बुधवार, 24 अगस्त 2022

विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत

 बिहार की धरती पर पले-बढ़े विनोद कुमार उर्फ़ विनोद अनुपम ने हिंदी विषय से स्नात्तकोत्तर करने के बाद एफ.टी.आई.आई. पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन में सर्टिफिकेट ग्रहण किया। 1988  में बेस्ट यूथ राइटर का राज्यस्तरीय पुरस्कार पाने वाले विनोद अनुपम ने 2002 में बेस्ट फिल्म क्रिटिक के लिए नेशनल फिल्म अवार्ड जीता। 65वीं नेशनल फिल्म अवार्ड में जूरी मेम्बर के रूप में अहम भूमिका निभाने के अलावे ये बिहार संगीत नाटक अकादमी के सचिव भी रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये विभन्न फिल्म संस्थान के सदस्य रहे हैं। पटना कलम, राजभवन संवाद, गोरैया, बिहार समाचार एवं उधावना आदि पत्रिका का सम्पादन इन्होंने किया। आपने दूरदर्शन के कुछ धारावाहिक के लिए पटकथा भी लिखी है। लगभग तीन दशक से आप प्रभात खबर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, आज, कथादेश, पाखी, इंडिया टुडे, सारिका, गंगा, वर्तमान साहित्य, सन्डे इन्डियन, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, आदि पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म समीक्षा, आलेख आदि लिख रहे हैं। प्रस्तुत है विनोद अनुपम से सत्यजीत राय पर केन्द्रित सुशील कुमार भारद्वाज की बातचीत के कुछ अंश।

 

Ø आपने सत्यजीत राय की सबसे पहली फिल्म कौन-सी देखी?

 

मैंने कौन-सी फिल्म देखी, महत्वपूर्ण यह नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि भारत में सिनेमा का कोई भी विद्यार्थी सिनेमा पढने, समझने, सीखने की शुरुआत सत्यजीत रे की ही फिल्मों से करता है। हम भी जब सिनेमा समझने के ख्याल से पटना, प्रकाश झा की संस्था “अनुभूति” द्वारा आयोजित ‘फिल्म भाषा और तकनीक’ की कार्यशाला में पहली बार भाग लेने आए, तो सत्यजीत रे ने ही सिनेमा का ककहरा सिखाने को उंगली थामी। फिल्म थी पथेर पंचाली, तब से यह फिल्म न जाने कितनी बार सामने आयी, शायद सौ से भी अधिक बार, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि खत्म होने के पहले हट गए। पथेर पंचाली की यही खासियत है, आपको किसी इमोशनल कविता की तरह बांधे रखती है। ब्लैक एंड व्हाइट उस छोटी सी फिल्म को देखने के बाद वही नहीं रह जाते, जो आप होते हैं। फिल्म आपको बदल देती है, आप थोडे और ज्यादा संवेदनशील, थोडे और विनम्र, थोडे और खूबसूरत इंसान बन जाते हैं। मेरा तो मानना है कि एटनबरो की गांधी की तरह इस फिल्म को भी बार बार दिखाया जाना चाहिए। ताकि हर पीढी इसके इमोशन को महसूस कर सके।

 

 

Ø  सत्यजीत राय की किस फिल्म ने आपको सबसे अधिक और किस रूप में प्रभावित किया?

देखिए, बेस्ट आफ द बेस्ट चुनना काफी मुश्किल होता है। सत्यजीत रे ने सिनेमा को एक सार्थकता दी,एक प्रतिबद्धता दी। उनकी फिल्मों में  प्रस्तुति और तकनीकि विविधता भले ही दिखती है,प्रतिबद्धता से समझौता वे नहीं करते। चाहे बच्चों के लिए ही वे क्यों नहीं फिल्म बना रहे हों? या पारस पत्थर जैसी फंतासी, दर्शकों को तो वही पहुंचता था जो वे पहुंचाना चाहते थे। जाहिर है उनकी हर फिल्म आपको प्रभावित करती है, मैं तो यहां तक कहता हूं कि जब आप सद्गति देखते हैं तो पथेर पंचाली को याद नहीं करते, जब शतरंज के खिलाडी देखते हैं तो जलसाघर को याद नहीं करते। यह सत्यजीत रे की माध्यम, समय और समाज तीनों के प्रति गंभीर समझ के कारण संभव हो पाता है। लेकिन इस सबके बीच पथेर पंचाली जिस तरह कम्युनिकेट करती है, वह उस फिल्म को विल्क्षण बना देती है।छोटे छोटे दृश्यबंध अपने आप में पूरी कथा लेकर आते हैं। इसकी सबसे बडी खासियत इसकी गीतात्मकता या कहें लिरिकल होना भी है। सत्यजीत रे बंगाल के एक समाज के सबसे अंतिम पंक्ति के एक परिवार के दुख को सार्वभौमिक बना देते हैं। यह हालांकि इसी क्रम में बनी तीन फिल्मों की ट्रायलाजी का पहला अंश है, लेकिन दुनिया के दुख के अहसास के लिए मैं इसे के जरुरी फिल्म मानता हूं।

 

 

Ø  वर्तमान सिनेमा पर सत्यजीत राय के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?

 

सत्यजीत रे से किसी ने पूछा था, आप किसके लिए फिल्में बनाते हैं। रे साहब ने बेहिचक कहा था,अपने लिए।उन्होंने आगे कहा था, शब्द अलग हो सकते हैं,बात यही थी कि जब तक आप अपने से ईमानदार नहीं होंगे, दर्शकों से भी ईमानदार नहीं हो सकते। उन्होंने कहा था कि फिल्म मेरे सौंदर्यबोध पर खरी उतरेगी तभी दर्शकों के सौंदर्यबोध को भी संतुष्ट कर सकती है। दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर हम अपने सौंदर्यबोध को कमतर नहीं कर सकते। इस संदर्भ में यदि वर्तमान सिनेमा को देखें तो निराशा होती है। मुख्यधारा की अधिकांश फिल्में दर्शकों की पसंद को ध्यान में रख कर बन रही है। अब तो स्थिति यह है कि वह दर्शक भी  आज सिनेमा व्यवसाय से गौण हो गए हैं, तकनीक ने सिनेमा वितरण के तमाम ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे में सिनेमा से जीवन गायब हो गया है, जो सत्यजीत रे की फिल्मों का आधार था। फिल्में अब भी बन रही हैं, क्यों बन रही, किसके लिए बन रही, यह सिनेमा के एजेंडे में है ही नहीं। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि सत्यजीत रे साहब को हमने सम्मान तो काफी दिया, लेकिन उनसे सीखा कुछ भी नहीं। वैसे यह भारतीय समाज की आदत में शुमार है, रामचरित मानस और गीता के साथ भी तो हमने यही किया, रखा,पढा नहीं,पढा तो सीखा नहीं।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने हिन्दी से अधिक बांग्ला में फिल्में बनाई, कम बजट की फिल्में बनाई और सफल रहे। इसे आप किस रूप में देखते हैं?

 

यही तो सत्यजीत रे थे। हिंदी में उन्होंने मात्र दो फिल्म बनायी, एक दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म सद्गति और दूसरी शतरंज के खिलाडी। ये फिल्मे उन्होंने हिंदी में इसलिए नहीं बनायी कि उन्हें एक पैन इंडियन आइडेंटिटी चाहिए थी, हिंदी का बडा बाजार चाहिए। ये फिल्में उन्होंने इसलिए बनाई कि वे प्रेमचंद की कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे,और उन्हें लगता था प्रेमचंद हिंदी में ही बेहतर तरीके से कहे जा सकते हैं। गौरतलब है कि सत्यजीत रे हिंदी में सहज नहीं थे,उन्होंने किसी बातचीत में कहा भी, यदि मैं हिंदी जानता तो शतरंज के खिलाडी और भी बेहतर बन सकती थी। सत्यजीत रे बांग्ला भाषा,बांग्ला समाज,बांग्ला संस्कृति को बेहतर समझते थे, उन्होंने अपनी फिल्में बांग्ला में बनाना तय किया।और उसी समय यह मनवाया कि जो जितना लोकल होगा, वहीं ग्लोबल होगा। ग्लोबल होने के लिए न तो भाषा से दूर होने की जरुरत है, न ही परिवेश से। सबों को पता है आस्कर अवार्ड भी उन्हें कोलकाता उनके घर पर प्रदान किया गया। यह तमाम क्षेत्रीय भाषा के फिल्मकारों के लिए याद रखने की बात है कि सिनेमा के लिए भाषा की सीमा नहीं होती,आप किसी भी भाषा में बेहतर करेंगे तो उसे स्वीकार्यता मिलेगी ही मिलेगी।

 

Ø  बजट की चर्चा छूट गई..

जी, सही याद दिलाया। सत्यजीत रे एक अलग तरह की परिकल्पना के साथ आए थे। लार्जर दैन लाइफ की जगह,जीवन जैसा है,वैसा ही दिखे।जाहिर है कोई भी प्रोड्यूसर उनके लिए जोखिम उठाने को तैयार नहीं था। उन्होंने अपनी जमा पूंजी से पथेर पंचाली की शुरुआत की। कह सकते हैं पथेर पंचाली के बजट जैसा कुछ था ही नहीं, उन्होंने पूरी फिल्म कागज पर बना ली, ताकि शूटिंग के समय, समय और संसाधन की कम से कम बरबादी हो। पथेर पंचाली की निर्माण प्रक्रिया युवा फिल्मकारों को अवश्य पढनी चाहिए,कि संसाधन कभी फिल्ममेकिंग में बाधा नहीं बनती। कहते हैं एक सीन में टाप ऐंगल शाट लेना था,बजट में क्रेन की सुविधा नहीं थी,रे साहब ने अपने कैमरामैन सुब्रतो मित्रा को पेड पर चढ शाट लेने की सलाह दी। शाट उसी तरह लिया गया, और दर्शक क्रेन का अभाव महसूस तक नहीं कर सके। खास बात यह कि सफलता मिलने के बाद भी रे साहब ने फिल्म के बजट पर अपना यही दृष्टिकोण कायम रखा। पथेर पंचाली के बजट पर एक और दिलचस्प तथ्य है कि बाद में जब पोस्ट प्रोडक्शन के लिए पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने राज्य सरकार को मदद की अर्जी दी। उस समय राज्य सरकार के पास सिनेमा को सहयोग के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी,लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र राय उनकी मदद भी करना चाहते थे,तो उनके अधिकारियों ने एक रास्ता निकाला फिल्म का नाम चूंकि पथेर पंचाली है,इसीलिए पथ निर्माण विभाग को मदद करने कहा जा सकता है,और वही हुआ,पथ निर्माण विभाग की मदद से फिल्म पूरी हुई।

 

 

Ø  सत्यजीत राय के फिल्म में किसी विचार धारा (राजनीतिक) का प्रभाव दिखता है?

 

देखिए भीमसेन जोशी के गायन में आप कौन सी राजनीतिक विचारधारा ढूंढेगे? बिरजू महाराज के नृत्य में क्या विचारधारा? ये वास्तव में भारत में वामपंथियों का पाखंड फैलाया है कि हर चीज के पीछे राजनीति होती है। देश के बौद्धिक जगत पर उनका इतना लंबा प्रभाव भी रहा कि हम मान कर चलते हैं,सबकुछ राजनीति से तय होती है। ऐसा होता नहीं। सत्यजीत रे की फिल्में हमारे दुख के साथ खडी हैं। आज भी, इसमें क्या राजनीति? एकबार संसद में मनोनीत सदस्य नरगिस ने यह सवाल उठाया कि सत्यजीत रे अपनी फिल्मों में गरीबी प्रदर्शित कर देश की छवि खराब कर रहे हैं। अब देश में गरीब हैं, ब्राह्मण भी गरीब हैं, सत्यजीत रे ने दिखाया तो क्या नेहरु जी की पंचवर्षीय योजनाओं पर पानी फिर गया? भाई, गरीबी में भी हमेशा राजनीति नहीं होती, उनकी संवेदनाएं होती हैं,उनके परिवार होते हैं,उनकी खुशियां होती हैं, इसमें कोई राजनीति नहीं होती।सत्यजीत रे ने हमेशा संवेदनाओं की बात की अपनी फिल्मों में,और संवेदना किसी राजनीति की मोहताज नहीं होती। नक्सलवाद की बात नहीं की उन्होंने अपनी फिल्मों में क्या कुछ कम रहा।कुछ लोग कहते हैं इमरजेंसी के दौर में वे बच्चों की फिल्में बनाने लगे थे,हां बनायी, लेकिन हीरक राजर देश देख लीजिए,समझ जाइएगा हस्तक्षेप हमेशा राजनीति के हथियार से ही नहीं किया जा सकता।

 

 

Ø  सत्यजीत राय ने कभी किसी संस्थान से कोई ट्रेनिंग नहीं ली बाबजूद इसके वे एक सफल फिल्मकार बने। आपके विचार से एक सफल फिल्मकार बनने के लिए  प्रशिक्षण का क्या औचित्य है?

 

यह सही है कि सत्यजीत रे ने किसी संस्थान से सिनेमा नहीं सीखा था,लेकिन उन्होंने जहां से सीखा, वह किसी भी संस्थान से कहीं बडा, बहुत बडा है। सत्यजीत रे को साहित्य के संस्कार अपने पिता से मिले,उनके पिता सुकुमार राय बांग्ला के प्रतिष्ठित लेखक रहे। सत्यजीत रे की रूचि कला में थी, इन्होंने साहित्य के साथ अपने का ग्राफिप डिजाइनर के रुप में विकसित किया।जैसा कि होता है साहित्य हर कलाविधा की बुनियाद को सशक्त बनाने में सहायक होता है।सत्यजीत रे ने कई किताबों के आवरण डिजाइन किए।पथेर पंचाली से उनाका पहला साबका भी तब हुआ थो जब वे विभूति भूषण वंद्योपाध्यय के इस उपन्यास के बाल संस्करण के लिए आवरण और चित्र बनाए। उनकी यही विशेषता ने बाद में उनकी फिल्मों की पटकथा को भी विशिष्ट पहचान दी। जहां तक फिल्ममेकिंग की बात है,कोलकाता में जां रेनआं अपनी फिल्म द रिवर की शूटिंग के लिए आए थे, यहीं रे साहब ग्राफिक डिजाइनर के रुप में जुडे।रेनुआं ने दृश्यों को विजुआलाइज करने की उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म बनाने को प्रेरित किया। सीखने का सबसे बेहतर तरीका होता है,जो जहां मिले वहीं से सीख लें।सत्यजीत रे ने यही किया।

फिल्ममेकिंग जैसी विधा के लिए प्रशिक्षण का औचित्य तो है ही। यह कला के साथ विज्ञान भी तो है।सबों के जीवन में सत्यजीत रे जैसे सीखने के अवसर तो नहीं आ सकते, ऐसे में एक बेहतर संस्थान की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। क्या आश्चर्य कि पुणे के बाद दूसरा फिल्म संस्थान सत्यजीत रे के नाम पर ही कोलकाता में खोला गया।

Ø  दादा साहब फाल्के और सत्यजीत राय की परंपरा/ संस्कृति को आगे बढ़ाने की क्षमता किस फिल्मकार में आप देखते हैं?

 

देखिए,ऐसा कुछ होता नहीं है।फिल्में समय से संवाद करती बनती हैं। यह भी गौरतलब है कि वही फिल्म और फिल्मकार कालजयी होते हैं,जिन्होंने अपने समय और समाज को बेहतर तरीके से प्रदर्शित किया हो।आज भी मदर इंडिया यदि हमें उतनी जीवंत लगती है तो उसका कारण उस समय से कनेक्ट करना है। दादा साहब फाल्के ने सिनेमा के आरंभिक दौड में 125 फिल्में बनायी,उनमें से लगभग सभी या तो धार्मिक या ऐतिहासिक कथानक पर थी। यह उस दौर की मांग थी,जरुरत थी।रे साहब ही लगातार बढते रहे, उनकी फिल्म पथेर पंचाली के साथ जलसाघर या चारुलता देखें,एकदम अलहदा फिल्म लगेगी, उनकी बच्चों की फिल्म देखें सोनार केल्ला, एकदम अलग। एक और बात जो उल्लेखनीय है, किसी भी कला पर परंपरा के निर्वहन की जिद नहीं लादनी चाहिए।पटना कलम समय के साथ अप्रासंगिक होकर खत्म हो गई। हरेक फिल्मकार अपनी पहचान के साथ विकसित हो, हमारे लिए खुशी की बात यह होनी चाहिए। हां,सत्यजीत रे और दादा साहब फाल्के से जो सीख सकते हैं,वह है उनकी ईमानदारी, अपने दर्शकों और अपनी विधा के प्रति उनका कनविक्शन।

 

Ø  सत्यजीत रे ने अधिकांश फिल्में साहित्यिक कृति पर बनायी,एक बेहतर सिनेमा के लिए कितना जरुरी मानते हैं आप साहित्यिक आधार?

यह सही है कि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय और सत्यजीत रे के संयोग ने जो चमत्कार दिखाया उसे दुनिया भर का कला जगत नजरअन्दाज नहीं कर सका और सर आंखों पर बिठाया। सत्यजीत रे की फिल्मों को देखते हुए यह तय करना मुश्किल होता है कि यदि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय, रमाशंकर गंगोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे साहित्यकार उन्हें नहीं मिले होते तो सत्यजीत रे सत्यजीत रे होते या नहीं। लेकिन यह भी सच है कि ऋत्विक घटक बगैर किसी विभूति के भी ऋत्विक घटक ही रहे। हिन्दी में कमलेश्वर और सावन कुमार टाॅक का लम्बा सान्निध्य कोई भी उल्लेखनीय फिल्म नहीं दे सका जबकि यही कमलेश्वर गुलजार के साथ आंधीऔर मौसमजैसी महत्वपूर्ण फिल्म दे सके। वास्तव में बेहतर सिनेमा के लिए बेहतर साहित्य की बाध्यता भले ही नहीं हो, लेकिन बेहतर साहित्य को फिल्माने के लिए बेहतर फिल्मकार की बाध्यता अनिवार्य है। सत्यजीत रे कहते थे किसी किताब को पढने के बाद मैं शून्य से शुरु करता हूं। मतलब वह पूरी की पूरी फ़िल्मकार की कृति होती है। किसी बातचीत में गुलजार साहब ने कहा था,किसी भी साहित्यिक कृति पर कोई अच्छी फिल्म नहीं बन सकती, जब तक इसके निर्देशक का मानसिक स्तर बड़ा, सुलझा हुआ, रचनात्मक और समझदारी भरा न हो।

 

Ø  विश्व सिनेमा के पितामह माने जाने वाले महान फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने राय के लिए कहा था,सत्यजीत रे के बिना सिनेमा जगत वैसा ही है जैसे सूरज चांद के बिना आसमान...इसे आप किस रुप में देखते हैं।

 

कुरोसावा की फिल्म की यह विशेषता है कि उनकी फिल्म में रोशनी की एक लकीर तक के मायने निकलते हैं। यदि जूते पर धूल हैं तो पटकथा का वह हिस्सा है। इतने सचेत व्यक्ति जब यह राय व्यक्त करते हैं,वह बस प्रशंसा मात्र नहीं कहा जा सकता।रे साहब ने वाकई अपनी फिल्मों से विश्व सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया। रे की फिल्मों को देखते हुए आप सहज ही महसूस कर सकते हैं कि मनुष्य चाहे बंगाल के किसी गांव का हो या अफ्रिका के किसी जंगल का, उनके इमोशन समान हैं। उन्होंने सिनेमा से मनोरंजन की शर्त को खत्म कर दिया था।उनका मानना था कि सिनेमा के लिए इंटरटेनमेंट से अधिक महत्वपूर्ण इमोशन है।

 

Ø  सत्यजीत राय से जुड़ा आपका अपना कोई खास संस्मरण या महत्वपूर्ण प्रसंग?

 

संस्मरण मेरा तो नहीं, लेकिन गिरीश दा(फिल्कार गिरीश रंजन) ने सुनाया था,वह याद है। गिरीश दा ने कहा था,पटना के रुपक सिनेमा में पथेर पंचाली देखी, और मन में तय कर लिया यही काम करना है।सबलोग फिल्म का सपना लेकर मुंबई भागते थे, मैं कोलकातो भाग गया। खोजते खोजते स्टूडियो पहुंचा,सत्यजीत रे साहब शूटिंग में व्यस्त थे।एक व्यक्ति मुझे ले जाकर मिलवाया। दादा,ये पटना से आया है,आपसे मिलने। उन्होंने जैसे ही नजर उठायी, मैं ने बेहिचक कहा मुझे भी फिल्म बनानी है। उन्होंने पूछा,पोछा लगाने आता है, सफाई करने। गिऱीश दा ने कहा,हां,आता तो है। फिर उन्होंने साथ वाले आदमी को कहा, इसे बुला लो कल से स्टूडियो की सफाई करने। गिरीश दा कहते थे,उस दिन तो समझ में नहीं आया, लेकिन जैसे जैसे कर फिल्म से जुडे सारे काम एक एक कर सीखता गया,उनकी दूरदृष्टि समझ में आ गई।वास्तव में वे मेरी लगन परखना चाहते थे।




शनिवार, 16 अप्रैल 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका : सुशील कुमार भारद्वाज


रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका : सुशील कुमार भारद्वाज 

 #रूस_यूक्रेन युद्ध 50 दिन से जारी है बाबजूद इसके कोई निर्णायक जीत- हार नहीं हुई। आधा दर्जन से अधिक बार बातचीत हो चुकी। विश्व के विभिन्न मंचों पर पक्ष-विपक्ष की बातें हो चुकी हैं। बाबजूद इसके परिणाम सिफर है। आखिर क्यों? क्या #यूक्रेन में इतनी सेना थी, इतने युद्ध-कौशल थे कि युद्ध इतना लंबा खींच गया या खींचता जा रहा है? दरअसल सही या गलत खबरें आ रही हैं  कि यूक्रेन की मदद में लगभग 30 देश अप्रत्यक्ष रूप लगे हुए हैं। यूक्रेन की मदद में #अमेरिका  की कुल युद्धक हथियार भंडार का एक तिहाई खाली हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में क्यों नहीं मान लिया जाय कि युद्ध का असली खलनायक अमेरिका है जो अपने युद्ध उन्माद के वशीभूत हो यूक्रेन को मोहरा बनाकर अप्रत्यक्ष युद्ध कर रहा है सिर्फ #रूस को हर तरीके से कमजोर करने के लिए।

अमेरिका सोवियत संघ को विखंडित करने के लिए रूस से  सदैव अपने रिश्ते को खराब करता रहा। विखंडन के बाद कुछ वर्ष तक अमेरिका शांत रहा। लेकिन ओसामा बिन लादेन के बहाने जो युद्ध उन्माद शुरू हुआ वह सद्दाम हुसैन के बहाने इराक की पूर्ण तबाही पर भी नहीं थमा है। और अभी रूस-यूक्रेन का बहाना कहां जाकर थमेगा कहना मुश्किल है। अब तो कभी -कभी लगता है कि इजराइल-फिलिस्तीन और उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया के विवाद के बीच भी कोई अहम भूमिका अमेरिका की तो नहीं रहती, क्योंकि अमेरिका में सरकार किसी की भी हो, युद्ध नीति ही उनकी प्राथमिकता में होती है।




रविवार, 16 जनवरी 2022

अनश्वर तोहफा

 अनश्वर तोहफा

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गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है। 


खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।


लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।


अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?

प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।


इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?


 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ। 


अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!


बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।


सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"

-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "

वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा जो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी। 


वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।


सुशील कुमार भारद्वाज


#लप्रेक



मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध एक प्रतिबद्ध बहुजन -----अरुण नारायण




प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध (5 जून, 1952 – 18 दिसंबर, 2017) की शख्सियत के कई पक्ष थे। एक प्रतिबद्ध संगठनकर्ता, संपादक, अध्यापक, प्रशासक, शोधकर्ता, कवि और उपन्यासकार के रूप में हिंदी में उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता रही। पूर्णिया के सुदूर गांव सिंघियान (भवानीपुर राजधाम) में 1950 में उन्होंने जन्म लिया। एक अति साधारण खेतिहर, पशुपालक ओबीसी परिवार से आने के कारण शिक्षा प्राप्ति में उन्हें बहुत कठिन संघर्षों से गुजरना पड़ा। बचपन में ही मां और पिता दोनों का साया उठ गया। फलस्वरूप बड़े भाई बालेश्वर यादव की देखरेख में उनकी पढ़ाई-लिखाई पूरी हुई। अपनी ‘खोज’ कविता में उन्होंने अपने इन दारुण दिनों के बारे में लिखा है– “अत्यंत निर्धन थे हम/घर में नहीं है किसी का फोटोग्राफ/न मां का/न पिता का/उनमें से अब किन्हीं का चेहरा नहीं है याद/ भागती हुई रेखाएं/साथ लेकर भाग गईं सब कुछ।” (‘संघर्ष के एस्ट्रोट्रर्फ पर’, पेज 145)

सुरेन्द्र स्निग्ध की आरंभिक शिक्षा अपने गांव और पड़ोस के शिक्षालयों से पूरी हुई। बड़े भाई ने आईएस.सी. में उनका नामांकन पटना साईंस काॅलेज में करवाया। लेकिन साईंस से अनिच्छा और शहरी जीवन में उनका दम घुटने लगा। फलस्वरूप पढ़ाई छोड़कर पूर्णिया लौट गए। कुछ दिनों तक बड़े उहापोह में रहे। फिर सीपीआई के प्रभाव में आए तो धीरे-धीरे सामान्य हुए। पार्टी की गतिविधियों में शाामिल होते रहे। पुनः पढ़ाई की सुध आई तो आर्ट्स संकाय में पटना काॅलेज में नामांकन लिया। यहां वर्षों टयूशन करवाया, स्लम इलाके में रहे, लेकिन अपनी पढ़ाई जारी रखी। पटना विश्वविद्यालय के एमए (हिंदी) टाॅपर रहे। एक छात्र के रूप में हमेशा उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया और अपने समय की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से भी गहरे नाभिनाल रहे।


1980 के दशक में जब नव जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा की नींव डाली गई तो सुरेन्द्र स्निग्ध राणा प्रताप और महेश्वर के प्रभाव में उसमें शामिल हो गए। इसके पहले वे प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय थे। जन संस्कृति मंच (जसम) की आरंभिक कई बैठकें उनके घर पर हुईं। महेश्वर, राणा प्रताप और नचिकेता के साथ मिलकर एक दौर में साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनवरत गतिविधियां पटना में उन्होंने वर्षों चलाईं। इसमें दर्जनों लेखक संस्कृतिकर्मी विकसित हुए और पूरावक्ती कार्यकर्ता के रूप में जनवादी चेतना के प्रसार में लगे रहे। लेकिन कतिपय कारणों से यह स्थिति कमजोर हुई और जसम भी यथास्थिति और अकर्मण्यता में गर्क हुआ। स्निग्ध धीरे-धीरे अलग पड़ गए और अपने को साहित्य रचना में ही केंद्रित कर लिया।


उस दौर में उन्होंने कई पत्रिकाओं का भी संपादन किया, जिनमें ‘अयस्टर’ और ‘नई संस्कृति’ खासतौर से चर्चा में रही।‘नई संस्कृति’ का गोरख पांडेय पर केंद्रित अंक बेहद सराहनीय रहा। ‘अयस्टर’ के हिंदी संपादक के रूप में भी उन्होंने कई नई प्रतिभाओं को रेखांकित किया। बाद के दौर में ‘उन्नयन’ पत्रिका के बिहार की हिंदी कविता पर एकाग्र अंक का अतिथि संपादन किया। इसमें उनकी संपादकीय अंतर्दृष्टि और साहित्यिक विवेक की तीक्ष्णता को उद्धृत किया जा सकता है। जब वे बिहार नेशनल काॅलेज में अध्यापक हुए तो काॅलेज की विभागीय पत्रिका ‘भारती’ का संपादन किया, जो अपने दौर में खासी चर्चाओं में रही। इस मायने में उन्होंने नलिन विलोचन शर्मा की तरह ही विभाग से निकलनेवाली पत्रिकाओं की जो रुढ़ियां होती हैं, उससे उसे बाहर निकाला और अपने समय की जटिल चिंताओं के बरअक्स उसे ला खड़ा किया। अपने प्राध्यापकी के अंतिम दौर में दरभंगा हाउस के हिंदी छात्रों से उन्होंने ‘शब्दिता’ नाम की पत्रिका निकलवाई। इस पत्रिका की रचना से लेकर उसके डिजायन तक में वे पूरी तन्मयता से लगे रहे। और अंततः उस पत्रिका का प्रकाशन हुआ। उसमें भी आप देखेंगे कि एक जनवादी नजरिया, साहित्यिक सामाजिक पक्षधरता का गजब का संतुलन साधा गया है।

काॅलेज मेें एक गंभीर, प्रतिबद्ध, रचनात्मक और छात्र हितैषी अध्यापक के रूप में उनकी लोकप्रियता रही। प्राध्यापक के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग जमशेदपुर के टाटा काॅलेज में हुई। उसके बाद पटना विश्वविद्यालय के बी.एन. काॅलेज में उन्होंने ज्वाईन किया। यहां कई वर्षों तक कार्यरत रहे बाद में उनका तबादला दरभंगा हाउस में हो गया। दरभंगा हाउस के पी.जी. हेड के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दीं और वहीं से अवकाश ग्रहण किया। वे उन जड़ और बज्रमूठ प्राध्यापकों में नहीं थे जो साहित्य की भूमिका भक्तिकाल, रीतिकाल और छायावाद तक ही सीमित होकर देखने के अभ्यासी थे। इस मामले में वे राजेंद्र यादव की इस बात को हमेशा उद्धृत करते कि “विश्वविद्यालय ज्ञान की कब्रगाह हैं। और वहां बैठे अध्यापक ज्ञान के दुश्मन।” 1990 के दशक से पहले तक विश्वविद्यालयों में पीएचडी सबसे ज्यादा भक्तिकाल, रीतिकाल और छायवाद पर ही होते थे, स्निग्ध जैसे अध्यापकों को यह श्रेय निश्चित रूप से जाएगा कि उन्होेंने इस जड़ और एकरस परिपार्टी से हमेशा लोहा लिया और समकालीन लेखन और अस्मितावादी लेखन पर केंद्रित शोध के लिए छात्रों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित हर काम को पूरे मनोयोग के साथ किया। इसी की नजीर है पटना विश्वविद्यालय का पत्रकारिता विभाग। जब इस विभाग का प्रभार सुरेन्द्र स्निग्ध को दिया गया तो उस समय तक यह विभाग बहुत अस्त-व्यस्त था। न कायदे की पढ़ाई न छात्रों को सही दिशा-निर्देश। अक्षम नेतृत्व के कारण विभाग बदनाम था। उन्होंने इसे गंभीर चुनौती के रूप में लिया और खुद गहरे सम्मिलित होकर स्वप्नशील और कल्पनाशील पत्रकारों को अपने विभाग से जोड़ा और छात्रों में एक रचनात्मक त्वरा पैदा की। वहां पुस्तकालय खोले गए। किताबें लाईं गईं और पढ़ने-लिखने का एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता गया। जिस कार्य के लिए स्निग्ध हो पुरस्कृत होना चाहिए था। लेकिन उनके बाद के प्रभारी ने उन्हें दंडित करने का षड्यंत्र रचा। आरोप लगाया गया कि पत्रकारिता विभाग में जो आलमारी गिफ्ट स्वरूप दिया गया है, उसमें वितीय अनियमितता की गई है। राजकमल प्रकाशन ने किताबें सप्लाई की थी और उसके जो कमीशन बने थे, वह प्रो. स्निग्ध को देना चाहता था। उन्होंने गलती अगर की थी तो यही कि उस पैसे की आलमारी खरीदकर राजकमल की ओर से पत्रकारिता विभाग को गिफ्ट में देने की बात कबूली थी। इस भलमनसाहत का पुरस्कार उन्हें अपमानित करके दिया गया। तत्कालीन प्रभारी ने इस पर उनके बारे में दुष्प्रचार किए। लेकिन ऐसे संकट में भी स्निग्ध हड़बड़ाए नहीं, उनका मुकाबला किया। उन्हें हमेशा अपमानित करने की घटनाएं होतीं रहीं। 


जिस माहौल में सुरेन्द्र स्निग्ध की परवरिश हुई थी, वहां उन्होंने देखी थी क्रूर जातीय, लैंगिक और वर्गीय खाई की अंतहीन निर्मम दुनिया। वे अति साधारण परिवार में जन्में और अपने संघर्षोे से समाज में एक प्रतिष्ठा अर्जित की। लेकिन यह उनका तात्कालिक मुकाम था। उनका स्थाई मकसद समानता पर आधारित समाज बनाने का था। जिसकी लड़ाई वे अपने साहित्य के माध्यम से और सांस्कृतिक स्तर पर भी अंत-अंत तक लड़ते रहे। स्त्री, दलित, आदिवासी और हाषिये के लोग सुरेन्द्र स्निग्ध के लेखन की केंद्रीय चिंता बनकर उभरे। उनके उपन्यास ‘छाड़न’ को जिन लोगों ने पढ़ा हो वे उनके इस दृष्टिकोण को भलीभांति जानते हैं। इस उपन्यास के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक के कोसी अंचल के लोमहर्षक खूनी संघर्ष की दास्तान अत्यंत ही मार्मिक रूप में रची है। उसे पढ़ते हुए आप सहज नहीं रह सकते। जिस तरह के अत्याचार वहां की प्रभु जातियों, अंग्रेजी और पितृसत्ता ने वहां की दलित दमित जाति समुदायों और स्त्रियों पर बरपाये – उसका बारीक निरूपण स्निग्ध के इस उपन्यास में हुआ है। ऐसी ही विषम स्थितियों में उस इलाके में नक्षत्र मालाकार जैसे रोबिनहुड पैदा हुए होंगे। ‘छाड़न’ में नक्षत्र एक छाया की तरह सर्वत्र मौजूद हैं। इसमें मृत्यु का एक अंतहीन सिलसिला चलता है जिसको पढ़ते हुए पाठक गहरी मायूसी और डर से भरे बिना नहीं रह सकते। अपनी मृत्यु से पहले समकालीन बिहार की विडंबना को रूपक बनाती एक महत्वपूर्ण उपन्यासिका भी उन्होंने रची जो संयोग से अभी साया नहीं हुई है।


सुरेेन्द्र स्निग्ध ने साहित्य की कई विधाओं में लेखन कार्य किया। नकेनवाद पर पटना विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की। तीन कविता संग्रहों की रचना की जिसमें ‘पके धान की गंध’, ‘कई-कई यात्राएं’ और ‘रचते गढ़ते’ मुख्य काव्य संग्रह हैं। इन्हीं संग्रह की रचनाओं से उन्होंने ‘अग्नि की इस लपट से कैसे बचाउं कोमल कविता’ ‘मां, काॅमरेड और दोस्त’ एवं ‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’ नामक कविता संग्रह साया किया। ‘सबद सबद बहुअंतरा’ और ‘जागत नींद न कीजै’ उनकी समसामयिक टिप्पणियों और फुटकर निबंधों की पुस्तक है। और ‘नई कविताः नया परिदृश्य’ उनकी आलोचना की पुस्तक है, जो नकेनवाद के मूल विचार को उसके गहरे सरोकार के साथ व्याख्यायित करती है। उन्होंने साहित्य अकादेमी दिल्ली के अनुरोध पर केसरी कुमार के अवदान को लेकर एक मोनोग्राफ भी लिखा, लेकिन पता नहीं क्यों अंततः वह किताब बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी।


प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध की ख्याति एक कवि के रूप में ज्यादा चर्चाओं में रही। उनके काव्य स्वभाव का अनोखापन हाशिएये के चरित्रों, लोकजीवन और जातियता पर चोट करने वाली कविताओं के साथ ही उनकी प्रेम कविताओं में देखी जा सकती है और इन सबसे बढ़कर उनकी राजनीतिक कविताओं में। उनकी एक अत्यंत लोकप्रिय कविता है, “जहां कोई दोस्त नहीं हो”। कवि लिखता है– “क्या रहना ऐसी जगह/जहां कोई मित्र यह नहीं पूछे/आपके किचन में आज क्या बन रहा है?/दूध नहीं है?/कोई बात नहीं/भाभी को कहिये/नींबू की चाय ही पिलायें।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’, पेज-62) 


इस कविता में हम मित्र की स्वभावगत विशेषता का तो वर्णन पाते ही हैं, लेेकिन महत्वपूर्ण है वह व्यापक दृष्टि जिसके कारण यह कविता जर्बदस्त राजनीतिक पक्षधरता को अंगीकार करते हुए अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का पक्ष उ्घाटित करती है। इसी कविता में कवि आगे लिखता है, “ऐसी जगह क्या रहना/जहां के लोग/कुछ भी मतलब नहीं रखते/कि अन्याय के खिलाफ/लड़ने वाली जुझारू जनता/कहां मर कट रही है/कहां कर रही है विकसित अपना संघर्ष।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’ पेज-63)  हिंदी में शायद ही किसी कवि ने इतनी प्रखर काव्यात्मक सधाव के साथ ऐसी मुहावरेदार राजनीतिक कविता लिखी हो। ऐसी कविताएं वही कवि लिख सकता है जो आम बदहाल लोगों की तरह विषम जीवन जीने का अभ्यासी रहा हो। ऐसे ही क्षणों में यह चट्टानी एप्रोच जन्म लेता है। मंडल की आंधी आई तो अपने यहां के बहुत से मार्क्सवादी जातिवादी हो गए। लेकिन इन्होंने उसके नकारात्मक पक्ष के साथ सकारात्मक पक्ष की भी चर्चा की। जाहिर है इन्हें जातिवादी तक कहा गया। मार्क्सवादी दर्शन की ओर स्निग्ध का झुकाव अपने आसपास के व्यापक परिवेश की परिस्थितियों की वजह से हुआ। इसीलिए हम पाते हैं कि उनके पूरे साहित्य में मार्क्सवाद महज वैचारिक प्रेरणा का स्रोत भर नहीं, अपितु उनकी चेतना का अभिन्न हिस्सा बनकर आया है। यह अकारण नहीं जब वह कहते हैं, “मेरी कविता/आंधी बनकर दौड़ना चाहती है/ बिहार के उन गांवों में /जहां के मजदूर किसान रच रहे हैं नया इतिहास।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’ पेज-59) अपनी एक कविता में वे लिखते हैं, “हम तो पोंछना चाहते हैं आंसू/तुम्हारी तरह की/ हजारों मांओं की आंखों के आंसू/बोना चाहते हैं सपनों के बीज/लहलहा सके जिससे/मुक्ति की फसल/काट सकें जिसे आनेवाली संतान/तमाम सुखों और/समृद्धियों के साथ।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’,  पेज-68) स्निग्ध ने अपने अंतिम दौर के संग्रह में ‘नींद सीरिज’, ‘ब्राहमांड और तेरह जातिवादी’ कविताएं रचीं, लेकिन इनमें वे परिपक्वताएं आप नहीं पाएंगे, जो आरंभिक दोनों संग्रहों की कविताओं में हैं। हां यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता पर चोट इन कविताओं में ज्यादा तल्खी भरे स्वर में की गई हैं।  


सुरेन्द्र स्निग्ध की कविताओं में स्त्रियों के कई रूप हैं। एक रूप जो कई कविताओं में आया है वह है प्रेमी के रूप में स्त्री को देखने की चेष्टा। यह पुरुषों का बहुत पारंपरिक आकर्षण रहा है और स्निग्ध की कई कविताओं में इस पक्ष को हम पाते हैं। स्त्री के साथ पितृसत्ता, सामंतवाद और हिन्दू धर्मव्यवस्था ने जो सलूक किया है उस पक्ष को वे वे अपनी कविताओं में बेहद मार्मिकता और सूक्ष्मता से सामने लाते हैं। ‘सुकनी की आंखों का सूरज’ स्निग्ध की एक ऐसी ही लंबी लेकिन बेहद मार्मिक कविता है जिसमें उन्होंने पूरी व्यवस्था किस तरह एक स्त्री के विपक्ष में खड़ी है इस बात को मुखर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। स्निग्ध की मृत्यु के बाद सहरसा की एक सांस्कृतिक टीम ने इस कविता का बड़ा ही प्रभावी मंचन किया। इसी मिजाज की उनकी एक और लंबी कविता ‘फटी बांहों का फ्रॉक वाली लड़की’ है, जिसमें वे उसकी बदहाली के कारणों की तफ्तीश करते समापन पंक्ति में लिखते हैं, “वर्षों से लगातार/दौड़ती नजर आती है/इसी प्लेटफार्म पर/कभी पकड़ नहीं पाती है/लोकल ट्रेन” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’, पेज-126)


सुरेन्द्र स्निग्ध का उपन्यास हो या उनकी कविताएं। पता नहीं क्यों उनके यहां मृत्यु बार-बार एक अनिवार्यता बनकर आयी है। मृत्यु उनकी कई कविताओं में कई-कई रूपों में आयी है। कवि महेश्वर पर उन्होंने एक बहुत ही भावप्रवण और मार्मिक कविता लिखी है जो उनकी महत्वपूर्ण कविताओं में एक कही जा सकती है। यहां वे मृत्यु के बरअक्स महेश्वर को खड़ा करते हैं– “उनके लंबे अयाल/सूर्य की आगवानी में /बिछ गए थे रेड कार्पेट की तरह/मौत को भी धता बताते हुए/वह दौड़ता रहा/आंधी की तरह/तूफान की तरह/संघर्ष के एस्ट्रो टर्फ पर/ वह दौड़ता रहा।”(‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’– ‘मजबूत पुट्ठों वाला घोड़ा’, पेज 114-15)


इसी तरह गोरख पांडेय का स्मरण करते हुए स्निग्ध लिखते हैं, “मौत की ठंढ़ी गोद भी/नहीं बुझा सकी उसकी प्यास/फूलों से कटती हुई दिल्ली/बन गई उसका कब्रगाह।” (‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’– ‘प्रेमः एक दुर्गम पहाड़’, पेज 117)


जिस असमानता की गर्क होती दुनिया में प्रो. स्निग्ध ने होश संभाला था, उसे मिटाने का सपना वे अपने साहित्य में अंत-अंत तक बोते रहे। यह अन्यायपूर्ण समाज और उसका अभेद्य दुर्ग ध्वस्त हो, इसके लिए वे लेखक संगठन प्रलेस, जसम में जाते हैं, शिक्षक आंदोलन में जेल जाते हैं, पत्रिकाएं निकालते हैं फिर भी वे कटुताएं जब मिटती हुई नजर नहीं आती तो वे मायूस हो उठते हैं और अंततः इन सभी माध्यमों से उन्हें मोहभंग होता जाता है। उनके इस मोहभंग को उनकी ही एक कविता ‘डोंगी’ की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है–


‘किसी ने शायद ही समझा हो

मेरा दर्द

किसी ने शायद ही महसूस किया हो

मेरे अकेलापन का रहस्य।’

(‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’ पेज-88)

                                

फारवर्ड प्रेस (Forward Press) से साभार।

रविवार, 19 दिसंबर 2021

रेणु के पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते।


 *रेणु ने साधारण आदमी में विराट का चित्रण किया -अखिलेश ( संपादक, तद्भव पत्रिका)* 




( पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का दूसरा दिन  )

पटना, 19 दिसम्बर।  पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' के दूसरे दिन की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में  बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे। 


दूसरे दिन की संगोष्ठी का उद्घाटन रेणु के चित्र पर माल्यार्पण करने के साथ हुआ। इस चौथे सत्र का विषय था ‛हिंदी कहानी : परम्परा, प्रयोग और रेणु’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकर और तद्भव पत्रिका के संपादक श्री अखिलेश ने की। इस सत्र की चर्चा की शुरुआत करते हुए दिल्ली से आये चर्चित कथाकार संजय कुंदन ने कहा “ फणीश्वर नाथ रेणु ऐसे कथाकार थे जिन्होंने प्रेमचन्द के ग्रामीण जीवन के सम्पूर्ण वैभव को कथा के संसार में पुनर्स्थापित किया है। वे प्रेमचंद से भिन्न हैं और भिन्न इस मायने में हैं कि उन्होंने कथा लेखन की प्रेमचंदीय शैली को नहीं अपनाया। वे परिवर्तन के हिमायती कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में साधारण आदमी के भीतर विराट का चित्रण किया है। "

पटना के चर्चित कथाकार संतोष दीक्षित के अनुसार  “ रेणु ने अपनी कथा में एक ऐसे इलाके के गाँवों के जन जीवन को उदभासित किया है जो बेहद पिछड़ा है। इस इलाके के सांस्कृतिक जीवन की संपूर्ण धड़कन को रेणु की कथाओं में सुना जा सकता है।” 

मुज़्ज़फ़रपुर से आये चर्चित कवि डॉ0 राकेश रंजन ने इस सत्र को संबोधित करते हुए कहा “ रेणु के पात्रों में अदम्य जिजीविषा देखा जा सकता है। उनके पात्र भीषण बीमारियों से मर सकते हैं लेकिन हार नहीं मानते। " 


अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री अखिलेश ने कहा “ रेणु देशज आधुनिकता के भाष्यकार थे। वे भी अपनी रचनाओं में अपने समाज की त्रासदी को चित्रित कर रहे थे। लेकिन अपने समकालीनों से भिन्न तरीके से वे इस त्रासदी को चित्रत कर रहे थे। उनकी आधुनिकता में अपने समकालीनों की टूटन और संत्रास की जगह समरसता की भावना थी। समाज के वंचित तबके के प्रति उनका समर्थन था। वे जीवन के उल्लास का जब चित्रित  करते हैं तो उनका मकसद कभी वंचित समूह की समस्याओं को तिरोहित करना नहीं होता। रेणु प्रेमचंद के यथार्थवादी ढाँचे के विरोधी नहीं थे बल्कि उनकी यथार्थवादी परंपरा को वे दुरुस्त करते हैं। " 


इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया। इस सत्र का संचालन पटना वीमेंस कॉलेज के सहाय प्राध्यापक धनंजय कुमार ने किया और कंचन कुमारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।



संगोष्ठी के पाँचवें सत्र के की अध्यक्षता हिंदी के साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने की। इस सत्र के अंतर्गत विभाजित विषय ‛रेणु : विविध रंग’ की शुरुआत करते हुए चर्चित कथाकर अवधेश प्रीत ने कहा “ रेणु समाज के अत्यंत वंचित समूह की लोक संस्कृतियों को अपने रिपोर्ताज का विषय बनाकर राष्ट्रीय फलक पर उभारते हैं। उनके बाढ़ पर की गयी ‛ऋणजल धनजल’ जैसी रिपोर्टिंग की चर्चा खूब होती है। उनके द्वारा बिहार में चले किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग बहुत दिलचस्प है। रेणु को साहित्यिक विधा के रूप में रिपोर्ताज को प्रतिष्ठित करने का श्रेय है।” 


हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा “ रेणु ने लोक नृत्य के वैभव को अपनी कथाओं में बहुत सफलता से समेटा है जबकि लेखक के लिए यह काम बहुत मुश्किल है। उन्होंने कथा लोक को लोक संगीत की संवेदना से भर दिया है। उनका लिखा रिपोर्ताज बहुत सजीव है। वे मूलतः एक्टिविस्ट लेखक हैं।” 


इस सत्र के विभाजित विषय ‛ रेणु और हिंदी सिनेमा’ में फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा “ रेणु की कहानी ‛तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’ पर बनी फ़िल्म ‛तीसरी कसम’ देखने लायक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में रेणु की समस्त रचनात्मक विशेषताओं को शामिल किया गया है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‛मैला आँचल’ पर धारावाहिक भी बनी है।” 


इस सत्र के अध्यक्षीय भाषण में  रेणु के संस्मरण से अपनी बातों की शुरआत करते हुए अरुण कमल ने कहा “  रेणु ने अपने एक रिपोर्ताज में लिखा है कि अरे आलोक तुम ! ये आलोक कवि आलोकधन्वा हैं। हममें रेणु के सबसे करीबी रहे हैं कवि आलोकधन्वा और रामवचन राय। अरुण कमल ने आगे कहा कि रेणु के कथेतर गद्य अयस्क हैं। उनके पास काफी स्मृतियां थीं। उनकी स्मृतियां काल के अहंकार को ध्वस्त करती हैं। रेणु अकेले आँचलिक कथाकर नहीं हैं। दुनिया के समस्त कथाकर, कलाएँ, साहित्य आँचलिक हैं। रेणु की कहानियां जीवन के गहरे रागों से लैश हैं। ये मनुष्य को कभी मरने नहीं देतीं। रेणु इसलिए बड़े लेखक थे कि उनमें धन और सत्ता के प्रति हिकारत की भावना थी। रेणु की कहानियों पर फिल्में नहीं बनायी जा सकतीं क्योंकि ये कहानियां भाषा के लिए रची गयी थीं, फ़िल्म बनाने के लिए नहीं लिखी गयी थीं।” 


सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न भी किया गया। इस सत्र का संचालन शिप्रा प्रभा ने किया। अंत में वाणिज्य महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ0 चंदन कुमार ने किया।




संगोष्ठी के छठे सत्र का का विषय था ‛सुनो कहानी रेणु की।’ इस सत्र में रेणु की तीन कहानियों का अत्यंत रोचक पाठ किया गया। पटना के सुप्रसिद्ध  रंगकर्मी  एवं टीपीएस कॉलेज में  हिंदी के प्रोफ़ेसर डॉ0 जावेद अख्तर खां ने रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‛एक आदिम रात्रि की महक’, रंगकर्मी मोना झा ने ‛संवदिया’ तथा दिल्ली की प्रसिद्ध कथानटी सुमन केशरी ने ‛रसप्रिया’ कहानी का पाठ किया।  सुमन केशरी ने अद्भुत कहानी पाठ किया। कथानटी के कहानी पाठ ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज के तीनों सत्रों में भी श्रोताओं की उत्साहवर्द्धक उपस्थिति रही।  इस सत्र का संचालन पटना विश्वविद्यालय हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो0 तरुण कुमार ने किया। अंत में प्रो0 कुमार ने वक्ताओं, अतिथियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं को इस सार्थक आयोजन को सफल बनाने में अप्रतिम सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और संगोष्ठी के समापन की घोषणा की।

आज के कार्यक्रम में मौजूद लोगों में प्रमुख थे पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा, डॉ0 कुमारी विभा, सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा, प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ0 विनय कुमार, गजेन्द्र कांत शर्मा, जयप्रकाश, राजकुमार शाही, ग़ालिब, सुनील सिंह, डॉ0 बेबी कुमारी, प्रो0 वीरेंद्र झा,गोपाल शर्मा, डॉ0 दिलीप राम, योगेश प्रताप शेखर, संजीश शर्मा, डॉ0 सुलोचना, डॉ0 चुन्नन कुमारी, उज्ज्वल कान्त, सुशांत कुमार, उचित कुमार यादव आदि।

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

पटना विश्विद्यालय, हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'रेणु-राग' का आयोजन




 पटना विश्विद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  'रेणु-राग' की शुरुआत पटना कॉलेज सेमिनार हॉल में  हुई। इस संगोष्ठी में   बिहार तथा बाहर के विभिन्न विश्विद्यालयों से जुड़े साहित्यकार, आलोचक व  प्रोफ़ेसर शामिल हुए। इसके साथ साथ बड़ी संख्या में पटना विश्विद्यालय के छात्रों के अलावा  साहित्य, संस्कृति से जुड़े बुद्धिजीवी , रंगकर्मी सामाजिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

उदघाटन सत्र में   माननीय शिक्षा मंत्री  विजय कुमार चौधरी , सुप्रसिद्ध साहित्यालोचक व लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, पटना विश्वविद्यालय  के कुलपति गिरीशचन्द्र चौधरी ,  प्रख्यात कवि आलोकधन्वा,  विधानपार्षद व आलोचक रामवचन राय, पद्मश्री उषाकिरण  खान उपस्थित थे।  विषय प्रवर्तन   राष्टीय संगोष्ठी के परिकल्पक एवं पटना विश्विद्यालय हिंदी विभागध्यक्ष तरुण कुमार ने किया। पहले सत्र का विषय था ' रेणु होने का अर्थ'।

स्वागत भाषण करते हुए पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो0 रघुनंदन शर्मा ने कहा कि "पटना कॉलेज के छात्रों को अपने अतीत के साथ जुड़ाव रखना चाहिये क्योंकि बिहार में जो श्रेष्ठ उसके निर्माण में पटना कॉलेज की अहम भूमिका रही है।” 

 शिक्षा मंत्री श्री विजय कुमार चौधरी आने वक्तव्य की शुरुआत पटना कॉलेज के अपने छात्र जीवन की स्मृति से की और रेणु होने अर्थ पर प्रकाश डालते हुए कहा "  रेणु होने का अर्थ अपनी जमीन से जुड़ाव होना है। वे अपने सामाजिक राजनीतिक अनुभवों को व्यवहार में सीखने के हिमायती थे। रेणु जी का ही कथन है कि जूता पहनकर देखना चाहिए कि जूता काटता कहाँ है। रेणु ने अपने इस कथन की आजमाइश की थी। वे लेखन से लेकर राजनीति तक में स्वयं अनुभव हासिल किया था। हम चले जायेंगे लेकिन रेणु का साहित्य बचा रहेगा। रेणु के साहित्य को बचाना हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है। हमारी पीढ़ी को रेणु का साहित्य बचायेगा।” 

विशिष्ट अतिथि के रूप में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष व निवर्तमान विधान पार्षद रामवचन राय ने रेणु होने के अर्थ को समझाते हुए कहा कि "रेणु ऐसे लेखक थे जो बोलते कम, लिखते ज्यादा थे। उनका मानना था कि लेखक के सामने अभिव्यक्ति का संकट कभी नहीं होता, लेखक अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता तलाश लेता है। रेणु के पास कहानी की बड़ी दुनिया थी, इसलिए उन्होंने कहानी कहने के लिए सबसे पहले उपन्यास लिखना चुना। वे लोकतंत्र की तीन-तीन लड़ाइयां लड़ चुके थे।” रेणु होने का अर्थ है जोखिम लेना होता है। 

उषा किरण खान ने कहा कि " हमारी पीढ़ी की कथाभूमि रेणु की कहानी की ही कथाभूमि है। रेणु के लेखन ने परमपरागत बिम्बों और नायिकाओं की अवधारणाएं बदल कर रख दिया।” 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने कहा कि " रेणु जैसा बड़ा लेखक किसी समाज को विरले ही मिलता है। रेणु को हम ऐसे समय में याद कर रहे हैं जिस समय में संवेदनशील आदमी आंसुओं से भरा हुआ है और रो भी नहीं सकता। रेणु संसदीय लोकतंत्र के अग्रणी प्रहरी थे। उनका लेखन संसदीय लोकतंत्र की रक्षा और उनका जीवन लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में रहा है। रेणु का रूप परिवर्तनकारी रहा है।” 

प्रसिद्ध आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा “ रेणु उन लेखकों में से हैं जो जिनकी कहानियां अपने घर लौटने का संदेश देती हैं।  वे जीवन भर लेखक रहते हुए एक्टिविस्ट भी रहे। वे चुनाव में भी हिस्सा लेने वाले लेखक थे और जुलूस में भी। आज रेणु होने का अर्थ है कि समाज और लेखन परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। रेणु महत्वपूर्ण और प्रभावी लेखक इसलिए हैं कि वे बिना किसी हो-हंगामा के संस्कृति का रेखांकन करते चलते हैं।

पटना विश्विद्यालय के कुलपति  गिरीशचन्द्र चौधरी ने कहा “ रेणु के जन्मशती पर एक बड़े आयोजन की जरूरत थी, हिंदी विभाग इसे पूरा किया। रेणु इतने बड़े लेखक थे कि उनकी कहानियों को आज की पीढ़ी भी बहुत चाव से पढ़ती है। 

 इस सत्र का संचालन  प्रोफ़ेसर दिलीप राम   ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन में पटना कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ0 कुमारी विभा ने किया।


उदघाटन सत्र के पश्चात दूसरे स्त्र का विषय था 'लोक-रंग और रेणु का कथाशिल्प '। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो0 जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल ने की। 

 इस सत्र में रांची से आये उपन्यासकार रणेन्द्र ने कहा “ रेणु ने अपने कथा साहित्य में अपने समाज के विविध रूपों को चित्रित किया है। उन्होंने अपनी कथा में भारतीयता की खोज की है। निम्नवर्गीय समाज के जीवन संघर्षों को रचनात्मक रूप में लाया है। उनके समय के अपने ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जो उनसे छूट गये हैं जिसे समेटने की जवाबदेही हमारी है।” 

बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में हिंदी  के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी ने कहा “ रेणु के कथाशिल्प पर हिंदी के कथाकर प्रेमचंद के प्रभाव के साथ बाँग्ला के रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचन्द्र, बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय का प्रभाव भी देखा जाना चाहिये। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों की तरह सामाजिक और यथार्थवादी हैं। रेणु के पात्र प्रेमचंद के पात्रों से आगे सांस्कृतिक है। रेणु की आंचलिकता का विमर्श बहुत भ्रामक है। इसी तरह उन्हें लोकरंग का कथाकर मान लेना भी भ्रामक है। रेणु के कथाशिल्प में गाँव अन्तरग्रथित है। "

जम्मू से आयी कथाकार  प्रत्यक्षा ने कहा “ रेणु राजनीतिक विषयों पर भी बहुत रोमैंटिक होकर लिखते हैं। जुलूस उनकी बहुत प्रिय किताब है।  इसमें अपने घर तलाशने की कहानी लिखते है।"

 इस सत्र के अंत में वक्ताओं से प्रश्न किया गया।  इस सत्र का संचालन पटना कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक मार्तण्ड प्रगल्भ ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो इन्द्रनारायण ने किया। 


तीसरे  सत्र विषय था '1950 का राष्ट्रीय परिदृश्य और रेणु के उपन्यास'


तीसरे सत्र के आरंभ में दिल्ली के आशुतोष कुमार ने कहा कि “ रेणु अंचल में बनने वाली कहानी को राष्ट्र की कहानी बनाना चाहते थे। वे अंचल की कहानी को राष्ट्रीय कहानी का विरोधी नहीं बताते बल्कि अंचल में प्रवेश करने वाली राष्ट्रीय कहानी को अंचल की कहानी बनाते हैं। रेणु यथार्थ के जिस रूप को अपनी कहानियों में कहना चाहते थे उस रूप को प्रेमचंद की शैली में नहीं कह सकते थे। 


चर्चित कथाकार गीताश्री ने कहा “ रेणु जिस दौर में लेखन कर रहे थे उसी दौर में महिलाओं को पहचान मिल रही थी। रेणु की रचनाओं में अपनी पहचान के लिए महिलाओं के उस तरह संघर्ष नहीं मिलता जिस तरह आज के स्त्रीवाद लेखन में मिलता है। लेकिन महिलाओं की पहचान को उन्होंने नज़रअंदाज़ नहीं किया है। रेणु की रचनाओं में अधिकांश महिला पात्र यौन शोषण का शिकार हैं पर रेणु इन महिला पात्रों के इन स्थितियों में अनुकूलन के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। "

मुज़्ज़फ़रपुर से आईं चर्चित कथाकार पूनम सिंह ने कहा " 50 का दशक पूर्णिया काला पानी की तरह था। रेणु यथार्थ वादी लेखक थे। मैला आँचल को किसान आंदोलन के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। किसान आंदोलन ने मैला आँचल के वैश्विक रूप के परचम को लहराता है। संथालों को जमीन से बेदखल कर दिए जाने के सवाल को भी रेणु उठाते हैं। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन भी होता है। सरकारें भूमिसुधार की बातें तो करती हैं लेकिन उसे लागू नहीं करती। दीर्घतपा उपन्यास का सवाल आज भी खड़ा है। शेल्टर होम में महिलाओं का शोषण आजभी जारी है। रेणु जुलूस में विस्थापन के प्रश्न को उठाते हैं। आज अपने देश सीएए और एनआरसी के द्वारा लोगों को विस्थापित किया जा रहा है।" 

इस सत्र में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चर्चित कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर  ने इस दो दिवसीय आयोजन के लिए  बधाई देते हुए कहा " मैला आंचल पहली बार समता प्रकाशन पटना से छपा था। रेणु मैला आंचल में पोएटिक हो गए हैं। रेणु के उपन्यास में सिर्फ यथार्थ ही नहीं सपने भी हैं। रेणु भारतमाता के आंसू पोछना चाहते हैं लेकिन असमर्थ हैं। रेणु जी नेपाली क्रांति में सशत्र रूप से भाग लिया तथा 1950 में वहां से लौटे। रेणु जी से यह भूल हो गई कि उन्होंने 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास कह डाला। इस बात की स्वीकारोक्ति  लोठार लुतसे से इंटरव्यू में की थी।" 

 इस सत्र का  संचालन  डॉ पीयूष राज ने जबकि  धन्यवाद ज्ञापन मगध विश्विद्यालय हिंदी विभाग की  प्रो अरुणा ने किया।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को  रज़ा फाउंडेशन  नई दिल्ली तथा साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का सहयोग प्राप्त हुआ था। 

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में शहर के प्रमुख बुद्धिजीवियों में शामिल थे  साहित्य अकादमी से समानित कवि अरुण कमल,    बिहार विरासत विकास समिति के विजय कुमार चौधरी, तद्भव के संपादक  अखिलेश,  सुमन केशरी,  पटना विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति रासबिहारी सिंह, कथाकारअवधेश प्रीत,  कथाकार सन्तोष दीक्षित,  कथाकार हृषीकेश सुलभ, कवि कुमार मुकुल, डॉ कंचन,   योगेश प्रताप शेखर,  निवेदिता झा,   सुनीता गुप्ता, वीरेंद्र झा,  सुनील सिंह,  राकेश रंजन,  बी.एन विश्वकर्मा, अनीश अंकुर, रँगकर्मी जयप्रकाश, गजेन्द्रकांत शर्मा,  गौतम गुलाल,   वेंकटेश, विद्याभूषण, श्रीधर करुणानिधि,  डॉ राकेश शर्मा,   गोपाल शर्मा,  सुनील झा,  कुणाल, अनीश,  संजय कुंदन, डॉ गुरुचरण, रामरतन, अनुज, सुनील, अशोक क्रांति, इंद्रजीत आदि।

बुधवार, 21 जुलाई 2021

रेणु की जीवनी की रचना-प्रक्रिया- भारत यायावर

 रेणु की जीवनी की रचना-प्रक्रिया 


भारत यायावर 



मैं पिछले चालीस वर्षों से प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी लिखने में लगा हुआ हूँ । 

यह जीवनी हिन्दी की श्रेष्ठ जीवनी साहित्य से थोड़ा हटकर है । 

मैं रेणु के जीवन प्रसंगों को याद करता रहता हूँ और उन्हें बेहद रोचक तरह से प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

 यह वृहद आकार की जीवनी  लगभग हजार पृष्ठों की होगी । 

इसका पहला भाग पूरा हुआ है और प्रकाशन के पथ पर है। 

पहले भाग का नाम है व्यक्तित्व निर्माण और संघर्ष ।

यह रेणु के व्यक्तित्व निर्माण का समय था । वे तब पढ़ते बहुत थे, लेकिन उनके जीवन में भटकाव भी था । इसी भटकाव से एक रास्ता भी निकल रहा था । यह उनके भावी कथाकार रूप का प्रथम चरण था जिसपर चलकर  बहुत आगे जाना था ।

फिर संघर्ष के रास्ते पर चलकर उन्होंने अपने को ही आन्दोलन बना दिया । यह आन्दोलन राष्ट्रीय मुक्ति से लेकर नेपाल की मुक्ति तक का था । उनकी आँखें हर जगह रचनाशीलता की तलाश करती रहती । आन्दोलन रत जीवन की रचनाशीलता विलक्षण तो होगी ही । अपार जीवनानुभवों से भरा उनका उपन्यास आया और वैश्विक स्तर पर महत्ता ग्रहण करता चला गया ।


रेणु के संघर्षमय जीवन में स्वाधीनता का स्वप्न है। बीमारों की दुनिया है। नेपाल का मुक्ति संग्राम है। रचनाशीलता के पथ पर चलते रहने का संकल्प है। जन जीवन में जनजागरण की बेचैनी है। अभाव को वरण करने की तपिश है । संस्कृति के द्वारा साहित्य के क्षेत्र में करने की बहुत कुछ तड़प है। विरोध को झेलते हुए मुस्कुराते रहने का विलक्षण काव्य व्यक्तित्व है । आन्दोलन और सहजीवन का सामंजस्य है । भ्रष्ट और विद्रूप व्यवस्था के प्रति क्षोभ है । रहस्यमय प्रकृति और मनुष्य की खोज है।


रेणु की जीवनी एक असंभव की साधना है , जिसके कारण मरा  हजार मरण ! मर-मर कर उठकर खड़ा हुआ । देखा, बहुत लोग हैं जो उत्सव मना रहे हैं,  लेकिन मेरी पीर को एक नई पहचान मिल रही थी ।


भारत यायावर



भारत यायावर के फेसबुक से साभार।

सोमवार, 19 जुलाई 2021

सुमित दहिया की कविताएं

 सुमित दहिया की कविताएं

           
सुमित दहिया
                  


मुल्तवी 

मैंने तुम्हारे पंखों को सम्पूर्ण कायनात की 
गुजारिश के बावजूद मुल्तवी कर दिया है
ताकि वे अगली व्यवस्थित चारागाह तक उड़ान भरकर
अपने बेहूदा जीवन और आज़ादी का अंत कर सके

तुम्हारा आना-जाना, भ्रमाना, शर्माना
विचारो की दरारों से झांककर
मेरी कविता बनना
मणिकर्ण के गर्म पानी के ऊपर पसरे
गंजेडीयो को देखकर थोड़ा डर जाना
उफनती नदी के ऊपर मौजूद ठोस पुल पर 
बरसात में मेरी तस्वीरें खींचना
रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग में हवा का पीछा करते हुए 
अपनी बंजर देह और उपजाऊ जेबो के साथ
मुझ से बिल्कुल चिपककर बैठना
अवास्तविक दुख से झुके अनपढ़ कंधों की कहानियां सुनाना
कही भी पहाड़ी सड़क के किनारे रुककर
मेरे सीने से लिपट जाना
और तुम्हारी कुँवारी जांघो की आरक्षित गंध का
सबसे पहले मेरे द्वारा सूंघे जाना
मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

किसी अहाते के निकट बैठी 
चंद बूढ़ी रंडियों के बीच से उठकर
तुम्हारी याददाश्त पर स्वयं को आरोपित करना
बस यूं ही 
अंजान मुस्लिम दोस्त की शादी में अचानक पहुँच जाना
उस तुम्हारे एकमात्र चमकीले सूट में
मेरा सदैव अटके रहना
सांवले रंग को और सांवला करने वाले काले काजल का
आंख की हद से पार जाने पर
मेरी गीली थूक लगी उंगली से उसे साफ करना
और फिर एक सूखा उत्तेजक निशान
हमेशा के लिए वहाँ छोड़ देना
 मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

हृदय की निरंतर घटती पाश्विकता में
शब्दो की मादक पुकार
और अपने व्यवहार की मजार के बीच
घने अंधेरे में गौर से तुम्हारा यह कथन बार,बार सुनना कि

     "आप तो मेरे जेहन की प्रोसेसिंग हो
      जिसे मै चाहकर भी कभी नही रोक पाऊंगी"

अनेक कहे-अनकहे तथ्य टटोलना
और चंद फुर्सत के लम्हों में
तुम्हारे जिस्म पर मौजूद हमारे प्राथमिक प्रेम के निशान निहारना
और अनगिनत मौसमो की गवाह
उस सफेद बर्फ के गोलों से बुनकर
लगने वाली खुशियों के क्रम को
न जाने कितनी ऋतुओं के लिए 
मैंने केवल इसलिए मुल्तवी कर दिया है
ताकि तुम भयंकर अपराध भाव से भरी हुई
मृत आत्मा और वाष्पित मन के साथ
न चाहते हुए भी अगले बासी बिस्तर पर बिछ सको

इस शहर,देश,काल के नक्शों की हदों के पार गूंजती
हमारी मार्मिक,मजबूर ध्वनि का रोना भिलखना
समंदर के तट पर रेत में धसे हुए
मेरे तलुवों के ऊपर पैर पर पैर रखकर
तुम्हारा चिल्लाकर सार्वजनिक प्रेम स्वीकारना
खुले आसमान और नंम गतिशील हवा के बीचोबीच लिए गए सैंकड़ो चुम्बनों को
बस अकस्मात ही इसलिए मुल्तवी कर दिया है
ताकि तुम्हारी नीच और डरपोक मर्यादा
नग्न रूप से हमारे उन पदचिन्हों के बीच 
ताउम्र भटकती रहे
जो कभी हमने एक साथ बनाये थे

किसी अपरिचित आदमी को तुम्हारे द्वारा कमाऊ पूत कहना 
मुझे नीचा दिखाना और अपमानित करना
कभी न भरने वाला एक निम्न श्रेणी का जख्म देना
यह परिचय है कि तुमने अपनी केंचुल छोड़ दी है
अब मुझे भी तुम्हारे भीतर से अपना प्रेमरूपी हिस्सा वापिस ले लेना चाहिए
इस धरती पर मौजूद करोड़ो स्तनधारियों में दौड़ते 
लहू से अधिक मेरे तरल आंसुओ का गिरना
और मेरी आँखों का बहना
मैंने इन सबको मुल्तवी कर दिया है

हमारे सभी सपने,आलिंगन, संभोग और भावनाओं की लरजती डोर का
नेशनल हाइवे के नए ठिकाने पर अटक  जाना
और तुम्हारी निर्लज और डरपोक मानसिकता के सरेंडर से पहले ही
मैंने हमारे प्रेम को अगले जन्म के लिए मुल्तवी कर दिया है


     
   आखिरी कमरा 

यह रहस्मयी आरक्षित विचार हर बार नए वेगो से झाँकता है
और अपने बहाव की निर्लज्जता मे
मेरी भावनाएं,महत्वकांक्षा और प्रेम की बलि मांगता है

यह मुझे पहाड़ों से टपकती बर्फ के आंचल के पास स्थित 
उस लगभग जमी हुई चारदीवारी में जल रही
धीमी लौ के नज़दीक अक्सर धकेल देता है
तब भी, जब मैं स्वयं एक ज्वलंत प्रश्न होता हूं
और कभी किसी ख़ुशनुमा रास्ते के बीचोबीच अचानक रोककर
चट्टान पर दो नाम अंकित करवाता है
जिनकी परिभाषा बनती है 
'तुम' और 'मै'

ये तुम और मै
किन्ही परिस्थितियों में
प्रेम वाले कम और अलगाव वाले अधिक हो जाते है
इन तुम और मै के
अपने कुछ चुनिंदा बेलगाम शब्द भी है

                  तुम के क्षणिक शब्द है
मैन्युपुलेटिव,धोखेबाज, गद्दार और दगाबाज आदमी
                  जबकि मै के स्थिर शब्द है
जिम्मेदारी, जिम्मेदारी, जिम्मेदारी और जिम्मेदारी

इस अलगाव की पृष्ठभूमि में लिखे कई संदेश
मेरी चेतना पर गंभीर जख्म है
हालांकि मुझे कमजोर,अपाहिज और खंडित रिश्तों की टूटन ने अखंड किया है

मेरे साथ किए गए प्राथमिकता के अनगिनत वादों के बीच
कब चंद नए अपरिपक्व युवा चेहरे
प्रदूषण वाला शहर
काँपता हुआ विवेक
पड़ोस वाली सेहली
और हाईवे के नए ठिकाने आ गए
स्पष्ट पता तक नही चला

मैंने एक मदहोश रात यूही अराजक घूमते हुए
साफ ह्रदय से यह सत्य बयान किया था
कि ओ हरामजादी
अरे ओ ओ हरामखोर
तूने अपनी कायरता के पीछे 
एक पारंपरिक नीचता को जन्म दिया है
जो योजनाबद्ध तरीके से तुझे किश्तों में नष्ट करती रहेगी
और कभी न कभी तुझे मर्लिन मुनरो के सुसाइड नोट की असल वारिस घोषित कर देगी

मै यह भी कुबूल करना चाहता हूं
कि तुम्हे यह समझाने में असफल रहा
कि "जीवन" अकेले और एकांत कमरों की फुर्सत का नाम है
राजा से लेकर रंक तक
सभी बहते चेहरों के महासागर में निपट अकेले है
और अंततः कब्र भी एक तरह का आखिरी कमरा है

यकीनन हमारे पुराने करार के दस्तावेजों में वर्णित गुप्त गठबंधन
इस ब्रह्मांड मे अनंत काल के लिए कही भटक गया है
लेकिन उन पिंघलती छातियों में
मैंने दुर्भाग्य से कभी प्रेम के बीज बोये थे
उस निष्प्राण प्राणी के अंदर से झांकती मादा मासूमियत के तनाव पर
कभी अपने ताज़ा प्रेम की इबारत लिखी थी
इस सौभाग्य को दुर्भाग्य बनाना
तुम्हारी अपनी अर्जित कला का परिचय है

शहद के छत्ते पर पत्थर लगते ही
जिस भांति मधुमक्खियां तीतर-बितर हो जाती है
मै कुछ यूं चाहता था
तुम्हारे भीतर अपनी उपस्थिति
मेरा विचार आते ही पत्थर की भांति
तुम्हारी बुद्धि और ठोसपन को बिखेर दे
हाँ, मै कुछ यूं चाहता था

मै अपने अंदर से कागज़ी चीथड़ों को बुनकर
तब तक तुम्हारे लिए आरक्षित प्रेम को श्रद्धांजलि देता रहूँगा
जब तक तुम्हारा निर्णायक लौटना आकस्मिक और अंतिम घटना न बन जाए।।


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