शनिवार, 17 जून 2017

पंखुरी सिन्हा की कहानी हत्या की शिनाख्त का सपना

जीवन अदृश्य समझौतानुमा बंधनों के मकड़जाल में जकड़ा हुआ है. और इंसान जाने–अनजाने उसी जकड़न में ऐंठ कर रह जाता है. उस ऐंठन के बीच भी सपने कुलबुलाते हैं. सपनों की एक हसीन दुनियां बनती है तो दूसरी उजड़ती भी है. इस बनने और बिखरने के बीच से जीवन का एक नया रास्ता खुलता है. जहां हमें कुछ अनसुलझे सवाल भी मिलते हैं. नियति के सहारे हम उनमें से कुछ सवालों के जबाब तो पा जाते हैं लेकिन कुछ की तलाश जारी रहती है. जिंदगी और जीवन के इसी द्वन्द को रेखांकित करने की कोशिश करती है कवयित्री–कथाकार पंखुरी सिन्हा की कहानी “हत्या की शिनाख्त का सपना”. कथाकार ने अपने छोटे-बड़े हिन्दी-अंग्रेजी वाक्यों एवं शब्दजाल से जिस कथा-कौशल का प्रदर्शन किया है वह पाठक को अंत–अंत तक बांधे रखने में सफल है बाबजूद इसके की थोड़ी–सी भी असावधानी आपको कहानी में ही उलझाकर रख सकती है. आप स्वयं इस कहानी को पढ़ कर देखें:-




हत्या की शिनाख़्त का सपना
पंखुरी सिन्हा

कोई नींद में बोल रहा था. नहीं, ये रात के सन्नाटे में किसी के फ़ोन पर झगड़ने की आवाज़ नहीं थी, ये एक बहकी हुई बेहोश आवाज़ थी, मैं अचानक डर गयी. यह आवाज़ नशे में बहकी हुई नहीं थी, नींद में बेहोश थी, लस्त पस्त। मैं उसे पहचानती थी. वह घर में रहने वाली दूसरी हिंदुस्तानी लड़की थी. मैंने सोचा जाकर दस्तक दूँ, लेकिन वह कोई आसान शक्सियत नहीं थी. बाक़ायदा साइंटिस्ट थी, कैंसर सेल पर रिसर्च कर रही थी. उसे भला क्या दुःस्वप्न सकते थे? प्रलाप सी ही सुनाई दे रही थी उसकी आवाज़, एक तरफ़ा। नहीं, वह फोन पर नहीं थी. मैंने कसकर अपने कमरे की साँकल, कुण्डी चढ़ाई, और कंफोर्टर ओढ़कर सो रही. जबकि इस घर के सारे दरवाजों की सारी कुंडियां ख़राब थीं, कमज़ोर थीं. दरवाज़ा एक झटके में खोला जा सकता था. मैंने करवट बदली, और उस ईश्वर को याद किया जिससे मेरा जन्मजात परिचय था और जो शायद उस लड़की का और मेरा साझा ईश्वर था. अद्भुत चीज़ है, 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स', देश विदेश, अपना पराया, सरहद, रात और दिन!
सुबह उठी तो कोई आवाज़ नहीं थी, सिवाय बजते हुए अलार्म क्लॉक के सब शांत था. थोड़ी सी धूप भी निकल आयी थी. कई लोग घर से रवाना भी हो चुके थे. सब सामान्य था, मैं घर में बिल्कुल नई थी. उसकी आवाज़ों से नितांत अपरिचित। फिलहाल, किसी परिचय का समय भी नहीं था, मुझे फ़ौरन बिस्तर छोड़ना था. समय से निकलना था. अप्रैल का महीना था और  एल्बर्टा कनाडा की सर्दी पिघलते पिघलते भी बर्फ़ की शक्ल में काफ़ी कुछ फुटपाथों पर जमी हुई थी. मुझे बस स्टॉप पर बस के लिए हर रोज़ इंतज़ार करना पड़ता था. जी हाँ, तलाक़ में करार की हुई गाड़ी मुझे अबतक नहीं मिल सकी थी. एल्बर्टा की हवा बरछी सी तेज़ थी. बस स्टॉप के शीशे के बाहर बर्फ के बहुत सफ़ेद टीलों के बीच, एक खूबसूरत नहर थी, अब भी जमी हुई. मुझे कभी कभी बस का इंतज़ार करते में वह मिली थी, वह दूसरी हिंदुस्तानी लड़की। उसका पहला नाम वही था, जिस नाम की मेरी प्रिय मित्र ने अभी अभी अमेरिका में आत्म हत्या कर ली थी---रूपम! अजीब इत्तफाक है, है ! मैं दुबारा लेट गयी. 'आज छुट्टी कर लूँ तो?' 'पागल हो! आज तुम्हारी फ़ेवरेट टीचर की क्लास है. उठो मीरा!' 'तुम तो चैन से सोई भी हो.' 'हाँ, मैं सपने कम देखती हूँ. कभी कभार। भयानक सपने नहीं के बराबर!’ ‘बस, अब उठ जाओ मीरा!’
          फिर रूपम से मेरी मुलाकात दो दिन बाद किचन में हुई. हमारा चीनी लैंडलॉर्ड या हाउस मेनेजर कह लें, भी वहां उपस्थित था, लेकिन मेरे आते ही ऐसे चल पड़ा जैसे हम दोनों को बातें करने का एकांत दे रहा हो. फिर मैं भी ज़्यादा देर नहीं रुकी, अल्ली टल्ली कर, गिलास भर पानी पी, किचन से निकल आयी. रूपम अपनी बड़ी सी हांडी में शायद चिकन और चावल पका रही थी. हम सबकी बड़ी, बड़ी हांडियां थीं और पकाने का भी अलग अलग समय हम ढूंढ लेते थे. रूपम खाना पकाते हुए हमेशा अपने बड़े से एंड्राइड फोन पर एक फिल्म देख रही होती थी. इस तरह, किचन में सबका समय बंटा था. सिवाय, तब के जब यांग सुकी अपने चीनी हर्ब्स उबालती थी, पूरा घर उस गन्ध में सराबोर हो जाता था. वो कुछ औषधि जैसी जड़ी बूटियां थीं, जिनकी शायद इस घर को ज़रूरत थी. ये दुःस्वप्न या नींद में बोलने वाला हादसा कुछ एक रात और हुआ. क्या वह नाटक कर रही है? क्या वह मुझे डरा रही है. बाकी सब सो चुके, मैं देर रात पढ़ रही हूँ. नहीं, ये आवाज़ फोन पर बातें करने की नहीं। कहीं भी विराम नहीं, यह निश्चित नींद में बोल रही है. लेकिन इतनी देर? लेकिन मैंने नहीं पूछा।
          फिर एक दिन अचानक, किचन में ही उसने मुझे बताया, मेरे कभी बिना किसी उत्सुकता जताए। उसके गले में ये जो निशान है , एक बार लैब में एक्सीडेंट हो गया था. आग लग गयी थी. और एकदम से उसके दुपट्टे में लगी, इतनी तेज़ी से कि उसका दुपट्टा जल गया, और उसकी गर्दन का कुछ हिस्सा भी जला गया. 'ओह! पर ज़्यादा कुछ दिखता नहीं।' मैंने कहा और मुझे लगता है, कुछ हड़बड़ाहट में ही किचन से फिर दौड़ी. ये मैं बार बार भाग क्यों जाती हूँ उसकी लंबी कहानी सरीखी बातों से? मुझे लगता है कि लड़कियां मुझे पहले अपनी कहानियां सुनाती हैं, बाद में, मेरी कहानी पूछकर पूछकर परेशान करती हैं, लिखने भी लगती हैं, भाग्य निर्माता की तरह! वो तो ठीक, लेकिन मैं इतनी घबराई और उत्तेजित सी भी क्यों हूँ? जैसे अभी-अभी किसी ने मेरी चलाती हुई गाडी को ठोक दिया हो. पढ़ने में भी दिल नहीं लगा, नींद भी नहीं रही. बाहर टहलने जाने का सवाल नहीं है. मैं बत्ती बुझा कर लेट जाती हूँ, पर वही सवाल कभी ट्यूब लाइट, कभी बल्ब, कभी सड़क की वेपर लाइट सा परेशान कर रहा है---- क्या ये संभव है, कि रूपम ने आत्म हत्या नहीं की हो, उसे मारा गया हो? ये मैं कैसे कह सकती हूँ? मैं तो उनमें से किसी को जानती तक नहीं। पिछली बार जब उससे बात हुई थी, चहक रही थी वह. कितना हँसे थे हम उसकी इस बात पर, ' ऑफिस हैज़ बिकम लार्जर दैन लाइफ!' क्या ऐसा ही होता है रूप? लंबी, गोरी चिट्टी बहुत सुंदर रूप, हममें सबसे क़ाबिल, सबसे होशियार, क्या कुछ नहीं कर चुकी थी, यहाँ पढ़ाना, वहां लिखना, ये फैशन, वो अदा! “'रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना', हम उसे गा गा कर चिढाते! कॉलेज के पुराने दिन किसी खूबसूरत चलचित्र की तरह मेरी आँखों के आगे से गुजरने लगे. मुमकिन है, इन सब गीली सूखी बातों की एक धार भी बह गयी हो! सब चेहरे गए आँखों के आगे! अभी, कुछ महीने ही हुए हैं इस दुर्घटना को. रूप अब इस दुनिया में नहीं है! तो क्या तफ़सील से याद भी नहीं किया जा सकता बीते समय को?
            अभी दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि किसी का हाथ मेरे ऊपर लहराया। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती अँधेरे का एक घटाटोप हुआ, जैसे तकिया उठाकर किसी ने रख दिया मेरे सर पर और कसकर दबाने लगा. मैं घिघियाती भी तो कैसे? नहीं, ये किसी का हाथ था मेरी गर्दन पर, पूरी ताक़त से उसे दबाता हुआ. मैंने अपने सारा ज़ोर लगाया और एक बारगी उछल गयी. कमरे के घबराये हुए अन्धकार और ब्लाइंड की सुराख से आती रौशनी में मैंने देखा, कोई नहीं था, बस सपना था! मैं सपना देख रही थी, एक दुःस्वप्न, कि कोई मेरी हत्या कर रहा है. क्यों? हवा के किसी गुम्फित जाल के भीतर, पसीने से सराबोर, मैं जाने समय के किस दरवाज़े पर खड़ी थी? एक ऐसी चौखट जहाँ से बीता समय किसी जाली दार मेहराब से छनकर आने वाले समय में प्रवाहित हो रहा था. इतना डर लग रहा था कि दरवाज़ा खोलकर बाथरूम जाना सम्भव था, एक ग्लास पानी पीना। जाने अँधेरे के किस गुरुत्वाकर्षण से बंधी हुई, किस हवा को लपेटे मैं लेट गयी.
          मैंने ये सपना कैसे देख लिया? मैं तो कभी सपने नहीं देखती। और तिसपर इतना भयानक सपना। अमूमन मेरी नींद बिल्कुल निर्बाध होती है---खाली, एक क्लास ख़त्म हो जाने के बाद शिक्षक द्वारा पोंछ दिए गए स्लेट की तरह साफ़, उस कागज़ की सफेदी लिए, जो कविता ही क्यों, कुछ भी लिखे जाने के लिए प्रस्तुत रहता है. कितनी ज़िम्मेदारी का काम है, कागज़ पर कुछ भी लिखना! वकीलों, नेताओं ही क्यों, इस देश के इमीग्रेशन डिपार्टमेंट के अफसरों द्वारा ही क्यों, हर किसी के द्वारा टेबल के नीचे, पैसे लेते देते, कितना कुछ फ़र्ज़ी लिखा जा रहा है रोज़. और मैं इतनी दूर चली आयी हूँ, अंग्रेजी के रोमांटिक काल के कवियों को पढ़ने---क्या पागलपन है? और उससे भी बड़ा पागलपन कि मैं अपने सुपरवाइजर से बहस कर रही हूँ, कीट्स पर शोध करना चाहती हूँ, वो चाहते हैं मैं येट्स पर पढ़ाई करूँ। जॉन कीट्स, २५ की उम्र में मरने से पहले दुनिया की सबसे खूबसूरत कविताएं लिख गया, येट्स से भी ज़्यादा सुंदर। हाँ येट्स से भी ज़्यादा सुंदर। येट्स को नोबेल सम्मान दीर्घायु होने की वजह से मिला, अपने अनेकों प्रेम संबंधों की वजह से. कलम का ही नहीं, दिल और दृष्टि का धनी आदमी था. लेकिन कीट्स---पानी में आग---‘When I behold, upon the night’s starr’d face, Huge cloudy symbols of a high romance, And think that I may never live to trace’, मैं कीट्स को इसलिए नहीं पढ़ना चाहती क्योंकि ट्यूबर कुलोसिस ने उसे मार डाला और मैं बच गयी!
'लेकिन ये पढ़ाई तो तुम घर लौट कर भी कर सकती हो', घर से आने वाले हर फ़ोन में यही बात. जैसे, जैसे स्टडी परमिट रिन्यूल में देर, घर की ये ज़िद और तेज़. बुलाहट और ऊँची। मैं अपनी इतनी बड़ी महत्वकांक्षा छोड़कर घर लौट जाऊँ? क्या मुझे यहाँ दुबारा मारा जा रहा है? क्या पानी पर देर तक चलते रहने से मौत हो जा सकती है? ठोस ज़मीन की प्रतीक्षा, हिचकोलों की अनिश्चितता में? मैंने क्यों कहा मैं सपने नहीं देखती? सपने महत्वकांक्षाओं से अलग होते हैं! दिन की तल्खी में, रात के अँधेरे में हम महत्वकांक्षाओं को गोल मटोल शब्द दे देते हैं, मिठास दे देते हैं, सपना कह देते हैं! सपने ही हमारा वजूद बन जाते हैं. कुछ लोग उसके पीछे, भटकते भी रह जाते हैं. लेकिन सचमुच मैंने क्यों कहा मैं सपने नहीं देखती? यानि क्या दुःस्वप्न? बुरे सपने? डरावने सपने? लेकिन वह तो कोई बुरा सपना नहीं था, वह तो बेहद अच्छा सपना था. बिल्कुल दिन की रौशनी की तरह वास्तविक था. ये अलग बात कि जो सपना देखा था, हुआ उसका ठीक उल्टा! यानि सपने की उलट बांसी हो गयी. मुझे अब भी वह सपना, कल देखे सपने की तरह याद है. उसकी आवाज़ें जेहन में बिल्कुल ताज़ी हैं. उनकी भी--"तुमने टॉप किया है."
वो मेरी प्रिय टीचर थीं, डॉ श्रेया सहगल। जबकि इतिहास केवल मेरा सब्सिडियरी विषय था. लेकिन, डॉ सहगल दोनों विभागों में पढ़ाती थीं. ‘' हिस्टोरिकल लुक एट इंग्लिश लिटरेचर', उनका पहला सेमिनार था, जिसके लिए मैंने साइन किया था. लेकिन, फिर बाद में मुग़ल इंडिया के क्लास में मैं उनकी दीवानी हो गयी. कितनी पढ़ाई की थी मैंने, उस सबसी के पेपर के लिए भी. मुझे याद है दूसरा सवाल मुहम्मद बिन तुग़लक़ पर था. जिसे कहते हैं , कलम तोड़ कर लिखना, वैसे लिखा था पर्चा मैंने। बाक़ी के पर्चे भी बढ़िया। परीक्षा फल का बेसब्री से इंतज़ार था. बिल्कुल जिस दिन रिजल्ट आया, उसी दिन, उसी सुबह का सपना है. और नतीजा देखा तो उन्हीं के पेपर में मेरे नम्बर इतने कम थे कि रिपीट करना पड़ा. मैंने शहर छोड़ दिया, मैंने पढ़ाई छोड़ दी, मैंने विषय छोड़ दिया। अब और क्या बचा था छोड़ने को? कुछ एक साल बाद की दूसरी पढ़ाई, दूसरे शहर, दूसरे राज्य, दूसरी नौकरी के बाद मैंने प्रेमी के साथ यह देश छोड़ दिया। मैं बिल्कुल बेगानी, परायी, खुद से अजनबी! मैं फूलों पत्तों में भटकती हुई सी, कि अब था क्या दफ्तरों की कुर्सियों में? बाहर डैफोडिल्स थे. टूलिप्स थे, डेज़ी हर खड्डे में खिली हुई थी. छोटी छोटी नहरों पर लकड़ी के पुलों से जुड़ीं हुईं, वर्तुलाकार, सर्पीले मोड़ों वाली राहें थीं, जिनसे हो कर कभी शेली, कभी कीट्स, लेकिन सबसे ज़्यादा बायरन की अगस्टा शीर्षक कविता मुझ तक पहुँचने लगी. इन राहों की बगल में, पेड़ों के विशाल झुरमुट थे---जिनपर कभी फौल के रंग थे, कभी बर्फ, कभी प्रस्फुटन था, और ज़रा देर की ग्रीष्म की हवायों में पक्षियों का बसेरा था. कितनी ठंड थी, कितनी ठंढी और कितनी लंबी! घरों के भीतर हीटिंग थी. यों ही नहीं पिघल जाती थी कीट्स की कविताओं की बर्फ---- मुझे बी में सेकंड डिवीज़न आया था. लेकिन, कितना कुछ बाकी था अभी. अभी तो सब कुछ बाक़ी ही था. जीवन, प्रेम, सोहर, बधाई के गीत, घर जाने क्या क्या और कवितायेँ। ‘Of the wide world I stand alone, and think, Till love and fame to nothingness do sink’ कौन जानता था यूनिवर्सिटी का मतलब सिर्फ राजनीति होगा। अब ये इस बार का दाख़िला, तो दुबारे का दाख़िला है.
जी, बचा हुआ था बहुत कुछ, उन्होंने किया आघात और ले गए. पुरुष कितनी जल्दी न्योत लेते हैं लोगों को अपने घरों के भीतर। मैं उन्हें निकाल नहीं पायी। उल्टे, फँस गयी गोरे के अवैध प्रेम में. फँसा ली गयी. इस फँसाने में हिंदुस्तानी मित्रों का क्या योगदान रहा, मत पूछिये। क्या करेंगे जान कर नहीं, वह एक अलग किस्सा है. एक लंबी कहानी। जागरूकता इस अर्थ में ही बड़ी नहीं, कि आगे ऐसे किस्से दुहराए जाएँ, बल्कि इस अर्थ में भी कि गुनहगार निर्दोष बने घूम रहे हैं. जबकि मैं यह मानती हूँ कि कानून न्याय करे इसके लिए लोगों को और मित्रों को सड़क पर उतरने की ज़रूरत नहीं। कानून को अपना काम खुद खुद कर देना चाहिए, लेकिन ऐसा है नहीं। उसका दरवाज़ा बहुत ज़ोर ज़ोर से पीटना होता है. क्यों? जबकि कानून कहता है, पुरुष दोषी है, अवैध प्रेम में स्त्री को फ़साने का, सज़ा मुझे दी गयी. अक्सर ऐसा ही होता है, स्त्री भुक्त भोगी होती है. हज़ार किस्से हैं यहाँ, हमारे आस पास अवैध प्रेम के. एक दिन में तो कोई मामला नहीं सलटता। पर ऐसे आनन फानन में, मेरे तलाक़ नामे पर दस्तख़त कर दी गयी, जो कभी स्त्री के अधिकारों को सुलझाने के लिए काफी नहीं होता। ख़ैर, सरहद पार करने के बाद ही आया ठप्पा लगा निर्णय। मुझे मालूम होता कि लौट नहीं सकूंगी तो दस्तख़त ही नहीं करती, तलाक के कागज़ पर. तो विदेश में खड़ी हुई एक नई नवेली सरहद, लगभग नागरिकता हासिल कर लेने के बाद. बुरी तरह मात खाकर, एक बार जेल से देश भेजाए जाकर, चूड़ी की तरह संगीत के सारे तार काट कर, तोड़ कर भेजी गयी पढ़ाई करने। दिन दहाड़े दुःस्वप्न की सीमा थी. आँख खोले भूकम्प से भी भयानक सपना !
फिर भी मुझे कभी कोई दुः स्वप्न नहीं आया. लेकिन रूपम का यों चल देना! ये दुबारे की फूलों से लदी ज़मीन! आजकल टहलने जाती हूँ तो एक सफ़ेद बालों वाला उम्र दर गोरा आदमी, मुझसे कुछ दूरी पर अपनी पत्नी/प्रेमिका का हाथ थामे चल रहा होता है. अब रोज़ यही ड्रामे सा नज़ारा होता है, पहाड़ों की गोद में! अद्भुत ख़ूबसूरत जगह है अल्बर्टा, लेकिन ग़ज़ब की राजनैतिक भी. एक स्टडी परमिट ही तो रिन्यू करना है, कितनी देर कर रहे हैं. मैं घर वालों से कह कहकर थक गयी हूँ, 'यहाँ किताबें बेहतर हैं, कहीं ज़्यादा, रिलेटेड रीडिंग्स की भी.' ठंढ के बारे में तो डर से कुछ बोल ही नहीं पाती। मैंने घर बदल लिया है. हॉस्टल में गयी हूँ. टनल्स से होती हुई क्लास तक पहुँच जाती हूँ. हॉस्टल में हर दूसरे दिन फ़ायर ड्रिल होती है. मैं हर रोज़ क्लास से लौटते अपनी चिट्ठियों का बक्सा खोलती हूँ. पर वह नहीं आयी, तो नहीं आयी. वह अंत तक इस तरह नहीं आयी कि फिर आना भी बेकार रहा. प्राय द्वीप की सीख यही रही कि बेहद सम्भल कर रहना था. ऐसे रहना था कि बन्दूक की नोक पर छीन ली जायेगी बसी बसाई ज़िन्दगी। लेकिन, अगर ऐसा ही था तो फिर गोरों के इतने निमंत्रण क्यों? और हिंदुस्तानियों के साथ तो यह होता नहीं। हर शुक्रवार निमंत्रण। फिर किस्म किस्म के निमन्त्रण। मेरा फुल टाइम काम लोगों को कहना क्यों हो?
तो लो, इस बार भी हाँ कहा और फिर फंस गयी. यह एक देशी जाल है. घरवालों के हल्ले के बीच, शादी के एक प्रस्ताव के साथ लौटा ली गयी हूँ देश. ठगी गयी हूँ फिर से. मुझे मंज़ूर नहीं। नहीं है क़ुबूल। और अब लौट नहीं सकती। मेरा वीसा सिंगल एंट्री था. आपने कहीं सुना है कि इतनी लंबी पढ़ाई का वीसा सिंगल एंट्री हो?
जबसे लौट कर आई हूँ, अमेरिका नामक उस महान देश में तीन क़त्ल दिन दहाड़े हो चुके हैं. एक बूढ़े से घर का रास्ता पूछते, और दो अभी अभी, बिल्कुल घर के सामने। एक परिवार के सदस्य जैसे मित्र को मेरे वहां रहते ही, रोड एक्सीडेंट में मार दिया गया था. कौन तब्दील कर रहा है, सरहद को एक खूबसूरत स्वप्न से दुःस्वप्न में? कौन कर सकता है तहकीकात इसकी? शहर और राजधानियां बदलने के एक वहशी जूनून के बीच. अपनी शिक्षिका की वही महीन आवाज़ सुनाई देती है, 'तुमने टॉप किया है. "


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गुरुवार, 15 जून 2017

असगर वजाहत की कहानी दलित के द्वारे

असगर वजाहत उन साहित्यकारों में से एक हैं जो देशकाल पर गहरी निगाह रखते हैं और उन्हें कलात्मक ढ़ंग से शब्दबद्ध कर इतिहास के दस्तावेजों में शामिल करते हैं। प्रस्तुत कहानी "दलित के द्वारे" भी हाल की एक राजनीतिक घटनाक्रम पर लिखी गई है। जिनके कई मायने भी हैं तो कई सवाल भी। आप भी पढ़े।


दलित के द्वारे
कहानी
अ. व.

नेताजी दलित के घर भोजन करने गए। उन्होंने अपनी एक करोड़ की कार को दलित के घर के सामने रोक दिया । और फिर उनकी गाड़ी के पीछे जो पचास - पचास लाख की गाड़ियां थी वे भी रुक गयीं। दलित घर के बाहर खड़ा था। उसके पैर कांप रहे थे। उसका दिल धड़क रहा था।उसकी गर्दन झुकी हुई थी। जनता नेताजी की जय जय कार कर रही थी ।नेताजी ने हाथ जोड़कर दलित को नमस्कार किया है और आगे बढ़कर दलित के गले में फूलों की एक माला डाल दी। इस भारी माला से दलित का सिर और झुक गया।
 दलित नेताजी को लेकर घर के अंदर आया खाना लगा हुआ था ।नेता जी और दलित खाना खाने बैठ गए। दलित ने इतना अच्छा खाना कभी न खाया था। खाना शुरु होते ही पत्रकार और मीडिया के लोग अंदर आ गए । वे भी खाने पर टूट पड़े। दलित को लगा कही खाना कम  न पड़ जाए। पर खाना कम नहीं पड़ा।
कैमरे चालू कर दिए और खाने के बाद पत्रकार नेताजी से कुछ मजेदार सवाल पूछने लगे ।दलित से भी कुछ पूछा गया लेकिन वह जवाब न दे सका क्योंकि उसका पेट गले तक भरा था और आवाज नहीं निकल रही थी। पत्रकार उसे छोड़कर नेताजी के पास आ गए। नेताजी धड़ाधड़ बातें कर रहे थे।
नेता जी के जाने के  बाद दलित पिघलने लगा।वह बर्फ की तरह गलने लगा।धीरे धीरे बहने लगा।फिर वह गायब हो गया।
अब दलित केवल उस फ़ोटो ही में था जो नेता जी के साथ खींची गयी थी।
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असगर वजाहत जी के फेसबुक वॉल से साभार।

मंगलवार, 6 जून 2017

फर्क होता है नमक के स्वाद का जिसे कहते हैं “नमक स्वादानुसार” (समीक्षा) :सुशील कुमार भारद्वाज




जीवन में नमक की जितनी आवश्यकता है उससे कहीं ज्यादे जरूरी है उसका संतुलित होना. मतलब कि व्यक्ति के जरूरत के हिसाब से होना. नमक की मात्र थोड़ी कम या अधिक हुई नहीं कि आपका जायका बिगड़ जाएगा. जी हां, निखिल सचान की पहली किताब “नमक स्वादानुसार” भी कुछ इसी तरीके के साथ प्रस्तुत किया गया है कि आप चीजों को अपने अनुसार ले सकें. निखिल ने सहज, सरल और लोकभाषा में अपना खिलंदड़ प्रयोग किया है तो बदलते माहौल के अनुसार अंग्रेजी का भी बेधड़क प्रयोग किया है. सच तो ये है कि अंग्रेजी को रोमन लिपि में ही लिख दिया है जिसे देवनागरी लिपि में भी उकेरना उचित नहीं समझा. उन्होंने सायास ही ऐसा किया होगा कि जो रोमन में नहीं समझ पाएंगें वे शायद देवनागरी में भी नहीं समझ पाएंगें क्योंकि उसे पढ़ने के लिए किसी डिक्शनरी की जरूरत नहीं है. अलबत्ता वे शब्द कहानी के समय-परिस्थिति से मेल खाते हैं.
निखिल की भाषा यदि रोजमर्रा की सामान्य बोलचाल की भाषा है तो यह भी स्पष्ट कर देना लाजिमी है कि कहानियों में प्रयोग किए गए कुछ शब्द बुद्धिजीवी एवं सभ्य समाज के लोगों को चुभ सकता है लेकिन न सिर्फ ये शब्द कहानी के लिहाज से उपयुक्त हैं बल्कि ये शब्द गलत अर्थों में इस्तेमाल भी नहीं किए गए हैं. अलबत्ता वे अपना मुहावारानुमा एक विशिष्ट अर्थ रखते हैं. लेखक ने “टोपाज” कहानी में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में लिखा है-
“वो इसलिए बिकता है कि वो उस भाषा में बात करता है जो भाषा लोगों को समझ आती है. वो इसलिए भी बिकता है क्योंकि हम जब दिन भर, इधर–उधर लात खाकर घर वापस आते हैं तो हम किताब अपनी दिमागी चोटों और फितूर को हल्का करने के लिए उठाते हैं, कोई फिलास्फर बनने के लिए नहीं.”

कहानियों के विषय का चयन जितना सुंदर है उसकी प्रस्तुति भी उतनी ही अच्छी है. बिम्बों का जितना शानदार प्रयोग किया गया है उतना ही उदाहरण दर उदाहरण देकर तथ्यों को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है. कहानियों के बीच ही लेखक साहित्य के बदले स्वरूप पर लिखते हैं –
“समय बदल गया है मेरे दोस्त! फ़िल्में और किताबें लिटरेचर नहीं रह गई हैं बल्कि एक मार्केटिंग एक्सरसाइज़ हो गई हैं. अगर मार्केट में सौ में से नब्बे लोग कमअक्ल हैं और दस लोग ‘सेल्फ परोक्लेमड इंटेलेक्चुअल’. तो तुम उन नब्बे लोगों के लिए लिखोगे या दस लोगों के लिए? दस के लिए लिखोगे, तो उसमें से पांच लोग खरीदेंगें और तीन को पसंद आएगी. दो लोग कह देंगें कि नमक कम है और तेल ज्यादा. इससे अच्छा उन नब्बे लोगों के लिए लिखों. कचरा पढकर भी कम से कम पचास लोग कहेंगें कि ‘माशाल्लाह! कितनी गहरी बात कह दी!, ओए होए! मजा ही आ गया साहब! और अगर अपने लिए ही लिखना है तो अपने पास ही लिखकर क्यों नहीं रख लेते हो? उसके छपने की परवाह ही न करो.”
यदि सार के रूप में कह दिया जाय कि “नमक स्वादानुसार” भी उपरोक्त कथन के समर्थन में ही लिखा गया है या वही चीजें इसमें भी लगती हैं कि गहरी से गहरी बातों को भी बेहद ही बेतख्लुफी के साथ कह दी गई है तो कोई गलत बात नहीं होगी. और कहने के तरीके तो हर लेखक के अलग –अलग भी हो सकते हैं और उस पर उदय प्रकाश जैसे लेखकों के प्रभाव भी दिख सकते हैं. और जो लोग राग-दरबारी को आराम से पढ़ सकते हैं उनकों हगने –मूतने और उसके बहाने अमीरी –गरीबी के विश्लेषण में क्या समस्या हो सकती है?
पहले गंभीर साहित्य और लुग्दी साहित्य की बात होती थी. लेकिन व्यावसायिक दौर में लुग्दी साहित्य भी अपने तेवर को बदलकर गंभीर साहित्य से तुलना कर लोकप्रिय साहित्य के रूप में दिखने की कोशिश में लगी है. फिर चीजों को देखने और पढ़ने का नज़र होता है. ऐसा भी तो नहीं है कि लोकप्रिय साहित्य में समाज नहीं होता या उसके दुःख दर्द नहीं होते? क्रांति की बात नहीं होती? फर्क बस होता है नमक के स्वाद का जिसे कहते हैं “नमक स्वादानुसार”.


पुस्तक :- नमक स्वादानुसार
लेखक :- निखिल सचान
प्रकाशक :- हिंद युग्म, नई दिल्ली
मूल्य :- 130 रुपए

पृष्ठ :- 165



शनिवार, 3 जून 2017

सुभाष रूपेला की कविताएं

सुभाष रूपेला की कविताएं जितनी छोटी और सुंदर होती है उतनी ही अर्थपूर्ण भी। ये कविताओं के विषय का चयन भी जिंदगी की सहज घटनाओं से करते हैं जो आपके मन को अक्सरहां छू जाते हैं और मन को गुदगुदा जाते हैं। आनंद लेते हैं सुभाष रूपेला जी की कुछ कविताओं का।


वो ठंडा हो जाए, तो बात बन जाए

ग़ुस्सा बिन ब्रेक की वो गाड़ी है,
अंधेरी राह पर चाल जिसकी तूफ़ानी है,
वो चल जिधर पड़ी, सो चल पड़ी,
है मज़ाल किसकी, जो बीच में रहे खड़ी?
रौंदती सब कुछ वो मंज़िल की ओर चल पड़ी।

ज़िद से दोस्ती उसकी पुश्तैनी है,
संकल्प से उसकी दुशमनी पुरानी है,
विवेक से नाराज़गी उसकी ख़ानदानी है,
तैश के ऐक्सिलेटर से ऐश उसने ठानी है,
हादिसों की सोहबत उसकी जवानी है,
ठुक पिटकर लाखों गँवाने की उसकी कहानी है।

अनुभव के हथौड़ों से होती है डेंटिंग,
निखरती है सूरत पाकर पछतावे की वेल्डिंग,
संयम का ब्रेक हो, संतुलन का क्लच हो,
साथ शांत मन की मंथर चाल हो,
फिर भला हादेसे का क्यों नसीब हो?
मंज़िल क्यों न सदा इस गाड़ी के क़रीब हो?

क्रोध से नहीं संयम से चलाओ ज़िंदगी की ये गाड़ी,
फिर रहेगी सफलता अगाड़ी और पिछाड़ी।

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वापसी

लंबा अर्सा पाँच साल का गुज़ार दिया,
मगर माँ का चेहरा न कहीं भी दिखाई दिया।
चेहरे और तस्वीर में फर्क हुआ करता है,
माँ-बेटे का दिल कहाँ जुदा हुआ करता है!

फोन करके भी चित्त को कहां मिल पाता था चैन!
सूरत माँ की देखने को तरस रह जाते थे नैन।
शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरा होगा,
बेटे ने माँ को जब याद न किया होगा।।

आ ही पहुँचा अमेरिका से, माँ से मिलने बेटा,
चरऩ छुए माँ के उसने, ली फिर जादू की जफ्पी।
ख़ुशी के समंदर में, नहाया-सा लगने लगा वो।
बचपन की बातों में, गोते लगाने लगा वो।।

काश ऐसा ही हमदर्द बेटा आप सबको मिलता जाए,
ख़िज़ाँ नहीं, फिर बहार ही बहार छा जाए।।

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बेचारे मास्टर की नेता जी के सामने पेशी

नगर में आ पहुँचा एक मदारी,
जमूरे-सी दिखती उसे जनता सारी.
सब मसलों का वो सुराग पा गया,
फैक्ट्री बदलने का खयाल आ गया.
ट्रेनिंग देने सैमिनार आ गया.
सार अखबार में ज़रा, लीक हो गया:--

“मैकाले थे सेर, हम हैं मियां सवा सेर,
अपनी गली में होता है कुत्ता भी शेर,
नज़र आते हो चूहे से मचाते फिरते अंधेर.
तैयार करते जाते हो क्रांतिकारी ढेर,
चूहेदानी से  सीसीटीवी लगाए हैं हमने ढेर,
बेजा हरकत कैद कर तुम्हें करेंगे कैद,
जासूस हमारे फिरते हैं हर कहीं मुस्तैद.

क्रांतिकारी नहीं, दरी बिछाऊ लाल चाहिए,
हुक़ुम बजा लाएं, वो कमाल चाहिए.
फेल हों, तो भी सब पास चाहिए.
अमल करो तुरंत, मत करना और लेट,
कर देते हैं हम वरना, पलक झपकते टरमिनेट.”

हुक़ुम सुन आआक़ा का, मास्टर को आ गया पसीना,
दिसंबर में घिर आया मानो जून का महीना.
याद आ गया उसे घर बैठा नगीना,
संभव नहीं बिलकुल, उसके बिना जीना.

“नेता शरऩम् आदेशम् शरऩम् दलम् शरऩम् गच्छामि,
मत  होना रुष्ट स्वामी, करूंगा मैं सदा गुलामी.”

छोड़कर राष्ट्र-भक्ति, बढ़ेगी जब तक व्यक्ति-भक्ति,
छिना पद जगत गुरु का, हीरे छिनेंगे बिन गिनती.
होता नहीं शिक्षक का आदर जहां,
फेल को भी पास करना पड़ता है जहां,
अँधेरा ही अँधेरा छा जाता है वहां.
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आशीर्वाद
सुरक्षा-कवच बन जाता है आशीर्वाद।
हर बुरी नज़र से बचाता है आशीर्वाद।
दुआओं की खाद से फलते सभी इरादे।
हिना का रंग खिला जाता है आशीर्वाद।।

बीमा दीर्घायु दे जाता है आशीर्वाद।
राह की अड़चनें भगाता है आशीर्वाद।
असीस के अनमोल रतन तुम संभाल रखना।
मुरादें पूरी करवाता है आशीर्वाद।।

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