शनिवार, 26 सितंबर 2015

निर्लज्ज (सुशील कुमार भारद्वाज)

                       निर्लज्ज ! 

                                        
सुशील कुमार भारद्वाज


वाराणसी – सियालदह एक्सप्रेस ज्योंहि आरा जंक्शन पहुंची, लोग प्लेटफोर्म पर धक्का-मुक्की करने लगे. दरवाजे तक लोग ठसे थे. उस भीड़ को चीरते हुए सलवार शूट में एक लड़की काफी जद्दोजहद के साथ आगे बढ़ी जा रही थी. उसका एक हाथ दरवाजे के रड को थामे था तो एक हाथ एक अधेड महिला को बेतरतीब खींचे जा रहा था. जबकि महिला भीड़ पर झुंझला रही थी – “सबके गेटे पर बैठेल रहता है, अन्दरवा जगहें न है का?”
इतने में उस महिला को सहारा देते हुए एक आदमी सबको धकियाते हुए आगे बढ़ा– “अरे तुमको उससे क्या मतलब है कि कौन क्या कर रहा है? तुम अपना सीट पकडो ना?” महिला भी तुनक कर बोली- “चलिए न रहे हैं जी, भीड़ न दिख रहा है का?”
आगे बढ़ने के बाद वह महिला, बहन जी- भाई जी करते किसी तरह जबरन अपने लिए जगह बना ली. फिर लड़की को इशारा करते हुए बोली- “आओ यहीं तुम भी बैठ जाओ”. लड़की इधर –उधर देखने के बाद सामने वाली सीट में किसी तरह अडजस्ट कर ली. फिर लड़की साथ खड़े आदमी से बोली – “पापा जी आप बैठ जाइये हम खड़ा ही रहेंगे.”
वह आदमी बोला – “तुम माँ- बेटी ठीक से बैठो न हमरा टेंसन काहेला लेती हो? एकाध स्टेशन के बाद हमको भी कहीं न कहीं जगह मिल ही जाएगा.”
गाड़ी खुली तो लड़की इधर – उधर तांक- झांक करने लगी. लगा जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो. अचानक खिडकी से दरवाजे की ओर नज़र पड़ते ही उसका चेहरा खिल उठा. उसकी माँ पूछ बैठी – “का है रे?” वह मुंडी हिलाते हुए बोली – “कुछो ना” और इधर-उधर देखने लगी.
गाड़ी ज्योंहि अगले स्टेशन पर रूकी तो लड़की गेट की ओर चल पड़ी. उसके मम्मी –पापा एक दूसरे को देखने लगे, लगा आँखों –आँखों में वे एक दूसरे से सवाल – जबाब कर रहे हों. गाड़ी खुलते ही वह लड़की आकर अपने सीट पर बैठ गई. इशारे-इशारे में वह औरत उस लड़की को कुछ समझाने लगी, लेकिन वह अनसुना करते हुए सिर्फ मुस्कुराती रही.
वह लड़की बिहटा स्टेशन पर फिर नीचे उतर गई. इस बार पीछे-पीछे उसके पिता भी भीड़ को चीरते हुए नीचे आ गए. नीचे आते ही उनकी आँखें फ़ैल गई. देखा कि लड़की एक लड़के का हाथ पकड़ कर हंस-हंस के बात कर रही थी. उन्होंने सख्त आवाज में कहा– “यहाँ क्या कर रही है? चलो अंदर.” लड़की कुछ पल अपने पिता को देखने के बाद फिर अपने गप्प में भीड़ गई. इतने में वह आदमी गुस्से से तमतमाता उठा और खिडकी के पास आकर चिल्लाया –“ले जाओ अपनी निर्लज्ज बेटी को अंदर…. निर्लज्जता की हद हो गई है” इतना सुनते ही धरफराते हुए वह औरत भीड़ से बाहर आयी और लड़की का हाथ खींचते हुए अंदर ले गई. और इधर उसके पिता उस लड़के से उलझ गए –“शर्म नही आती है आवारागर्दी करते?”
लड़के ने तपाक से जबाब दिया – “प्यार करना आवारागर्दी नही है. और जब आपकी बेटी आपके वश में नहीं है तो मुझे कुछ भी बोलने का आपको क्या हक है?”
गुस्से में वह आदमी बोला –“ढेर बोलता है. चलो पटना सब पता चल जाएगा.”
लड़का – “पटना में का है….. ”
लड़का और कुछ बोलता उससे पहले ही उस अधेड आदमी ने उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ रशीद कर दिया. थप्पड़ की आवाज से आसपास में सन्नाटा छा गया और लोग अवाक् हो उसे ही देखने लगे.
लोग अचानक इस घटना पर सिर्फ एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे और पूछ रहे थे कि आखिर हुआ क्या? इतने में गाड़ी ने सिटी दे दी और लोग चढ़ने के लिए गेट की ओर लपके. गाड़ी चलने लगी तो प्लेटफोर्म पर ही अपना गाल सहलाता उस लड़के ने गाड़ी के दरवाजे पर से ही उस आदमी को नीचे खींच कर पीटना शुरू कर दिया. जब तक झगडे की बात गाड़ी में गूँजती तब तक गाड़ी गति में आ चुकी थी और माँ – बेटी में से कोई नीचे नहीं उतर सकी. नीचे सिर्फ वह आदमी पिटता हुआ नजर आ रहा था.
भीड़ से एक आवाज आयी – “जब बेटा–बेटी हाथ से निकल जाता है तो माँ-बाप का यही हाल होता है.”
दरवाजे पर से आते ही महिला ने बेटी को एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा – “अब मन खुश हुआ न रे हरामजादी… मरयो का हे न गई? ढेर जवानी के जोश चढल है?”
इतने पर तमक पर लड़की बोली – “मार काहे रही हो? हम क्या किये हैं? पापा उससे लड़ने काहे गए?… अपन जवानी के दिन भूल गई जो हमको बोल रही हो?”
महिला – “हम तोरे जैसन छिन्नरपन नहीं करते थे. तुम्हरे जैसे निर्लज्ज नहीं थे. हमारे ज़माने में लोग शांति से अपने माँ–बाप की बात मानते थे. तुम्हरे जैसे कलंकनी नहीं थे. देखो तो इस निर्लज्ज को… कैसे जुबान लड़ाती है?”
लड़की फटते हुए बोली –“तुमको मौका नही मिला तो उसमें मेरी गलती है? उसका कुंठा तुम मुझ पर उतारोगी? बहुत बोल ली. अब चुप रहो वर्ना…..” दांत पिसते हुए लड़की खिडकी की ओर देखने लगी.
इतना सुनते ही सब अवाक् हो उस लड़की के व्यवहार को देखने लगे. सब के सब चुप. इतने में गाड़ी अगले स्टेशन पर रूकी और भीड़ के साथ वह माँ – बेटी भी नीचे उतर गई. फिर गाड़ी आगे की ओर बढ़ी और लोग बदले जमाना की बात करने लगे.




रविवार, 6 सितंबर 2015

कलबुर्गी की हत्या के बाद का तमाशा(सुशील कुमार भारद्वाज )



                   कलबुर्गी की हत्या के बाद का तमाशा
                              ( सुशील कुमार भारद्वाज)





              एम एम कलबुर्गी
कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद जो तमाशा दिख रहा है उससे यक़ीनन स्वयं प्रो एम एम कल्बुर्गी की आत्मा दुखी होगी. निर्ममता और नृशंसता की हद है कि लोग तरह तरह की बयानबाजियां कर रहें हैं. कोई कहते हैं कि कल्बुर्गी मुस्लिम होते तो कितना हायतोबा मचता? कोई कहते हैं कांग्रेस की सरकार है फिर सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी ने चुप्पी क्यों लाद रखी है? लगभग किसी न किसी शहर में किसी न किसी संगठन के द्वारा प्रतिरोध मार्च प्रतिदिन निकाले जा रहे हैं उनमें बहुत सारे ऐसे भी हैं जिनका विचार उनसे अलग रहा है. बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी है. लेकिन हस्याद्पद स्थिति ये है कि कुछ लोग खेमेबाजी का भी खेल खेल रहें हैं. बात यहीं कहाँ रूकी? एक प्रसिद्ध लेखक ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार राशि सहित लौटाने का घोषणा किया तो इस पर एक अलग खेल शुरू हो गया. कोई उन्हें पलटदास कहता है तो कोई उनके ऐतिहासिक कृत्यों पर ऊँगली उठा रहा है.

कोई यह नही कह सकता कि आगे किसी तरीके की हत्या अब न होगी. न ही कोई यह कह रहा है कि आगे की कार्य योजना क्या हो? कुछ लोगों की गंभीरता की बातों को अलग कर दें तो सारा नजारा किसी तमाशा से कम नही दिखता है जहाँ अपना फोटो खिंचवाने और नाम उछालने का मौका लोगों को ठीक उसी प्रकार मिल गया है जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान के समय सेल्फि का मिल गया था. क्या यह किसी क्रूर मजाक से कम है?

लोगों ने कन्नड़ भाषा या कलबुर्गी के साहित्यों की ना तो गंभीरता से चर्चा की न ही उनके साहित्य को बड़े फलक या विश्व के बड़े पाठक समुदाय के बीच लाने की कोई कोशिश या संकल्प किया. उनके पीछे जो परिजन हैं उनकी सहायता के लिए कितने हाथ आगे सही मायने में बढे कहना मुश्किल है. ऐसी परिस्थिति में प्रो एम एम कुलबुर्गी अब क्या सोचते होंगे ठीक ठीक कुछ कह पाना मुश्किल ही लगता है. लेकिन इतना तो तय ही है कि जितना वे जिन्दा रहते दुखी नही हुए होंगें उससे कहीं अधिक आज वे अपनी मौत के बाद हो रहे तमाशे से दुखी होंगें. लोगों को कम से कम किसी के मौत के बाद खेले जा रहे इस असंवेदनशीलता से थोडा उपर उठने की कोशिश जरूर करनी चाहिए.

शनिवार, 15 अगस्त 2015

सुशील कुमार भारद्वाज की लघुकथाएं



१. पगली का तौलिया (लघुकथा)

            सुशील कुमार भारद्वाज 

बाघ एक्सप्रेस के समस्तीपुर जंक्शन पहुंचते ही, भीड़ के साथ एक पगली भी उसमें चढ आयी| गर्मी में भी मलिन स्वेटर पहने, गंदे व उलझे बालों में सबके आकर्षण का केंद्र बनी वह सीट-दर–सीट घूमती रही| कभी कोई प्रेम से कहता –“नीचे उतार जाओ|” कभी दूर करने के लिए –“उधर चली जाओ|” और कभी सख्त आवाज कान से टकराती – “भागो|“

और वह सुना – अनसुना करते प्रवेश द्वार के पास पालथी मारकर बैठ गई|

एक आवाज आयी –“पागलों को कोई देखने वाला नही है| जहाँ देखो वहीँ नज़र आ जाएं|”

दूसरी आवाज आयी –“कैसे हैं, इसके नाते – रिश्तेदार|”

तभी पीछे से आवाज आयी – “स्वार्थी दुनिया में नाता –रिश्ता क्या होता है, भाई?”

आवाज अचानक रुक गई| जींस – टॉप पहने एक युवती बर्थ नम्बर १ से उठी और उसने अपने बैग से एक नया तौलिया निकालकर पगली को ओढा दिया| उसमें क्लिप भी लगा दिया, ताकि कहीं गिरे नहीं| उसके बालों को कंघी किया और फिर अपनी जगह पर लौटकर कान में ईयरफोन लगा कर बैठ गई| शांति के माहौल में सभी की निगाहें कभी उस युवती की तरफ जातीं तो कभी पगली की तरफ| लेकिन युवती की इस हरकत ने सबके अंदर हलचल मचा दी थी| इन सबसे बेफिक्र वह युवती कभी अपनी डायरी में कुछ लिखती, तो कभी कोई चित्रकारी करती रही| अंग्रेजी का कोई उपन्यास उसके बैग से झांक रहा था| ट्रेन अपनी गति में थी और वह पगली अपने आप में खोयी कभी आंख मटकाती तो कभी मुस्कुरा रही थी|

अचानक हलचल हुई जब गाड़ी ढोली स्टेशन पर पहुंची और भीड़ उतरने को आतुर हुई| भीड़ से एक आवाज आयी – वाह! पगली का तौलिया तो एकदम नया है|”

और जब भीड़ छंटी तो सबके मुंह खुले के खुले रह गए| पगली का तौलिया गायब हो चुका था और पगली पूर्ववत हालत में बाहर की ओर देख रही थी| 

सुशील कुमार भारद्वाज            




.कामवाली की जाति  
                   सुशील कुमार भारद्वाज            



सारिका बहुत परेशान थीं |घर के सारे काम  खुद ही करने पड़ते थे | अंत में उसने पडोसी के घर काम  करने वाली रागिनी से मदद मांगने की सोचीं |और अगली शाम ज्योंही उनकी नज़र रागिनी पर पड़ी उन्होंने लपक कर खुद को उसके  आगे करते हुए बोली - "अरे रागिनी ! क्या मुझे भी अपने जैसी काम  करने वाली को बुला दोगी ? .... अब क्या बताऊँ ? खुद से सारा काम  हो नहीं पाता है | सुबह से शाम तक में क्या क्या करती रहूँ ? "

मुस्कुराते हुए रागिनी जबाब दी  -" आदमी की भी कोई कमी होती है ? बस अच्छे लोग मिलने चाहिए | मैडम के यहाँ काम  से फुर्सत ही नहीं मिलती वर्ना मैं ही कर देती |"

आशा की किरण मिलते ही बोली - " सच पूछो तो मेरी भी यही इच्छा थी, पर सीधे कैसे कहती ? खैर किसी वैसी को देखना जो घर के साफ़ सफाई के साथ साथ रसोई में भी कभी कभी मदद कर दे |"

"मैडम ये भी कोई कहने की बात है |"

"रागिनी तब तो लगता है की मेरा काम जल्दी ही हो जायेगा | पैसे की कोई बात नहीं है जो उचित होगा दूंगी | बस एक बात का ध्यान रखना की वो किस जाति धर्म की है? तुम सब कुछ समझ  रही हो मैं क्या कहना चाह रही हूँ ?"

गौर से रागिनी सारिका के चेहरे पर देख रही थी और बात खत्म होते ही बोली -" मैडम एक बात पुछूं ?"

"हाँ हाँ पूछो , क्या पूछना चाहती हो ? " - सारिका हुलस कर बोली |

रागिनी सारिका के चेहरे पर नज़र गडाये हुए  ही बोली - "मैडम सिर्फ काम करने वाली की  जाति - धर्म पर ही ध्यान देना चाहिए? या जिसके यहाँ काम करना है उसके जाति - धर्म का भी ध्यान रखना चाहिए ?"

सारिका इस सवाल के  जबाब में सिर्फ रागिनी को फटी आँखों से देखती रह गयी
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