहीं फरमाते रहें हो लेकिन उनकी लोकप्रियता के सामने जरूर ही नतमस्तक थे और शायद रहेंगें भी.




पटना इतिहास की नजर में : अरूण सिंह


ईस्ट इंडिया कंपनी जब हिंदुस्तान में व्यापार करने आयी थी उस वक्त विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी। और जब वे भारत छोड़कर गए तो यह घटकर चार फीसदी से भी कम रह गयी थी। उन्होंने यहां के उद्योगों को भरपूर क्षति पहुंचाई और यहां की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया।
पटना का समृद्ध बाजार भी इससे अछूता नहीं रहा। एक वक्त में ब्रिटिश, डच, डेन और फ्रांसीसियों का पसंदीदा यह शहर धीरे धीरे अपनी महत्ता खोने लगा। पटना और इसके आसपास के गांवों में जहां कभी घर घर में हथकरघे चल रहे थे, धीरे धीरे बंद होने लगे। ओ’ मैली जब 1907 में सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त तक यह सिमट कर रायपुरा (फतुहा) तक ही रह गया था। यहां के बुनकर अभी भी सिल्क से तसर का निर्माण कर रहे थे। इसके साथ ही बुनकर सिल्क और सूती को मिलाकर जिसे बाफ्टा कहते थे, का उत्पादन कर रहे थे। इसकी खपत स्थानीय बाजार में थी और साथ ही इसका निर्यात कलकत्ता तक हो रहा था। इसके सौ वर्ष पहले जब बुकानन यहां सर्वेक्षण कर रहा था उस वक्त यहां के सिल्क का निर्यात पर्शिया के बाजारों तक हो रहा था।
पटना सिटी में बने शीशे के उत्पादों का भी एक वक्त में बड़ा बाजार था। इसका निर्यात यूरोप तक हो रहा था। ओ’ मैली ने गज़ेटियर में पटना सिटी के लोदीकटरा मोहल्ले में शीशे से बने उत्पादों का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इत्र रखने की शीशियां,बोतलें,लैम्पों और चुड़ियों का निर्माण सोन नदी के बालू और सोड़ा से किया जाता है। इससे शीशे का जो निर्माण होता है वह हरे रंग का और अशुद्ध होता है। लेकिन जो शीशा शुद्ध और सफ़ेद होता है उसका निर्माण रेलवे के टूटे लैम्पों के शीशे से होता है। उसने यूरोपियन शैली के फूलदानों के निर्माण का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि कारीगर फूलदानों के शीशों को रंगने के लिए नीले थोथे, नील के रंग और अन्य सामग्रियों का प्रयोग करते हैं। जबकि शीशे को नीला रंग देने के लिए टिन के ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। उसने इनके निर्माण के प्रक्रिया का भी जिक्र किया है।
पटना सिटी के मारूफगंज मोहल्ले के संगतराशों (पत्थर गढ़ने वाला) का भी उल्लेख ओ’ मैली ने किया है। उसने लिखा है कि जिस बलुआ पत्थर का उपयोग यहां के कारीगर करते हैं वह मिर्जापुरी पत्थर कहलाता है। इन पत्थरों के बड़ी बड़ी सिल्लियों को मिर्ज़ापुर जिले के चुनार और बिंध्याचल से नाव से गंगा नदी के मार्फ़त लाया जाता है। सासाराम और मुंगेर से ग्रेनाइट का भी आयात किया जाता है। इन पत्थरों से देवी देवताओं की मूर्तियां, आटा पीसने वाला जांता, मसाला पीसने वाला सिल-लोढा, कुम्हारों की चक्कियां, पत्थर के प्लेट और कपों का निर्माण होता है। इनकी खपत पटना और देश के दूसरे शहरों में होती है। इनकी मांग लगातार बनी रहती है।
ओ’ मैली ने पटना और दानापुर के बढ़इयों (लकड़ी का काम करने वाले) की दक्षता का भी उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि इन कारीगरों द्वारा बनाये गए लकड़ी के खूबसूरत छज्जे, जो दानापुर और पटना की इमारतों की खास पहचान है उनकी कारीगरी के नमूने हैं। इन कारीगरों द्वारा बनाये गए खूबसूरत मजबूत फर्नीचर और आलमारियों का निर्यात देश के दूसरे शहरों में होता है। कुत्ता गाड़ी और पालकियों का निर्माण भी पटना और दानापुर की विशेषता है।
पटना सिटी की सड़कों और गलियों से गुजरते हुए ठहर कर आप पुरानी इमारतों को देखें तो उनमे लगी लकड़ी के खूबसूरत छज्जे आपको अभी भी दिख जायेंगे।
साभार: प्रभात खबर

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हुआ पटना पुस्तक मेला 2017

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हुआ पटना पुस्तक मेला
-सुशील कुमार भारद्वाज

पटना पुस्तक मेला में “साहिर समग्र” पर चर्चा के दौरान जब प्रेम भारद्वाज, मदन कश्यप और अवधेश प्रीत जैसे लोगों ने कहना शुरू किया कि “पार्टनर तुम्हारा पॉलिटिक्स क्या है?” तो उनलोगों ने शायद उस परिचर्चा को वहीं भूला दिया होगा लेकिन अब पटना पुस्तक मेला पटनावासियों, अपने आयोजकों, एवं आगंतुकों से पूछ रहा है कि “पटना पुस्तक मेला का पालिटिक्स क्या है?” मेले में जहां सूबे के मुख्यमंत्री आए, स्वास्थ्य मंत्री आए, वित्त मंत्री आए तो आख़िरकार राज्यपाल भी आए.  सूबे के प्रशासनिक पदाधिकारी, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद आदि आए तो देश के चर्चित साहित्यकार भी आए और गुमनाम रचनाकार एवं आम पाठक भी. मुख्यमंत्री ने जहां मेले को अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनाने की सलाह दी वहीं मेले में ही नोवेल्टी प्रकाशन की ओर से “ब्लू बर्ड” नाम से अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन की ही घोषणा नहीं की गई बल्कि ढाई लाख का चेक पटना पुस्तक मेला के अध्यक्ष एवं लेखक रत्नेश्वर सिंह को देते हुए ग्लोबल वार्मिंग पर केंद्रित उपन्यास “रेखना मेरी जान” के लिए लगभग पौने दो करोड का अनुबंध भी किया जो कि शायद हिन्दी लेखकों के लिए एक बहुत बड़ी रकम है.

4 फरवरी को अहले सुबह कुहरे और कनकनी का जो आलम था उसमें पुस्तक मेले जैसे किसी आयोजन में शरीक होने से पहले शायद लोग किसी जरूरी काम में व्यस्त होने के बहाने तलाशते लेकिन मौसम की मेहरबानी रही कि चढ़ते दिन के साथ वसंत अपने खिले धूप में मुस्कान बिखेड़ने चली आई. फिर भी शुरू शुरू में मेला धूप और धूल के बीच हो रहे नुक्कड़ नाटक, संवाद –परिसंवाद, कविता –पाठ, कहानी –पाठ एवं अन्य सांस्कृतिक आयोजनों के लिए ही नहीं बल्कि पुस्तक और लिट्टी –गोलगप्पे के लिए भी दर्शकों और खरीददारों को ढूंढते रहा.



पुस्तक मेला जब 23 वी बार पटनावासियों को पुस्तकों की दुनियां में सैर कराने की तैयारी में था उसी समय पहला झटका लगा जब प्रशासन ने 350 वें प्रकाश-पर्व की तैयारी और गाँधी मैदान में टेंट-सिटी बनाने के नाम पर जगह उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया. प्रकाश-पर्व की खुमारी पूरी तरह से उतरती उससे पहले ही गणतंत्र दिवस की तैयारी शुरू हो गई. प्रशासन गाँधी मैदान में जगह की उपलब्धता की जो बात रखी उसमें आयोजकों ने वसंत ऋतु की वसंती वयार के बीच 4 -14 फरवरी 2017 का समय तय किया. समय तय करते वक्त 8 नवम्बर  2016  को प्रधानमंत्री की घोषणा से हुई नोट्बंदी का विचार मन में था या नहीं यह तो कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इतना तय है कि वे इस समय से आगे बढ़ने को बिल्कुल ही तैयार नहीं थे क्योंकि कुछ वर्ष पहले भी मार्च में मेला को आयोजित किया गया था जिसमें गर्मी एवं बिक्री के मामले में मेले की भत्स पिट गई थी.
इसे भी संयोग ही कहा जाय कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर गाड़े गए बांस –बल्ले पूरी तरह से उखर पाते उससे पहले ही पुस्तक मेले की तैयारी शुरू करनी पड़ गई वह भी आयोजकों के इच्छा के प्रतिकूल अन्य वर्ष की तुलना में कम जगह पर. लेकिन आयोजकों की ही यह अथक लगन थी कि मेले की लगभग 25-30% की तैयारी के बाबजूद महज कुछ लोगों की मौजूदगी में माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से न सिर्फ मेले का उद्घाटन करवा लिया बल्कि मुख्यमंत्री ने आने वाले वर्षों में मेले को अन्तराष्ट्रीय स्तर का बनाने और उसमें सरकारी सहयोग देने की बात कहकर सबका दिल जीत लेने की कोशिश की.
मसि के द्वारा आयोजित कविता –कहानी कार्यशाला में स्कूली बच्चों ने जरूर अपनी सक्रिय भागीदारी निभाकर मेले की उपयोगिता को साबित करने की कोशिश की. बच्चों ने मेले में जहां गणित के कुछ खास नुस्खे सीखें वहीं नृत्य एवं संगीत से धमाल भी मचाए. आयोजकों ने भोजपुरी मुक्ताकाश मंच पर एक प्रमुख कार्यक्रम एवं अन्य औसतन पांच –छः कार्यक्रम प्रतिदिन प्रस्तुत किए जिसमें लोगों की भीड़ इतनी रही कि कुर्सी कम पड़ने लगी. आयोजक की सबसे बड़ी खासियत रही कि पाठकों के बीच न सिर्फ गौरतलब एवं समकालीन विषयों एवं पुस्तकों पर बहस एवं बातचीत के लिए शमी जमां, भगवान दास मोरवाल, यतीन्द्र मिश्र, उदय प्रकाश, शशि शेखर, अनंत विजय एवं संजीव जैसे लोगों को आमंत्रित किया बल्कि बिहार के रचनाकार उषाकिरण खान, हृषिकेश सुलभ, अवधेश प्रीत, मदन कश्यप एवं प्रेम भारद्वाज आदि जैसों को भी यथोचित सम्मान देते हुए नई एवं युवा पीढ़ी को भी मंच पर सहृदयता के साथ स्थान देने की सफल कोशिश की. यूं तो कई रचनाकार अपनी निजी व्यस्तता के कारण इस आयोजन में सशरीर शरीक नहीं हो सके लेकिन सोशल मीडिया के बहाने न सिर्फ इससे जुड़े रहे बल्कि होने वाली हर गतिविधि पर नजर गडाये रहे एवं शुभकामनाएँ भेजते रहे. साथ ही शहर में मौजूद अनेक रचनाकार मेले में अपनी सहभागिता भी दिखाते रहे.
ग्यारह दिवसीय इस आयोजन में लगभग तीन –चार दिन ही ऐसे रहे जिसमें औसत से कुछ अधिक भीड़ रही जिसने मेले को न सिर्फ सफल बनाने की कोशिश की बल्कि प्रकाशकों के चेहरे पर भी खुशी लाने की कोशिश की. बाबजूद इसके लगभग सभी प्रकाशक एक मत दिखे कि पिछली बार की तुलना में भीड़ कम जुटी है और बिक्री पर इसका स्पष्ट असर दिख रहा है. एक खास बात जो देखने को मिली वह यह थी कि अधिकांश खरीददार भी नवरचनाकार ही थे जो कुछ किताबें अपने वरिष्ठ लेखकों की सलाह पर खरीद रहे थे वर्ना प्रेमचंद, शरतचंद्र, बच्चन, बाबा नागार्जुन, रेणु, निर्मल वर्मा, एवं धर्मवीर भारती की ही किताबें चर्चा में रहीं.
मेले में पुस्तक –लोकार्पण के वक्त दर्शकों के होठ तब मुस्कुराने को बाध्य हो जाते थे जब लोकार्पण करने आए शहर के नामचीन शिक्षाविद एवं राजनेता बगैर किताब की सामग्री को पढ़े ही शीर्षक एवं लेखक के नाम पर ही पुस्तक को श्रेष्ठ एवं उपयोगी होने की बात कहने लगते थे. दूसरी बात नज़र आई कि हर लेखक सामने वाले को अपने पुस्तक के ग्राहक के रूप में देखता और हर मिलने वाला इंसान मुफ्त में इक किताब पा जाने की आस में घूमता रहता.
1993 से पटना पुस्तक मेला अपने सांस्कृतिक पहल में निखार लाते हुए न सिर्फ साहित्यकारों एवं पाठकों को नजदीक लाकर एक दूसरे के संपर्क में लाने की कोशिश में लगा है बल्कि यह प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वालों, अपनी जिंदगी संवारने वालों को भी एक दूसरे से मिलाने की कोशिश करता है. साथ ही साथ विभिन्न राज्यों की हस्तशिल्प कला को भी प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा है. जबकि इस बार भवनों, प्रवेश द्वारों एवं सभागारों के नाम भाषा के आधार पर रखे गए थे.
पटना पुस्तक मेला में आमंत्रित गणमान्य अतिथियों का स्वागत कॉफी, स्मृति –चिह्न एवं पटना पुस्तक मेला मुद्रित झोले से किया गया. जबकि मुक्ताकाश मंच के बगल में सभी आगंतुक अपनी इच्छा एवं अपनी जेब के हिसाब से बिहारी लिट्टी, गोलगप्पे समेत अन्य फास्ट –फ़ूड का मजा लेते रहे.

यूं तो जब नोट्बंदी ने सबके हाथ बांध रखे हों, आयकर के खर्च –ब्योरे के समय भी समापन की ओर हो, परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला हो वैसी स्थिति में भी पुस्तक –मेला का आयोजन अपने आप में ही अहम है. और किस आयोजन में कमी बेसी नहीं होती है.अब चाहे मैथिली वाले कहें कि किसी मैथिली प्रकाशक को जगह क्यों नहीं या पंकज दूबे की परिचर्चा को कुछ कहें, लेकिन पटना पुस्तक मेला इस वादे के समाप्त हो गया कि नवम्बर –दिसम्बर में फिर मिलेंगें.   

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं: हृषिकेश सुलभ

15 फरवरी 1955 को बिहार के सीवान जिले के लहेजी ग्राम में स्वतंत्रता सेनानी रमाशंकर श्रीवास्तव के आंगन में एक बच्चे का जन्म हुआ जो अपनी प्रारंभिक पढाई के साथ –साथ वहां के सांस्कृतिक परिवेश में भी घुलने लगा. 1968 में जब वह बालक बिहार की राजधानी पटना आया तो यहां की उर्वर भूमि ने पढाई के साथ –साथ उसे साहित्य और रंगमंच की दुनियां की ओर भी खींचना शुरू कर दिया. उसने बाल कथा लिखते लिखते 1976 ई० में मुख्यधारा के साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. जो कि  आज न सिर्फ एक लब्ध –प्रतिष्ठित एवं देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार हैं बल्कि उनके साहित्यिक खाते में लगभग आधा दर्जन नाटक, आधा दर्जन कहानी संग्रह और रंगमंच आधारित किताब एवं लेखों के अलावे लगभग आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी हैं. जी हां, हम बात कर रहे हाल के वर्ष में आकाशवाणी पटना से सेवानिवृत हुए साहित्यकार हृषिकेश सुलभ की. आइए पढ़ते हैं सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी बातचीत के एक अंश को .

अपने साहित्यिक सफर के बारे में बताएं.

यूं तो लिखना विद्यालय स्तर पर ही शुरू कर दिया था लेकिन 1976 ई० में श्रीपत राय जी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “कहानियां” और वसंत जी की पत्रिका  “समझ” में प्रकाशित अपनी कहानियों को ही अपनी शुरुआत मानता हुआ. उसके बाद 1977 ई० में सारिका के नव लेखन अंक में छपने के बाद से यह सफर अब तक जारी है. समय के साथ जीवन और साहित्य में परिपक्वता आई, नये नये जीवनानुभव मिले. दृष्टि में विकास एवं बदलाव हुए. कहानी कहने का अंदाज और भाषा पहले की तुलना में काफी बदल गया है.

कभी कहानी, नाटक के अलावे कविता या उपन्यास लिखने की इच्छा हुई?

मैंने अभी तक कविता नहीं लिखी है लेकिन सिर्फ कविता ही साहित्य तो नहीं है. अरुण कमल ने महत्वपूर्ण गद्य भी लिखे हैं. मुक्तिबोध की कहानी या अज्ञेय की शेखर एक जीवनी को भी देखा जा सकता है. मैं मानता हूं कि किसी रचनाकार को किसी खास विधा में बांधकर उसका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए. यह महज सम्प्रेषण में सहजता का मामला है. वैसे नाटकों में गीत लिखें हैं. हो सकता है कि भविष्य में कभी कविता भी लिखूं. वैसे एक उपन्यास पर काम जारी है.

आपकी रचना प्रक्रिया क्या है?

मैं जो कुछ भी अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बोलूँगा वह बिल्कुल झूठ बोलूँगा. मेरे लिखने का कोई खास तौर- तरीका नहीं है. मैंने कोई भी कहानी एक बैठक में पूरी नहीं की है. कहानियां लंबे समय तक चलती रहती हैं. कहानी और पात्र के साथ संघर्ष चलते रहता है. कहानी लेखक के नियंत्रण –अनियन्त्रण के द्वन्द से आगे बढती है. दरअसल में लेखन एक जटिल प्रक्रिया है. लेखक की रचना प्रक्रिया को समझने में लोगों की उम्र निकल जाती है. किसी लेखक ने सच ही कहा है कि लेखक का निजी जीवन फूहर औरत का वार्डरोब होता है इसलिए इसमें कभी हाथ नहीं डालना चाहिए. कब क्या निकल आए और लेखक की बनी छवि टूट जाय, कहना मुश्किल है. रचनाकार का मूल्यांकन सिर्फ उसकी रचना से ही करना उचित है.

आपको किस साहित्यकार ने सर्वाधिक प्रभावित किया?

जिस तरह एक बालक के विकास में उसके माता –पिता, नाते –रिश्तेदार और उसके परिवेश का अहम योगदान होता है उसी प्रकार एक लेखक के निर्माण में भी उसके सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिवेश के साथ –साथ अपने पूर्ववर्ती एवं अन्य का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है. किसी के प्रभाव को कम या अधिक नहीं बताया जा सकता. लेकिन किसी के प्रभाव में आकर उसी का अनुकरण करते हुए लिखकर कोई बेहतर भी नहीं कर सकता. वैसे यह एक आलोचक की जिम्मेवारी है कि वह पता करे कि किसी रचना पर किसका प्रभाव दिखता है?

लोकप्रिय साहित्य एवं गंभीर साहित्य के बहस को आप किस रूप में देखते हैं?

साहित्य में इस तरह का बंटवारा बहुत पहले से होता रहा है लेकिन अंततः इसका कोई अर्थ नहीं है. जो लोकप्रिय है वह श्रेष्ठ या दीर्घजीवी हो कोई जरूरी नहीं और जो लोकप्रिय हो वह कूड़ा या क्षणभंगुर ही हो यह भी जरूरी नहीं. महत्वपूर्ण उदाहरण हैं भिखारी ठाकुर. वे अपने समय में भी लोकप्रिय थे और आज भी उनकी रचनाओं पर विमर्श चल रहा है, मंचन हो रहा है और उनकी लोकप्रियता बरकरार है. साहित्य का परिवेश सबसे मिलकर बनता है. अभी जो लोकप्रिय साहित्य प्रकाशित होता है उसको लेकर किसी प्रकार से भयभीत या चिंतित होने की जरूरत नहीं है. अगर उस साहित्य में जीवन होगा, हमारे समय का सुख –दुःख और अंतर्द्वंद्व होगा तो वह जीवित रहेगा नहीं तो नष्ट हो जाएगा. बाज़ार को लेकर बहुत भय व्यक्त किया जा रहा है लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि बाज़ार की जो खरीद –बिक्री के आंकड़े हैं वे साहित्य का मूल्य नहीं तय करते हैं और ना ही साहित्य को दीर्घ जीवन दे पाते हैं. अंग्रेजी में साहित्य को प्रचारित –प्रसारित करने की और बाज़ार में बेचने की पद्धति कुछ ऐसी है कि पाठकों तक पुस्तकों के पहुंचने में सुविधा होती है. हिन्दी में यह परम्परा ही नहीं रही है. अब कुछ प्रकाशक अपनी सीमाओं के बीच ही सही, ऐसा प्रयास कर रहे हैं और यह एक अच्छी बात है.

साहित्य के दलित साहित्य, स्त्री साहित्य आदि में वर्गीकृत होने को आप किस तरह से देखते हैं?

ये सारे बंटवारे साहित्य की दुनियां में तात्कालिक प्रभाव भले ही डाल लें लेकिन अंततः बचता वही साहित्य है जो मनुष्य की गरिमा की रक्षा कर सके.

लिखना आपके जीने की एक जरूरी शर्त है. थोड़ा स्पष्ट करें.

मेरे लिए लिखना जीने की शर्त है इन अर्थों में कि वह मेरे जीवन के लिए जरूरी है. अंदर की व्याकुलता, छटपटाहट को अभिव्यक्त करने की जरूरत है, जिसे मैं अपनी कहानियों एवं नाटकों में अभिव्यक्त करता हूं.

एक लेखक के लिए सम्मान और पुरस्कार के क्या मायने हैं?

यदि कोई सम्मान और पुरस्कार दे रहा हो और अगर आपको यह महसूस होता है कि यह सही मायने में सही भाव के साथ दे रहा है तो स्वीकार करना चाहिए नहीं तो छोड़ देना चाहिए. एक रचनाकार को उसकी रचनाएं जीवित रखती हैं पुरस्कार नहीं. लेखक को सिर्फ लिखना चाहिए.

भागमभाग वाली डिजिटल एज में लंबी कहानियों के बारे में आप क्या सोचते हैं?

जो पढता है वह लम्बी कहानियों को पढ़ेगा ही. जिसके पास समय नहीं है वह लम्बी क्या छोटी रचना को भी नहीं पढ़ेगा. मोबाइल, ई –पत्रिका आदि नये माध्यम हैं. मैं इसे बुरा नहीं मानता. लेकिन यह कहना निरर्थक है कि भागमभाग वाली डिजिटल एज में लोग चार पंक्ति की ही चीजों को पढ़ना चाहते हैं.

अभी के साहित्य और रंगमंच के बारे में क्या महसूस करते हैं?


समय के साथ चीजें तेजी से बदल रही हैं, माहौल से तालमेल के साथ आगे बढ़ रहीं हैं. एक ही जगह टिके रहने से नष्ट होने का खतरा रहता है. रंगमंच हो या साहित्य हर जगह बदलाव आता है और आते रहना चाहिए. परिवर्तन ही संसार का नियम है.

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सुषमा सिंहा की बहुत दिनों के बाद पर शहंशाह आलम की टिप्पणी

समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं। पेश है समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणीः-


'बहुत दिनों के बाद' ( सुषमा सिन्हा ) : घर लौटने के सुख का ख़्वाब बुनने की एक अप्रत्याशित दुनिया
● शहंशाह आलम

आज जब आदमी से उम्मीदें, सपने, घर, रोशनियाँ, स्मृतियाँ सब छीनी जा रही हैं, बदले में नाउम्मीदी, ख़ौफ़, फुटपाथ, अँधेरा और भीषण उदासी से लबालब भरी दुनिया हमें दी जा रही है, कोई अपना है, जो हमारे घर लौटने का ख़्वाब अब भी बुन रहा है : हमने ही तो चाहा था जाना घर से दूर / ताकि बचा रहे घर लौटने का सुख / आज बहुत दिनों के बाद / लौटी हूँ अपने घर / एक सुकून के साथ / दरवाज़े ने हँस कर मेरा स्वागत किया / खिड़कियों ने खुलते-खुलते / आख़िर पूछ ही लिया / उस दुनिया के बारे / जो खिड़की से दिखती ही नहीं / रोशनदानों ने हुलस कर कहा- हमने बचा रखी है / तुम्हारे लिए उम्मीद की कई किरणें / तन्हाइयों ने मुस्कुरा कर देखा मुझे / और गले लगा कर रोईं बहुत / बहुत दिनों के बाद / घर के कमरे, दीवारें, छत, बालकनी / ख़ामोश हसरत भरी नज़रों से देख रहे हैं / मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज़ / तेज़ हो आई है / देखा कि ज़ख़्म अब भी हरे हैं / और दर्द आज भी / हर जगह बिखरा पड़ा है / हिम्मत कर के फिर से / समेटने लगी हूँ उन्हें / कि हरकत हुई है घर में / घर जो ख़त्म हो रहा था / मैंने उसे बचाना चाहा / बहुत दिनों के बाद ( 'बहुत दिनों के बाद', पृ. 13-14 )। यह सच है कि 'घर' शब्द उस लोकशब्द की तरह है, जिसमें आदमी का अपना पूरा लोक झलकता है, आदमी की अपनी  गंध फैली मिलती है। समकालीन कविता के महत्व को बढ़ाने वाली स्त्री-कविता की ओजपूर्ण कवयित्री सुषमा सिन्हा की कविताओं का संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' की कविताएँ आदमी के घर को बचाने की कविताएँ हैं। 'बहुत दिनों के बाद' पंक्ति से सुषमा सिन्हा यह स्पष्ट करती जाती हैं कि आदमी के लिए यह दुनिया कितनी ज़रूरी है। यह कवयित्री की अपनी ताक़त है कि दुःख से भरे हुए समय में भी आदमी के घर यानी आदमी की दुनिया के लिए उम्मीदों के ख़्वाब बुनना चाहती हैं। यहाँ 'घर वापसी' का अर्थ यह भी है कि मुक्तिबोध ने जिन गढ़ों और मठों को तोड़ने के लिए अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, वे गढ़ और मठ फिर से बेहिसाब खड़े कर दिए गए हैं और यह निर्माण-कार्य आदमी के घरों को तोड़ कर किए जा रहे हैं। यह सुषमा सिन्हा अकस्मात नहीं बल्कि पूरे होशोहवास में रह कर कहना चाहती हैं कि आदमी के घरों को बचाने के लिए आदमी के विरुद्ध खड़े किए गए गढ़ों और मठों को ढाने ही होंगे। तभी आदमी की सच्ची घर वापसी होगी, जिस घर वापसी का सपना कुमार विकल ने कभी देखा था। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुक्तिबोध और कुमार विकल की ताक़त सुषमा सिन्हा के पास नहीं है, ना दावा, लेकिन मुक्तिबोध और कुमार विकल की उम्मीदें उनके पास हैं, जो हर नेक नीयत और सच्चे कवि के पास होती हैं : देखती हूँ / जिस घर में नहीं होतीं / माँ, बहन, बेटियाँ / तरसते हैं उस घर के लोग / इन ख़ूबसूरत रिश्तों के लिए / फिर सोचती हूँ / जिस घर में होती हैं / माँ, बहन, बेटियाँ / कैसे हो सकते हैं / उस घर के लोग बलात्कारी / माफ़ी माँगना चाहती हूँ / उन तमाम बेटियों से / जिन्हें जन्म देने के बाद / हम उनकी हिफ़ाज़त नहीं कर पाए / अफ़सोस करना चाहती हूँ / दुनिया की उन तमाम औरतों के लिए / जिनकी कोख से / इंसान की शक्ल में हैवान पैदा हुए / रोना चाहती हूँ / उन तमाम बहनों की क़िस्मत पर / जिनके भाइयों द्वारा / किसी माँ, बहन, बेटी के साथ / किया गया ऐसा घृणित कार्य / और पूछना चाहती हूँ / दुनिया के तमाम लोगों से / क्यों हो रहा किसी माँ का / दामन तार-तार / क्यों लुटी-पीटी-मारी जा रही हैं / हमारी जन्मी-अजन्मी बेटियाँ / क्या माँ होना गुनाह है / या फिर / माँ बनने लायक़ इंसान होना गुनाह है ( ' पूछना चाहती हूँ', पृ. 24-25 )।

     सुषमा सिन्हा का पहला कविता-संग्रह 'मिट्टी का घर' नाम से 2004 में शिल्पायन, दिल्ली से आया था। एक दशक से थोड़ा अधिक समय के बाद उनका यह दूसरा कविता-संग्रह 'बहुत दिनों के बाद' प्रकाशन संस्थान, दिल्ली से छप कर आना किसी घटना से कम नहीं है। पहले संग्रह से दूसरे संग्रह के बीच इस अंतराल का अर्थ यही है कि सुषमा सिन्हा ने इस अंतराल के बीच कविता के बोलने-बतियाने वाले बिम्बों को, कविता के सच्चे अभिप्रायों को काफ़ी हद तक पकड़ने-साधने का काम बख़ूबी किया है। इस बीच उन्होंने यह भी तय किया है कि कविता का जो सच्चा पक्ष है, उसे स्थगित नहीं किया जाए। इस दूसरे कविता-संग्रह की कविताओं की जीवनानुभूतियाँ इस प्रमाण हैं। इस नए संग्रह की कविताओं में कविता को पूरी महीनी से पकड़े रहने का गुण भी उन्होंने सीख लिया है और यह क़ाबिले-तारीफ़ है। ऐसा कविता के प्रति उनके भीतर आए गहरे आत्मविश्वास की वजह से भी होता दिखाई देता है। कविता का यह संतुलन समकालीन स्त्री-कविता का संतुलन कहा जाना यहाँ पर ज़्यादा उचित होगा। सुषमा सिन्हा का कविता-स्वर आधी आबादी का अपना स्वर है, जो पुरुष-समाज की चालाकी, धोखेबाज़ी, काइयाँगिरी के विरुद्ध ग़ुस्से, आक्रोश के साथ-साथ टूटन और घुटन को परदे से बाहर लाता है। इसका यह अर्थ नहीं निकाल जाना चाहिए कि ये कविताएँ किसी टूटी और घुटी हुई स्त्री के पक्ष का स्वर मात्र हैं बल्कि ये कविताएँ उन स्त्रियों की कविताएँ हैं, जिनमें लोहा लेने का हुनर आ गया है : जिस डर की आशंका से / काँप जाते हैं हम हमेशा / वक़्त बुरा हो तो / गुज़र जाता है वह हम पर / लेकिन बर्दाश्त करने की हमारी / ज़बर्दस्त है क्षमता / झेल कर वैसे लम्हों को भी / रह जाते हैं हम ज़िंदा / यूँ ही नहीं हम चलते हैं / नंगे पाँव जलते हुए अंगारों पर / नाचते हैं शीशे के टुकड़ों पर / गिर पड़ने की हद तक / चलते हैं पतली रस्सियों पर / मारते हैं कोड़े अपने बदन पर / दिखाते हैं अजीबो-ग़रीब करतब / जान पर खेल जाने का / ना जाने कितनी बार गुज़रते हैं हम / डर की हद से / कि डरते नहीं अब किसी भी बात से / दर्द की हद भी जानते हैं हम / और यह भी जानते हैं / कि मृत्यु से भी ज़्यादा / भयावह होती है भूख / यह भूख जब वक़्त बुरा हो तो / करवा ही लेती है हमसे / सभी तरह के काम / फिर भी नहीं होती है ख़त्म ( 'भूख', पृ. 15-16 )। दरअसल सुषमा सिन्हा की कविताएँ किसी ढोल की तरह डिन-डिन-डिन डिडिक-डिडिक की या ढम-ढम-ढम की आवाज़ ना भी निकाल पाती हैं तब भी ये कविताएँ उस नदी की तरह ज़रूर हैं, जो जब तक शांत है, तभी तक ख़ामोश दिखाई देती है, लेकिन तेज़ हवाओं के मौसम में वबाल मचा देने का दमखम रखती है। मैं सुषमा सिन्हा की कविताओं की इन्हीं अदाओं पर मोहित हूँ। ये कविताएँ क्रांतिकारी नहीं भी हैं तब भी इन कविताओं में एक स्त्री की आग दबी हुई ज़रूर है : छोटी-सी मुनियाँ / खेला करती / लड़कों के ही सारे खेल / गोली, कंचे, गिल्ली-डंडे / पतंगें भी उड़ाती ख़ूब ऊँचे / ढेर सारे सपनों के साथ / पड़ोस की चाचियाँ / शिकायत करतीं अम्माँ से / बिगड़ रही है तुम्हारी बेटी / दिन-दुपहरिया घूमती रहती है / मुहल्ला भर के छोकरों के साथ / समझातीं ऊँच-नीच / किसे पता वही मुनिया / लड़कों से ही कर-कर के मुक़ाबला / जीत लेगी अपने हिस्से के सारे कंचे / गिल्ली-डंडे से मारते हुए / पा लेगी एक मुकाम / और पतंगों के साथ-साथ / पहुँच जाएगी एक ऊँचाई पर ( 'मुनियाँ', पृ. 32-33 )।

     सुषमा सिन्हा की कविताएँ अपने आसपास के जीवन के लिए दुष्कर कुछ भी नहीं रचतीं बल्कि अपने शांत मिज़ाज के हिसाब से जीवन की कठिनाइयाँ दूर करने का भरसक प्रयास करती हैं। यहाँ ऐसा करते हुए सुषमा सिन्हा समकालीन कविता को शैली की कोई नवीनता अथवा प्रतीकों का कोई अनूठापन ना भी दे सकी हैं, लेकिन समकालीन कविता को नई गहराई और व्यापकता ज़रूर देने में सक्षम हुई हैं। एक स्त्री, जिसका जीवन सिर्फ़ अपना जीवन नहीं है, अगर रात के अपने एकांत से कविता के विश्व के लिए करवटें बदल-बदल कर कुम्हार के चाक-सा कुछ-कुछ बढ़िया रच रही हैं तो विश्व-कविता के लिए असंभव में संभव जैसा मैं मानता हूँ। सुषमा सिन्हा के इन्हीं प्रयासों को सराहते हुए समकालीन कविता के महत्वपूर्ण कवि अरुण कमल लिखते हैं, 'तमाम धूल-धक्कड़ और साहित्य लोक के आंतरिक प्रपंचों से दूर, सुषमा जी ने अपने कौटुम्बिक तथा प्रशासकीय दायित्वों का सफल निर्वाह हुए अपने ही आस-पड़ोस, घर-बार और चतुर्दिक जीवन को उत्तम कविता में बदला है। यहाँ कवि का निजी संसार तो है ही, साथ ही वह कठोर प्रस्तर-जीवन भी है जो झारखंड के आदिवासी-लोक का प्रतिनिधित्व करता है।' यह सच है कि सुषमा सिन्हा की आवाज़ एक नए मौसम के आने की आवाज़ है। यह आवाज़ ऐसी है जो बिना किसी अवरोध के हम तक पहुँचती है : हर रोज़ हम / ना जाने कितनी सीढ़ियाँ चढ़ते हैं / और ना जाने कहाँ-कितनी / उतर जाते हैं, अपने-आप / हर रोज़ हम / ना जाने कितने सपने बुनते हैं / और ना जाने कब कितने सपने / उधड़ जाते हैं, चुपचाप / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी बातें तुमसे करते हैं / और ना जाने कितनी चाहतें / छुपा जाते हैं, ख़ामोशी में / हर रोज़ हम / वक़्त की उँगली थाम / शुरू करते हैं चलना / और वक़्त अपनी उँगली छुड़ा / निकल जाता है हमसे बहुत आगे / हर रोज़ हम / ना जाने कितनी कोशिशें / करते हैं जीने की / सहेजते रहते हैं जीवन को / सपनों को, तुमको और वक़्त को / जबकि यह जानते हैं हम / कि ख़त्म हो रहा है / धीरे-धीरे सब कुछ / बहुत ही ख़ामोशी से ( 'हर रोज़', पृ. 81-82 )।
शहंशाह आलम


     सुषमा सिन्हा का लहज़ा यानी बोलने का, बातचीत करने का ढंग अपना है, ख़ास है, सलीके वाला है। यही तमीज़, यही शऊर उनकी कविताओं ने उन्हीं से सीख रखा है। एक ख़ास बात यह भी नोट करने वाली है कि सुषमा सिन्हा की आत्मा जितनी पाक-साफ़ है, उनकी कविताएँ उन्हीं की आत्मा जैसी हैं। इसलिए कि सुषमा सिन्हा जिस लफ़्ज़ को छू भर देती हैं, वह नया हो जाता है। इसीलिए मैंने यहाँ लिखा कि सुषमा सिन्हा की आत्मा उनके एक-एक शब्द में छुपी दिखाई मुझे देती है। इसीलिए उनकी कविताएँ अपने पाठ किए जाते समय किसी को तोड़ती नहीं, जोड़ती हुई चलती हैं : अपने घर को, अपने प्रेम को, अपने आस-पड़ोस को, अपने संघर्ष को, अपने अतीत-वर्तमान को और हमारे जीवन के खंडहर को भी। ये कविताएँ बारिश के बाद धुल कर साफ़ हुए मकान की तरह हैं। संग्रह की 'अच्छे दिनों को याद करते हुए', 'रेस', 'एहसास', 'विनाश', 'तुम्हारा सपना', 'संभावनाएँ', 'चौराहा', 'इच्छा', 'सपने', 'माँ' ( दो कविताएँ ), 'घर', 'यादें', 'पानी', 'रास्ता', 'मदद', 'चूल्हा-रोटी-औरत', 'हिम्मत', 'अँधेरा', 'चाहत', 'भीड़', 'सच', 'शक', 'प्रेम का अर्थ', 'डर तो होता है', 'बदलाव', 'ख़बरें', 'आख़िर कब तक', 'रोक', 'असंभव', 'ख़ुशियाँ', 'मृत्यु' आदि कविताएँ हमारे समय को बग़ैर किसी संशय के प्रकट करती हैं और प्रेरित भी। सुषमा सिन्हा अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन का पुनर्संयोजन जिस तरह करती हैं, यह उनके कविता-समय का भी पुनर्संयोजन है। ऐसा इसलिए भी है कि कविता मनुष्य को उसके कठिन दिनों से मुक्ति दिलाने का माध्यम भी है : रेगिस्तान में ओस की बूँद / आँधियों में थरथराता दीया / काली-अँधेरी रात का ध्रुवतारा / हिम्मत देता हुआ / अनजानी-अनचाही / आवाज़ों के बीच / ठहरी-सी एक आवाज़ / घने जंगल से गुज़रती हुई / पतली-सी एक राह / भागते-दौड़ते रास्ते पर / मील का एक पत्थर / एक सुकून देता हुआ / 'जीवन में प्रेम' / बस ऐसा ही तो है ( 'जीवन में प्रेम', पृ. 116 )।
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बहुत दिनों के बाद ( कविता-संग्रह ) / कवि : सुषमा सिन्हा / प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान / 4268/B-3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 / मूल्य ₹ 250
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