रविवार, 18 फ़रवरी 2018

विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में (आलेख): अनीश अंकुर



  विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में
                                                                                                                   अनीश अंकुर



हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं मसलन कविता, कहानी में कई किस्म के आंदोलन चले, नये-नये ‘वाद’ का जन्म हुआ। लेकिन नाटक में वैचारिक बहसों की केाई वैसी निरंतर परिपाटी नहीं रही। आजादी के पहले जन नाट्य संघ की जब  स्थापना हुई तो तो नारा ही था ‘ हमारी नायक जनता है’’।  इसके प्रदर्शित प्रस्तुति ‘नवान्न’ में पहली बार किसान को नायक के रूप में मंच पर अवतरित हुआ।

सत्तर के दशक में नाटकों में ‘बैक टू द रूट्स’ यानी अपनी ‘जड़ों की ओर लौटो’ की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ लिया। इसके तहत नाटकों में भारतीयता’ व परंपरागत विरासत की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। जिसे देखों वो ‘लोक’ व ‘फोक’ की बात करने लगा।

‘भारतीयता की खोज’ की ये पूरी प्रक्रिया बदनाम अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन द्वारा समर्थित था। ‘फोक’ की प्रधानता वाली इस परिघटना ने  इसने निर्देशक को ताकतवर तथा  नाटककारों को कमजोर बना दिया।   रंगमंच में प्रदर्शनकारी तत्वों की प्रधानता होने लगी फलतः ‘टेक्सट’ का महत्व कमजोर होने लगा।

 मजबूत निर्देशक ने  पहले चरण में नाटककारों को पृष्ठभूमि में धकेला वही दूसरे  चरण में अभिनेताओं को अप्रासंगिक बनाना शुरू कर दिया। रंगमंच में  अभिनेता अब डिजायन का निष्क्रिय तत्व में तब्दील होता जा रहा है।  एक्टर अब आब्जेक्ट में बदल गया है।

एक समय नुक्कड़ नाटकों ने प्रोसेनियम पर होने वाले थियेटर केा  बेहद सशक्त चुनौती दी थी। नुक्कड़ नाटकों के एक बड़े हिस्से के एन.जी.ओ करण की प्रक्रिया ने  भी उसकी वैचारिक वैधता को कमजोर कर डाला है।

 बिहार का रंगमंच मुख्यतः प्रयोगधर्मी माना जाता रहा है। चॅुंकि बिहार प्रारंभ से ही विभिन्न आंदोलनों व संघर्षों की भूमि रहा है। साथ  रंगमंच की जनपक्षधर धारा ने वैचारिक बहसों से जीवंत संपर्क बनाए रखा फलतः नये-नये प्रयोग होते रहे हैं। बिहार के रंगमंच के  प्रयोगधर्मी होने का यह प्रमुख कारण है।

लेकिन फिर भी वैचारिक बहसें नयी-नयी शक्लों में सामने आ रहे हैं। अभी थियेटर ओलंपिक को लेकर रंगमंच दो हिस्सों में विभाजित है । सतह पर दिखने पर भले ही रंगकर्मियों के दो समूहों के मध्य का संघर्ष दिख रहा है।  दरअसल यह विचाराधात्मक प्रश्न है।
 सत्ता की सरपरस्ती में होने वाले चलने वाले  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों द्वारा आयोजित महोत्सवों  के रंगमंचविरोधी चरित्र पर सवाल उठने लगे हैं। एन.एस.डी से प्रशिक्षित रंगकर्मियों के संकटग्रस्त  रंगमंच होने की पहचान हैं , ये सवाल। अभी हिंदी रंगमंच अपने संकटों की पहचान कर रहा है। यही बात वैचारिक विमर्श की दृष्टि से बेहद उम्मीद  पैदा करने वाली है।

बिहार नुक्कड़ नाटकों को लेकर भी काफ़ी  चर्चित रहे हैं।   सफदर हाशमी की हत्या के पश्चात बिहार के नुक्कड़ नाटको की बाढ़ आ गयी। नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई कि जब बिहार के सौ साल  हुए  तो रंगमंच की मुख्य पहचान के रूप में नुक्कड़ नाटकों को रखना पड़ा।
बिहार  के रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती है कि अपनी प्रयोगधर्मिता  को बचाये रखते हुए उसे आगे विकसित करने का काम करे।

  इसके अलावा बिहार की उभरती  सामाजिक  शक्तियों एवं उनसे जुड़े बिहार के लोकनाटकों यथा सलहेस, रेशमा चौहरमल, हिरनी बिरनी, सती बिहुला, दीना भद्री, बहुला गढ़िन आदि के साथ को आधुनिक रंग चेतना के साथ   तालमेल बनाना एक ऐसा कार्यभार है जिसे आगे आने वाले दिनों में सम्पन्न होना है।

बिहार के रंगमंच को यहां के सामाजिक राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप करना है। उसे विवादों से भी घबराना नही है। जैसा कि गिरीश कर्नाड कहते हैं '' जो रंगमंच विवाद से बचता है वो अपना कफ़न खुद तैयार कर रहा है।"

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

प्रलेस की गतिविधियां इन दिनों (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक
सुशील कुमार भारद्वाज

वर्तमान परिदृश्य को देखकर लगता है कि यदि बिहार प्रगतिशील लेखक संघ निष्क्रिय नहीं है तो कम-से-कम अपने आप को जन्मशताब्दी और शोकसभा तक ही जरूर सिमटाते जा रही है. विस्तार की तो बात ही जुदा है. बिहार इकाई से तात्पर्य राज्य के अड़तीस जिलों से होना चाहिए. लेकिन देखा जाए तो इसकी सक्रिय गतिविधि पटना, गया, बेगूसराय, लखीसराय, समस्तीपुर, आरा, भागलपुर और बक्सर आदि तक ही नज़र आती है.
बिहार प्रलेस के महासचिव रवीन्द्रनाथ राय कहते हैं –“पिछले दो-तीन वर्षों में लगभग पन्द्रह कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. भीष्म सहनी का शताब्दी वर्ष मनाया गया. जिसमें अन्य गणमान्य साहित्यकारों के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी मुख्य वक्ता थे. फिर मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी मनाया गया जिसमें अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, रमेश कुमार, राजेंद्र राजन समेत दर्जन भर वक्ता थे. लगभग सभी वक्ता बिहार से ही थे.”
इसके आलावा वे गोदार्गमा, मटिहानी, सिमरिया (बेगूसराय), गया, आरा , भागलपुर, बक्सर, लखीसराय , समस्तीपुर में होने वाली छोटी-बड़ी कविता-पाठ, गजल और विमर्श गोष्ठियों की चर्चा करते हैं. राजधानी पटना की गतिविधि पर रबिन्द्रनाथ राय कम बोलते हैं. पटना की गतिविधि पर कहते हैं किपिछले दिनों रानी श्रीवास्तव के नेतृत्व में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध को श्रद्धांजलि दी गई और काव्य पाठ किया गया.

जबकि बताता चलूँ कि सुरेन्द्रजी को  श्रद्धांजलिसुमन अर्पित करने का कार्यक्रम रानी श्रीवास्तव के निजी आवास पर किया गया था जिसमें शिवनारायण, अनिल विभाकर, रबीन्द्र कुमार दास, समीर परिमल समेत दर्जन भर साहित्यकार उपस्थित हुए. और वहीं पर पहली बार सुनने को मिला कि प्रलेस की ओर से मौखिक रूप में कहा गया कि कोई कार्यक्रम करने की क्या जरूरत है? बस एक प्रेस विज्ञप्ति बना दिया जाय.  वैसी स्थिति में रानी श्रीवास्तव ने अपने आवास पर कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसी गोष्ठी में ज्ञात हुआ कि केदार भवन में स्थित प्रलेस के कार्यालय को किसी प्रलेस पदाधिकारी के इशारे पर ही निजी आवास में तब्दील कर दिया गया है. जहां कोई भी साहित्यिक गतिविधि करा पाना असंभव है. प्रलेस कार्यालय में साहित्यिक गतिविधि नहीं करा पाने आदि अन्य कारणों से ही पटना इकाई के सचिव शहंशाह आलम ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.

गौरतलब है कि केदार भवन में पिछले पांच वर्ष पहले राजेंद्र राजन आदि के प्रयास से कन्हैया लाल मुंशी के नाम पर एक कमरा प्रलेस कार्यालय को आवंटित किया गया था जिसका उद्घाटन प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने किया था. और तब से उसमें अक्सर छोटी-छोटी गतिविधियां होती रहीं हैंजबकि बड़े-बड़े आयोजन शिक्षक संघ के भवन में अमूमन आयोजित होते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीने सेदफ्तर का यह कमरा निजी आवास बन चुका है.

जबकि रबीन्द्रनाथ राय कहते हैं-पटना इकाई लचर हो गई है और कोई भी ढंग का कार्यक्रम करने में असफल रही है. जल्द ही नई टीमगठित  की जाएगी.

जबकि प्रलेस पटना इकाई के बैनर तले शहंशाह आलम के नेतृत्व में मदन कश्यप समेत कई प्रतिष्ठित कवियों की काव्य-गोष्ठियां टेक्नो-हेराल्ड के दफ्तर में विगत कई महीनों से आयोजित होते रहे हैं.

आश्चर्य यह भी है कि बिहार प्रलेस के सदस्यों में हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, कर्मेन्दु शिशिर जैसे कई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल हैं. तो क्या ये साहित्यकार पटना में रहकर भी इन सब गतिविधियों से अनभिग्य हैं? क्या वे प्रलेस के दफ्तर कभी नहीं जाते या सबकुछ जान कर भी चुप हैं? या ये सब फिजूल की बातें हैं? क्या हिन्दी के साहित्यकार प्रलेस के प्रति अभी भी वही नजरिया रखते हैं जो स्थापना के वक्त थी? प्रेमचंद की तरह दर्शक दीर्घा में बैठने वाले?

जबकि एक तरफ प्रलेस के नेतृत्व में जयपुर में पूंजीवादी लिट फेस्ट के विरुद्ध समानांतर लिट फेस्ट आयोजित किया जा रहा है. और बिहार प्रलेस आगामी महीनों में राहुल सांस्कृत्यायन पर एक आयोजन की तैयारी में है. जिसमें इतिहास, दर्शन आदि पर बातचीत करने के लिए रोमिला थापर, केदारनाथ सिंह, और विजय चौधरी आदि को आमंत्रित किया जाना है.

प्रलेस के इतिहास पर किताब लिखने वाले ब्रज कुमार पांडे कहते हैं-1935 में प्रलेस का जब घोषणा-पत्र तैयार किया जा रहा था तो दो ही लक्ष्य रखे गए थे. पहला था फासिज्म का विरोध और दूसरा था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
1936 ई० में स्थापित प्रलेस का लक्ष्य सिर्फ इसी से पूर्ण हो जाता है कि कल्बुर्गी, पन्सारे, और गौरी लंकेश आदि के हत्या की विरुद्ध प्रदर्शन कर दिया और शोक सभाएं आयोजित कर दीं? क्या साहित्य का इतना ही महत्त्व रह गया है? प्रलेस खुद किस स्थिति में है?

रबीन्द्रनाथ राय स्वीकारते हैं कि पाठकीयता घटी है. इंटरनेट भी एक कारण है लेकिन लेखक भी कहीं दोषी हैं. लेखक प्रलेस के सिद्धांत के अनुरूप जनता के बीच जाकर, जनता की समस्या से रूबरू होकर लिखने की बजाय बंद कमरे में लिखेंगें तो वो भाव, वो जुड़ाव कहां से आएगा?” आगे राय कहते हैं-इसी परंपरा को बनाए रखने के लिए कुछ समय पहले किसान सभा और प्रलेस के तत्वावधान में सिवान में एक आयोजन किया गया था. जिसमें खगेन्द्र ठाकुर भी शरीक हुए थे. लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जो वाजिब माहौल चाहिए वो बन नहीं पा रहा है.  जो सक्रियता होनी चाहिए उसमें कहीं न कहीं चूक हो रही है. समाज में लोगों को उतरना पड़ेगा. उनके बीच से लेखन करना पड़ेगा. तभी पाठकीयता को विस्तार दिया जा सकता है.

ब्रज कुमार पांडे भी कहते हैं-अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाज उठाई जा रही है. प्रलेस में महान साहित्यकारों के जन्मदिन और वर्षगांठ मनाएं जा रहे हैं.
तो सवाल उठता है कि क्या अब प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक रह गई है? स्थापना के 81 वर्ष देख चुकने के बाबजूद प्रलेस इतने तक ही सिमट कर रह गया है? जरूरी है समय के साथ बदलने की. अपनी अहमियत साबित करने की.


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रविवार, 21 जनवरी 2018

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच
सुशील कुमार भारद्वाज



पिछले कुछ वर्षों से बाज़ार मेंकुछ किताबें आ रही हैं जो नई वाली हिंदी के नाम से बिक ही नहीं रही है बल्कि  बेस्ट सेलर जैसे टैगलाइन के साथ भी धूम मचा रही है. और इन किताबों के लेखक चाहे निखिल सचानहों या सत्य व्यास या कोई और सभी के सभी ये नए लेखकचेतन भगत की लोकप्रियता से अभिभूत होकर ही लेखन के क्षेत्र में आए हैं.

लेकिन जैसे चेतन भगत को लोगों ने धीर-गंभीर साहित्यकार मानने से इंकार कर दिया है वैसे ही हिंदी के इन लोकप्रिय साहित्य के रचनाकारों को भी विभिन्न वजहों से लोग खारिज कर रहे हैं. और सबसे बड़ी बाततो ये है कि ये रचनाकार ना तोखुद को प्रेमचंद आदि की परंपरा की मानते हैं और ना हीवेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्रमोहन पाठक आदि की श्रेणी का. ये खुद का एक अलग ब्रांडिंग करते हैं. खुद की एक नई श्रेणी मानते हैं जो दोनों के बींच है. ये खुद को  क्लासिकल साहित्य की सीढ़ी मानते हैं. ये सोचते हैं कि ये बिखरते हुए पाठकों को किताबों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और इन पाठकों को वे असली साहित्य की ओर मोड़ने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ये रचनाकार खुद को आज की जरूरत का लेखक मानते हैं. वे मानते हैं कि वे  आज के युवाओं की जीवनशैली और जरूरत को देखते हुए उनकी रुचि के अनुसार लिखते हैं. ये लेखक ये नहीं मानते कि कोई इनकी किताबों को पढ़कर कोई बड़ी बौद्धिकता हासिल कर लेंगें. वे अपने साहित्य से पाठकों के रूचि परिमार्जन की बात भी नहीं सोचते हैं. कुछ लेखक तो शुद्ध व्यापारी की भाषा में बात करते हैं कि प्रकाशक जितने शब्द की किताब कहते हैं उसी के हिसाब से लिखते हैं. और उसी के अनुसार कहानी में भी काट-छांट करते हैं. हां, कीमत कम रहे इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं ताकि किताब अधिक से अधिक हाथों तक पहुँच सके. वे इसलिए नहीं लिखते हैं कि उनकी किताबें पुस्तकालयों की शोभा बने. वे तो  साफ साफ शब्दों में कहते हैं कि अकादमिक लेखन वाले ही धीर गंभीर लिखकर पाठकों की रुचियों का परिमार्जन कर सकते हैं जबकि वे  भूल जाते हैं कि प्रेमचंद और रेणु आदि कोई अकादमिक लेखक नहीं थे.
अपनी ही बातों पर अड़ते हुए नई हिन्दी वाले ये लेखक  कहते हैं कि आज के पाठक  ना तोखुद को प्रेमचंद आदि से जोड़ पाते हैं और ना ही वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के साहित्य से इसलिए वे नई आबोहवा में पल बढ़ रहे युवाओं के मनोरंजन के लिए उन्हीं की भाषा में उन्हीं की पसंद की चीजों को लिख रहे हैं.
इन साहित्य में उद्देश्य क्या होता है? तो सत्य व्यास जैसे लेखकअपनी किताब “बनारसटॉकीज का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि आई कार्ड खो गया मोबाइल खो गया तो पुलिस में तुरंत रपट लिखवानी चाहिए वरना आप कभी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.”

आपको इन उद्देश्यों को सुनकर ठहाका लगाने की इच्छा हो रही हो लेकिन इन लेखकों को लगता है कि पहले से परिभाषित साहित्य के उद्देश्य को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है. क्योंकि हमारा समय बदल गया है समाज बदल गया है तकनीक के साथ साथ परिस्थितियां बदल गई हैं.इसलिए इन चीजों को बदलने की जरूरत हैक्योंकि समय के साथ चीजे बदल जाती हैं. जो नहीं बदलती हैं वह सड़ –गल के एक दिन खत्म हो जाती है. अपनी प्रासंगिकता खो देती है.  

और सबसे बड़ी बात कि  इन साहित्यकारों को लगता है कि बिक्री के पैमाने पर ही लेखकों की लोकप्रियता ही नहीं आंकी जाय  बल्कि उन्हें मान्यता और स्थापना भी दी जाए. पिछले दिनों पटना में सत्य व्यास ने तो एक कार्यक्रम में बनारसटॉकीज को नोबेल पुरस्कार का हकदार” भी खुलेआम बता दिया.

ये नए लेखक क्या लिखते हैं जो लोगों को लुभाता है? वे  जरूरी बातें लिखते हैं या गैरजरूरी यह मायने नहीं रखता. क्योंकि हर लेखक अपनी अपनी कहानियों पर अपने अपने तरीके से काम करता है. लेकिन इतना तो तय है कि ये लोग पूरा का पूरा मनोरंजन का मसाला तैयार जरूर करते हैं. अब चाहे उसे आप चुटकुले के रूप में स्वीकार करें या दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के रूप में.

यह भी एक सच है कि नकी लेखनी में एक प्रवाह है जो अंत तक पाठकों को बांधे रखने में सक्षम होता है. अब यह उनके लिखने की शैली कहें या भाषा कौशल. लेकिन इतना तो तय मानें कि  इनके किताबों में आपको एक दो लाइन नहींबल्कि पैराग्राफ के पैराग्राफऔर पूरे पेज अंग्रेजी के शब्द वो भी रोमन लिपि में छपे हुए मिल जाएंगे और लोगों की सबसे बड़ी शिकायत उनकी अंग्रेजी के शब्दों के रोमन में छपने से ही है.जबकि किताब में प्रयोग किए गए रोमन लिपि के शब्द कोई ऐसे नहीं होते, जिनके लिए आपको कोई शब्दकोश पलटना पड़े. और इसीलिए वरिष्ठ लेखक तक स्पष्ट शब्दों में कहते हैं किया तो अंग्रेजी में लिखो या फिरहिंदी मेंदोनों का घालमेल मत करो.’ तब ये  लेखक अपने बचाव में दो ही बात कहते हैं.पहले तो यह कि “ये  किताबें ही इसलिए इतनी बिक रही है क्योंकि इसे इस रूप में लिखाही गया है. और आज का पाठक खुद को इस से जोड़ पाता है.” दूसरी बात वे  कहते हैं कि मेरी भी यह सीमा है कि मैं अपनी बातों को इसी रूप मेंसहजता के साथ अभिव्यक्त कर पाता हूं.” तब  लोगों की एक ही आवाज उठती है कि भारत के हिंदी पट्टी का पला-बढ़ा इंसान अपने हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषामें खुद को अभिव्यक्त करने की बजाय अधकचरी अंग्रेजी में कैसे अभिव्यक्त कर सकता  है? ये हमारी शिक्षा –व्यवस्था का दोष है या व्यक्ति विशेष का?
जबकि ये लेखक स्पष्ट शब्दों मेंकहते हैं कि मैं इन शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने कीकोशिश करता तो या तो सही शब्दों को नहीं लिख पाता या फिर वह प्रभाव नहीं पड़ता जो अभी है.” यदि थोड़ी देर के लिए इन लेखकों की बातों को सच मान भी लें तो क्या इन लेखकों के पाठक अधकचरा ज्ञान वाले ही हैं? जिनके पास ना तो हिंदी की सही-सही समझ है और ना ही अंग्रेजी की? यह तो सबसे बड़ा सवाल है पाठकों पर भी बनता है?  जबकि  शुद्ध अंग्रेजी में लिखी गई किताबें जिस अनुपात में बिक रही है और पढ़ी जा रही है उसी अनुपात मेंहिंदी की भी किताबें. अब भलेही संख्या कमोबेश जो भी हो.

अब रह गई बात किताबों मेंबिलो द बेल्ट भाषा का इस्तेमाल करने का, तो ये लेखक स्पष्ट कहते हैं कि ऐसास्थापित एवं सम्मानित रचनाकार भी कभी-कभी करते हैंलेकिन इसे पूरी तरीके से सच नहीं माना जा सकता है.क्योंकि जो स्थापित रचनाकारहैं वे यदि ऐसे दृश्यों  या शब्दों का प्रयोग करते हैं तो अमूमन वैसी परिस्थिति होती है यावातावरण होता है. या फिर वे विभिन्न प्रतिबिंब से अपनीबातों को अभिव्यक्त कर देते हैं.लेकिन इन लेखकों का चित्रणपूर्णतः मसाला के रूप में ही प्रयोग किया जाता है.

इन सबके बावजूद सवाल यह उठता है कि आखिर नई हिंदी वाले ये नए लेखक नए पाठकभी बना रहे हैं? या पहले से ही वर्गीकृत पाठकों को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.पहले से ही साहित्यकारों के तैयार जमीन में ही कहीं सेंधमारी कर अपनी नई जमीन तैयार कर रहे हैं? आखिर यहसच प्रकाशकों की ईमानदारी के बगैर कैसे पता चलेगा? लेकिन इतना तो तय है कि आप इन्हें खारिज करें या स्वीकार करें. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. और दिन -प्रतिदिन ये खुद को स्थापित ही करते जा रहे हैं.  

संपर्क :-sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

लोहियाजी का हिन्दी का सपना अधूरा ही रह गया -सुशील कुमार भारद्वाज

लोहियाजी का हिन्दी का सपना अधूरा ही रह गया
-सुशील कुमार भारद्वाज

भारत के स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर चिन्तक एवं समाजवादी राजनेता डॉ राम मनोहर लोहिया बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे जब से इन्होंनें होश संभाला तब से ही देश और समाज के लिए समर्पित हो गए. बचपन में ही माँ(चन्दा देवी) का हाथ हमेशा के लिए छूटने के बाद वे अपने पिता हीरालाल के साथ गांधीजी से मिलने जाने लगे। और गांधीजी के विराट व्यक्तित्व ने इन्हें काफी प्रभावित भी किया। लेकिन गांधीजी, नेहरूजी आदि से मिलने-जुलने और विचार–विमर्श के बाबजूद इन्होंने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप खुद के लिए अपना एक नया रास्ता बनाया। कांग्रेस में विदेश प्रभाग को देखते हुए इन्होंने बहुत सारे विदेशी घटनाओं को करीब से देखा और उस पर विचार-मंथन किया। अपने समृद्ध अनुभव की ही वजह से लोहियाजी एक ही समय में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाजवाद की परिकल्पना करने में सफल रहे। एक तरफ वे भारत-चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, सिक्किम आदि के बीच अंतर्राष्ट्रीय विवाद एवं समस्या सुलझाने तथा भाईचारा कायम करने की दिशा में पहल करते हुए हिमालय नीति की प्रस्तावना करते थे तो दूसरी तरफ भारतीय समाज की मूल समस्याओं, वर्ण-व्यवस्था, भुखमरी, विषमता, गैरबराबरी, सांस्कृतिक दरिद्रता, गुलामी, सामंती उत्पीड़न पर विचार करते थे। और दाम बांधों, जाति तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, नर-नारी समानता, चौखंभा राज, खेतिहर मजदूरों, किसानों, कारीगरों के लिए वैचारिक सांस्कृतिक आंदोलन आदि भी चलाते थे।
लोहियाजी 'भारतीय समाजवाद' की परिकल्पना में अंग्रेजी भाषा को बाधा मानते थे। इन्होंनें तो लोकसभा में भी कहा कि-
“अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोकराज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिए, उसकी जगह कौन-सी भाषा आती है, यह प्रश्न नहीं है। इस वक्त खाली यह सवाल है, अंग्रजी खत्म हो और उसकी जगह देश की दूसरी भाषाएं आएं। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटनी ही चाहिए और वह भी जल्दी। अंग्रेज गए तो अंग्रेजी भी  चली जानी चाहिए” ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत जैसे विशाल एवं बहुभाषी देश में शासन और राजकाज के लिए सरकार ने अंग्रेजी के पक्ष में बहुत सारी दलीलें दीं लेकिन डॉ लोहिया ने सारी दलीलों से अपनी असहमति जताते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंग्रेजी शोषण, गुलामी और भ्रष्टाचार की भाषा है। गरीब किसान और मजदूर न तो अंग्रेजी समझ पाएंगें न ही वे कचहरी में न्याय मांगनें में सफल हो पाएंगें और न ही वे अंग्रेजी में लिखे संविधान को आसानी से समझ पाएंगें। अंग्रेजी अन्याय की भाषा है।

हालांकि 1950 ई० में जब भारतीय संविधान लागू हुआ था तो यह प्रावधान किया गया कि 1965 ई० तक सुविधानुसार अंग्रेजी का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन उसके बाद हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों एवं सरकारी नौकरशाहों की व्यवस्था पर विचार करने के बाद लोहियाजी ने 1957 ई० में अंग्रेजी हटाओ मुहिम को सक्रिय आंदोलन में परिणत कर दिया। लेकिन अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का सर्वाधिक विरोध दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु में हुआ हिंसक घटनाएं होनें लगीबाबजूद इसके वे हैदराबाद और मद्रास में सभाएं करते रहे 1961ई० में मद्रास में उनकी सभा पर पत्थर भी बरसाए गए 1962-63 में जनसंघ भी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गया। कुछ छात्रों के आत्महत्या करने आदि की घटनाओं के बाद उन्होंने आंदोलन को रोक दिया
लोहियाजी 28जून 1962 को नैनीताल में कहते हैं- “अगर सन्‌ 1947 या 48 में ही सरकार ने अंग्रेजी को हटा दिया होतातो तटीय प्रदेश खुशी से उस नीति को मान लिए होते या कम से कम उनके विरुद्ध नहीं लड़ते। मैं यह साफ कर दूँ कि यह समस्या उत्तर और दक्षिण के बीच की नहीं हैबल्कि तटीय प्रदेशों और मध्य के प्रदेशों के बीच की है। अपनी नीतियों के कारण भारत सरकार ने एक ऐसी स्थिति बना दी है कि जिसमें तटीय और मध्य के प्रदेशों के बीच गड़बड़ हो सकती है। अब इसके सिवाय और कोई इलाज नहीं बचा है कि दिल्ली का काम दो विभागों में बाँट दिया जाए- एक अंग्रेजी का विभागताकि जो तटीय प्रदेश उसमें रहना चाहें तो वे उसमें जाएँऔर दूसराहिन्दुस्तानी का विभागजिसमें मध्य के प्रदेश रहें। इस तरह की नीति पर चलने से मध्य के प्रदेशऔर शायद गुजरात और महाराष्ट्र भीअपने ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा में तेजी से उन्नति कर लेंगे और योजना और उद्योगीकरण में कहीं ज्यादा प्रगति करेंगे। मुझे आशा हैबाद मेंशायद वर्ष के अंदरइससे तटीय प्रदेशों का भी मन ललचाएगा कि वे भी हिन्दुस्तानी विभाग में आ जाएं और इस तरह समूचे देश के पैमाने पर वे अंग्रेजी का माध्यम खत्म करने का इरादा कर लें। श्री नेहरू की नीतियों के कारण तो हरेक आदमी को यकीन है कि तटीय क्षेत्रों और मध्य क्षेत्रों के बीच झगड़ा होकर रहेगा”
वहीं 'हिंदी के सरलीकरण की नीति (1962), भाषा (1966), हिन्दी बनाम अंग्रेजी, 'जाति, भाषा और दाम नीति', सामंती भाषा में लोकराज असंभव' आदि दर्जनों लेखों में लोहियाजी ने साबित करने की कोशिश की है कि अंग्रेजी के पक्ष में दिए गए सारे तर्क कमजोर एवं निराधार हैं। लोहिया ने तात्कालिक आंकड़े पेश करते हुए साबित किया कि ढाई अरब दुनिया में सिर्फ तीस करोड़ लोग अंग्रेजी जानते हैंतब फिर अंग्रेजी का ही इस्तेमाल क्योंअन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का क्यों नहींकेवल शासकों की भाषा ही क्योंउन्होंने यह भी तर्क दिया कि जर्मनी, जापान, सोवियत रूस, दर्शन, विज्ञान, गणित, तकनीक, उद्योग धंधों आदि में विकसित हैं तो अपनी मातृभाषा के कारण न कि अंग्रेजी के कारण। जहाँ तक अन्य भारतीय भाषाओं में अराजकता का सवाल है तो यह बिल्कुल ही बकवास बात है क्योंकि हिंदी ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में लोगों को जोड़ने का काम किया है। वे उदाहरण के तौर पर समझाते हुए कहते हैं कि सन्‌ 1919-20 के आस-पास राष्ट्रीय आंदोलन इसलिए तीव्र हुआ क्योंकि गाँधीजी का आगमन हुआ और उन्होंने भारतीय भाषाओं में आंदोलन को साकार रूप दिया।
साथ ही वे हिन्दी का अन्य भारतीय भाषाओं से किसी बैर की बजाय इसे आपस में एक-दूसरे की पूरक भाषा मानते हैं। लोहिया हिंदी की जगह किसी भी तटीय प्रदेश की मातृभाषा को राजकाज की भाषा के रूप में स्वीकारने को तैयार थे लेकिन हिंदी की जगह अंग्रेजी के वर्चस्ववादी-साम्राज्यवादी रूप को स्वीकारने के पक्ष में नहीं थे। लोहिया मैक्समूलर का हवाला देते हुए कहते हैं कि उसने वेदों के अध्ययन के लिए संस्कृत सीखी लेकिन लिखा अपनी मातृभाषा जर्मन में। उसे मातृभाषा में चिंतन-मनन करने व लिखने के कारण ख्याति मिली।
लोहिया इस आरोप को भी सिरे से खारिज करते हैं कि अंग्रेजी हटते ही जनेऊधारी, चोटीधारी, दकियानूसी दाढ़ी वाले हावी हो जाएँगे। वे इस कथन के सख्त खिलाफ थे कि अपनी भाषाएँ प्रतिक्रियावादी हैं और विदेशी भाषा प्रगति की प्रतीक हैं। लोहिया सामंतवाद के चार आधार मानते हैं- सामंती भाषा, सामंती-भूषा, सामंती-भोजन और सामंती-भवन। उनकी दृष्टि में अंग्रेजी का इस्तेमाल सामंती जीवन का सबसे बड़ा खंभा है। भाषा का संबंध सत्ता एवं राज्य के साथ केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक-आर्थिक मसले से भी जुड़ा होता है। लोहिया की अंतर्दृष्टि ने मातृभाषा की शक्ति को पहचान लिया था।
इन सब के बाबजूद 1965 ई० की समयसीमा को देखते हुए दक्षिण भारत में अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके पार्टी ने “हिन्दी हटाओ” अभियान को और आक्रामक रूप दे दिया जिसकी वजह से केंद्र सरकार को 1963 ई० में संसद में राजभाषा कानून पारित करना पड़ा जिसके अनुसार 1965 के बाद भी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग राजकाज में जारी रहेगा और वह आज तक जारी है
राममनोहर लोहिया के लिए भाषा की समस्या जातिवर्णगरीबीविषमता और गुलामी से कम महत्वपूर्ण नहीं थी। इसलिए उन्होंने भारत की भाषा नीति पर गंभीरता से विचार किया है। आजाद भारत की भाषा नीति कैसी हो?  इसके लिए सबसे व्यवस्थितमौलिक एवं विचारोत्तेजक स्थापना लोहिया ने दी। हालांकि इसके लिए वे गाँधीजी की भाषा नीति के भी ऋणी हैं। गाँधी जी ने ही भारतवासियों को यह शिक्षा दी कि देश की समृद्धिउन्नति एवं विकास मातृभाषा में चिंतन-मनन एवं कार्य करने से संभव है। साथ ही गाँधीजी यह भी कहते थे कि मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाएं और मेरी खिड़कियाँ बंद कर दी जाएँ। मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में चारों ओर से अधिक से अधिक स्वतंत्रता के साथ बहती रहे। मगर मैं किसी के झोंके में उड़ नहीं जाऊँ"।
     

लेकिन यह भी अजीब संयोग है कि डॉ लोहिया का सपना उनके असमय मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गया और आज भी हिन्दी वहीं है जहां वर्षों पहले थी और अंग्रेजी आज भी उसी स्वरूप में है जिसके लिए डॉ लोहिया ने चेताया था

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब

नेहरूजी और बाबू वीर कुवंर सिंह के बीच से लोहिया जी गायब
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आज जब राजेंद्र नगर से लौटते हुए पटना जंक्शन से गुजर रहा था तो थोड़ा अजीब लग रहा था। भीड़ थोड़ी कम लग रही थी। शायद मौसम का असर रहा हो। फिर लगा कि शायद अतिक्रमण हटाया गया हो क्योंकि आज मीठापुर और चिड़ीयांटांड फ्लाईओवर को जोड़नेवाले नए पुल का भी उद्घाटन है। तीसरी बात कि ऑटो वाले को भी वहां से हटाकर बगल वाले मल्टिपार्किंग कम्पलेक्स में शिफ्ट कर दिया गया है।
इन सभी कारणों को सोच ही रहा था कि जंक्शन के ठीक सामने आते ही गोलम्बर में चमकते बुद्ध की मूर्ति पर नजर पड़ी। कभी इस गोलम्बर में एकलौते नेहरूजी की प्रतिमा चमकती नजर आती थी। लेकिन आज उनकी स्थिति देखकर थोड़ा दुख हुआ। बेचारे धूल-गंदगी में नहाए हुए थे जबकि बुद्ध यूँ चमकते हुए मुस्कुरा रहे थे कि लगा उन्हें अभी-अभी ही ग्यान की प्राप्ति हुई हो।खैर, महावीर मंदिर के ठीक सामने पुल पर ही मंच सज कर तैयार था। आगे बढ़ा तो जीपीओ गोलम्बर के पास आते ही लोहिया जी की याद आई। गोलम्बर तो ज्यों का त्यों ही है बस बेचारे लोहिया जी की मूर्ति वहां नहीं थी। कुछ वर्ष पहले ही वहां से हटा दिया गया था। हटाने की वजह क्या थी?- ये बात तो राजनेता ही बेहतर जानें! हम तो बस इतना ही जानते हैं कि एक छोड़ पर नेहरूजी मार्ग दिखा रहे थे तो आर ब्लॉक में चौराहा पर बाबू वीर कुंवर सिंह अपने घोड़े पर तलवार लहराते नजर आते थे तो बीच में लोहिया जी ही गरीबों -मजदूरों को पनाह देते थें। वहीं लोग सब्जी, पान, आदि की दुकान सजाए नजर आते थे।
जब आर ब्लॉक पहुंचा तो देखा कि बाबू वीर कुवंर सिंह भी धूल-गर्द में सने हुए थे। फ्लाईओवर बनाने में लगे मजदूर उनकी मूर्ति के चारों ओर इतने गड्ढे बना दिए हैं कि कभी-कभी डर लगने लगता है कि बेचारे का घोड़ा न कहीं लुढ़क जाए।
खैर, पटना बदल रहा है। पटना की आबोहवा बदल रही है। राजनीति बदल रही है फिर नेहरूजी को थोड़ा गंदगी से एलर्जी की बीमारी थोड़े ही न हो जाएगी! रही बात बाबू वीर कुवंर की तो स्वतंत्रता सेनानियों को अब कौन पूछता है? अब तो ये भी नहीं पता चलता साफ-साफ कि उनकी महत्ता किसी दल के लिए मायने भी रखता है?
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सुशील कुमार भारद्वाज