शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

पंखुरी सिन्हा की कविताएँ

पंखुरी सिन्हा की कविताएँ जितनी सारगर्भित हैं उतनी ही प्रभावकारी भी. इनकी कविताओं में बिम्बों का प्रयोग बखूबी देखने को मिलता है. आइये पढ़ते हैं बिम्बों से भरे पंखुरी सिन्हा की कुछ राजनैतिक एवं गैर-राजनैतिक कविताओं को:-




कोई क्या चखेगा शहद अब?


कोई क्या चखेगा शहद अब?
अब कहाँ लगाती है
मधुमक्खहि नीम में खोंता
करंज में छत्ता?
अब कहाँ आती है
मध छोरवा की पुकार
जो आयी इस बार
राजधानी में
तो मैंने सोचा
कोई क्रांति हुई
वह बाल्टी में बेच रहा था शहद
उस में दिख रही थी
कुछ गिर गयी मधु मक्खही
टूटे हुए छाते के टुकड़े
धूप में सुनहली खुशबू
की तरह चमक रहा था मध्
धूप में चमक रहा था
शहद का सुनहला रंग
या उसकी सुनहली परछाई
से चमक रही थी धूप
कितना सुंदर था यूँ
ले लेना प्रकृति से सीधा सीधी
मिठास नामक स्वाद
मानो तोड़कर फूलों का रस
            फूलों के खिले चेहरे से जैसे
बेतक्कलुफ़
चिड़िया सा
तितली सा
मधु मक्खी सा
उड़  उड़ जाना
भर भर आना
इस सब कुछ से लबालब थी
मध् छोड़वा की बाल्टी
उससे कैसे नहीं
ख़रीदा जाता शहद?
जबकि माँ मचाती रहीं
ठगों और ठगी का कुहराम
पर कैसे कैसे तोला गया शहद
भरा गया किन दालों की
पुरानी खाली शीशियों में
बाज़ारू शहद के पुराने डब्बों में
ढक्कनों के भीतर शहद भरती
मैं वह आतुर लड़की थी
जिसने कभी नहीं खरीदा था
मध् छोड़वा का मध
किन बगीचों की टहल थी उसमे
जाने किन पत्तों की हवा
पतझर की धूप थी
सर्दियों की दस्तक लिए
जिनके आते ही
जम गया बोतलों
शीशियों में रखा शहद
जैसे उसमे चीनी का उच्छिष्ट हो
और जबकि याद आये थे
गन्ने के लह लह खेत
और हुई थी ख़ुशी
चीनी मिलों को पीछे
बहुत पीछे छोड़ आने की
पर वे छूटे कहाँ थे ?
क्या कभी नहीं छूटता है
चीनी मिलों में पिसा बुरादा
कभी नहीं छूटती है
चीनी मिलों की दुर्गंध?
क्या हम कभी नहीं छूटते
व्यापार और बाज़ार के
दुष्चक्र से ?
क्यों इतनी तीखी हो जाती है ?
हम तक आते आते, गन्ने  की मिठास ?
जाने इनमें किन किन किस्मों की मिलावट हो ?
शीरा हो, बुरादा हो ?
ख़राब चीनी का
चिंता में डूबी माँ के कड़वे बोल सुनती
मैं सधा जाती हूँ
ग़लती से खरीदा
बिना जांचा परखा शहद
और तरस जाती हूँ
हुलस जाती हूँ
उस सहज खुलेपन को
जहाँ पेड़ों में मधु मक्खी
लगाती है खोंता
जिसमे भरता है शहद
आहिस्ता -आहिस्ता
अब सब कुछ होता है
व्यापार सा
पाला, पोसा हुआ
खरीदा बेचा हुआ
अब कुछ भी
प्राकृतिक नहीं
नीम का शहद नहीं
करंज के पेड़ नहीं......................



लाख करके भी बातें, रक्तिम संधियों की


लाख करके भी बातें
रक्तिम संधियों की
कर नहीं पाती ऐसी
एक भी संधि
मुझसे तो ये भी नहीं हो पाता
कि राष्ट्रपति के उम्मीदवारों का चुनाव होते ही
उसपर अपना मत लिख डालूं
टिप्पणी समेत राजनैतिक पहुँच भी
दिखा डालूं
और कुछ बने तो निंदा ही कर दूँ
हर पक्ष की
तानाशाहों की तो निंदा ही होती है
तानाशाहों की निंदा करने वाले
अगली पंक्ति में बिठाये जाते हैं
और समर्थन वालों की बनी होती है सभा
मुझसे तो ये तक नहीं होता
कि पर्यावरण जैसे अपने
सर्वाधिक प्रिय विषय पर आये
एक न्यायाधीश के चिंता मय व्यंग्य पर
घंटे भर में
जुमले पे जुमले लिख मारूं
न्यायालय इस आज़ाद देश का
सर्वाधिक शक्तिशाली स्तम्भ है
वह कितना आज़ाद है
यह एक अलग बहस है
या मुमकिन है
साझे की बहस हो
होगी, पर मिनट भर के लिए
इतना तो कहा है
प्रधान मंत्री ने भी
भाषण में अपने
कि जो बचाया गया
तो होगा ही नहीं पर्यावरण
फिर भी नहीं लिखा
मोर या मोरनी पर
ठीक अगले दिन
जबकि कितने हुआ करते थे मोर
इंद्रप्रस्थ के पास
दिल्ली रिज में उन दिनों
और जाया करते थे
भटकते भटकते
घूमते टहलते
हॉस्टल के आगे या पीछे
दाना पानी चुगते
अभी हाल में
अकादमी के पास के
हरे वीराने में
दिखा था एक मोर
कुछ मोरनियां
दिखी थीं
लेकिन विरल से विरल होता जाता है
मोर का दिखना
उसकी आवाज़ दुर्लभ हुई जाती है
मैंने कभी नहीं देखा मोर को नाचते
हुलसते
बस गीत लिखने वाले ज़रूर लिख रहे हैं
मोर पर
और हम अगर गा नहीं रहे
तो गर्दन थामे बैठ
उसे याद कर रहे हैं
जैसे कि मैंने किया था याद उसे
एक विदेशी क्लासरूम में
होकर लगभग बेहोश उनकी
धमकियों से
थामे अपनी गर्दन
मैं गर्दन थामे रही
भूकंप आते रहे
गानों के मोर
कभी दिल
कभी रात में
बोलते रहे
सच, इतनी कम क्यों है
मोर के जन्मने की दर
और हमारी इतनी ज़्यादा क्यों ?
मैं लगातार सोचते हुए भी
उस दिन इसपर
कुछ कह सकी
अजन्मे बच्चों का भी ख्याल किया
तमाम भग्न प्रेम कथाओं का
पर मैं लोगों को मोर
उनकी लड़ाइयों को
प्राकृतिक कह सकी
ये कुछ इसलिए भी था
कि अगली चर्चा का विषय
यो तय था
मुझसे यह भी बिल्कुल नहीं होता
कि नेताओं को देख कर
टेलीविज़न पर
लिख सकूँ कोई टिप्पणी
प्रशंसा अथवा निंदा में
ऐसा कुछ भी करना मुझे
राजनैतिक जागरूकता
नहीं लगती
जाने यह पश्चिम का संक्रमण है
या मेरी उनसे
जागरूकता सम्बन्धी सहमति
जो अधिकारों से जुड़ती है
उसकी लगातार मांगें करती है
बहस करती है
नागरिकता पर
सहज सुलभ साधनो पर
मैं उनतक की भी दूरियां
नहीं तय कर पाती
जिनसे करीब का नाता है
उनतक पहुँच भी नहीं पाती
जहाँ से बुलावे आते हैं
आप  इसे मेरी राजनैतिक उदासीनता कह सकते हैं
लेकिन, मैं प्रतिवाद करूंगी
मुझे लगता है कि राजनैतिक जागरूकता
केवल और केवल उतनी है
कि लोग अपने अधिकारों की मांग करें
वो क्यों कहते हैं  एक भी शब्द
किसी राजनेता पर
क्योंकि नहीं लिखते रहते
बोलते रहते एक ही बात
सड़क, बिजली, पानी, किताब
नौकरी, बारिश, सूखे की
और कुछ भी नहीं ?



बाढ़ की राजनीति

अपने आप खुल गयी
कसी हुई मुट्ठी मेरी
फ़ैल गयी हथेली
और टपकता रहा
आसमान से पानी
दिल्ली में हुई
फिर से बारिश
आखिरकार, इस साल
दिल्ली में बारिश
और याद आया
इंग्लैंड का राजा
उसी ने तो आकर कहा था
पर्दे पर, टेलीविज़न के
हू हेल डिड दिस वेदर?
क्या विज्ञापन था वह?
लंदन की झिर झिर बारिश की शिकायत नहीं थी
जबकि अभी, इन दिनों
जैसे आयी है
फलां फलां जगहों पर बाढ़
भयानक जासूसी लगती है मौसम की
या फिर राजनीति
कि फ्रांस के इतिहास में
जब चुना गया हो
सबसे युवा राष्ट्र पति
माँ की उम्र की प्रेमिका वाला
तो कनाडा के मोंट्रियल क्षेत्र में
आयी हो भयानक बाढ़
और कि जब आपके
रूम मेट रहे हों युगोस्लाव
तो सच, युगोस्लाविआ में बाढ़
क्या उसने कर लिया है
पूरा पुनर्निर्माण ?
क्या अब एक हो गए हैं
बंटे हुए युगोस्लाव टुकड़े
निष्काषित कर
धर्म के नाम पर बरसों से
वहां बसे हुओं को
वो कहाँ गए
मालूम नहीं
पर ये सब तो पहले हो चुका था
लेकिन, युगोस्लाव रूम मेट्स का किस्सा
खत्म नहीं होता
कनाडा का वीज़ा छोड़ देने के बाद भी
उन्होंने वहीँ शुरू की थी
बाथरूम की सफाई की राजनीति
और साथ में
बार बार फ्लश की
टॉयलेट ब्रेक्स की
कौन नहीं जानता
इन भीतरी लड़ाइयों का हाल
लेकिन, एक रोज़ पुलिस बुलानी पड़ी
अपनी ही दिल्ली में
निरंतर बजते गाडी के हॉर्न के कारण
पूर्णतः शांत माहौल में
अचानक बज उठते
हॉर्न के कारण
होते ही दाखिल
बाथरूम में
मुझे याद है
उस दिन केरल में चुनाव थे
मैं घर में अकेली थी
और पड़ोस में हॉर्न का शोर
बहुत बढ़ा हुआ
लेकिन, राजनीति इससे कहीं ज़्यादा बड़ी है
कुछ हिंदुस्तानी दस्ते हैं
अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में
अब अमेरिका की फर्स्ट लेडी
यूगोस्लाव हैं
क्या फर्क पड़ता है?
सिवाय इसके कि एक राइट विंग कट्टर पंथी
पता नहीं उसे हिंदी में दक्षिण पंथी कहेंगे
या नहीं
लेकिन नस्लवादी
सत्ता का निर्माण हो जाने से
हमारी लगी हुई नौकरियां भी छूट जाती हैं
अब पूछिए
क्या फ़र्क़ पड़ता है का सवाल?
और वो पूछ रहे हैं बदस्तूर
गांव की गरियाति हुई भाषा में
कि हम लात ही मार आएं
दुनिया भर को तो क्या?
भार में जाएँ विश्व बैंक
इंटर नेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस
और तमाम संस्थान, देश
ये पूछने वाले कलाकार हैं
कला और संवेदना का पेशा करने वाले
अगर भोथे शब्दों में बयान कर दिया जाए
कलाकारी को, तो
और ये जाने क्या कह रहे हैं
दुनिया भर के तकनीकी रिश्तों के बारे में
दुनिया भर के तकनीकी अवसरों के बारे में
बकवास की आग में
जल रहा है यह शहर
और देश के कई शहर जल रहे हैं
बिना बात की बात में
और जल रहे हैं लोग
और जलाई जा रही हैं लड़कियां
और बस्तियां
धूप से जल रहे हैं खेत
लेकिन, राजधानी की बारिश
यहाँ सबसे खर्चीले बाग हैं
और महानगरों में भी
जिनमें से कोई नहीं झेल सकता
तीन घंटे की भी तेज़ बारिश
तो क्या अब धुँआती
सुलगती, ईटों की रहेगी
सूखी बरसात?
दो चार बूंदों की
मेरी खुली हथेली पर
तपती दोपहर में
खुशबु के फव्वारे सी.........................




-------------------------पंखुरी सिन्हा

प्रकाशन---------हंस, वागर्थ, पहल, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, वसुधा, साक्षात्कार, बया, मंतव्य, आउटलुक, अकार, अभिव्यक्ति, जनज्वार, अक्षरौटी, युग ज़माना, बेला, समयमान, अनुनाद, सिताब दियारा, पहली बार, पुरवाई, लन्दन, पुरवाई भारत, लोकतंत्र दर्पण, सृजनगाथा, विचार मीमांसा, रविवार, सादर ब्लोगस्ते, हस्तक्षेप, दिव्य नर्मदा, शिक्षा धरम संस्कृति, उत्तर केसरी, इनफार्मेशन2 मीडिया, रंगकृति, हमज़बान, अपनी माटी, लिखो यहाँ वहां, बाबूजी का भारत मित्र, जयकृष्णराय तुषार. ब्लागस्पाट. कॉम, चिंगारी ग्रामीण विकास केंद्र, हिंदी चेतना, नई इबारत, सारा सच, साहित्य रागिनी, साहित्य दर्पण, करुणावती साहित्य धारा, मंतव्य  आदि पत्र पत्रिकाओं में, रचनायें प्रकाशित, दैनिक भास्कर पटना में कवितायेँ एवं निबंध, हिंदुस्तान पटना में कविता एवं निबंध,
हिंदिनी, हाशिये पर, हहाकार, कलम की शान, समास, गुफ्तगू, उमंग, साहित्य उत्कर्ष आदि पत्रिकाओं, ब्लौग्स वेब पत्रिकाओं में, कवितायेँ तथा कहानियां, प्रतीक्षित
किताबें ----- 'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
                  'क़िस्सा--कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
                   'प्रिजन टॉकीज़', अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013
डिअर सुज़ानाअंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014
 पवन जैन द्वारा सम्पादित शीघ्र प्रकाश्य काव्य संग्रह काव्य शालामें कवितायेँ सम्मिलित
 हिमांशु जोशी द्वारा सम्पादित पुस्तकप्रतिनिधि आप्रवासी कहानियाँ’, संकलन में कहानी सम्मिलित
 विजेंद्र द्वारा सम्पादित और बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कविता संग्रहशतदलमें कवितायेँ शामिल 
रवींद्र प्रताप सिंह द्वारा सम्पादित कविता संग्रहसमंदर में सूरजमें कवितायेँ शामिल
गीता श्री द्वारा सम्पादित कहानी संग्रहकथा रंग पूरबीमें कहानी शामिल

'रक्तिम सन्धियां', साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कविता संग्रह, 2015
इसी पुस्तक मेले २०१७ में बोधि प्रकाशन से दूसरा कविता संग्रह, ‘बहस पार की लंबी धूप’, प्रकाशित
पुरस्कार--- 
कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का २०१७ का पहला पुरस्कार

 राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013
पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान
             ------------'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला

-------------'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार,
-------------1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान

अनुवाद----कवितायेँ मराठी में अनूदित,
          कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,
उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,
रमणिका गुप्ता की कहानियों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद

सम्प्रति----
पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’,
एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम,
और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,
साथ में, हिंदी और अंग्रेजी में कविता लेखन, सन स्टार एवम दैनिक भास्कर में नियमित स्तम्भ एवम साक्षात्कार
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सोमवार, 3 जुलाई 2017

बदलते इंसान की कहानी है कमलेश की कठकरेजी: सुशील कुमार भारद्वाज

बदलते इंसान की कहानी है कमलेश की कठकरेजी
सुशील कुमार भारद्वाज



कमलेश


कथाकार कमलेश की कहानियों में अमूमन विस्थापन का दर्द, जड़ से कटकर अलग हो नये जीवन की तलाश और सामंजस्य की समस्या अक्सर दिख ही जाती है. कमलेश की नई कहानी “कठकरेजी” भी बाढ़–पीड़ित विस्थापितों की ही कहानी है. यूं कहें कि कठकरेजी बाढ़ की त्रासदी में घर-बार से बेदखल, परिवार से अलग, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, और भावनात्मक रूप से टूटे सुमेसर की कहानी है. सुमेसर तबाह हो चुकी जिंदगी को फिर से सजाने –संवारने के लिए अपना सबकुछ छोड़ कुछ ख्वाबों के सहारे पटना की धरती पर पैर रखता है. चकाचौंध शहर में भी उसे रहने लिए फुटपाथ पर बने अवैध टिन का घर नसीब होता है. तुर्रा ये कि उस घर का भी किराया उसे चुकाना पड़ता है. जबकि सुमेसर भी अब जान चुका है कि यहाँ भी बड़े मुंह वाला राक्षस कोशी की बाढ़ की तरह आता है लेकिन फर्क बस इतना है कि कोशी सबकुछ अपने में समा लेती है जबकि शहरी राक्षस कुछ भी निगलता नहीं बल्कि तबाही को भी कौतुहल और तमाशा बनाकर छोड़ देता है.
दरअसल में कहानी सरकारी व्यवस्था पर एक जोरदार तमाचा है. बाढ़ के नाम पर बिहार जैसे प्रान्तों में हर साल अरबों रूपया का वाया-न्यारा होता है. राहत-कोष से बहने वाली गंगा से कितने बाढ़ पीड़ितों का किस हद तक सहायता होता? कितनों का पुनर्वास होता है? कितने लोगों को सही से दवाई और चिकित्सा नसीब होता है? सबकुछ साफ़ –साफ़ दिखने लगता है. चिंता का विषय तो यह है कि लोक-कल्याणकारी लोकतांत्रिक देश में सड़कों पर जिंदगी गुजारने की भी कीमत चुकानी पड़ती है. मौलिक सुविधा के नाम पर बिजली की कौन कहे? पीने का शुद्ध पानी तक मस्सैयर नहीं. उसके लिए भी पास के नुक्कड़ पर लगे सरकारी चापाकल पर घंटों लाइन में लगना पड़ता है. जब विवश हो कीड़े –मकोड़ों के संग जानवरों की तरह सड़कों के किनारे रात बितानी पड़े तो हम किस मुंह से मानवता की बात करें? खुद को सभ्य और सभ्य समाज का वासी कहें? जबकि यही लोग तथाकथित सभ्य समाज की गंदगी को भी ढो रहे हैं. इन लोगों का न तो कोई जाति है न धर्म. लेकिन समाज के नज़र में दलित और अछूत जरूर हैं. ये समाज की सेवा तन, मन और धन से करते हैं और खुश रहते हैं लेकिन बदले में मिलता है क्या? ये किसी के वोटबैंक भी नहीं हैं तो इन्हें पूछेगा कौन? हां, ठंढ़ के मौसम में नये –पुराने कपड़ों के बहाने कुछ राजनीतिक और गैर-सरकारी संगठन के लोग तस्वीर खींचवाने जरूर पहुँच जाते हैं. लेकिन इन तस्वीरों से इन पीड़ित लोगों को वो सुख भी नहीं मिल पाता है जो नयनसुख इन्हें सड़क किनारे दीवारों पर चिपके सिनेमा के पोस्टरों से मिलता है.
विस्थापितों की जिंदगी के कई आयामों को कमलेश जी ने पकड़ने की कोशिश की है. सदाबहार खुशी और गम के बीच चिलम –गाँजे का कश है तो शराब की खुमारी है. मारपीट गालीगलौज की छौंक है तो सद्भाव और भाईचारे की मिशाल. पिता-पुत्री का रिश्ता है तो मशीनी जिंदगी जीने वाले कठकरेजी भी. दिल से सबके लिए खुशी, शुभकामानाएं और शोक भी है लेकिन ताज्जुब है कि दिल ही नहीं है. वर्ना पुत्र के मरने के बाद शोक की बजाय पिता नशे में धूत नहीं रहता. पिता के मरने के बाद बेटी आजादी नहीं महसूस करती. आजादी की बात तो तब होती जब मीना शहर दर शहर भटकने के अपने धंधे को छोड़ नई जिंदगी जीने की कोशिश करती. मीना को जिस्म और प्रेम का अंतर मालूम है? भौतिकवादी युग में बाजार से सुख और शांति की चाह रखने वाली मीना के लिए वैवाहिक जीवन गुलामी की निशानी है. दाम्पत्य जीवन का अनुशासन उसके स्वतंत्रता में दखलंदाजी है. मीना का चरित्र उस समय बेहतर रूप से स्पष्ट होता है जब वह अपने धंधेवाले अंदाज़ में अपने जिस्म को सुमेसर के प्रस्ताव के जबाब में आगे कर देती है. एहसान बस इतना है कि दूसरे से वह उस काम के लिए पैसे लेती है लेकिन सुमेसर से नहीं लेगी.       
मीना का दूसरा पहलू भी विचारणीय है कि उसका बीमार पिता अब झिकझिक नहीं करता. जो कुछ भी मीना लाकर देती है, वह चुपचाप ग्रहण करता है. कहां जाती है? कब जाती है? क्यों जाती है? किसी चीज से उसे मतलब नहीं है. क्या यह स्वार्थ की पराकाष्ठा नहीं है? क्या मीना के अंदर कभी निर्दोष मन नहीं था? क्या उसके जिंदगी में हसीन सपने और सपनों के राजकुमार के लिए कोई जगह कभी थी ही नहीं? या परिस्थितियों के जुल्मों सितम ने उसे कठकरेजी बना दिया? मासूमियत और जिंदादिली यथार्थ के रुखड़ी जमीन पर वर्षों से रगड़ खाकर अंत में दम तोड़ गई? क्या मीना की परिस्थिति के लिए मीना को ही दोषी माना जा सकता है? नरक के जीवन से बाहर आ पाना इतना आसान है क्या? सुमेसर के साथ शादी रचाकर वह वाकई खुश हो जाती? सुमेसर पहला आदमी रहा होगा जिसने घर बसाने का प्रस्ताव दिया होगा या कई आए और धोखा देकर चले गए? क्या मीना का इतिहास उसके वैवाहिक जीवन में समय –बेसमय फन तानकर खड़ा नहीं हो जाएगा?
जिस आंतरिक संघर्ष से मीना वर्षों पहले गुजरी उसी संघर्ष और टूट-फूट के दौर से गुजरकर तो सुमेसर भी कठकरेजी बन रहा है. मायामोह और भ्रम के टूटते ही सुमेसर के होठों पर मुस्कुराहट नाचने लगती है. वह नई सुबह की नई रौशनी में नये नज़रिये से नई चकाचौंध को महसूसने लगता है. गांव से लाई गई यादों और संस्कारों के साथ–साथ पटना की चमक–धमक में सड़कों पर रिक्शा चलाने के अनुभव ने उसे एक नये इंसान के रूप में गढ़ दिया.
कहानी विध्वंस से निर्माण की ओर बढती है. जीवनानुभव अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर है. ग्रामीण जीवन की सहृदयता और सहयोग भागमभाग वाली शहरी जिंदगी में कहीं दम तोड़ती नज़र आती है. मानवीय संवेदना शहरों से विलुप्त होती जा रही है. समयाभाव और नैतिक भ्रष्टाचार अस्पताल के कुव्यवस्था में नज़र आता है जहां जिंदगी की तलाश कम, कब्र की बिस्तरें अधिक नज़र आती हैं. भयादोहन का तो अंत ही नहीं है. चाहे बाढ़ का आतंक हो या जमींदार के सेना का  या बैंक कर्ज का या सिपाहियों का.  
कमलेशजी का कथा कौशल सरल, सहज, और परिवेशानुकुल भाषा में ही परिलक्षित नहीं होता है बल्कि बिम्बों के यथोचित प्रयोग एवं प्रस्तुति में भी साफ़-साफ़ झलकता है; जो कहानी की पठनीयता को सहज एवं सुगम बनाता है. साथ-ही-साथ लोकरंग और लोकसंस्कृति में पगा कहानी का एक-एक पात्र अपनी पहचान के लिए संघर्षरत दिखता है.

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गुरुवार, 29 जून 2017

बदलती पत्रकारिता और हमारी पसंद



अखबार शायद तब से है जब सूचना क्रांति का प्रस्फुटित होना शेष था। लेकिन समय के साथ चीजें बहुत तेजी से बदलती चली गई। अखबार के अलावे रेडियों एक मात्र सहारा नहीं रहा। 1990 ई० के विनिवेश नीति का असर हमारे अर्थशास्त्र पर ही नहीं पड़ा बल्कि इसने पूरे जनसंचार को ही प्रभावित करने की कोशिश की। परिणामस्वरूप समाचार चैनलों की ऐसी व्यवस्था और बाढ़ आई की पल-पल की खबरें नजरों के सामने आने लगी। इंटरनेट के प्रचार -प्रसार ने तो रही-सही कसर निकालने की पूरी कोशिश कर दी। बस एक क्लिक पर सब पत्रकार और एक क्लिक पर सारी खबरें। लगा जैसे कि अखबारों के दिन लदने वाले हैं। लेकिन फिलवक्त तक ऐसा हुआ नहीं है। अखबारों ने भी अपने उपलब्ध संसाधनों के सहारे अपने -आप को बदलते हुए मौजूदा रेस में भागीदारी की कोशिश की है। बहुत कुछ बदलते हुए भी बहुत कुछ अब भी नहीं बदला है। खैर, मैं बचपन से हिन्दुस्तान पढ़ता आया हूँ आज भी पढ़ता हूँ। दैनिक जागरण, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर, द हिन्दू, द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, द पायोनियर, द स्टेटस मैन, आदि समेत दर्जनों हिन्दी अंग्रेजी के अखबारों को विद्यार्थी जीवन में पढ़ा। लेकिन फिर घुम-फिर कर हिन्दुस्तान पर ही लटका। सब अखबारों की अपनी-अपनी खूबियाँ और कमियाँ थी लेकिन बात सहजता, उपलब्धता, रूचि और पसंद और जरूरत पर अटक जाती है। जिससे आपकी जरूरत पूरी होती है। वही आपके लिए खास है।
संपादक विशेष पर कभी गौर नहीं फरमाया। बस अपनी जरूरत पूर्ति से खुश होता रहा। अब रही बात सुझाव और बदलाव की तो स्वाभाविक रूप से इस गलाकाट युग में जब अखबार ही बाजार के हवाले है तो आप संपादक की स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकते। पत्रकारिता को मिशन के रूप देखना खुद को दु:ख देना है। क्योंकि संपादक भी इन दिनों महज अपनी नौकरी निभा रहे हैं। वे त्याग, बलिदान और समाज कल्याण के लिए नहीं हैं, भले ही उनकी दिलीइच्छा कुछ भी हो। उन्हें सत्ता के पक्ष या विपक्ष में से एक को चुनना है। अन्यथा में न लें तो अब अखबारों /समाचार चैनलों का राजनीतिकरण हो गया है। वे अब निष्पक्ष खबरों की बजाय सुविधाजनक पत्रकारिता करते हैं। सुविधानुसार खबरें बनाते और दिखाते हैं। जनमानस को पक्ष-विपक्ष में करने के लिए खबरों को परोसते हैं। और पूँजीवाद के इस दौर में पत्रकारिता के बचे रहने में ही जब संशय है तो फिर अखबार की क्या बात की जाय? जहां, पूँजीपति ही अखबारों और चैनलों के मालिक हों वहां सुझाव और सलाह के कोई मतलब नहीं होते। सीधी भाषा-पसंद है तो स्वीकार करो वर्ना नकार, लेकिन वे करेंगें वही जिनसे उनका व्यापार बढ़ेगा।
- सुशील कुमार भारद्वाज

मंगलवार, 27 जून 2017

हिमांशी शेलत की कहानी "चुड़ैल की पीठ"

वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में स्त्री हमेशा से परिस्थितियों की शिकार होती रही है। निर्दोष होकर भी वह अपना बचाव नहीं कर पाती है। नियति और इंतजार के बाद मौत के सिवा बचा ही क्या है उसके पास? खुद को जिंदा रखने की जिद्द और दूसरों के बच्चों के सुख में ही सुखी होने की प्रवृत्ति दूसरों की नजर में खटकती जरूर है। वह डायन, चुड़ैल और पता नहीं क्या -क्या कहलाती है? ऐसी स्त्रियों से लोग अपने बच्चों को दूर रखने में ही भलाई समझते हैं। समाज में गिद्ध की नजर रखने वाले लोग अपनी पैनी निगाह से कपड़े के भीतर जिस्म में सुराख करने से भी बाज नहीं आते हैं। लेकिन जब स्वार्थलोलुप्त अंधविश्वासी समाज में खुली आँखों वाले बिना किसी नशे के ही नशे में हों तो लाल आँखों वाले नशेड़ी से क्या उम्मीद पालना? लेकिन डूबते को तो आखिरी तिनके का भी सहारा नसीब नहीं हो पाता है। आर्थिक के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर टूटती-बिखरती स्त्रियों को न तो ससुराल वालों से राहत मिलती है न मायके वालों से सहयोग। हर स्तर पर विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों को जब समाज में सम्मान ही न मिले तो हम खुद को सभ्य -समाज का हिस्सा कैसे मान लें? हिमांशी शेलत की मार्मिक व यथार्थ परक कहानी "चुड़ैल की पीठ" का हिन्दी में अनुवाद डॉ मालिनी गौतम ने किया है। आइये पढ़ते हैं इस कहानी को - सुशील कुमार भारद्वाज

चुड़ैल की पीठ

गुजराती कहानीकार- हिमांशी शेलत 

दरवाज़ा ज्यादा मजबूत नहीं था । बाहर आवाज़ें बढ़ती जा रहीं थीं । पेटी-पिटारा और जो कुछ भी खींचा जा सके वह सब दरवाज़े से सटा कर पसीने में लथपथ, बेबाक भाणकी कमरे के बीचोबीच खड़ी हुई थी। कुछ भी करने की स्थिति नहीं थी अब, सिवाय इसके कि वह झमकू के घर की तरफ खुलने वाली ख़िड़की खोल कर वहाँ से भाग जाये । वहाँ भी इस बात का डर तो था ही कि दिन भर खाँसता रहता भगले का बुढ्ढा कहीं देख न ले। पर बुढ्ढे की नज़र कमज़ोर थी...ज्यादा दिखाई नहीं देता था उसे। अब जो भी हो,....या तो उसे भागना पड़ेगा या फाँसी लगानी पड़ेगी.....
  “ अबे खोल रही है कि तोड़ दें......
तोड़ ही दो...देर किस बात की, अंदर छुपकर बैठी है अपने-आप बाहर आयेगी....साली पूरा गाँव खाने को बैठी है...
ऐय रवला, सामने से तीकम लेकर आ.....
दरवाज़ा थरथरा रहा था । डंडा, लकड़ी, धड़ाधड़ मुट्ठियाँ और अब इन सबसे जोरदार हथियार मँगाया जा रहा था। वहीं एक कोने में रड़की, आकुल-व्याकुल आँखों से बोले जा रही थी।
“.......रोज़ रात को सिकोतरी ( भूतनी) बुलाती थी। मैं कितने ही दिनों से कह रही थी कि भाणकी रात को कुछ करती है, पर किसी ने नहीं माना, लो अब खुद ही देख लो कि क्या हुआ है...
भाणकी की साँस तो जैसे दरवाज़े पर ही लगी हुई थी। कमरे के बीच तो वह मात्र परछाईं बन कर खड़ी थी। ये दरवाज़ा टूटा, ये भीड़ घर में घुसी, सटासट लकड़ियाँ, पीठ पर सोटियाँ, खिंचे हुए कपड़े और बिल्कुल नग्न शरीर, पूरे गाँव में दौड़ती-हाँफती वह अकेली और पीछे पूरा टोला....धधकते दाग, नुकीले पत्थर और खून का रेला.....
यूँ तो पिटारे में रस्सी रखी हुई थी। खोलकर फन्दा तैयार करने में क्या देर लगनी थी ? ये
लटकाया और ये खेल खत्म । पर हाथ जैसे पिटारे तक पहुँचने को तैयार न थे। जीव कहीं फँसा हुआ था...कह नहीं सकते शायद पेमा में ही अटका पड़ा हो ...
गाँव में ऐसी घटना कोई पहली बार तो बनी नहीं थी । न जाने कितनों के बालक चल बसे थे। उन्हीं में से गीगला भी एक था । उस दिन भाणकी के घर के पास खेल रहा था। अकेला भी नहीं था साथ में दाजी और उकड़ के टोपलाभर नंगे-मुंगे थे। टिटिहा-रोह हुआ तो खटिया में पड़े हुए बुढ्ढे-डोकरे और फुर्सत मिलते ही सब के सब उसी दिशा में दौड़े चले आये । लड़के की नसें खिंच गईं थीं और आँखें चढ़ गईं थीं। सवारी तुरंत कैसे मिल जाती...बड़ी मिन्नत-मसाजत करके भीमा कहीं से रिक्शा ले आया था। अस्पताल में बहुत सुईयाँ खोंसीं पर गीगला तो उसकी माँ की आँखों के सामने ही सूखी लकड़ी-सा हो गया।
यह ख़बर जब गाँव में पहुँची तब भाणकी चूल्हे के पास बैठी हुई थी । एक समान आँच पर सिंकती रोटी की काली-बदामी डिज़ाइन को ताकती हुई वह वहाँ से इंच भर भी नहीं हिली। गीगा चल बसा, इसमें उसका कोई दोष नहीं था यह वह जानती थी, फिर भी किसी अनजाने डर की आशंका से उसके पैर काँपते रहते थे। पेमा के शहर जाने के बाद जब कितने ही दिनों तक उसकी कोई ख़बर न आई उस समय किसी को भी अपने घर की तरफ आते देखकर काँपते थे बिल्कुल वैसे ही । पेमा को कितना समझाया था, गाँव छोड़कर जाने को कितना ही मना किया था। पर पेमा तो बड़ा ही झक्की और अड़ियल था। छीबा ने छ्प्पर डलवा लिया...दीवाल भी पक्की करवा ली...शहर में तो मजदूरों की हमेशा ही ज़रूरत रहती है...कुछ ठीक-ठाक मिलेगा तो बचेगा भी....बाकी गाँव में अब क्या रखा है....
यह एक की एक बात घुमा-घुमाकर कहता हुआ पेमा गया सो गया । वह नहीं आया पर उसके बारे में तरह-तरह की बातें आती रहीं—“ दंगा फ़साद में खत्म हो गया,...कहीं हाथ-सफ़ाई करता हुआ पकड़ा गया इसलिए जेल में सड़ रहा है,...बस की चपेट में आ गया है ...तो कोई यह भी कहता कि शहर में तो सबकुछ मिलता है इसलिए सिर्फ औरत के लिए पेमा को गाँव आने की भला क्या ज़रूरत है।
छप्पर अच्छा-खासा गल गया था। मूसलाधार बारिश वाली रात में भाणकी बैठी रहे या सो जाये यह निश्चित नहीं कर पाती और रातभर दीया जलाती और बुझाती रहती ।यही कारण था कि माणेक और रड़की कानाफूसी करने लगीं कि भाणकी रातबिरात कुछ करती है और उसे जरूर भूतनी चिपक गई है। वेलजी ( ओझा) गाँव में यूँ ही चक्कर लगाता रहता था, भूतनी वाली बात सुनने के बाद वह भी गाँव में ही रहने लगा । 
-और उसी समय यह गीगला टप्पदिना से मर गया...
दरवाजा बस अब टूटने ही वाला था। दीवार से चिपक-चिपक कर भाणकी खिडकी तक पहुँची। 
अधिकतर बंद रहने वाली यह खिडकी जकड़बंद हो गयी थी इसलिए धकेलने पर नहीं खुली। दाँत भींचकर उसने पूरा ज़ोर खिड़की पर लगाया। खिडकी ज़रा-सी हिली, पल भर के लिए भाणकी को लगा कि अभी कोई आकर उसे पकड़ लेगा। डर कुछ कम हुआ तो चारो तरफ सुनसान पाया ...सारी चीख-पुकार और धमाधम तो दरवाज़े पर मची हुई थी। बिल्कुल नीची-सी यह खिडकी खुल गयी इसलिए भाणकी भगवान का आभार मानते हुए कूद पड़ी और दौड़ने लगी।
वह दौड़ तो रही थी पर दौड़कर जाना कहाँ था यह उसे नहीं पता था। पैर काँप रहे थे और साँसें 
तेज़ चल रही थी। तभी... भाणकी वो भाग रही है...कैसी भाग रही है....जैसे दहकते शब्द उसके कानों में पड़े। इधर-उधर दौड़कर टोले को उलझाने के सिवाय दूसरी कोई सुध-बुध भाणकी को नही थी। खुद के दौड़ते पैरों की आवाज़ और साँसों की धौंकनी की आवाज़ के सिवाय दूसरी कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही है यह निश्चित हो जाने पर वह देवालय के पास पीपल के पेड़ की आड़ में ज़रा देर खड़ी रही ।  उसकी बावरी आँखें एक ही दिशा में देख रही थीं। इस तरफ बस्ती कम थी, कुछ तितर-बितर झोंपड़े थे, भीमनाथ के चबूतरे की आसपास ही कहीं दत्तु और बावजी खर्राटे भर रहे होंगे ।
........शायद दोनों पी कर पड़े होंगे…..यह विचार आते ही भाणकी का हाथ तुरंत अपनी पसीने से
लथपथ छाती पर आँचल ढँकने के लिए उठ गया । दत्तु की यही आदत थी। भाणकी चाहे कहीं भी हो...बीच बज़ार में या सुनसान पगडंडी पर, बेशर्मी से बस एक ही जगह ताकता रहता था। 
एक बार जगु की दुकान पर सामान बँधवा कर पैसे निकालने के लिये ज्यों ही ब्लाउज़ में हाथ 
डाला, दत्तु वहीं थोड़ा पीछे खड़ा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता दिखाई दिया। उस दिन से उसने पैसे साड़ी के किनारे बाँधने शुरू कर दिये थे। पर तब भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा था ...दत्तु की नज़र तो जैसे सबकुछ चीरकर आर-पार हो जाती थी। भाणकी को लगता कि उसकी आँखें छाती को छू जाती हैं और वह आकुल-व्याकुल हो उठती। लेकिन आँखें दत्तु की एकदम साफ थीं, पीने के कारण थोड़ी-सी लाल रहती थीं बस । वैसे न तो  वो बोलता-चालता था और न ही कोई छेड़-छाड़ करता था बस चुपचाप देखता रहता था। दिखने में तो बड़ा भला था। उस दिन बड़े अस्पताल से दवा लेकर भाणकी बस पकड़ने के लिये हड़बड़ाती-हड़बड़ाती दौड़ रही थी कि किसी ने बस खड़ी रखवायी। भाणकी को पूरा विश्वास था कि वह दत्तु ही था। बस में दत्तु के सिवाय दूसरा था ही कौन जो भाणकी के लिए बस खड़ी रखवाता। सबेरे-सबेरे भी निठल्ला दत्तु चक्कर लगाता रहता था। भाणकी सबेरे कुछ न कुछ काम निकाल कर चबूतरे पर आती-जाती रहती थी। कारण बस इतना ही था कि सामनेवाले चबूतरे पर रतन अपने हष्ट-पुष्ट जुड़वाँ बच्चों को छाती से चिपकाकर बैठी रहती थी। बच्चे दूध पीकर तृप्त होने पर हाथ-पैर उछाल कर खेलते...भाणकी की प्यास जैसे उन बच्चों में छिपी हुई थी। ऐसे समय पर इधर-उधर भटकता दत्तु उसे भला कैसे दिखाई देता। और इसीलिये बेखबर भाणकी को दत्तु एकटक......
पीपल के नीचे ही पड़ा रहने को मिल जाये तो कितना अच्छा हो....इस कल्पना मात्र से ही भाणकी की आँखें बंद हो गई। किसी के साथ नींद में बात कर रही हो इस तरह उसके होठ थोड़े-थोड़े फड़फड़ा रहे थे.......दत्तु को कह्ती हूँ कि छुपा दे मुझे कहीं....कर दिखा सचमुच...अगर मैं तुझे इतनी ही ज्यादा....बाकी पेमा तो बिल्कुल झूठा है। यूँ कहाँ से मर गया होगा.....ये तो सब भागने के बहाने हैं.....
भाणकी की पलकें भारी हो रहीं थीं तभी हो-हो और धम-धम की आवाज़ें तेज़ी से पीपल की दिशा में आने लगीं और वह फुर्ती से सीधी भीमनाथ के चबूतरे की तरफ़ दौड़ी। हवा में बेफाम पत्थर फेंके जा रहे थे...डांग-कुल्हाड़ियाँ लहरा रही थीं।
वंतरी (भूतनी) को खत्म कर दो आज....छोड़ना मत
कहाँ छुप रही है चुड़ैल, सामने आ...बताते हैं तुझे.....गाँव की जिम्मेदारी हमारी है...समझी..
अईला जोर लगाओ सब....वंतरी भेस बदल कर भाग जायेगी...
भाणकी के बाल जूड़ा खुल जाने से हवा में लहरा रहे थे। लंबी लटें गाल और कपाल पर बिख़र गयीं थीं। आँचल का ठिकाना नहीं था, बल्कि हमेशा ढँका रहने वाला छाती की बाँयी तरफ का बड़ा सा लाखू भी साफ दिखायी दे रहा था। भाणकी को इस रूप में देखकर दत्तु का रहा-सहा नशा भी चला गया। वह कुछ समझ नहीं पाया । हाँफती हुई भाणकी को बस पैर स्थिर करने जितना ही समय मिला। तभी दत्तु पीछे से सुनाई देने वाली चिचियारियों में खिंचने लगा।
अईला दत्तुड़ा...पकड़..साली डाकण को...
दत्तु क्या खाक पकड़ेगा....होश में हो तब न...
दत्तु...मार...
दत्तु भागने मत देना चुड़ैल को...बच्चे-आदमी सबको खा जायेगी कुलटा साली...
भाणकी बहुत कुछ कहना चाहती थी दत्तु से, पर दत्तु मानों घबरा गया हो इस तरह पीछे ख़िसकता चला गया । भाणकी को लगा कि जैसे उसके हाथ कुछ ढूँढ रहे हैं । शायद उसकी डांग,या फिर.....। नज़र के बिल्कुल सामने ढली हुई भाणकी की लगभग उघड़ी हुई छाती दत्तु को दिखना बंद हो गयी थी। वह तिरछी नज़रों से इधर-उधर देखने लगा।
मार सोंटी खींच के,..देख क्या रहा है...इन आवाज़ों के दबाव में फँसा हुआ दत्तु कुछ करे उसके पहले भाणकी चबूतरा कूद कर हवा में तीर बन गयी। उसके मजबूत पतले पैर ज़मीन पर टिकते न थे।
वंतरी...साली...मर्द भी पीछे रह जायें इतना तेज़ दौड़ रही है...”  
नदी में डूब मरूँगी पर किसी के हाथ नहीं आऊँगी...यह सोचकर भाणकी ने ऊबड़-खाबड़ टेकरियों वाला रास्ता चुना। पैरों में कितना कुछ उलझ रहा था और ऐसी ही किसी चीज़ से ठोकर लगने पर वह नीचे गिर पड़ी। गिरने के साथ ही मानों उसके पैर पूरी तरह टूट गये। वजन उठाने लायक न रहे..टें हो गये और भाणकी लाचार हो गयी। उकड़ू पड़ी हुई वह पसीने में  घुलती गयी।
चिचियारी और धमाधम की आवाज़ें अब बिल्कुल नज़दीक आने लगीं थीं। किसी ने उसे पीछे से खींचा। ज़मीन पर उगी हुयी घास से भाणकी चिपकी रही। कपड़े चीर-चीर हो गये..पीठ खुल्ली हो गयी...और उस पर पड़ने लगे डाँग, पत्थर, लात, गालियाँ ...और फिर सब के सब टूट पड़े पूरी ताकत से।
संपूर्ण होश उसने कब खो दिया यह तो पता नहीं...पर बस होश खोने से पहले मन में विचार आया...
साले भड़वे....कीड़े पड़ें तुमको......दत्तु जैसा सच्चा आदमी इनके बीच में हो ही नहीं सकता...आज पिया हुआ न होता तो बिचारा दत्तु....कैसा सच्चा...मर्द है.....
यूँ तो गाँव वाले सब मानते थे कि चुड़ैल की पीठ में भी आँखें होती हैं । बिल्कुल झूठी बात.....अगर होतीं तो भाणकी को टोले में खड़ा हुआ पहाड़ जैसा दत्तु दिखाई न दिया होता .??

डॉ. मालिनी गौतम


अनुवादक- डॉ. मालिनी गौतम
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