रविवार, 27 दिसंबर 2015

युवा कवि और उनके रचना का विषय(आलेख):सुशील कुमार भारद्वाज




 युवा कवि और उनके रचना का विषय : सुशील कुमार भारद्वाज 


यदि किसी से पूछें कि हिंदी साहित्य का कौन–सा दौर चल रहा है तो अधिकांश लोग मुंह देखते नज़र आएंगें. कुछ लोग सीधे यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगें कि यह साहित्य के लिए संकट का काल है जिसका कोई नाम ही नहीं है. दरअसल इस समय पांच पीढ़ी एक साथ लेखन में हैं उसपर तुर्रा ये कि अधिकांश युवा कवि हैं चाहे उनकी उम्र 18 वर्ष की हो या 50 पहुँचने के करीब. आखिर किस आधार पर सबों को युवा कहा जाए?
बात यहीं कहाँ रूकती है वरिष्ठ एवं स्थापित समालोचक इनकी रचनाओं को एक सिरे से ही नकार देते हैं. फिर भी ये रचनाकार अथक परिश्रम के साथ लिखे जा रहे हैं. कहीं छप रहें हैं तो ठीक वर्ना खुद ही छापना और छपवाना शुरू कर देते हैं. जिन्हें किसी पत्र-पत्रिका में जगह नहीं मिली तो वे फेसबुक और व्हाट्सअप्प के जरिये अपने मित्रों और परिचितों के साथ शेयर कर रहे हैं. कभी कभी अधिक से अधिक लोगों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए ये रचनाकार अपनी कविता के साथ तस्वीर और टैग लगाना नहीं भूलते. धीरे धीरे ये ब्लॉग और बेब पत्रिका में छपने की कोशिश करते या फिर खुद ही अपना ब्लॉग शुरू कर देते हैं. मुझे हजारी प्रसाद द्विवेदी जी बात याद है जिन्होंने कभी कहा था–“साहित्य में जल्दबाजी के लिए कोई स्थान नहीं है. और अपनी रचना को खुद से कभी नहीं छापना चाहिए वर्ना बांकी सब तो याद रहेगा लेकिन लिखना जरूर भूल जाओगे.”
कविता के नाम पर अस्पष्टता का माहौल खड़ा किया जा रहा है. कविता अपनी अर्थवत्ता खो रही है. आखिर ये कवि क्यों बने? यदि ये खुद की संतुष्टि के लिए लिख रहे हैं तो डायरी क्यों नहीं लिखते? और यदि लोगों के लिए लिख रहें हैं तो उनके पसंद–नापसंद की चिंता किए बगैर आप बाजार में कैसे टिक सकते हैं?
सच तो ये है कि पद्य सबसे पुरानी विधा है और इसकी अपनी एक कला है, लेकिन पद्य के गद्य रूप में आने की वजह से लोग कविता को सबसे आसान विधा समझ रातों–रात महान कवि बनने की परिकल्पना करने लगे हैं बगैर शब्दों की कलाकारी समझे. उन्हें न तो भाषा विज्ञान की अच्छी समझ होती है न ही वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाओं को बारीकी से समझने का समय. सबों को जल्दबाजी है अपनी बातों को कह देने की बिना संवेदना और संप्रेषणीयता का विचार किए. जल्दबाजी का आलम ये है कि जिस उम्र में स्थापित रचनाकार अपनी कविता किसी को सुनाने से हिचकते थे उस उम्र में कवियों के चार संग्रह खुद के पैसे से छप चुके होते हैं.
लेकिन आलोचकों की परवाह नहीं करते हैं आज के युवा, क्योंकि समय बदल चुका है, जीवन की सहुलियतें बदल चुकी हैं, वे अपने आप को अपने दम पर सिद्ध करने में लगे हैं. वे अपने विषयों के चयन में भी विविधता रखने की कोशिश करते हैं- गाँव की गरीबी, दलित, साम्प्रदायिकता, समाज, इतिहास, लोक, भूमंडलीकरण, बाजार, साम्राज्यवाद, विषमता आदि के साथ-साथ स्त्री, सौंदर्य, प्रेम प्रकृति, ईश्वर, विज्ञान जैसे सभी विषयों को अपने दायरे में रखते हुए काव्यात्मक अभिव्यक्ति को सहज सरल एवं संप्रेषणीय भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं. ये बदलते परिवेश में समय के साथ संवाद करते हुए आगे बढ़ने की कोशिश में हैं भले ही आलोचक क्यों न ये कहते फिरें कि कुछ भी नही लिखा जा रहा है और जो लिखा जा रहा है वह स्थापित मानकों पर खड़ा नहीं उतर रहा है.
जबकि पंकज चतुर्वेदी, शायक आलोक, अग्निशेखर, सुरेश सेन निशांत, केशव तिवारी, महेश पुनेठा, भरत प्रसाद, वीरू सोनकर, बोधिसत्व, हेमन्त कुकरेती, प्रताप राव कदम, बद्रीनारायण, राजकिशोर राजन, शाहंशाह आलम, संतोष चतुर्वेदी, ऋषिकेश राय, बाबुषा कोहली, कमलजीत चौधरी, राज्यवर्द्धन, अरुण शीतांश और हरे प्रकाश उपाध्याय आदि जैसे कवि आलोचकों को कड़ी चुनौती दे रहे हैं.
इन पंक्तियों में शायक आलोक की रचनात्मकता को स्वयं देखें-
“एक दिन 
कीड़े खा जाएंगे तुम्हारी रखी जमा की गई किताबों को
फिर कीड़े आहार बनाएंगे तुम्हारी लिखी जा रही कविताओं को
फिर वे तुम्हारे जेहन पर हमला करेंगे
चबा लेंगे अजन्मी कविताओं के एक एक शब्द
वे खा लेंगे नींब से चाटते तुम्हारी पूरी कलम
और अंत में वे तुम्हारी उँगलियों को घर बना लेंगे.
इसी तरह बाबुषा कोहली की कविता शिल्प और संवेदना के स्तर पर विचारणीय है-
“उन मछलियों को अपने काँटों में मत फाँसो
उनकी छाती में पहले ही काँटा गड़ा है
कौन कहता है मछलियों की आवाज़ नहीं होती?
मछलियों की पलकों में उलझी हैं सिसकियाँ
टुकुर - टुकुर बोलती जाती हैं निरंतर
उनके स्वर से बुना हुआ है समुद्र का सन्नाटा”
बद्री नारायण उन कवियों में से हैं जो लोक से ताकत लेते हैं. वे कथनों को मुहावरी जामा पहनाने में समर्थ हैं.
         चिड़िया और हिरणी के बारे में सोचना    
        अन्ततः शिकारी के बारे में सोचना है”

इस समय की कविता नारेबाजी, बड़बोलेपन, शोर और उत्तेजना के अतिरेक, आदि से कोसों दूर है. दायरों की बंदिश उन्हें पसन्द नहीं, मामला चाहे कथ्य का हो या अभिव्यक्ति का. आज के कवि एकांगी नहीं हैं बल्कि वे सही अर्थों में प्रगतिशील हैं. उनके पास अपनी तरह के अभिव्यक्ति के औजार हैं. लोकजीवन, लोकभाषा, लोककथा,मिथक आदि अछूत नहीं हैं. वह प्रहार करते हैं लेकिन सार्थक एवं सकारात्मक. इनका विश्वास विध्वंस की बजाय सृजन में है. वे  प्रकृति में महत्वहीन समझे जाने वाली बातों को भी कविता में यथोचित स्थान देते हैं. फ़्रांस की घटना हो या सीरिया की सब पर उनकी नज़र है. पंकज चतुर्वेदी स्पष्ट कहते हैं-
       “हम अणु युग की ताकत का दुख नहीं चाहते    
        धरती पर विस्फोट नहीं चाहते   
        हम थोड़ी सी धरती और थोड़ा सा आकाश चाहते हैं             
        हम धरती का प्यार चाहते हैं    
        हम तितली और फूलों का प्यार चाहते हैं”          
माँ, पिता, बहन, भाई, बेटियाँ, मित्र आदि पर कविताएं हैं तो
भूख, शोषण और विस्थापन भी पीछे नही है. अग्निशेखर यूँ रखते हैं अपनी बातों को -
       “छींकती है जब भी मेरी माँ
        यहाँ विस्थापन में
        उसे याद कर रही होती है गाय
        इतने बरसों बाद भी
        नहीं थमी है खून की नदी
        उस पार खड़ी है गाय”
        इस पार है मेरी माँ”
पारिवारिक दर्द को सुरेश सेन की पंक्तियों में देखा जा सकता है-
                पिता के जाने के बाद
        हम बेटों ने आपस में
        सब कुछ बांट लिया
        जमीन, घर, पासबुक में पड़े सभी पैसे
        रह गई घर के कोने में पड़ी
        टुकुर-टुकुर निहारती माँ और वह छड़ी

 वहीं विडम्बना पर पुनेठा की पंक्तियाँ गौरतलब हैं-
       “कैसा अदभुत समय है
        एक हत्यारा
        दूसरे हत्यारें को
        देता है सजा
        हत्या के आरोप में”
कवि लगातार समाज की बुराइयों और अत्याचारों पर निडर हो प्रहार कर रहें हैं वे अपने अनुभव एवं विरोध को जनमानस तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.
यदि इन युवाओं की कविताओं का मूल्यांकन, पारंपरिक मूल्यांकन पद्धति से परे नये नज़रिये के साथ बगैर पूर्वाग्रह को मन में रखे किया जाए को कोई कारण नहीं बचता कि ये कविताएँ अपने समय का प्रतिनिधित्व करते न नज़र आए. इन कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियों में गुजरता हुआ समय दिखाई देता है. यहाँ सपनों की उड़ान ही नहीं, बल्कि हकीकत के धरातल पर बेबाक और बेलौस टिप्पणियां हैं जो नयी उम्मीदों को पल्लवित कर रहे हैं. 
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बुधवार, 16 दिसंबर 2015

प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है : प्रभात रंजन (साक्षात्कार)



प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है : प्रभात रंजन






प्रभात रंजन की कहानियों में बिहार मजबूती के साथ मौजूद है. उनके कहानी संग्रहों 'जानकी पुल' और 'बोलेरो क्लास' की कहानियों में बदलता हुआ बिहार है, युवाओं के सपने हैं, अटाटूट महत्वाकांक्षा है. आजकल 'कोठागोई' से वे विशेष चर्चा में हैं, जिसमें उन्होंने किस्सागोई शैली में चतुर्भुज स्थान की तवायफों के किस्से कहे हैं. वे हिंदी के सबसे चर्चित साहित्यिक ब्लॉग 'जानकीपुल.कॉम के मॉडरेटर भी हैं. पेश है प्रभात रंजन से उनकी रचनाशीलता को लेकर सुशील कुमार भारद्वाज की हुई बातचीत का एक अंश :-


जानकीपुल से कोठागोई तक का सफर कैसा रहा?
मुझे याद है जानकी पुल कहानी जब आई थी तब भी उसके नयेपन को लेकर अच्छी चर्चा हुई थी.2004में.उस समय भाजपा सरकार ने इण्डिया शाइनिंग का नारा दिया था, मैंने अपने गाँव के उस पुल को याद किया था जिसके बनने की घोषणा 20 साल पहले हुई थी. लेखक के रूप में इस सफ़र से मुझे इस बात की ख़ुशी है मेरी उन कहानियों को विद्वानों-पाठकों में स्वीकृति मिली जिनके केंद्र में उत्तर बिहार के धूल भरे गाँव हैं, तिरहुत की संस्कृति है. मुझे इस बात का संतोष है कि मेरी उस भूली बिसरी संस्कृति को सभी लोगों ने भरपूर प्यार दिया है. मैं स्थानीयता का लेखक हूँ. संतोष इस बात का होता है कि उस स्थानीयता को वहां से बाहर स्वीकृति मिली. इस सफ़र की यही बड़ी उपलब्धि मुझे लगती है.
उदय प्रकाश और मनोहर श्याम जोशी जैसे रचनाकारों ने आपको कितना प्रभावित किया?   
उदय प्रकाश मेरे लिए पहले प्यार की तरह रहे हैं. जब मैं लेखक नहीं था तब उनसे काफी मिलता था. वे भी मुझसे मिलने मेरे होस्टल आते थे. उनसे मैंने यह सीखा कि लेखक के लिए विजन कितना जरूरी होता है. किस तरह अपने आस-पास, अपने परिवेश को विराट रूपक में बदला जा सकता है. उन्होंने मुझे बड़ा सोचना सिखाया.
मनोहर श्याम जोशी मेरे गुरु थे. लम्बा साथ रहा उनके साथ. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा. लेकिन सबसे बड़ी सीख उनकी यही रही कि गंभीर से गंभीर लेखन में भी पठनीयता होनी चाहिए और बेहद पठनीय रचनाओं को भी गंभीरता से लिखा जाना चाहिए. वे किसी भी विषय पर लिख सकते थे, बोल सकते थे. उर्दू शायरी से लेकर ज्योतिष तक हर विषय पर वे पूरे अधिकार के साथ चर्चा कर सकते थे. उनका रेंज अक्सर मुझे चमत्कृत कर जाता था. लेकिन उनकी संगत में रहकर मैंने हर विषय को गंभीरता से पढना सीखा. उन्होंने मुझे सिखाया कि अच्छा लेखक बनने के लिए बहुत पढना चाहिए, और कुछ भी पढना चाहिए. वे कहते थे कि 100 किताबों की एक सूची बनाकर उन्हीं पुस्तकों का बार-बार अध्ययन करना चाहिए.
यही नहीं उनसे यह सीखा कि लेखन में मुकाम बनाना है तो लेखन में एक अनुशासन का पालन करना चाहिए और रोज नियम से लिखना चाहिए.
आप अपनी रचनाओं को उत्तर बिहार पर ही विशेष केंद्रित करते हैं. कोई खास वजह?
मुझे गाब्रियल गार्सिया मार्केज याद आ रहे हैं- ‘जिंदगी वह नहीं होती है जिसे हम जीते हैं, जिंदगी वह होती है जिसे हम याद करते हैं और जिस तरह से उसे याद करते हैं. उत्तर बिहार मेरे जीवन की समृद्धि का प्रतीक है. दिल्ली में तो मैं विस्थापित हूँ. जो संस्कृति, जो समाज मुझसे छूट गया उसे अपनी कहानियों में बचाता चलता हूँ. बदलाव इतना चुपचाप और इतना तेज हो रहा है कि जल्दी ही उन स्थानीय तत्वों का लोप हो जायेगा जिनको हम अपना मानकर जिनसे जुड़ते रहे. एक लेखक के तौर पर उनको अपनी कहानियों में तो बचा पाऊं. यह पीड़ा है. मेरे लेखन में विस्थापन का दर्द है. इस सबका केंद्र उत्तर बिहार है.
बदले परिदृश्य में हिंदी साहित्य और इसके बाजार को कहाँ देखते हैं?
देखिये हिंदी की जो बड़ी ग्रंथि थी वह खुल गई है. इसका एक अकादमिक, लेखक संगठन वाला जो माहौल था वह व्यापक हुआ है. हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार हुआ और उसके पसंद का साहित्य भी सामने आ रहा है. पिछले दौर में मुख्यधारा के लेखक हिंदी में विचार बचाने के लिए लिखते थे आज जो नया लेखक वर्ग सामने आया है उसके पास पाठकों की ताकत है, वह हो सकता है वैचारिक रूप से हृष्ट पुष्ट न लगता हो मगर वह समाज के ज्यादा निकट लगने लगा है. आज हिंदी साहित्य की स्वीकृति बढ़ी है. सोशल मीडिया ने हिंदी के बाजार को एक नया आयाम दिया है, लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी के लेखकों की पूछ बढ़ी है. जी, हिंदी का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, बदल रहा है, जरूरत उसे समझने की है.
लोकप्रिय साहित्य और गंभीर साहित्य के विभाजन को आप किस तरह देखते हैं?
गंभीरता कोई मूल्य नहीं है. हर भाषा में, हर समाज में दोनों तरह का साहित्य होता है, होना चाहिए. इससे भाषा समृद्ध होती है, रहती है. कहते हैं कि तुर्की भाषा में जासूसी उपन्यासों की समृद्ध परम्परा की ज़मीन पर ही ओरहान पामुक जैसा विलक्षण लेखक पैदा हुआ. हिंदी में भी फणीश्वरनाथ रेणु, मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक हुए हैं जिनको हर तरह के पाठकों का प्यार मिला. मुझे गंभीर और लोकप्रिय साहित्य हमजाद की तरह लगते हैं. आजादी पाठकों के पास रहनी चाहिए चुनने की. जिसे जो पढना है पढ़े.
युवाओं को लक्षित करके लिखे जा रहे साहित्य का क्या प्रभाव पड़ेगा?
युवाओं को लक्षित करके हर दौर में लिखा गया है. आज हिंदी में बड़ी तादाद में युवा पाठक हैं. यही हिंदी का भविष्य निर्धारित कर रहे हैं. साहित्य को भविष्योन्मुख होना ही चाहिए. समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है, उसके मानक, उसके मूल्य बड़ी तेजी से चेंज हो रहे हैं, हिंदी साहित्य को उस समाज को रूपायित करने की चुनौती है जिससे वह बच नहीं सकता.
संपादक के रूप में युवा रचनाकारों में क्या सम्भावना देखते हैं?
सबसे बड़ी बात यह है कि आज जो युवा लिख रहे हैं वे साहित्यिक गुटबंदी से पूरी तरह मुक्त हैं. हम लोगों ने जब लिखना शुरू किया था तब हम हिंदी साहित्य के सत्ता केन्द्रों को प्रभावित करने के लिए लिखते थे. उनकी नजर में आने के लिए. आज का लेखक पाठकों के लिए लिखता है. यह बहुत बड़ा बदलाव है, जो हिंदी को समृद्ध करेगा. इससे सिर्फ युवा लेखक की सम्भावना का ही पता नहीं चलता है सुशील जी बल्कि यह भी पता चलता है कि हिंदी का पाठक वर्ग कितना बड़ा और विस्तृत है. एक महीने में अगर 50 हजार के आसपास पाठक सिर्फ साहित्य पढने के लिए आयें तो यह बहुत बड़ी और उत्साहवर्धक बात है.
कला के लिए कला (आर्ट फॉर आर्ट सेक) पर आपका क्या विचार है?
भाई देखिये कला सबसे पहले कला के मानकों पर कला होनी चाहिए, अगर कविता है तो पहले कविता तो हो, विचार, उसको प्रासंगिकता देते हैं. यही हाल साहित्य की अन्य विधाओं के सन्दर्भ में भी कहे जा सकते हैं. मैं यह नहीं मानता कि बिना सामाजिक सन्दर्भ के, बिना सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के कोई साहित्य या कला विधा कालजयी हो सकती है. जो रचना काल अपने काल को गहराई से पकड़ता है, अंकित कर पाता है वही रचना कालजयी हो सकती है.
जब कुछ लोग आपके लिए मठाधीश शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो कैसा लगता है?
हा हा हा. हिंदी में मठाधीश तो वह होता है जो अकादमिक सत्ता के केंद्र में होता है या उसके पास लेखक संगठनों की सत्ता होती है. हम तो जानकी पुल वाले हैं. इस पुल के माध्यम से यह जरूर किया है कि सत्ता केन्द्रों को लगातार प्रश्नित करने का काम किया है.
इन दिनों क्या लिख रहे हैं?
इन दिनों प्रेम को लेकर एक उपन्यास लिख रहा हूँ. डिजिटल एज में प्रेम और उसकी तड़प को लेकर. मुझे लगता है कि प्रेम का अभाव इस समय का सबसे बड़ा भाव हो गया है. सारे नए तकनीकी माध्यमों के सहारे चलने वाले प्रेम में वह उत्कटता, वह तड़प हो सकती है क्या?
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बुधवार, 11 नवंबर 2015

हनीफ मदार की बंद कमरे की रोशनी बेपर्द करती हैं समाज की सच्चाईयों को (पुस्तक समीक्षा) :सुशील कुमार भारद्वाज



                   
  बंद कमरे की रोशनी : बेपर्द करती कहानियां (पुस्तक समीक्षा)
-    सुशील कुमार भारद्वाज 

जिंदगी निर्मम स्वार्थ और झूठे अहम के बीच जिस विद्रूप समाज में जीने को विवश करती है उसी समाज का आईना प्रस्तुत करता है कथाकार हनीफ मदार का कथा-संग्रह “बंद कमरे की रोशनी”. आशावादी दृष्टिकोण से रची गई ग्यारह कहानियों को इस संग्रह में प्रस्तुत किया गया है.
हनीफ मदार की इन कहानियों में क्रांति का एक स्वरूप देखने को मिलता है. राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और नैतिक रूढ़िवादी परम्पराओं की प्रताड़नाओं से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ संघर्ष करती स्त्रियां अपने जीवन को अपनी  शर्तों पर जीने की कोशिश करती हैं. कहानी की नायिकाएं पुरुष सत्ता के एहसानों तले दबने की बजाय अपने वस्तुपरक तर्कों से मुखर होकर अपने अधिकारों की मांग करती हैं. “दूसरा पड़ाव”, “एक और रिहाना नहीं”, “चरित्रहीन” और “अब खतरे से बाहर हैं” आदि कहानियां इनकी गवाह हैं. जबकि “पदचाप” और “तुम चुनाव लड़ोगे” जैसी कहानियों में पुरुषों के प्रतिकूल परिस्थिति में लड़खड़ाते कदमों को मजबूती देती नारियों का स्वरूप नज़र आता है.
हनीफ मदार
संग्रह की पहली कहानी “पदचाप” पीतपत्रकारिता के साथ-साथ पुलिस प्रशासन की कारगुजारी पर करारी चोट करती है. कहानी यह भी दिखाती है कि कैसे सामंतवादी सोच के लोग भोले-भाले लोगों का जमीन हड़पने और उनलोगों को बंधुआ मजदूर बनाये रखने के लिए बालश्रम आदि कानूनों की आड़ में क्या–क्या साजिश रचते रहते हैं?
“तुम चुनाव लड़ोगे!” में स्पष्ट दिखता है कि समाज के होशियार प्राणी किस प्रकार निरीह इंसान पर चुनाव आदि मसलों में अपनी मर्जी जबरन जाति- धर्म के नाम पर लाद देते हैं. साथ देने के वक्त पीछे हटने लगते हैं और किस प्रकार सत्ता लोभ के दलदल में फंसने पर सिर्फ असामाजिक तत्व अपनी घुसपैठ कर उनके घर के वातावरण को अपने कर्मों से दूषित करने लगते हैं?
“दूसरा पड़ाव” मनुष्य के अवसाद और कुंठा पर करारी चोट करती है| शालिनी जब कला के लिए कदम बढाती है तो सामाजिक और पारिवारिक संघर्ष उसके सामने आते हैं. लेकिन नाटक मण्डली का ही साथी और बाद में जीवन-साथी रवि अपने अंदर दबे रूप को हारे हुए इंसान की तरह बाहर लाते हुए जब पति होने का एहसास कराता है, तो कला के नाम पर मण्डली में समाये काले भेडिये का एहसास होता है. अवसाद ग्रस्त रवि जब राजनीति का सहारे लेकर शालिनी को परेशान करता है तब भी वह बगैर अपना तमाशा बनाये जहर का घूंट पीते हुए अपने मिशन के साथ आगे बढती रहती है.
“बंद कमरे की रोशनी” फिजूल के सांप्रदायिकता कट्टरता पर चोट करती है. जहाँ धर्मानुसार विषय का चयन नहीं करने पर जीवन में बहुत सारी भौतिक सुखों से हाथ धोना पड़ता है वहीं पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग जिस पुजारी की प्रशंसा करने से नही थकते थे वही नाम मात्र के भेद पर उबाल खाने लगते हैं.
जबकि “एक और रिहाना नही” में रिहाना अपने माँ की वैवाहिक-जीवन की दुर्गति और पिता के अमानवीय रूप को देखकर विवाह जैसी संस्था में अपना विश्वास खो देती है. लेकिन जब सामाजिक दबाब में अपने जीवन की शुरुआत करती है तो पहले ही पग से ऐसे हालत से रुआबरू होना पड़ता है कि वह खुद को फिर से इससे अलग होकर रहने का एलान कर देती है कि एक और रिहाना की जरुरत नहीं है, जो की समाज में नारी दुर्दशा को बहुत ही करीने से उभरता है.
“चरित्रहीन” में एक आदमी के मानसिक दिवालियापन को बखूबी उकेरा गया है. स्पष्ट किया गया है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति भावनात्मक असुरक्षा में किस प्रकार का कदम उठा लेता है? चरित्रहीन जैसे शब्दों से आत्मा तक बिंध चुकी सरला आखिर अपने कुंठाग्रस्त प्रेम-प्रस्तावक रामप्रकाश से पूछ ही लेती है कि क्या उसके प्रेम को ठुकराना ही उसके चरित्रहीन होने का पैमाना है?
इन सबसे अलग “रोजा” धोखे के धार्मिक पाखंड को तमाचा है. आखिर उलाहना का वाजिब हक़दार कौन है? – वो जो ईमान से मानता है कि जीवन के इस जटिलता में रमजान के पावन महीने में रोजा पल-पल खंडित होता है या वो जो दिखाने के लिए रोजा तो रखे लेकिन उनके टूटने का गम तक उसे ना हो?
“उद्घाटन” जैसी कहानी मानवीय सम्बन्ध और धर्म के नाम पर होते संघर्ष के बीच पनपे  अविश्वसनीय रिश्ते की पोल खोलता है.
जहाँ कथाकार “चिंदी–चिंदी ख्वाब” में अमानवीय होते रिश्ते को दर्शाने की कोशिश करता है. अपने सारे अरमानो को तिलांजलि देकर माता–पिता जिस बेटे को डाक्टर बनाते हैं, वही दीपक धन और नाम के मद में अपने माता-पिता के होने मात्र से हीनभावना से ग्रस्त दिखता है. और ऐसी स्थिति में असाध्य रोग से लगातार संघर्ष करते माता –पिता बेटे के इस व्यवहार को देखकर दम तोड़ देते हैं तो अनुचित क्या है? वहीं “अनुप्राणित” में नैतिक, जातीय और सामाजिक बंदिशों के बीच टूटता इंसान अपने अस्तित्व को प्रेम के सहारे तलाशने की कोशिश जारी रखता है.
संग्रह के अंतिम कहानी “अब खतरे से बाहर हैं” में एहसान के चादर तले खान साहब जब इस्लाम की बात कह स्त्रियों को शिक्षा से दूर रखने की साजिश करते हैं तो परवीन जैसी बहुएं उनकी सच्चाइयों को बेपर्द करने से नही चुकती हैं. नारी शिक्षा और कठमुल्लों के संघर्ष को यह कहानी स्पष्ट करती है.  
जिंदगी जीने के दो ही विधि हैं – एक जिंदगी जिस रूप में है उसे उसी रूप में स्वीकार करना और दूसरा रास्ता है – पलायन का. लेकिन हनीफ मदार की कहानियों के पात्र पलायन नही करते हैं बल्कि बंद कमरे की रोशनी में अपने अस्तित्व के सच और झूठ से जूझते नज़र आते हैं. हनीफ मदार की खासियत है कि वे कहानियों को यथार्थ के रुखड़ी जमीन पर रगड़ने के बाबजूद आशावादी दृष्टिकोणों के साथ एक नए बदलाब के साथ क्रांति के लिए प्रेरित करते हैं. वे कहानियों में कुंठा, अवसाद, और स्वार्थ जैसी मानवीय प्रवृत्तियों के सहारे आर्थिक गैरबराबरी , जातीय दंश, धार्मिक उन्माद और रूढ़िवादी परम्पराओं के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के संघर्ष को दिखाते हैं.
जहाँ लेखन शैली में पाठकों को बांधे रखने की क्षमता है वहीं ग्रामीण परिपेक्ष्य में रची इन अधिकांश कहानियों में शब्दों का चयन और क्षेत्रीय बोली(ब्रजभाषा) की मिठास इसे और भी खास बनाती है. कहानियां आपको अंत में सोचने को विवश करती हैं कि हम कैसे मनुष्य हैं? हमारा मानवता के प्रति क्या दायित्व है? और यही इस कथा-संग्रह की सफलता भी है.
 पुस्तक – बंद कमरे की रोशनी,
लेखक – एम० हनीफ मदार
प्रकाशक –उद्भावना, गाजियाबाद,  
पृष्ठ – 135,   मूल्य -125/-


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