![]() |
| प्रभात रंजन |
प्रभात रंजन की नयी
किताब “कोठागोई” के आने की खबर मात्र से मन में बेचैनी थी कि आखिर चतुर्भुज स्थान
के बारें में क्या लिखा गया है? मन में एक ही बात समायी थी कि इन्होंने उन बदनाम
गलियों में क्या देख लिया कि कलम उठाने को मजबूर हो गये? इसी बीच मालूम हुआ कि अक्सर
तिरहुत क्षेत्र को कलमबद्ध करने वाले इस इंसान ने तवायफो की जिंदगी पर कुछ लिखा
है| तब मन में बात आयी कि फिर तो ये अधूरी
कहानी ही होगी, क्योंकि तवायफो की जिंदगी सिर्फ चतुर्भुज स्थान तक ही सीमित तो
नहीं है| लेकिन जब “कोठागोई” मेरे हाथ लगी तो, दंग रह गया| इस कोठागो ने साहित्य
में कोठागोई के बहाने एक नयी विधा से ही परिचय नहीं कराया है, बल्कि बहुत ही
साफगोई और अपने कठिन परिश्रम से चतुर्भुज स्थान की एक लंबी परम्परा को हमारे सामने
प्रस्तुत भी किया है|
पहली बार जाना कि लखनऊ, बनारस जैसे संगीतमय वातावरण को छोड़ लोग यहाँ आकर गाने में फक्र महसूस करते थे| पन्नाबाई, भ्रमर, गौहरजान, और चंदाबाई आदि जैसे नगीने किस प्रकार मुजफ्फरपुर के इस बाज़ार में आये, और किस तरह अपनी जिंदगी को आबाद करके, वे यहाँ से चले गये? तवायफ कितने प्रकार की होती हैं? और उनके जिंदगी की क्या ठसक और कसक थी? मुजफ्फरपुर ही नहीं, बल्कि समस्तीपुर, सीतामढ़ी और नेपाल तक में इनकी कितनी पैठ थी? कितने ऐसे हुए जो इन तवायफों से ठोकर खाकर अपमान और जलालत की जिंदगी ही नहीं झेली, बल्कि उसी चतुर्भुज मंदिर के पास फटेहाल में भीख मांगने को भी मजबूर हुए? समय के साथ चतुर्भुज स्थान का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य बदलता चला गया| मुजरा के साथ-साथ ठुमरी और दादर जैसे संगीतों का दिन ढलने लगा| आधुनिकता के दौर में गीतों के साथ नाच का जो प्रचालन शुरू हुआ, वह चतुर्भुज स्थान जैसे संगीत और कला के समृद्ध केंद्र को पतन की ओर धकेलने लगा| सिनेमाघरों आदि की शुरुआत ने भी इनकी जिंदगी के मायने ही नहीं बदले जीने और कला -प्रदर्शन के तरीके को भी बदल डाला| बाज़ार में कला कला ना रह कर एक बाजारू वस्तु बन गया| बाद के दिनों में तो शामियाना में गोलियों की बौछार होने लगी| चंदाबाई का नाम सुनते ही टेंट वाले, टेंट का पूरा दाम पहले ही वसूल लेते थे| 1980 के बाद के दिनों में तो, देर रात छापेमारी और होटलों में तवायफों के मरने की भी बातें आम होने लगी| किस्सागो ने लघु प्रेम की बड़ी कहानियों के माध्यम से चतुर्भुज स्थान के उत्थान और पतन के एक लंबे इतिहास को कहानी के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया है वह बेमिशाल है|
मजे की तो बात ये है
कि कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस धरती पर अपने पैर नहीं रखे, बल्कि शरतचंद्र
चटोपाध्याय को पारो के रूप में सरस्वती से भी यहीं मुलाकात हुई थी| और यहाँ से
लौटने के बाद ही उन्होंने देवदास की रचना की थी| साहित्यकार ने “दुनिया दुनिया
जीवन जीवन” वाले अध्याय में यह राज भी खोला है कि इस किताब को कैसे, क्यों और किन
लोगों की मदद से लिखा गया है| अंतिम शब्दों में यह भी बताया गया है कि पृथ्वीराज
कपूर जानकी वल्लभ शास्त्री के पास अक्सर क्यों आते थे?
हिंदी, मैथिली और
वज्जिका में लिपटी भाषा शैली जितनी मनमोहक है, शब्दों का चयन उतना ही सरल और सटीक
है| पढ़ने बैठने पर 12 अध्यायों से होते
हुए, 200 पन्नों का अर्ध आत्मकथात्मक शैली में लिखा यह किताब धीरे - धीरे कब खत्म हो गया पता ही नहीं
चलता|
लेखक ने बहुत ही चालाकी
से किताब के प्रारंभ में ही सारी कहानियों को चतुर्भुज स्थान की कसम खाते हुए झूठी
करार दी है, जो कि सिर्फ आपको गुदगुदाएगा| आप आसानी से समझ सकते हैं कि इन शब्दों
का प्रयोग किन चीजों से बचने के लिए किया गया है? फिर भी यदि कोई किताब पर अंगुली
उठाना चाहे तो यही कह सकता है कि भाई तवायफों की कहानी में उसके लिखे जाने की
प्रक्रिया तक की बात तो ठीक है लेकिन जानकी वल्लभ शास्त्री और रणबीर कपूर आदि की
चर्चा करने की क्या जरुरत थी? क्या लेखक कुछ अधिक बताने के अपने लालच को नियंत्रित
नही कर सका? लेकिन सच यह है कि शास्त्री जी का घर भी इसी चतुर्भुज स्थान में था और जब बात रचनात्मकता और कला का हो तो फिर उन्हें कैसे छोड़ा जा सकता था| पूरे संस्कृति कि कहानी यूँ ही तो बयां नही हो जाएगी?
मुखरों के साथ शुरू होता हर अध्याय भी इसकी प्रस्तुति
की एक और विशेषता ही है| साथ ही साथ प्रसिद्ध गायिका मालिनी अवस्थी की लिखी भूमिका और
फ़िल्मकार इम्तियाज अली का सन्दर्भ लेखन भी काफी प्रभावकारी है| देखा जाय तो किताब प्रशंसनीय ही
नही बल्कि संग्रहणीय भी है|

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें