शनिवार, 27 मई 2017

गीताश्री की कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा”

समकालीन साहित्यकारों में गीताश्री का नाम बहुत ही महत्वपूर्ण है. गीताश्री अपनी कहानियों में न सिर्फ शब्दों को करीने से गुंथती हैं बल्कि ज्वलंत समस्याओं एवं मुद्दों को एक नये नज़रिये से भी प्रस्तुत करने की कोशिश करतीं हैं. इनकी कहानियों के पात्र कई बार नियतिवाद के शिकार होते हैं तो कई बार वे नियति को ही चुनौती दे डालते हैं. इनकी कहानियों में शहर के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का सामाजिक, नैतिक और आर्थिक विद्रूपता सामने आता है तो कई बार इनकी कहानियों में सुदूर ग्रामीण इलाके की पारिवारिक जीवन में घुटन भरी जिंदगी का बदसूरत चेहरा भी नज़र आता है.
गीताश्री की प्रस्तुत कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा” भी बिहार की ग्रामीण परिवेश में  बालविवाह की शिकार हुई उस कामिनी की कहानी है जिसने कई निष्पाप सुनहले सपने बुने लेकिन वे सपने यथार्थ की रुखड़ी जमीन पर न सिर्फ एक एक कर टूटते गए बल्कि वह परिस्थितिवश रिश्तों की गर्मी और सुस्ती के संघर्ष में मानसिक रूप से भी टूटती चली गई. यह कहानी गीताश्री की अन्य कहानियों से थोड़ी अलग इस रूप में है कि कहानी में कामनी (मुख्य पात्र) कहीं भी मोर्चा संभालते नहीं दिखती है बल्कि नियति के आगे नतमस्तक दिखती है. वह समस्या का समाधान सलीके से शायद इसलिए नहीं ढूँढ पाती है क्योंकि वह पारिवारिक और नैतिक पहरे के द्वंद्व में फंसी हुई है. जबकि लल्लन के धमाके और कामिनी के गायब हो जाने के बाद घर की सबसे चुप्पी पुतोह वीरपुरवाली के चेहरे के बदले हुए भाव काफी कुछ बयां करते हैं. कामिनी और वीरपुर वाली के बीच के अनकहे रिश्ते अपने –आप बहुत कुछ कहते हैं. शायद वहां कोई रहस्य भी हो. कहानी में लेखिका ने बिम्बों के माध्यम से भी बहुत कुछ कहने की कोशिश की है. खैर, आप भी पढ़े गीताश्री की चर्चित कहानी “अन्हरिया रात बैरानिया हो राजा” – सुशील कुमार भारद्वाज  
गीताश्री

धीरे धीरे धूल दबने लगी थी। गाँव में खुसुर फुसुर कम होने लगी थी, पर आँखों ही आँखों में बात चल रही थी। कुछ बातें टूट रही थीं तो कुछ बन रही थीं। कुछ अधूरी थीं तो कुछ ने अभी ही जन्म लिया था। कामिनी माने कपरपूरावाली माने मुख्तार जी की बड़की पुतोह के कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था, पीछे खेत में भी कुछ निशान थे, पैरों के! तो क्या ये कामिनी के पैरों के थे? या उसी जिन्न के पैरों के निशान थे जो उस पर आता था। सरकार जी तो अलग टेसुए बहा रही थी।
"कहाँ गई उनकी कामिनी दुल्हिनियाँ?" जब उस पर जिन्न चढ़ता था तब कितनी बार उसके तलवे और हाथ सहलाती थी!
"कुछ कहा सरकार जी?" किसी ने पूछा।
"कुछ नहीं"।
"सरकार जी, ई कामिनी कहाँ गई है?, जिन्न उठा ले गया क्या?"
"मैं तो उसे बहुत दुलार से रखती थी, न जाने कहाँ चली गई?"
"जी सरकार जी, हमने सबने देखा था, आप उसे बहुत प्यार से रखती थीं।"
उधर बादलों का एक टुकड़ा सरकार जी की बातों की पोल खोलते हुए बरस पड़ा। जैसे वह उनके झूठ की परतें खोल रहा हो।
"अरे... अभी तक तो ये बादल नहीं था, अब कहाँ से आ गया? मुख्तार जी की रोबीली आवाज गूँजी।"
मुख्तार जी का बहुत रुतबा था। हाजीपुर के पास एक छोटे से गाँव में मुख्तार जी और उनकी बीवी सरकार जी का भरापूरा परिवार था।
तीन बेटे, एक कमाऊ था जो असम में नौकरी करता था, बाकी दो बेटों में से एक सबसे छोटा कस्बे के स्कूल में था और मँझला कॉलेज में। अभी तक उन्होंने अपने पूरे कुनबे को जोड़कर रखा हुआ था। संयुक्त परिवार का ठाठ था।
विदाई की बेला के बाद भी वह दो साल मायके रही थी। गौना सरकार साहब ने तय किया था। जब तक वह अट्ठारह बरस की नहीं हो जाती उसका गौना नहीं कराया जाएगा। उन दो बरसों में कामिनी अपने अंदर न जाने कितने किस्से कहानियाँ बसाती रही। रसोई में गोबर लीपने से लेकर कुएँ से पानी भरने तक वह लगी रहती। दिदिया से ठिठोली होती।
"जाओगी जब दोंगे के बाद तब पता चलेगा कि क्या होता है फेरों और बिदाई के बाद" कामिनी की दिदिया उसे चिढ़ाती और उसे न जाने क्यों बहुत अच्छा लगता था। उसके जी में गुदगुदी होने लगती। और वह उस गुदगुदी को कुएँ से पानी निकालते हुए बाल्टी में उड़ेल देती। बाल्टी से लोटे में पानी भरती और मुँह ऊपर करके गटगट पीने लगती।
अपने पति का चेहरा भी नहीं देखा था उसने! बस जब सिंदूर डाला जा रहा था तो उसने जरूर देखा था हल्के से, पर याद नहीं रहा उस अजीब से माहौल में। दिदिया और चाची लोग अजीब से गाने गा रही थीं। और माई? माई तो व्यस्त थीं।
शादी के बाद दो साल माई ने उसे घर के कामों में निपुण कर दिया था। और वह देह के तमाम रहस्यों को खुद में समेटकर अपने आप ही जवाब देती रही, सवाल उठते रहे कहीं से और वह अपना वकील बनकर पैरवी करती रही।
आखिर शादी के दो साल बाद वह दिन आ ही गया जब उसका दोंगा हुआ। घर में शादी तक तो माई ने राजकुमारी की तरह रखा था, पर जो दो साल में उसे ट्रेंड किया था, उसका फायदा उसे अपनी ससुराल में मिला। जैसे ही कामिनी का दोंगा हुआ वैसे ही यहाँ आते ही सास ने रसोई छुआ दिया। खाना बनाने से लेकर बर्तन धोने तक का काम अकेले सिर माथे पे उसके। वैसे तो घर में कई औरतें थी, पर घर की सारी औरतों ने अपने अपने हाथ पैर समेट लिए। अपने दसो हाथों से कामिनी उर्फ कपरपुरा वाली को रसोई में भिड़ जाना पड़ा।
सास के रूप में सरकार जी बहुत कठोर थी, मजाल जो सिर से पल्ला खिसक जाए। सरकार जी उसूलों की एकदम पक्की। सीधे पल्ले की साड़ी पहने हुए सरकार साहब जब लाल सिंदूर की बिंदी अपने गोरे माथे पर लगातीं तो ऐसा लगता जैसे सूरज उग रहा हो। उस उगते सूरज जैसा ही तेज और गर्व उनमें था।
लकड़ी, संठी, भूसा और उपले से चूल्हा फूँकते फूँकते बहुओं की आँखों से आँसू बहने लगें पर मजाल जो घूँघट खिसके या आवाज सुनाई दे किसी भी पुतोह की। मुख्तार साहब के तीन भाइयों का परिवार एक साथ था। ये तो पुतोहुओं के लिए थोडा सुकून था कि चूल्हे अलग अलग थे।
कामिनी अपने ससुर के परिवार में इकलौती पुतोह थी। हालाँकि एक चुप-सी परछाईं जैसी पुतोह दूसरे परिवार की थी पर वह बात न करती। चूल्हे और बासन में जब उसके काम का कोटा पूरा हो जाता तो वह अपने लिए काम चुन लाती थी। या तो चक्की पे बैठ जाती या पूरे घर के कपड़े लेकर कुएँ की मोरी पर बैठकर पटकुन्नी से कूटने लगती।
कभी मूड में होती तो कामिनी को देखकर मुस्करा देती। पर उससे ज्यादा कुछ नहीं करती।
वह भी तो चुप ही थी। पति दोंगे के अगले दिन ही वापस असम चला गया था।
पीछे वह छूट गई, अजनबियों के बीच।
कामिनी के अंदर बादल था, नया बना हुआ बादल था। पर वह बरस नहीं पाया था। उसके बरसने में कई अड़चनें थीं। एक तो उसका ईंट-मिट्टी का बना हुआ चूल्हा ही था, जो उसकी देह के ताप को और सुखा देता, पर उसकी देह का बादल इंतजार करता। वह अपने आंतरिक उमस और घुटन से हलकान हो रही थी। उस रात नींद नहीं आ रही थी। चारो तरफ धुंधलका महसूस हो रहा था। उमस में दम घुट रहा था उसका। न जाने उमस की कितनी अंतर्कथाएँ थीं। वह उन कहानियों में खो गई थी। वह उठी, सिंदूर लगाया, टिकुली लगाई, इत्र लगाया। लाल रंग की साड़ी पहनी और बिस्तर पर लेट गई। उसे अच्छा महसूस हो रहा था। उसे लगा, वह बादलों पर लेटी है।
उस दिन सुबह सुबह पूरे घर में हंगामा मच गया। शोर मच गया.. नईकी दुल्हिन को भूत ने धर लिया। उसके ऊपर भूत आया है। भूत बरजोर है। अजबे भूत है... अइसा तो हम न देखे सुने... ई खानदान में केकरो पर भूत-प्रेत नहीं आया... ई तो अजूबे बात है... कहाँ से लेके आई ई भूत प्रेत रे...
सबकी आँखें फटी हुई थी जैसे आसमान में कई बार बादल फट कर छितरा जाते हैं।
कल रात का बादल था, उमस थी। पर अभी तो धूप थी। धूप एकदम निखर कर आ गई थी। सूरज का ताप बढ़कर उसके चेहरे पर छा गया था। वह सँभाले नहीं सँभल रही किसी से। देह बेकाबू होती जा रही थी। कामिनी कुछ बड़बड़ा कर शांत हो जाती और फिर बाल बिखेर कर कुछ न कुछ कहने लगती।
पूरा खानदान बड़की पुतोह के दरवाजे पर इकट्ठा हो गया। दरवाजा पीटा गया, लेकिन दरवाजा तो खुला था। खुल गया। अंदर पहले सास घुसी, देखा, बिस्तर पर बहू एकदम अस्त व्यस्त कपड़े में पड़ी हुई है। लाल साड़ी, खुली पड़ी है। सिंदूर फैला हुआ है, इत्र की भीनी भीनी खुशबू आ रही। चादर सिमटी हुई है, न जाने कितनी सिलवटें हैं। कामिनी बेड पर चित्त लेटी हुई तड़प रही है। करवट लेना चाह रही पर नहीं ले पा रही। उसके दोनों ही हाथ फैले हुए हैं। पैर रगड़ रही है। मानो किसी ने दबोच रखा हो। सरकार साहब डर गईं, अपनी पतोहू की हालत देखकर चीख पड़ी। फिर मदद के लिए चीखी -
"अरे आओ, देखो, कपरपूरावाली को क्या हो गया" वे चीख रही थीं। देखते देखते ही आँगन घर की औरतों से भर गया। वो अजीब-सी सुबह थी, उमस के साथ धूप आ रही थी नीचे।
उसमें कामिनी की दबी दबी पुकार और हँसी दोनों ही अपना सुर अलाप रही थीं। जैसे कोई सियार मद्धम मद्धम रो रहा हो।
उस आवाज से हर कोई परेशान हो रहा था पर कानाफूसी के लिए ये आवाज बहुत थी। कामिनी के पोर पोर में कुछ हो रहा था। घर की कानाफूसियों को दबाकर औरतों ने मिलकर उसे बिस्तर से उठाया। एक हिचकी आई और वह उठते ही वह उनकी बाँहों में झूल गई...
कानाफूसी और तेज हो गईं। कामिनी की पूरी देह पर देह पर नोंचने खसोटने के निशान, ये निशान किसकी निशानी हैं। लाल लाल लंबी लकीरें, सिंदूर जैसे दहक रहा था पूरे कमरे में।
मँझले देवर को बुलाया। उसकी बलिष्ठ बाँहों को देखा कामिनी ने, आँखें खुलीं, और फिर बंद हो गईं। वह निढाल-सी गिर पड़ी। उसकी बेकाबू देह को उसने आज सँभाला। देह की ऐंठन शांत हो गई। छटपटाती हुई गिलहरी एकदम काबू में आ गई। देर तक देवर उसे सहलाता रहा। बच्चे की तरह बाँहों में लिए हुए। वहाँ से हटा नहीं। सरकार जी आग्नेय नेत्रों से यह सब देखती रहीं। लल्लन बाबू ने भौजी का इतना निष्पाप चेहरा पहली बार करीब से देखा था। उनका मन उनसे जुदा हो गया। उनका मन कविता-कामिनी में रमता था। कविता तो करते ही थे, अब कामिनी सामने थी, भूतबाधा से ग्रस्त।
दिन में फिर सब कुछ सामान्य रहा। कामिनी उसी तरह हँसती-बोलती रही और काम किया। चूल्हे के पास आकर सरकार जी की उसे देखने की हिम्मत नहीं हुई। उधर कड़ाही में सब्जी पकती रही और सरकार जी मनाती रहीं कि कामिनी ठीक रहे।
देगची में दाल पाक रही थी। सरकार साहब और मुख्तार को चूल्हे में पकी हुई दाल का सौंधा सौंधा स्वाद बहुत पसंद है और कामिनी भी अब पूरी तरह पारंगत हो गई है, यह दाल बनाने में। वह दाल बनाते बनाते हँसती है। ऐसा नहीं है कि वह बाकी समय हँस नहीं सकती। अकेले में वह हँस सकती है, क्योंकि बात करने के लिए तो कोई है नहीं।
दाल को उबलते देखकर उसे अजीब-सी खुशी मिलती है। उसे ऐसा लगता जैसे उसके मन के ही बुलबुले इस दाल में हैं। वह उनसे बात करती। जब तक दाल घुट न जाती, वह उसके दानों को देखती रहती। फिर उसे लगता कि ये दाने भी उसके बादल की उमस को बढ़ा रहे हैं। वह फिर बेकाबू हो जाती। उसके मन में कई बार काई जम जाती थी और वह कई बार फिसलती।
वह फिसलना नहीं चाहती थी। वह काई के नीचे के पानी को साफ करना चाहती थी। वह नदी बनकर बहना चाहती थी।
सरकार साहब कल रात से पुतोह को लेकर बहुत डर गई थी। उनकी सारी ठसक, पुतोह से सेवा कराने की जिद, सब कुछ कामिनी की हालत देखकर धरी की धरी ही जैसे रह गई थी। जहाँ वह अभी कुछ दिन पहले बहू को पैर दबाने के लिए गाँव में ही रखने वाली थीं, अब सोच रही थीं कि वह भेज दे असम में। बेटे के पास। आखिर जाना तो है ही।
"ठीक है, छठ पे इस बार भेज देंगे..." कहते हुए उन्होंने करवट बदली। उनके भारी शरीर से उनका पलंग चरमरा उठा। लाल साड़ी तो सरकार साहब को भी बहुत पसंद थी। पर उनकी बात अलग थी। वे सरकार जी थीं। गोरी, अपने जमाने में कइयों का सपना रही थीं। न जाने कितने लोग आते थे बाउजी के पास हाथ माँगने के लिए। पर बाउजी को तो मुख्तार जी ही जमे। कई दिन बाद वे कुबूल कर पाई थीं। पर कामिनी की बात अलग है। उसे भेज देंगे, उसके मरद के पास। पहले तो न जाने कितने कितने दिन अपने आदमी के पास नहीं जाते थी, फिर चाहे कुएँ के पानी के पास बैठे बैठे रात बिता दो, पर मजाल है कि सास के सामने मुख्तार जी से बात कर लें।
कई बार वे भी सिंदूर लगाकर ऐसे ही उठी थीं, जैसे रात में कोई उनके साथ रहा हो।
पर आँख खुलने पर कोई न था। और इतनी बेकाबू कभी नहीं हुईं कि किसी को बुलाना पड़े।
उधर वे अपनी बातों को सोचती थीं, रसोई से बर्तन-बासन समेटने की आवाजें आ रही थीं। बर्तन टकरा भी रहे थे, पर उन्होंने जल्द ही उस तरफ से अपना ध्यान खींच लिया।
रात को उमस से कामिनी फिर परेशान हो गई। सिंदूर लगा लिया, इत्र लगा लिया और खिड़की के पास बैठकर गाने लगी। वह क्या गा रही थी, किसी को नहीं पता था। पर गा रही थी। वह गा रही थी...
"अन्हरिया रात बैरनिया हो राजा..." बहुत दर्द था इस गाने में। न जाने कब उस दर्द को आगोश में भरे हुए वह सो गई।
सुबह फिर हवेली में शोर था। बड़की पुतोह पर भूत आ गया। फिर सिंदूर में लिपटी हुई वह मिली। फिर बेकाबू-सी वह मिली। खूशबू से नहाई हुई, सिंदूर से लिपटी देह को काबू में करने के लिए इस बार देवर को बहुत कोशिश करनी पड़ी। सरकार जी आज डर गईं थीं बहुत। उनके डर ने उनके चेहरे को अपनी पकड़ में ले लिया। उनका गोरा चेहरा फक्क सफेद पड़ गया।
देवर यानी लल्लन बाबू ने अपनी माँ को बहुत समझाने की कोशिश की कि भौजी को डाक्टर से दिखा लाएँगे, शहर भेज दीजिए। हाजीपुर में भुटकुन चचा का डेरा है, वहीं रह कर इलाज करवा लेंगे भौजी का। भौजी को कोई भूत प्रेत नहीं पकड़ा है, कोई बीमारी होगी। शहर जाएँगी तो इलाज से ठीक हो जाएँगी।
सरकार जी कहाँ सुनने वाली।
"बड़ा आया इलाज करवाने वाला... भूत प्रेत का कहीं डाक्टर से इलाज होता है..." लल्लन बाबू को माँ का यह व्यवहार बहुत क्रूर लगा। वे समझ रहे थे कि भूत प्रेत के नाम पर भौजी की बलि चढ़ जाएगी। ये अंधविश्वासी लोग जान लेकर छोड़ेंगे। बड़का भइया पक्के माँ के भक्त हैं, किसी की बात नहीं सुनेंगे। लल्लन बाबू गिड़गिड़ाते रहे माँ के आगे लेकिन सरकार जी ने ओझा की शरण ली।
अपने पिटारे में जिन्नों की कहानी को लेकर आया था ओझा। ठिगने कद के काले, और चेचक के दाग वाले ओझा ने जिन्न की मौजूदगी की कहानियाँ बना डाली थीं। उन कहानियों में जिन्न थे, भूत थे, चुड़ैलें थीं। और थे कई उसके साथी। डरी सहमी कामिनी को ओझा के दरबार में लाया गया। वह तो बासन धो रही थी। उसे तो दिन में साँस लेने की फुर्सत ही नहीं थी, फिर वह आज ऐसे, और वह भी दूसरे मरद के सामने?
"अरे ई ओझा हैं, इनसे डरना कैसा?"
ओझा ने उसके साँवले पड़ते गेंहुए रंग को ध्यान से देखा। उसके शरीर के हर तिल और मस्से को देखा।
उसने गहरी साँस ली। बर्तन धोते हुए उसके हाथों में राख-मिट्टी भर गई थी, उसकी भी गंध उसकी नाक में घुस गई। उसकी गंध ने शायद उसकी गंध की सीमा तय कर दी थी।
ओझा उस दीवार से डर गया था, और डरकर आँखें बंदकर उसके रोग का अध्ययन करने लगा।
"सच सच बता... कौन है तू... क्यों इस औरत को तंग कर रहा है... क्यों... बता... क्या चाहता है...?"
कामिनी काँप रही थी। वह हिलने लगी थी। वह झूमने लगी। मुँह से गोंगियाने की आवाज। सब लोग ये हालत देखकर डर गए। ओझा ने मंत्र पढ़ कर पानी के छींटे उसके मुँह पर मारे। कामिनी को झटका-सा लगा। वह थोड़ी सचेत हुई। खुद को नियंत्रित करना चाहती थी पर रुलाई फूट गई। हिचक हिचक कर रोने लगी।
नखरे मत कर... बता कौन है तू... ऐसे नहीं मानेगा...
उसने कामिनी के बाल पकड़ लिए जोर से। वह चीख पड़ी।
माई गे माई... करुण कराह घर को चीरती हुई दालान तक जा रही थी।
सरकार जी, ये बताइए, क्या दुल्हिन जी कभी पोखरा के किनारे शाम को गई थीं।
साज ऋंगार करके। बाल खुले करके...
सरकार जी अनभिज्ञ थीं... उन्होंने इनकार में सिर हिलाया।
हो नहीं सकता... आप लोग पता करिए... ये एक शाम गईं थी... पूरे गाँव को पता है कि बिसनटोला के पोखरा और वहाँ खजूर के पेड़ के आसपास कोई शाम या रात को नहीं जाता... काहे गई थी दुल्हिन...
कामिनी की चेतना लुप्त हो रही थी। घर के सब लोग हैरान हो रहे थे कि इतने कड़े परदे में रहने वाली नई पुतोह पोखरे तक गई कैसे। कौन ले गया होगा। अकेली कैसे हिम्मत करेगी। माजरा किसी को समझ में नहीं आ रहा था।
चेतना खोते खोते भी कामिनी को लगा, वह पोखरे के जल में अपना चेहरा देख रही है। बाल खोल लिए और ठठा ठठा के हँस रही है... खजूर के पेड़ों के घने साये में दौड़ रही है... दूर दूर तक कोई नहीं।
ओझा ने कहा - "दुल्हिन पर आशिक जिन्न का कब्जा है" और ऐसा कहते हुए उसने फिर से उसके सारे तिल देखने की तमन्ना की।
"आशिक जिन्न है जो रोज रात को उसके साथ हमबिस्तर होता है..." इसका खुलासा होते ही हवेली में हड़कंप मच गया।
"अरे, नइकी दुल्हिन, कपरपूरा वाली पे जिन्न का साया।"
"कैसी भूतैली लरकी दे दी हमें इसके मा बाप ने... रोगियाह बेटी थी तो रखते अपने पास, हमारे गले डाल दिया गे माई..."
सरकार जी विलाप कर उठी। घर की अन्य औरतों ने छाती पीट लिया। उस आँगन की सबसे चुप्पा पुतोह यानी वीरपुर वाली के होठों पर हल्की हँसी आई और विलुप्त हो गई। वह तमाशबीन बनने के बजाय अपने कमरे में घुस गई। इधर ओझा ने उपायों की एक लंबी सूची दे दी सरकार जी को। उपायों की सूची में थी - इनका इत्र लगाना बंद, सजना सँवरना बंद... खासकर शाम को... रूम में इत्र न छिड़के... भूत नही जिन्न है... जिन्न आसानी से पीछा नहीं छोड़ता... वो जान नहीं लेता पर बेदम करके छोड़ता है। और चित्त सोना बंद। उस दिन से उस हवेली के सभी कुँवारी और अकेली औरतों के चित्त सोने पर रोक लग गई।
उधर जिन्न के इस हमले के बाद सरकार जी बहुत ही सचेत हो गई। कामिनी क्या करे। क्या न करे। सब कुछ उनकी निगरानी में था। सोच रही थीं कि पुतोह को उसके नइहर ही भेज दें।
उधर कुछ औरतों ने समझाया कि बेटे को बुला लें, इतना तो जमीन जायदाद है ही। क्या करना है और कमा कर। इधर सरकार जी ने सबको दहाड़कर चुप करा दिया।
"अरे मरद है, बाहर कमाने गया है। यहाँ पे क्या धरा है, और फिर ले ही तो जाएगा कुछ दिन में। छठ पे भेज तो देंगे..."
इस तकरार में उन्हें कुछ कौंधा।
"सरकार जी..." कामिनी ने डरते हुए सरकार जी को पुकारा।
"आप उन्हें बुला लीजिए न..."
आखिरी शब्दों को जैसे गले में ही घोंटते हुए कामिनी ने कहा था...
"क्या कहा? मरद के बिना अच्छा नहीं लगता क्या ससुराल? हम लोग तो आदमी को अपने पल्लू में बाँधकर नहीं रखते थे, जैसे तुम चाहती हो! बहुत हुआ! अभी कुछ दिन यहीं पर रहो, फिर ले जाएगा तुम्हें! अभी चार पैसा कमा ले, फिर ले जाएगा। दोनों भाइयों की पढ़ाई भी तो करानी है।"
कामिनी समझदार है, सास का इशारा समझ गई;
"और सुनो दुल्हिन, लोटा और मरद बाहरे मँजाता है। समझ में आया कुछ, अभी होली और छठ पे आएगा मरद। जब तुम्हारा दोंगा करा के लाया तो रहा था न तुम्हारे संग, ये समझ जाओ, औरतों को इतना ही मरद मरद करना चाहिए। मरद को अँचरा में नहीं बाँधते। अँचरा में तो सिक्का ही बाँधना चाहिए... अब जाओ..."
सरकार जी अपना आँचल निकाल कर कोने में बँधे सिक्के दिखाने लगीं।
समझदार कामिनी सारा इशारा समझ गई। और अपने अंदर की उमस पर लोटे से पानी उलीच लिया। वह चल पड़ी, मिट्टी के चूल्हा से एक मुट्ठी राख लेके। कुआँ पर सादी मिट्टी रखा रहता है... दोनों को मिला कर माँजेगी तो चमक जाएगा। लोटा माँजने... पीतल का लोटा हरिया गया था। लगता है पानी से खंगाल कर सब छोड़ देते हैं। वह अपने हिस्से का लोटा अलग से माँगेगी। तिलक में इतना पितरिया बर्तन सेट के साथ लोटा तो जरूरे आया होगा। एक भी बाहर नही निकाली हैं माता जी। मन करता है कि पूछे कि ऐ माता जी, का करिएगा एतना भारी भारी बर्तन और परात... निकालिए न रसोई, भंसा घर में काम तो आएगा। दो बार आटा सानना पड़ता है, बड़का कठौती में, एके बार में हो जाएगा...
कठकरेज बुझाती हैं... तभी तो उसे कहा कि मुझे माँ जी मत कहना... सरकार जी कहना।
लोटा को माँजते माँजते कपरपुरावाली बड़बड़ाती जा रही थी। लोटा पटकने से टनाटन आवाज आ रही थी। उसे लगा टनाटन की आवाज तेज हो रही है... कैसे... उसके हाथ रुक गए... कभी धीरे कभी तेज आवाज आती... उसने भरी दुपहरिया में चारों तरफ नजर दौड़ाई... बड़ा-सा प्रांगण था जो सिर्फ औरतों के लिए सुरक्षित था... कोई बाहर का मर्द या अजनबी नहीं घुस सकता था। इसी कुएँ पर सारी औरते खुले में स्नान करती... कुएँ के पास केले के कई पेड़, गन्ना और पुदीने के पौधे थे जो पानी बाल्टी से गिरते ये पौधे उन्हीं से सींचते थे... खुराक पाते थे।
कुछ देर वह इधर उधर टोहती रही... कोई नहीं दिखा। आँगन के ठीक पीछे आम का बगीचा था। बहुत घने पेड़ थे। कोई तो करता था देखभाल उसकी। पर वह आज तक दिखाई नहीं दिया था। कभी कभी उसकी टेर सुनाई देती या चिल्ला चिल्ली। चुप्पी पुतोह ने ने कभी देखा नहीं था उसे...
कामिनी को दोंगा कर आए हुए दिन ही कितने हुए थे और उस पर ये आशिक जिन्न?
कामिनी रात को खिड़की खोल देती थी। तो क्या जिन्न उसी से आया? रात को उसे जुगनू देखने बहुत पसंद थे। झींगुर की आवाजें उसे भाती थीं। वह उन्हें सुनती रहती, फिर अपनी पायल की झंकार बजाती। फिर न जाने किस भाव से आलता लगा लेती, मेहँदी लगाने का मन होता, तो मेहँदी के पत्ते ले आती, उन्हें पीसती, सिल को लाल रंग में रँगे हुए देखती। और फिर अपने सिंदूर का लाल रंग देखती। दोनों को मिलाती और फिर न जाने कैसे वह हरसिंगार बन जाती।
रात को कमरे की खिड़की खोलती, जो गाछी की तरफ खुलती थी। अँधेरा पसरा रहता... इसके जेहन में भरता जाता। लगता कोई साया आम के पेड़ो को हिला रहा है। वह देखने की कोशिश करती, पर वह डर जाती। सोचती पति को चिट्ठी ही लिख दे, रात, जिन्न और अपने बारे में बताए। खिड़की बंद करती तो कमरे में घुटन महसूस होती। क्या करे? क्या करे? तो क्या इसीलिए जिन्न आया था? उससे बातें करने के लिए? उसके मन की गाँठ खोलने के लिए?
कई बार साया दिखाई देता उसे। उसे लगता कि कोई साया उसे पर नजर रख रही है। उसके आसपास मँडरा रही है। उसे डर नहीं लगता। खिड़की खोल देती कि वह साया आकर सीधे उससे बात कर ले। वह साया बचता क्यों है, क्या वह सचमुच उस पर फिदा है, यह सोच कर एक पल को शरमाई। लगा कि खुद को आपादमस्तक आईना में देख ले एक बार। पर ठिठक जाती। कान में बचपन की की कुछ आवाजें नेपथ्य से आतीं... आपकी बेटी बहुत सुंदर है रामसुभीता बाबू, किसी आन्हर-कान्हर के हाथ में न दे दीजिएगा। शादी के बाद तो वह भूल ही गई थी वह बहुत सुंदर है और उसके पिया के शरीर पर भालू जैसे काले काले बाल, जो अभिसार के क्षणों में शूल बनकर चुभते रहे हैं उसे। और कोई फिदा नहीं हुआ, भूत प्रेत ही बचा है क्या फिदा होने को... वह खुद से सवाल पूछती और खिड़की के बाहर गाछी के अँधेरे को घूरती रहती।
मन की बात करे किससे। कौन है जो सुने उसकी बात। सरकार जी का खौफ ऐसा कि दोनों देवर बाहर ही बाहर गायब रहते हैं। वह तो उनसे भी बात नहीं कर सकती। एक दिन भर अँग्रेजी किताबों में डूबा रहता है, छोटा वाला अपने ही जीट जाट में। कई बार वह सोचती कि किसी किताब की तरह उसे खोल कर लल्लन पढ़ता क्यों नहीं। जब देखो, अँग्रेजी की कोई किताब लिए घूमता रहता है जैसे सबको अपनी पढ़ाई के रोब में ले लेगा। न वह किताब हो सकी न मुकम्मल इनसान।
उसके लिए तो केवल चूल्हा है, बासन है, देगची में खौलती हुई दाल है। आम का पेड़ है, उसका अँधेरा है...
हवेली अभी जिन्न के हमले से उबरी भी न थी कि एक और हमला उस पर हुआ और उस हमले से हिल उठा हर कोई। मुख्तार जी तो अभी जिन्न को ही सही से पहचान नहीं पाए थे, कि कौवा काँव काँव करता हुआ मेहमान के रूप में तबाही ले आया।
मँझला देवर गायब था। वही जो अपनी बाजुओं से थामकर जिन्न को उसकी देह से नोचकर फेंक देता था वह गायब था। तो क्या जिन्न उसे भी अपने साथ ले गया? या जिन्न ने बदला ले लिया?
सरकार जी सुबह से ही उसे कोस रही थीं। क्यों ब्याह कर लाए, क्यों दोंगा किया? और अगर किया भी तो जिन्न को थामने के लिए मँझले देवर को ही क्यों बुलाया?
पुलिस में खबर लिखवाई, खोजबीन शुरू की। कानाफूसी से पता चला कि लल्लन बाबू आजकल भूत प्रेतों वाली किताबें खोजते थे।
घर में हाहाकार मच गया। रोना पीटना शुरू हो गया। कामिनी को लगा जैसे वह ही इन सबकी जिम्मेदार है। सरकार जी ने उसे ही मारना शुरू कर दिया। सरकार जी ने कितनी बार गरम माँड़ वाली कठौती उसकी तरफ फेंकी होगी, गरम रोटी फेंकी होगी उसकी तरफ, अब तो कामिनी को भी ध्यान न होगा।
सरकार जी की छोटी गोतनी ने तो कई बार दबी जुबान में टोका भी कि क्यों आप सौतन का खीस कठौती पर उतार रही हैं। सरकार जी बौखला जातीं। आँगन में मातम पसर जाता। कामिनी को लगता कि वह खुद भी भूत बनती चली जा रही है। जिंदा भूतों के बीच फँस गई है।
कामिनी का मरद छुट्टी लेकर आया। मुख्तार जी और बड़े बेटे की भागदौड़ से पुलिस ने थोड़ी सक्रियता दिखाई और काफी तहकीकात के बाद इसे अपहरण का नहीं, मर्जी से गायब होने का मामला करार दे दिया। मगर सरकार जी को एकदम यकीन था कि यह काम उसी आशिक जिन्न का है जिसने कामिनी के शरीर पर कब्जा जमाया था। कामिनी सुनती रही।
वह अपने बनाए दायरे में और सिमटती रही। किसी ने कहा दोस्तों ने मारकर उसे रेलवे पर लिटा दिया था। किसी लड़की से कोई चक्कर था। उसके भाइयों ने ऐसा किया।
"अरे किसी ने कुछ नहीं किया है, अगर किया है तो उसी जिन्न ने, कोई नहीं है, इसके पीछे, अगर कोई है तो ई मुँहझौसी कपरपूरावाली!"
"सरकार जी, ये आज के जमाने में कैसी बातें कर रही हैं! भला जिन्न होते हैं क्या?" पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा।
"होते हैं, आप इस ओझा से पूछिए, इसके शरीर पर जिन्न आता था, इसका आशिक है जिन्न! अब इसका मरद साथ नहीं रहता, वह जिन्न रहता है, अरे खा गई, मेरे बेटे को, अब दूसरे को खाएगी! अरे किसी को पकड़ना है तो इसे पकड़ कर ले जाओ, ये ही है अभागन..."
"सरकार जी, अंतिम बार लल्लन बाबू अपने दोस्तो के साथ सरैया चौक पर देखे गए थे। दोस्तों के साथ हँसते बोलते जा रहे थे। पता चला है। अब वे कहाँ गए,, क्या हुआ ये तो तहकीकात के बाद ही पता चल सकता है न!"
दारोगा जी ने समझाने की कोशिश की।
घर में गहरा सन्नाटा छा गया है। एकदम शांत हो गया है घर। उस शांत घर में अँधेरों में कैद कामिनी लल्लन की आखिरी बातों को ध्यान कर रही है।
"भाभी, तुम उबालती रहना इस देगची में दाल, और देखना मैं क्या करूँगा?"
देगची में अभी उबाल नहीं आया था और वह दानों से बातें ही कर रही थी।
"अरे क्या करेंगे?"
"अभी नहीं बता सकता, पर कुछ ऐसा कि एक धमाका होगा! और तुम देखना, वह दिन जल्द आएगा, कहो तो तुम्हें भगा ले जाएँ।"
"हम कहाँ जाएँगे घर दुआर छोड़ कर बउआ जी... अभी तो आपकी सादी-वादी भी करनी है न हमें... आपके पाँव में बेड़ी बाँध देंगे फिर देखते हैं कहाँ भागते हैं आप पगहा तुड़ा कर..."
वह हँस पड़ी। लल्लन को लगा जलतरंग बजा कहीं। कितना सुंदर हँसती हैं भौजी। मन में उदासी छाई। अपनी कविता तो बचा लेगा किसी तरह, कामिनी नही बच पाएगी उसकी।
वह ठुनका - मत भागो, ले जाएँगे किसी दिन उड़ा के... देखना... आएँगे लेने आपको... हमको नहीं रहना ईहाँ... नहीं पिसना घरेलू चक्की में... हम तो बहता पानी हैं भौजी... बहो हमारे साथ... नहीं तो देखना, धमाके में बहा ले जाएँगे...।
"ओह, लल्लन... तुम ये धमाका करने जा रहे थे।" उसके मन में भी मरघट जैसा सन्नाटा छा गया।
संदिग्ध दोस्तों की खोज हुई। केस किया गया। दोस्तों ने कहा कि लल्लन बाबू बहुत उलझे उलझे से थे।
और स्टेशन की तरफ गए थे। वे शहर की तरफ जा रहे थे। कह रहे थे कि जरूरी काम से जा रहे। जल्दी ही कुछ धमाका करने वाले हैं। बताया नहीं कि क्या करने वाले हैं। अक्सर कहा करते कि वे ऐसी जिंदगी नहीं जी सकते।
सरकार जी सन्नाटे में। कैसी जिंदगी चाहता था उनका बेटा।
कामिनी की तरफ से अब सबका ध्यान हट गया था। दुख में डूब गए थे सब। सरकार जी का दिल कह रहा था कि बेटे को किसी बात की कमी नहीं थी, आखिर वह घर से भागेगा... अच्छा खासा बीए कर रहा था। इंगलिश पढ़ रहा था। विदेश जाने के सपने देखा करता था। वो क्यों भागेगा। उसे भगाया गया है, जिन्न ने मारा, या दोस्तों से मरवाया होगा। ऐसे तो कुछ हो नहीं सकता, वह खुद को नहीं कुछ कर सकता था। फिर उसे क्या हुआ? नहीं नहीं!
और कामिनी को लगा कुछ खो गया। जब से जिन्न को उसने काबू किया था तब से उसकी दोस्ती हो गई थी। वह बहुत समझाता रहता। दिन में अक्सर कमरे में आने लगा था। अकेले बात करने लगा था। जितनी देर कमरे में रहता, हँसी बाहर आती रहती।
सबसे छोटा देवर शरमाता था। बहुत ही कम कम मिलता जुलता। पर लल्लन तो बहुत मनलग्गू था। अँग्रेजी की बातें खूब बताता। जिन्न को उसने कैसे काबू में किया, उसे किस्से सुनाता, उसके आम के पेड़ की बातें सुनकर हँसता। लोटपोट हो जाते दोनों ही ये बातें करके। पर वह क्यों चला गया? और ऐसे? क्या उसे यही धमाका करना था? उसे उसकी बातें याद आतीं, उसकी वे बाजुएँ याद आतीं जिनसे वह जिन्न को भगाता था। उसे ऐसा लगा कि मानो फिर से जिन्न उसकी छाती पर बैठ गया हो। और वह घुट रही है, दब रही है।
पर आज उसे बचाने वाला कोई नहीं था। जो था वह न जाने कहाँ चला गया। और पति को इस दुख में उसके पास आने की जरूरत ही क्या थी। उसे उसकी माँ और उसके काम से फुरसत कहाँ थी?
धीरे धीरे इस घटना को चार महीने बीत गए। कामिनी के पति असम चले गए। उनके जाते ही फिर कामिनी को दौरे पड़ने शुरू। वही जिन्न का किस्सा, जिन्न आया, उसके शरीर पर कब्जा किया। झाड़फूँक हुई। आशिक मिजाज जिन्न, पीछा छोड़ ही नहीं रहा था। धीरे धीरे फिर से किस्से गूँजने लगे। उसने उमस का घूँघट ओढ़ लिया था।
वह भी जेठ की रात थी। बहुत तेज गर्मी थी। उस गर्मी में गाँव में अभी भी ठंडक रहती है। उस गर्मी के रात में सब थे। कामिनी भी छत के कोने में ओट लेकर बैठी थी, आँगन की कुछ औरतो के साथ। खुले में सोती नहीं, गरमी में ठंडी हवा लेने छत पर आई। झाड़-फूँक करवाना भी छोड़ दिया था सास ने। रोज सुबह वह उसी तरह तड़पती, चीखती हुई मिलती। अब वह थोड़ी देर में शांत होने लगी थी। वह बहुत उग्र होने लगी थी। कमरे में उठ कर सामान फेंकने लगती... सब उससे दूरी बनाने लगे थे।
सरकार जी उसे मायके भेजने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थीं। बेटा साथ नहीं ले जाना चाहता। वह बोलकर गया था कि इसे यहीं रखो, सँभालो, जरूरत हो तो डाक्टर से दिखा देना... पैसे की दिक्कत न महसूस करना। पैसे भेजता रहूँगा। समय होता तो खुद ही दिखा देता। लेकिन उसके सामने एक बार भी जिन्न नहीं आया उसकी देह पर।
कामिनी अब खोई खोई रहने लगी थी। मुरझा रही थी। वह देख रहा था पर असहाय था। असम में पहले क्वार्टर खोज ले फिर परिवार को ले जाएगा। प्लानिंग साल भर बाद ले जाने की थी। तब तक माँ को पुतोह का सुख मिल जाए। यहाँ तो माँ कुछ और ही प्लान कर रही थी। बहू को मायके वाले के माथे मढ़ने के फिराक में। चिट्ठी भिजवा दी थी कि छठ के बाद आकर ले जाए।
सब कुछ सरकार जी के मन में एकदम साफ था उनके मन की चालों को कुछ हलचलों से विराम मिला। जैसे स्पीड ब्रेकर आ गया हो, जहाँ पहले वे बहू को छठ पर बेटे के पास भेज रही थीं, अब वे मायके भेजने पर तुल गई थी।
वह अमावस की रात थी। स्याह अँधेरी रात। करिया कुचकुच रात। सबके सब गरमी से राहत के लिए छत पर डटे हुए थे। चुप्पी पतोहू यानी रजौली वाली कामिनी को आँगन में अकेले बैठे देख कर कमरे से निकली। लालटेन की हल्की रौशनी में उसका चेहरा दिपदिप जल रहा था।
"चलो छत पर... ईहाँ काहे गरमी में सीझ रही हो..."
"हम इहें ठीक हैं..."
"अगोरिया कर रही हो का..."
वह रहस्यमयी ढंग से मुस्कुरा रही थी। कामिनी ने नोटिस किया कि उसकी आँखें ठंडी और बेजान थी।
छत पर अचानक हलचल होने लगी। शोर उठा। दोनों भाग कर छत की सीढ़ियाँ चढ़ गईं।
गाछी के बगल वाले खेत में छोटी छोटी लाइटस दिखाई दे रही थीं। अनेकों बत्तियाँ जल रही थी। भुक भुक... हिल रही थी हवा में... दूर थीं पर लग रहा था कि घर की तरफ बढ़ती चली आ रही हैं। घर के सारे लोग घबरा गए। हो न हो डाकू आ गए गाँव में। घर डाकू डाकू के शोर से भर उठा।
मुख्तार जी ने कहा - "डाकू बिना सूचना के नहीं आते... वे पत्र लिखते हैं... फिर आते हैं... पता करो, कोई और बात..."
सरकार जी ने कहा - "अन्हरिया रात में बिना बताए भी डकैत आ जाते हैं, आजकल किसी का दीन-ईमान नहीं रहा..."
"जरूरी नहीं कि डाकू हमारे घर ही आ रहे हों, गाँव में और भी तो घर हैं, हमारे यहाँ से ज्यादा कमाने वाले मरद जोगी बाबू के घर में हैं, वहाँ जाते होंगे...", किसी ने कहा।
"कई बार डाकू डकैती करके नदी किनारे से गुजरते हैं... डरिए मत... शांत रहो... चुपचाप... जैसे हम लोग घर पर है ही नहीं..."
यह सबसे छोटे देवर की आवाज थी।
किसी की हिम्मत न हुई, कोई घर से नहीं निकला, सब छत पर पत्थर ईंट के टुकड़े लेकर बैठ गए कि डाकू नीचे आएँगे तो उन पर पत्थर बरसाएँगे... छत पर खूब जमा कर लिया सबने। कामिनी नीचे भागी... कुछ औरतें अपने गहने जहाँ तहाँ छिपाने लगीं। गले से चेन खोला, किसी ने बूँदे.. किसी ने कंगन... सरकार जी के कहने के बावजूद कामिनी ने अपने गहने नहीं खोले। दहशत का माहौल हो गया। कामिनी ने सुना, चुपचाप सीढ़ियाँ उतर गई। बत्तियाँ जलती रही... पास आने का भ्रम होता रहा... सब डाकू के आने का वेट करते रहे... कोई काँप रहा है तो कोई प्रार्थना बुदबुदा रहा है... इस मौसम में डाकुओं का आना, अटपटा लग रहा था। देर हो गई, डाकुओं ने लगता है खेत में डेरा डाल दिया है। थोड़ी देर में देखा... कुछ लोग हाथ में लालटेन लिए चले आ रहे। सब सतर्क हो गए... ईंट पत्थर बरसाने के लिए... छत पर लाइटें कम कर दीं... चोरी की बिजली गायब थी। कभी कभार आ जाती... आज वो भी गायब। छत पर सरगर्मी बढ़ गई...
लोगों के मुँह खुले रह गए... जब नीचे पहुँचे लोग शांति से आकर खड़े हो गए। लालटेन की रोशनी में देखा... कुछ विदेशी महिलाएँ, विदेशी मर्द और उन सबके साथ विचित्र वेशभूषा में लल्लन बाबू। सबके बाल बेतरतीब, लंबे। लगता है कई दिनों से नहाए धोए नहीं। फटी हुई ब्लू पैंट और आँखें जैसे लाल दरिया।
"लल्लनवा..."
"माय, अब हम तुम्हारे बेटा नहीं रहे, ये मेरी दुनिया है, इसी में हम हैं..."
"लल्लनवा... क्यों किया रे ऐसा... क्या जरुरत... हमको बता तो जाता..."
सरकार जी दुख से विलाप कर उठीं। मुख्तार जी को काठ मार गया। उनके मुँह से बोल ही न फूटे।
"पट्टीदारी के लोग सारा माजरा देखकर हैरान थे।
"भइय्या... आप हिप्पी हो गए..."
छोटा भाई चिल्लाया।
"तब तक मुख्तार जी थोड़ा सँभल गए थे।
"अब क्यों आए हो यहाँ दलबल लेकर, मरे हुए लौटा नहीं करते... अशुभ होता है..."
"हम आप लोगों को कुछ बताने आए थे। एक तो ये कि हम जिंदा हैं और अपनी अलग दुनिया चुन ली है..."
वह चुप रहा। उसकी आँखें घरवालो की भीड़ में कुछ खोजने लगीं...
"और..."
मुख्तार जी के गले से ये शब्द मुश्किल से निकले। लल्लन के मुँह से बोल नहीं फूटा...
"जाने दीजिए... विदा, बाय बाय... जिंदा रहा तो फिर मुलाकात होगी..."
सारे विदेशी लल्लन के साथ हो लिए। उनके चेहरे भावहीन थे। उनके लिए यह भाषा और माहौल दोनों अबूझ थे।
सरकार जी "लल्लन लल्लन..." पुकारती रही। मुख्तार जी ने उन्हें पकड़ लिया कि कहीं बेटे के पीछे दौड़ न जाएँ। लल्लन के साथ जाती हुई विदेशियों की जमात कुछ गाती हुई जा रही थी... जिसे थोड़ा बहुत स्कूली बच्चा पकड़ पाया....
"लिविंग दिस वे, विदाउट ज्वाय, विदाउट टार्चर, आई डू रिमेंबर द पास्ट इयर्स... एंड यूअर सिलवरी हैंडस..."
सुर धीरे धीरे अँधेरे में विलीन हो गए।
उस रात पूरे घर पर अमावस्या की गहरी परत चढ़ गई।
उस रात सरकार जी को इतना सुकून आ गया कि उनका बेटा जिंदा है। जिन्न ने मारा नहीं है। कभी न कभी घर लौट आएगा। मुख्तार जी ने कलेजे पर पत्थर रख लिया। उस रात आँगन उसी घर में रहने वाले पट्टीदारी के लोग अलग अलग तरह की बातें सोच रहे थे। तरह तरह की बातें, अफवाहें, अनुमान थे। सरकार जी रोती बिसूरती और कपरपूरा वाली को ठिकाने लगाने के बारे में सोचती जातीं। उन्हें लगने लगा कि इस पतोहू के रहते घर से अपशकुनी छाया कभी न हटेगी। बड़े बेटे को भी इस जिन्न की महबूबा से निजात दिलाना जरूरी नहीं तो उसको भी खा जाएगी। जब भुतहा मकान में नहीं रहा जा सकता तो भुतैली औरत के साथ बेटा कैसे जी सकता है... पर कामिनी का क्या किया जाए? उसे कहाँ भेजें? वह रात सदियों की रात पर भारी थी। सबके लिए। कामिनी अपने कमरे में बेखबर बैठी थी। गाछी की तरफ खुलने वाली खिड़की रात भर खुली थी।
सुबह, मुँह अँधेरे सबसे पहले पिछवाड़े से गुजरते हुए आँगन की किसी औरत ने देखा। कपरपूरा वाली रात में खिड़की खोल कर कभी सोती नहीं। घर सुबह सुबह ही चीख पुकार से भर उठा।
कामिनी गायब थी।
जिन्न उसे उठा ले गया है? ओसारे पर लोटा चमक रहा है... घर वाले चीख रहे हैं... "कामिनी... कामिनी..."
गाछी का रखवाला अकेलापन काटने के लिए कोई अजीब-सा गीत गा रहा है। घर की सबसे चुप्पी पुतोह, रिश्ते में गोतनी वीरपुर वाली अपने कमरे की चौखट से बाहर निकली। कामिनी का चमचमाता लोटा खोज रही है। आँखों में पहली बार इतनी चमक और जान दिखाई दे रही है। लोटा लेकर कुएँ के पास पहुँची और गड़प्प... लोटा कुएँ के तल में चला गया।
वह बिसनटोला के पोखरा की तरफ बढ़ी चली जा रही है। रास्ते में ही बाल खोल लिए... लोल (होंठ) रंग लिए, आँखों में काजल, बड़ी-सी बिंदी और इत्र छिड़कती हुई वह पोखरा के पास जा खड़ी हुई। पानी थिर है। अपना चेहरा वह साफ साफ देख रही है। पानी में जो चेहरा दिखा, उसे देख कर वह दंग रह गई। वह उसका चेहरा तो नहीं था। वो कोई और स्त्री थी, जो उसमें रहा करती थी।
कंकड़ उठाया और चेहरे पर दे मारा, शाम गहरा रही थी। खजूर के पेड़ हौले हौले हिल रहे थे।
वह ठठा कर हँस रही थी।

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गुरुवार, 25 मई 2017

मनुष्य-देह की ताज़ा आग में तपी हुई कविताएँ हैं संजय कुमार शांडिल्य की कविता-संग्रह 'आवाज़ भी देह है' : शहंशाह आलम




  'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। प्रस्तुत है युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह "आवाज भी देह है" पर समीक्षक शहंशाह आलम की टिप्पणी -


'आवाज़ भी देह है' युवा कवि संजय कुमार शांडिल्य की ऐसी कविताओं का संग्रह है, जिसमें शामिल कविताओं की चमक ऐसी है, जिस चमक से समकालीन हिंदी कविता का चेहरा एक नई रौशनी से जगमग दिखाई देता है। इन कविताओं में कवि का लबो-लहजा ऐसा है जिसमें जाड़े की धूप की मिठास भरी दिखाई देती है। इस संग्रह की पहली कविता का लबो-लहजा आप सब देखिए :

          कुछ थोड़े-से लोग हमेशा टापुओं पर रहते हैं
          तो मैं रोज़ो-शब खुले समुद्र में रहता हूँ
          मुझे हर बार लहरें दूर बहुत दूर
          लाकर पटक देती हैं
          इतनी दूर कि मेरे देश का नौ क्षेत्र
          मुझे दिखाई नहीं देता
          एक बड़े झंझावात में इस दुनिया की छत
          उड़ रही होती है
          और हिमालय और आल्पस जैसे पहाड़
          भसकते हुए अपने मलबे के साथ
          मेरी ओर लुढ़कते हैं
          कुछ थोड़े-से लोग तब पबों में जाम टकराते
          हुए मेरी इस बेबसी पर हँसते हैं
          मुझे इस मृत्यु की नींद में उनके ठहाके
          सुनाई पड़ते हैं
          मैं जब एक दूब की तरह सिर उठाता हूँ
          अपने ऊपर के आसमान से मेरा सिर लगता है
          कुछ थोड़े-से लोग अंतरिक्ष से खेलते हैं
          और मेरी पृथ्वी रोज़ हिलती है ( 'हिलती है पृथ्वी', पृ. 13)।

     'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ कवि की उस आत्मचेतना की कविताएँ हैं, जिस आत्मचेतना से कवि अपने आसपास की मिट्टी को देखता है, अपने आसपास के मौसम को महसूसता है, अपने आसपास के जीवन को हाशिए पर से आगे लाने का जतन करता है। इसलिए कि हर कवि अपने आदर्श से बँधकर मनुष्यता के बचाव के लिए ही तो सारे प्रयत्न करता आया है। संजय कुमार शांडिल्य भी अपनी आत्मचेतना को उसी आदर्श से बाँधकर मनुष्यता को बचाए रखने की मुहिम में लगे दिखाई देते हैं। तभी कवि आवाज़ को देह मानता है और मनुष्य-देह को इसी जादुई आवाज़ से जगमग भी करता है। दरअसल कवि की महत्ता भी इसी में है कि कवि मनुष्य-जीवन को नए सिरे से पकड़े और मनुष्य-जीवन को हर संकट से आज़ाद कराए। यहाँ आज़ादी दिलाने का मतलब यह है कि कवि मनुष्य को कमज़ोर कर रहे सारे तत्वों से आज़ाद कराए। आज सारा संकट मनुष्यता पर ही तो आ रहा है। बड़ा सवाल यही है कि यह संकट पैदा कौन कर रहा है, तो जवाब यह है कि आज मनुष्यता को संकट में देश की सरकारें ही तो ला रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि इन दिनों सबसे ज़्यादा संकट में कुछ है तो मनुष्यता है। अब की सरकारें 'फूट डालो राज करो' की नीति वाला अपना एजेंडा बख़ूबी लागू कर रही हैं। आदमी-आदमी के बीच भेदभाव बढ़ाकर आज सत्ता हासिल की जा रही है :

          याक की तरह सर्दी खुर बजा रही है
          जिनके जिस्म ओढ़े नहीं जा सकते
          वो मिट्टी ओढ़ रहे हैं
          ग्लैशियर-सी रात फ़िसलती हुई बह रही है
          हिंसा है इन रातों की नींद हिंसा है
          दुःख-आँच देकर जल रहा है दान का अलाव
          साँसों से हथेलियाँ गर्मा रही है रूह
          पत्तों पर ठोस हवा ठहरी है
          सूखी हुई लकड़ियाँ सब हरी हैं
          यह रात जैसे हड़ताल में अस्पताल
          इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है
          देह तानकर ओढ़ रहे हैं लोग
          इस ठंडे की आग लगे यह रोग ( 'इस महादेश में मौसम भी एक बीमारी है', पृ. 38 )।

     अथवा,

          पेड़ों के तने हथेलियों के स्पर्श से सख़्त हो जाते हैं
          और जड़ पृथ्वी के अँधेरे में धँसने लगती है
          पाँव सड़क पर इतने परिचित हैं कि मेरा आना-जाना
          उनमें ऊब पैदा करता है
          उससे अधिक रुचिकर तो आसमान में गर्दिश करते सितारे हैं
          इतनी लय से विज्ञापन आते हैं कि कहीं भी कुछ चौंकता नहीं
          गाड़ियों का शोर ओढ़ता-बिछाता शहर यातायत में डूब जाता है
          सब भाग रहे हैं एक परिचित त्वरा में कि
          धीमी गति की बैलगाड़ी इतनी भली लगती है
          कि भले लोग कहते हैं अच्छा हुआ इसके पहिए में
          बॉल बेयरिंग नहीं लगा
          अचानक अपने घर के दरवाज़े पर आप तय करते हैं कि
          हथेली की दस्तक बदल देंगे
          और आप आश्चर्य में हैं कि कोई बिना पूछे
          रोज़ की तरह दरवाज़ा खोल देता है ( 'रोज़ की तरह', पृ. 39 )।

     'देह भी आवाज़ है' की कविताएँ हमारे आजूबाजू जो कुछ बचा रह गया है, उस बचे रहने की कविताएँ हैं। हालाँकि जो कुछ बचा रह गया है, वह और कितने दिन बचा रह पाएगा, यह संदेह कवि-मन में एक डर की तरह छिपकर बैठा रहता है। कवि का यह डर अनुचित न होकर वाजिब है। आज जिस भीषण पराजय से आदमी जूझ रहा है, पहले ऐसा शायद हुआ हो। संजय कुमार शांडिल्य भी एक आदमी हैं और आदमी होने के नाते किसी आदमी का पराजित होना उन्हें बुरा लगता है। आदमी को हराए जाने की सौदागरी इन दिनों विश्व-स्तर पर जारी है। और आदमी को लेकर किसी भी सत्तापक्ष का यह लेनदेन घातक है। आज सत्तापक्ष होने का तात्पर्य इतना भर रह गया है कि जनता अपने हर मोर्चे पर हारती रहे और सत्तापक्ष अपने हर मोर्चे पर जीत हासिल करता रहे। सत्तापक्ष का कोई विस्फोट कभी असफल नहीं होता। स्थिति यह हो गई है कि हर आदमी दूसरे आदमी को घृणा से देख रहा है। आज के सत्ताधीशों की देन यही है कि हर घृणा को इतनी हवा दी जा रही है कि हर आदमी कन्फ्यूज़ है और हर आदमी को लग रहा है कि एक-दूसरे को मारकर ही ज़िंदा रहा जा सकता है। अब देश को बदलने का मतलब इतना भर बचा रह गया है सत्ताधीशों के पास कि प्रेम से नहीं घृणा से देश को भर दिया जाए। संग्रह की 'अब्दुल मियाँ', 'हम मृत्यु को प्रेमिकाओं से अधिक जानते हैं', 'हम जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है', 'पेड़ : एक, दो', 'अभी सिर्फ़ एक आँख जगी है', 'इन में', 'मैं हर बार 'अ' से शुरू करता हूँ', 'लड़ना उतना आसान होता नहीं', 'घर में एक तंबू है तो जॉर्डन एक नदी नहीं है', 'मैं इन उदास शामों में रहता हूँ', 'ख़ुश होने के लिए', 'पृथ्वी के छोर', 'बारिश गिर रही है', 'खेल की नीति-कथा', 'इतनी साजिशें हैं मौसम के', 'आश्चर्य', 'हज़ार दरवेश', 'हड़प्पा की स्त्रियाँ', 'वे सड़कें', 'स्वार्थ का वैश्विक गाँव', 'यह समय खच्चरों की उदासियों का है', 'टेक्सस से टिकारी तक', 'मेरी कविताओं में मैं', 'कोई मुझे भी खोदकर निकालेगा', 'मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो', 'कसिया अभी आठ कोस है' आदि कविताएँ दुनिया भर की सरकारों की इसी नीति-कथा का बयान हैं।

     संजय कुमार शांडिल्य हमारे समय के ऐसे कवि हैं, जिन्हें दुनिया का, दुनियादारी का और डगमग विचारधारा के बारे में ख़ूब पता है। उनकी कविताओं का आकाश-मंडल इतना बड़ा है, इतना फैला हुआ है, इतना तपा हुआ है कि 'आवाज़ भी देह है' की कविताएँ पढ़ते हुए पाठक कहीं दूसरी जगह भटक नहीं जाता बल्कि इन कविताओं की आकाशीय आभा से टिका रहता है। इन कविताओं में जब पृथ्वी चौंकती है, तब हम-आप भी चौंकते हैं कि आज की निरंकुश व्यवस्था ने हमारी देह को कहाँ-कहाँ छेदा है। संजय कुमार शांडिल्य कविता के उन लोहारों में हैं, जिनकी कविताएँ बिलकुल ताज़ा आग में तपकर हम-आप तक पहुँचती हैं यानी संजय कुमार शांडिल्य कमाल के कवि हैं, जो एक नए क़िस्म की आवाज़ हमें सौंपते हैं। हमारे दुश्मन हमको दरिया में बहा आते हैं और यह कवि हमको दरिया से बाहर निकाल लाता है पूरी हिफ़ाज़त से। तभी पूरी ताक़त लगाकर कवि कह पाता है, 'तुम हमारी आवाज़ें खा रहे हो / रुई के फ़ाहों-सी / हवाओं के दस्तक-सी / निरपराध आवाज़ें… ( 'आवाज़ भी देह है', पृ. 52 )।'
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आवाज़ भी देह है ( कविता-संग्रह ) / कवि : संजय कुमार शांडिल्य / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नम्बर-11, करतारपुरा इण्डस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 / मोबाइल संपर्क : 09839018087 / 09431453709 / मूल्य : ₹100


समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / 09835417547

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सोमवार, 22 मई 2017

शहंशाह आलम की तीन कविताएं


समकालीन कवि शहंशाह आलम की सबसे बड़ी खासियत है कि वे न सिर्फ कविताएं लिखते हैं बल्कि अचूक मारक कविताएं लिखते हैं। उनकी पैनी नजर आस-पास की हर गतिविधि पर होती है। यदि वे अपने शहर में फैल रहे अत्याचार और अराजकता पर नजर रखते हैं तो वे नोटबंदी, आधार कार्ड और जीएसटी जैसे निर्णय से होने वाली कठिनाइयों एवं सहुलियतों पर भी ध्यान रखते हैं। ध्यान तो इस बात का भी रखते हैं कि अलबत्ता शातिर शासक किस कदर भोलीभाली जनता को दूसरे मुद्दों में उलझाकर अपना उल्लू सीधा करती है। साथ ही साथ कवि इस ओर भी इंगित करते हैं कि माहौल इतना गंदा और भयाक्रांत है कि विरोध के स्वर फुटें उससे पहले ही दबा देने की पूरी तैयारी है। आइये पढ़ते शहंशाह आलम की तीन बेहतरीन कविताएं जो हमारे वर्त्तमान परिवेश और परिदृश्य को बखूबी रेखांकित करती हैं। -- सुशील कुमार भारद्वाज

तुम्हारे शहर में
     ● शहंशाह आलम

तुम्हारे शहर में चाँद निकलता है
मेरे शहर में क़ातिल निकलते हैं रोज़ रात को
हुकूमत की तरफ़ से फुसलाकर भेजे हुए

तुम्हारे शहर में फूल खिला किए हैं
मेरे शहर में बबूल उगा किए हैं
मेरे थके-हारे पाँवों के नीचे काँटेदार

तुम्हारे शहर में रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
साबुन भी तेल भी कपड़ा भी घैला भी कनस्तर भी

मेरे यहाँ तो नल में पानी तक उनके इशारे पर आता है
जिन्होंने मेरे घोड़े के चारों पाँव क़ैद कर लिए हैं
जिन्होंने मेरी कश्ती के लिए बची नदी चुरा ली है

जानेमन, तुम मेरे किस शहर की बात करते हो
जहाँ चाँद निकलता है क़ातिल नहीं
जहाँ फूल खिलते हैं बबूल नहीं उगा करते
जहाँ रोटियाँ बाआसानी मिल जाया करती हैं
जहाँ फ़ाक़ाकशी नहीं है ज़ुल्म नहीं है

तुम्हारे शहर का ज़िलाधिकारी यही एलान कराता रहा है
तुम्हारे शहर का पुलिस कप्तान यही कहता आया है
कि तुम्हारा शहर एक बेहद स्मार्ट शहर है
जहाँ रोटियाँ रख दो तो चींटियाँ नहीं लगतीं
जहाँ रात को सोओ तो मच्छर नहीं काटा करते
जहाँ घूमने निकलो तो उचक्के सामान लेकर नहीं भागते

जानेमन, मेरे शहर का ज़िलाधिकारी
सारा झूठ ही एलान कराता है
मेरे शहर का पुलिस कप्तान
एक बेहद मक्कार पुलिस कप्तान है

क़ब्र खोदने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
पेट्रोल कम देने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
औरतों को जलाकर मारने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
घूस लेकर काम करने वाले सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
दवाइयाँ नहीं मिलने वाले हॉस्पिटल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में
बिना उस्ताद वाले स्कूल सबसे ज़्यादा मेरे शहर में

अब बस भी कीजिए हुज़ूर
मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था
मैं आपके शहर को सचमुच
एक अच्छा शहर मानता आया था

चलो, तब हम ऐसा करते हैं
मिलकर एक ऐसा कोई शहर
एक ऐसा कोई नगर तलाशते हैं
जहाँ शहतूत के पेड़ बचे हों
जहाँ शहद के छत्ते बचे हों
जहाँ किसी का ख़ून नहीं किया जाता हो
जहाँ औरतों की इज़्ज़त नहीं ली जाती हो
जहाँ बच्चाचोर बताकर लोग बेगुनाहों का क़त्ल नहीं करते हों
जहाँ मुंसिफ़ बिना डरे सच्चा इंसाफ़ करता हो

जानेमन, इस सदी का सबसे बड़ा जोक आपने सुना दिया
मेरे शहर में बलात्कार नहीं होगा ख़ून नहीं होगा
लोग भूखे मारे नहीं जाएँगे दिक़्क़्त में नहीं होंगे
तो हुकूमत आला ऑफ़िसरों की तरक़्क़ी रोक देगी

तुम्हारे शहर में भी चाँद नहीं क़ातिल निकला किए हैं
तुम्हारे शहर में भी शायर नहीं क़ातिल रहा किए हैं
मैंने मान लिया मैंने समझ लिया मैंने जान लिया।

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तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
                         
 

तुम काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
मैं डरता हूँ नोटबंदी से आधार से जीएसटी से

नोटबंदी से तुम काहे डरते हो
इससे हम पैसे के लिए लाइन में लगे-लगे मारे जाएँगे
राजा लोग के पैसे उन्हें घर बैठे मिल जाया किएँगे

आधार से तुम काहे डरते हो
इससे हमें हमारे मुल्क में शरणार्थी
घोषित किए जाने का ख़दशा है
राजा लोग चूँकि राजा लोग होंगे
उन्हें हमेशा की तरह कोई दिक़्क़्त नहीं होगी

जीएसटी से तुम काहे डरते हो
इससे हमारे खाने की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ जाएँगी
राजा लोग की अय्याशी के सामान की क़ीमतें घट जाएँगी

फिर मुल्क का वित्त मंत्री इन सबको लागू करने के लिए
इतना हड़बड़ाया-घबराया हुआ क्यों है अनजाने मुसाफ़िर

वित्त मंत्री को पता है कि गाय की तीन तलाक़ की
मंदिर की मस्जिद की बेमक़सद बहसों के बीच
नोटबंदी को आधार को जीएसटी को लागू कर लेना ज़रूरी है
इससे पहले कि अवाम वित्त मंत्री की असली मंशा जानकर
सड़कों पर उतर आएँ उनकी सरकार के ख़िलाफ़

तुम और काहे से डरते हो अनजाने मुसाफ़िर
उन ख़तरनाक कवियों से जो बातें तो गांधी की करते हैं
लेकिन अपने ख़्वाब में गोडसे को पुकारा किए हैं

लेकिन यह तो जनम-जनम का क़िस्सा है मेरे अनजाने मुसाफ़िर

हाँ, यह जनम-जनम का क़िस्सा है हमारे बनाव-बिगाड़ का
इसलिए कि अब मुंसिफ़ के हाथ में ख़ंजर है बम-बारूद है
और अब मुल्क में क़ातिल को सज़ा नहीं देने का नया रिवाज है।

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मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
                 


मुझे अच्छी तरह से मालूम है
मेरा ठिकाना उनके निशाने पर है
जिस ठिकाने पर मैं उनके ख़िलाफ़ नज़्में
लिखता हूँ कमरे में आई धूप के साथ मिलकर

मैं उनके ख़िलाफ़ क्यों न लिक्खूँ नज़्में
जोकि मेरी छत पर का चाँद चुरा ले जाते हैं
घर के दरो-दीवार का रंग-रोगन नोच डालते हैं
कनस्तर में रखी चीज़ें बाहर फेंक आते हैं

उनके घोड़े ज़ख़्मी हो चुके हैं
मुझे कुचलने की चाहत में
उनके निगराँ थक चुके हैं
मुझे दबाने की उम्मीद में

मैं जो पहले से सताया जाता रहा हूँ
मैं जो पहले से दबा-कुचला रहा हूँ
मुझे उनकी गालियों का ख़ौफ़ कैसा

उनके हमले तो मेरे पुश्त-दर-पुश्त पर होते चले आए हैं
उनकी बेईमानियों में इज़ाफ़े भी होते रहे हैं मुसलसल

ये उनके ख़ुफ़िया फ़ैसले हैं ख़ुफ़िया एजेंडे भी
कि मैं सैर के लिए निकलूँ और मेरी क़लम उठा ली जाए
कि मैं सोने जाऊँ और मुझे समुंदर में बहा दिया जाए

उन्हें मालूम है अदालतें उन्हीं की हैं
मुंसिफ़ लोग उन्हीं के हैं
हर जल्लाद उनके ख़रीदे हुए ग़ुलाम हैं

उन्हें मालूम है मेरे जैसे आदमी का अग़वा करना
बेहद मुश्किल कामों में एक काम है
वे मेरा क़त्ल भी करवा नहीं सकते इस बदनामी के डर से
कि वे जब भी मारते हैं मरे हुओं को मारते हैं।

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संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, बिहार विधान परिषद, पटना-800015 / मोबाइल : 09835417537

प्रीत भैया से अवधेश प्रीत तक (संस्मरण): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रीत भैया से अवधेश प्रीत तक (संस्मरण): सुशील कुमार भारद्वाज





बचपन में घर के बड़े लोगों की ही तरह मुझे भी हिंदुस्तान (अखबार) का बेसब्री से इंतज़ार होता था क्योंकि उसमें बच्चों के लिए भी एक पन्ना रहता था. जिसमें कविता, कहानी, कार्टून और चुटकुले के अलावे उपर के कोने में “प्रीत भैया” का बच्चों के नाम सन्देश और सुझाव भरा पत्र होता था. जिससे प्रेरित हो कुछ–कुछ लिखने की इच्छा होने लगी.
2000 ई० में जब दसवीं की वार्षिक परीक्षा होने के बाद पिताजी की लायी हुई रामायण–महाभारत आधारित कई किताबों को पढ़ा तो मन में एक रचनात्मक विस्फोट हुआ और एक बड़ा-सा लेख लिखकर पैदल ही हिंदुस्तान के दफ्तर में पहुँच गया. उन दिनों हिंदुस्तान में एक पन्ना धर्म–आध्यात्म का आता था. दफ्तर में लोगों ने मुझे फीचर सेक्शन में भेज दिया. ग्राउंड फ्लोर में प्रिंटिंग प्रेस के दीवार से सटे हालनुमा बड़े कमरे के दरवाजे पर पहुंचा तो देखा कि सामने की कुर्सी में हाफ शर्ट और टोपी पहने साँवले रंग का एक दुबला–पतला आदमी अपने काम में लगा था. व्यस्त आदमी से कुछ पूछने की बजाय मैंने कमरे में बैठे अन्य लोगों के पास जाना ज्यादा मुनासिब समझा जो गप्प में लगे हुए थे. उन गप्पियों में से एक ने आलेख देखने के बाद दरवाजे के सामने कुर्सी में बैठे टोपी वाले आदमी की ओर ही इशारा करते हुए कहा कि- “अवधेश प्रीत” जी के पास चले जाओ वही यह सब देखते हैं.
प्रीत शब्द से मन में हलचल मच गई कि– ‘कहीं ये बच्चों के पेज वाले प्रीत भैया तो नहीं हैं? फिर लगा नहीं, वो तो बच्चों के प्रीत भैया थे, ये तो बड़ा आदमी है. उसमें भी इनका नाम अवधेश प्रीत है’.
यूं ही विचारों में खोया हुआ मैं अवधेश प्रीत जी के टेबल के पास पहुंचा तो वे मेरा लेख लेकर देखने लगे. फिर ऊपर से नीचे देखते हुए पूछे –“कहां से लिखे हो?” जबाब में –“जी, मैंने खुद से लिखा है. कुछ किताबें पढ़ीं हैं जिसमें मुझे कुछ बातें सामाजिक स्थिति से मेल खाती हुई नहीं दिखी, इसलिए विरोध स्वरूप मैंने अपनी बात कही है.”
-“आपकी उम्र इन गहरी बातों के लिए काफी छोटी है. इस पर बड़े-बड़े विद्वान लिखते हैं जो चीजों का खूब गहन अध्ययन करते हैं, तथ्यों को समझते हैं और तब लिखते हैं....... जैसे कि जो आदमी सिगरेट नहीं पीता है वह कैसे बता सकता है कि सिगरेट पीने में कैसे होंठ जलते हैं और कैसे अंगुली? बिना अनुभव के चीजों के तह तक नहीं पहुंचा जा सकता है. ठीक है. जाओ.” – उन्होंने अपनी बात रखी. मैं निराश हो वहाँ से वापस लौट गया.
उसके बाद जब मैं बोरिग रोड (पटना) कोचिंग पढ़ने जाने लगा तो “अमृतवर्षा” सांध्य दैनिक का कार्यालय दिखा जहां मैं अपनी कहानियां, आलेख और रपटें देने लगा. जिसमें मेरी पहली कहानी “रिश्ते” प्रकाशित हुई थी. धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया. फिर जब पटना से “दैनिक जागरण” का प्रकाशन शुरू हुआ तो वहां भी लिख-लिख कर डालने लगा. इन जगहों पर छपने के बाबजूद मन नहीं मान रहा था क्योंकि हिंदुस्तान मेरे लिए चुनौती बन चुका था. सो एक बार फिर हिंदुस्तान की ओर मुड़ा लेकिन इस बार अंदर जाने की बजाय बाहर में रखी पत्र-पेटी में ही डालकर चला आता था. जो कि सम्पादकीय पेज के निचले हिस्से में छपने वाले आपके पत्र में छपने लगा. साथ-ही-साथ अंग्रेजी में भी हिंदुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ इण्डिया के लिए लिखने लगा.
वर्ष 2004-05 में, हिंदुस्तान में साहित्य का पेज एक नये रूप में शुरू हुआ जिससे शहर के नये रचनाकारों को भी मौका मिला. वे अपनी कविता, कहानी आदि भेज सकते थे. काफी लोगों ने तो इसी रास्ते पत्रकारिता-जगत में भी अपनी पहचान बनाई और काफी आगे तक पहुंचे. मैंने भी अपनी कहानी “धर्म” छपने के लिए भेज दी. छपने के बाद मैं वर्षों बाद अवधेश प्रीत जी को धन्यवाद कहने के लिए दफ्तर के अंदर गया तो काफी कुछ बदल चुका था. ग्राउंड फ्लोर से हटकर फीचर सेक्शन एक बड़े-से हाल में पहले तले पर चला आया था. उन दिनों फीचर सेक्शन में दर्जन भर से अधिक लोग हमेशा प्रीत जी के निर्देशन में काम कर रहे थे. वे अक्सर नये लोगों को कुछ-ना-कुछ नया और अच्छा करने के लिए प्रेरित करते दिख जाते थे. सबसे अच्छी बात देखने को मिली कि प्रीत जी न सिर्फ साहित्य के पेज को देख रहे थे बल्कि सोमवार से शुक्रवार तक हर दिन करियर, महिला, आध्यात्म आदि विषयों पर निकलने फीचर पेज की पूरी जिम्मेवारी भी उन्हीं पर था जिसे वे सफलतापूर्वक सम्पादित कर रहे थे. उन दिनों प्रीत जी पटना विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कुछ कक्षाएं भी लेने लगे थे. खैर, मैं उनसे मिला और पुस्तक–समीक्षा, आलेख देते रहा और छपता रहा लेकिन कभी मैंने पुरानी मुलाकात का जिक्र नहीं किया. इसी तरह जब एक दिन मेरा एक आलेख पूरे फ्रंट पेज में आ गया तो मुझे अजीब सी खुशी और संतुष्टि मिली. लगा कि मैंने अपनी चुनौती पूरी कर ली. उदासीनता के कारण धीरे–धीरे मैं पत्र–पत्रिका से विमुख हो अध्यापन के काम में जुट गया. धीरे–धीरे कुछ वर्षों के लिए पटना से भी मैं बाहर चला गया.
जब अवधेश जी की कहानियों को हंस आदि पत्रिकाओं में पढ़ने लगा तो उनका कथाकार वाला रूप सामने आया. कहानियों में उनके विषय का चयन, शब्दों का प्रयोग और कहने की शैली ने मुझे बहुत प्रभावित किया. उनकी कहानियां इतनी मार्मिक लगीं कि एक बार मैं लाइब्रेरी में ही रो पड़ा. मुझे उस कहानी का नाम तो याद नहीं, लेकिन वो कहानी लोक कलाकार के बिखरते दाम्पत्य जीवन पर आधारित था.
अगली बार मैं हिंदुस्तान के दफ्तर में 2014 में “पगली का तौलिया” लघुकथा लेकर पहुंचा तो ऑफिस का नज़ारा बिल्कुल ही बदल चुका था. अवधेश प्रीत जी भी सहायक संपादक बन चुके थे. फीचर सेक्शन में लगा रहने वाला जमावड़ा कब और कैसे बिखर कर कहां चला गया पता नहीं. अब इत्मीनान से बैठकर चाय–काफी पीते हुए उनसे काफी कुछ खुलकर बातें होने लगीं. उनको और करीब से जानने का मौका मिला जैसे कि उन्होंने अपनी पढाई खत्म करने के बाद पटना एक रिश्तेदार के घर घूमने के लिए आए. और धीरे –धीरे खगौल (दानापुर) में रहते हुए नाटक, कला और साहित्य से जुड़ गए. पटना में इन्हें रोबिन शॉ पुष्प, विकास कुमार झा, और सुबोध गुप्ता जैसे साहित्य और कला प्रेमियों का साथ मिला. और जब पत्रकारिता में हाथ आजमाने की कोशिश की तो शुरुआत भी कला–संस्कृति से ही की. 1985 ई के आसपास ये पाटलिपुत्र टाइम्स से जुड़े और 1986 ई में जब पटना से हिंदुस्तान के प्रकाशन की शुरूआत हुई तो वे इससे जुड़े और फरवरी 2016 में अपनी 30 वर्षों की नियमित एवं समर्पित सेवा से मुक्त हो गए. लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आज की तारीक में भी उनसे कार्यालय के लोग दिशा–निर्देश लेते रहते हैं. उनके मिलनसार और खुशमिजाज रूप को जानने का मौका कथा-समारोह, लघुकथा-सम्मेलन और दूसरा शनिवार जैसे अन्य कार्यक्रम के बहाने मिला.
लघुकथा सम्मेलन की वह घटना मुझे अक्सर याद आ जाती है जिसमें अवधेश प्रीत जी का एक विनम्र व्यक्तित्व देखने को मिला. जब सभी आमंत्रित लघुकथाकारों ने अपने कथाओं का पाठ कर लिया तो उद्घोषक ने अवधेश प्रीत जी को उन पठित कथाओं पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया. और ज्योंहि  उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि लघुकथा का उन्हें विशेष ज्ञान नहीं है और वे अपने सीमित और व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर टिप्पणी करेंगें तो कुछ लेखक उग्र भाव से यह बोलते हुए बाहर जाने लगे कि – “जिस आदमी को लघुकथा का ज्ञान नहीं. समझ नहीं. उस व्यक्ति की बात क्या सुनना? पूरे आयोजन का कचरा हो गया.” लेकिन ज्योंहि ख्यातिप्राप्त लघुकथाकार सतीशराज पुष्करणा ने बीच में ही रोकते हुए कहा कि “ये अवधेश जी का बड़प्पन है कि ये खुद को लघुकथा से अनभिज्ञ बताते हैं. जबकि सच तो ये है कि स्थापित कथाकार होने से पहले इन्होंने ढ़ेरों लघुकथाएँ लिखीं हैं और जब कभी मौका मिलता है हमलोग अक्सर  बैठकर लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर बात करते हैं. इसलिए आप इनकी बातों को एक बार सुने.” इसके बाद जब प्रीत जी ने लघुकथा के विभिन्न कला और तकनीकी पक्षों पर बोलना शुरू किया तो पूरे हाल में सन्नाटा छा गया और अंत में उनके लिए सिर्फ ताली बजने लगी और सभी उनके प्रतिभा को सलाम करने लगे.
सबसे अजीब है कि प्रीत जी के सेवा-निवृति के बाद से मैं भी अब तक दुबारा हिंदुस्तान नहीं जा सका जबकि कुछ लघुकथाएं, पुस्तक–समीक्षा और कुछ साक्षात्कार प्रकाशित होते रहे हैं जिन्हें मैं अब मेल से ही भेज दिया करता हूं.

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रविवार, 21 मई 2017

दूसरा शनिवार पर नरेंद्र कुमार की रपट

दिनांक 20.05.2017 शनिवार, शाम 5 बजे। पटना में सीजन का सबसे गर्म दिन―तापमान 42.2℃ था। ऐसी गर्मियों में जब महा जनकवि बिना वातानुकूलित हॉल के किसी भी गोष्ठी का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते, हमलोग खुले वातावरण में गाँधी मैदान की गाँधी मूर्ति के पास कवि राकेश प्रियदर्शी को सुनने के लिए उपस्थित थे। संजय कुमार कुंदन, भावना शेखर, राजकिशोर राजन, प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, समीर परिमल, डॉ सुजीत वर्मा, रामनाथ शोधार्थी, हेमंत दास 'हिम', कुमार पंकजेश, शशांक, अमरनाथ झा एवं नरेन्द्र कुमार 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में सम्मिलित हुए। भावना शेखर की उपस्थिति गोष्ठी की उपलब्धि रही। कवि राकेश प्रियदर्शी ने 'पिता का चश्मा', 'एक युग का अवसान', 'नदी', 'कागज बिनता बच्चा', 'इतिहास' (मगही एवं हिंदी), 'जहाँ प्रेम तड़प रहा है', 'लोमड़ी', 'पालतू कुत्ता' (मगही एवं हिंदी), 'मुक्तिपथ', 'मछली', 'घास और बकरी', 'साँप', 'हर्ष-विषाद' एवं 'असफ़लता' शीर्षक वाली कविताएं सुनाई।


राकेश प्रियदर्शी को सुनना जीवन को सुनना था। कवि की सरलता एवं सहजता उनकी रचनाओं में पिरोई हुई थी, पर भाव एवं अर्थ में कई गूढ़ बातें उद्घाटित कर रही थीं। कविता-पाठ के उपरांत कुमार पंकजेश का कहना था कि कवि की रचनाएं सरल एवं सुगम हैं। इन्हें सुनने के लिए कोई माथा-पच्ची करने की जरूरत नहीं पड़ती। सुनने के उपरांत श्रोताओं के मन में अपना बिंब छोड़ जाती हैं। कविताओं में आम आदमी की तकलीफ है तथा कई कविताएं व्यंग्य शैली में लिखी गयी हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। हिम दास 'हिम' का मानना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं लोकभाषा में मुखर होती हैं। पालतू कुत्ता शीर्षक वाली कविता व्यंग्यात्मक शैली में बहुत असरदार है। वे रचनाओं में मुहावरों का प्रयोग करते हैं तो कई मुहावरे गढ़ भी लेते हैं। रामनाथ शोधार्थी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सभी कविताएं अच्छी लगीं। शब्दों का चयन एवं संयोजन बेहतरीन है तथा कविताएं अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।



संजय कुमार कुंदन ने दूसरा शनिवार का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राकेश प्रियदर्शी जैसे लो-प्रोफाइल कवि को एकल-पाठ के लिए चुनना सार्थक रहा। कवि जितने सीधे एवं सरल हैं, कविताएं भी वैसी ही दिख रहीं हैं पर असीम गहराई लिए हुए है। बिंबों का अद्भुत प्रयोग उनकी कविताओं में है। समीर परिमल कविता-पाठ से सन्तुष्ट दिख रहे थे। उनका कहना था कि सहज-सुबोध कविताएं प्रभावित कर गयीं। प्रत्यूष चन्द्र मिश्र ने कहा कि इतना सहज-सरल कवि आज के साहित्यिक समाज में हाशिये पर क्यों है जबकि कवि का दो संग्रह आ चुका है। कविताएं प्रचलित फॉर्मेट में रची गयी हैं तथा लयात्मकता इनकी विशेषता है। भावना शेखर ने दूसरा शनिवार में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की तथा कविताओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरल-सुबोध कविताएं समय के माकूल हैं तथा समाज की समस्याओं  को हौले-से छू जाती हैं। इन कविताओं में तपन है। सुजीत वर्मा ने "कविता जीवन की आलोचना होती है" उद्धृत करते हुए कहा कि राकेश जी की कविताएं सीधे मन में उतरती हैं।

नरेन्द्र कुमार ने कहा कि कवि की रचनाओं में दो तरह के भाव आये हैं। एक तरफ वे समय एवं समाज की विद्रूपता को अपने व्यंग्यात्मक लहजे में पुष्ट करते हैं, वहीं प्रेम या अन्य संबंधों पर रची कविताएं उनकी सहज एवं घनीभूत संवेदना को पूर्णता में व्यक्त करती हैं। जहाँ तक आलोचकों का ध्यान न जाने का प्रश्न है तो आज अधिकांश रचनाकारों के अपने आलोचक हैं तो आलोचकों के अपने रचनाकार। इसमें सीधे-साधे एवं इन छद्मों से अलग रचनाकारों को हाशिये पर डाल ही दिया जाता है। आलोचकों को रचनाओं में चमत्कार दिखाना होता है। शशांक ने कहा बांग्ला एवं तमिल साहित्य में रचनाकर पाठकों से सीधे जुड़ते हैं क्योंकि वे स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं। आज की कविताएं सीधे श्रोताओं तक पहुंची हैं। राजकिशोर राजन का कहना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं सहजता की साधना है और इसी कारण साहित्यिक समाज में अलक्षित रह गयी हैं।

चर्चा के उपरांत सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाएं सुनाईं। उसके बात चाय एवं बतकही का एक और दौर बिस्कोमान भवन के पास।

शनिवार, 20 मई 2017

इंतज़ार (कहानी) :सुशील कुमार भारद्वाज

इंतज़ार (कहानी)
                                    -सुशील कुमार भारद्वाज




“मैं क्यों किसी लड़की का इंतज़ार कर रहा हूँ? क्या है वो? अगर वो नज़र के सामने आ भी जाएगी, तो क्या फर्क पड़ जाएगा?” – इन सवालों को खुद से पूछकर ध्यान बटाना चाह रहा था|
पर मन था कि मानने को तैयार ही नहीं| बरबस नज़रें चारों ओर उसी को ढूंढें जा रही थी| चार – पांच बार कैम्पस में चक्कर लगा चुका| पर दिखी एक बार भी नहीं| फोन पर बोली थी कि तीन बजे तक रुके रहना मुश्किल है| इसलिए न चाहते हुए भी बारह बजे ही कॉलेज पहुँच गया| पर यह क्या? दोपहर का डेढ़ बज चुका| रास्ते पर नज़र गडाये इंतज़ार करता रहा| भूख लगी तो होटल में खाने बैठ गया, लेकिन नज़र रास्ते पर ही टिकी थी कि कहीं वह चली मत जाय|
मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि उसे देखने के लिए इतना उतावला क्यों हूँ? अगर मेरी इस बैचेनी पर किसी परिचित की नज़र पड़ जाएगी तो क्या जबाब दूँगा? कोई कुछ कहे या न कहे खुद सोचना चाहिए कि जो कर रहा हूँ – क्या वह ठीक है?
दोपहर की चिलचिलाती धूप में इंतज़ार करते करते खुद पर गुस्सा आने लगा| कैसा आवारा हूँ? जो पढाई छोड़ यहाँ उसके इंतज़ार में समय बर्बाद कर रहा हूँ? क्या जरुरी है कि वो मुझसे प्रेम करती भी होगी? हंसकर बोलना और मजाक करना तो उसकी आदत है| फोन पर वह कुछ कही नहीं – यही क्या कम है? मुझ जैसे से कोई दिल लगाने की बात कैसे कोई सोच सकती है? क्या है मेरे पास? 4 G के ज़माने में 2 G का साधारण – सा मोबाइल जो कि अपने नेटवर्क की ही तरह कभी – कभी आउट ऑफ सर्विस भी हो जाता है, जैसे आज| अभी मोबाइल ठीक होता तो कॉल नहीं भी करता, तो कम से कम फेसबुक से तो संपर्क कर ही सकता था? एक से बढ़ एक नए फैशनेबल माडल वाले बाइक के ज़माने में पुरानी स्कूटर चला रहा हूँ| किसी बड़े होटल में जाने की बात आ जाए तो बगलें झांकने लगूं|
उस दिन दफ्तर में बात बात मेंवो बोली – “आप अपने लिए एक लड़की खोज लीजिए|” उसने ये बात क्यों कही? आज तक ठीक से समझ नहीं पाया| पर अपने मुंहफट आदत के कारण कहा –“आप ही खोज दीजिए न! वर्ना मुझे तो मिलेगी ही नहीं|”
बोलने को तो बोल दिया पर मन ने कहा –“आप को छोड़ मैं किसे खोजने जाऊँ?”
खुद को हंसी का पात्र बना उससे रोज पूछने लगा –“कोई मिली क्या?” और वह रोज खोजने का बहाना बना टाल जाती थी| गोया रोज बातचीत शुरू करने का एक मंत्र मिल गया| एक दिन बोली –“कल आपको उसका नाम बताउंगी|” दिल में खुशी के गुब्बार फूटने लगे| बस इसी कल्पना में दिन बीत गया कि कल जब वो मुझसे अपने प्रेम का इजहार करेगी तो क्या होगा ? कैसे वो अपने झिझक को तोड़ कर पहली बार कहेगी? मैं क्या करूँगा? उसके हाथों को कसके थाम लूँगा? नहीं, बिल्कुल नहीं| थोडा मजा तो उसे भी जरुर चखाऊंगा| बहुत मुझे परेशान की| थोडा तो उसे जरूर तडपाउंगा| हाँ, इतना तो मुझे भी हक है| ...... अरे उसे तो किसी और लड़की का नाम बता कर जलाऊंगा भी| मैं कोई कम हूँ| बहुत नखरे दिखाई अब थोडा मुझे भी झेले|
अहले सुबह दफ्तर में काफी पहले ही पहुँच गया| थोडा माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करने लगा| कुछ भी नया नही था| वही टेबल, कुर्सी, कंप्यूटर, और ताजे समाचारों की झलक दिखलाती टेलीविजन | लोग भी तो वही थे| लेकिन पता नही क्योंकर तो सबकुछ नया नया लग रहा था| उसका इंतज़ार करता रहा| और जब आयी तो उसके पीछे ही पड़ गया| लेकिन ढलते दिन के साथ दिल बैठता ही चला गया| मेरे सारे सपने एक एक कर टूटते चले गए| वो किसी का नाम नही बतायी| समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ? फेसबुक से भी सवाल पूछ लेने की इच्छा हुई लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया? जब वो लिफ्ट में चढ गयी तो मन के वशीभूत हो बाबला की तरह उसके पीछे चला गया| और अपने दारुण स्वर में पूछ बैठा –“नाम बताने में कितना समय लीजिएगा?” और वो गर्दन हिलाते हुए बोली – “अभी मिली ही नहीं है|” होठों पर हलकी सी हंसी नाच गयी और दिल से आवाज आयी –“किसको इतना बड़ा बेबकूफ समझ रही हो| मैं तुम्हारे हामी के इंतज़ार में तड़प रहा हूँ और तुम हो कि .......” फिर मन को संयमित कर सख्त स्वर में बोला –“आप जाइये| कल मैं आपको उसका नाम बताऊंगा|” – शायद इसके सिवा कोई चारा भी न था| शायद उसे भी मेरे मुँह से हाँ सुनने का इंतज़ार था|
लेकिन अंदर से एक आवाज आयी – “खुद पर हंसना बुरा नहीं है, लेकिन किसी को अपनी भावनाओं से खेलने देना समझदारी का काम नहीं है|” फिर इन सारी बातों से दूर रह अपने काम पर ध्यान देना ही अच्छा लगा| अगली सुबह इन सब बातों से बेपरवाह हो मैं अपने कागजों में उलझा था| तभी पीछे से आकार मेरे हाथ से कलम छीन कर बोली –“क्या बात है? बहुत व्यस्त हैं?” उसके चेहरे पर नजर पड़ी तो उसकी भाव – भंगिमा देखकर मन अंदर तक गुदगुदा गया| इच्छा हुई कि कहूँ – “तडपाने के सिवा कुछ आता भी है या बस ......? लेकिन कहा कुछ नहीं| चुपचाप अपने काम में फिर लग गया|
“बहुत नाराज हैं क्या?” – कान से उसकी आवाज टकरायी| झटके से उसके चेहरे पर नज़र पड़ी और उसके आँखों में देखने लगा| मन में बुदबुदाने लगा – “तो क्या आपको मेरी भी चिंता है| यदि हाँ तो फिर क्यों नहीं खोल रहें हैं अपने दिल के दरवाजे? सिर्फ जले पर नमक छिडकने आयी है? कमाल पर कमाल किये जा रही हो| अपने मजनू से उसके लैला का नाम पूछ रही हो? आखिर क्यों?”
“आप बोल रहे थे कि आज आप अपने प्रेमिका का नाम बताएँगे| मैं कब से आपके मुँह से  उसका नाम सुनने को बैठी हूँ और आप हैं कि ....” उसकी पतली सी आवाज उसके होठों से निकली| जी में तो आया कि उसे तड़पने को छोड़ दूँ| लेकिन मुझसे संभव ही कहाँ था| खुद तो खुजली हो रही थी| और पता नहीं कहाँ से तो हिम्मत आ गयी? और मैंने एक कागज पर लिख दिया – “एन.आर”| देखते ही देखते उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्की-सी छाया दिख गयी – मतलब नंदिता रानी | परंतु जिसका मुझे डर था वही हुआ| वह तुरंत हंस कर नंदिनी और रजनी का नाम लेने लगी, जिसका कोई मतलब न था| फिर भी मैंने कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा| इंतज़ार करता रहा कि शायद कभी वह सीरियस होगी| लेकिन उसके लिए यह सब, शायद मजाक से ज्यादे कुछ था ही नहीं| हंसी मजाक का यह दौर कुछ और खींचता उससे पहले ही एक मीटिंग की खबर आ गयी|
यह मीटिंग नहीं एक वज्रपात था, जिसकी उम्मीद हममें से किसी को नहीं थी| महज पांच मिनट में हमलोग समझ गए कि तत्काल प्रभाव से कंपनी बंद हो रही है| जिस बड़ी कम्पनी ने इसे ख़रीदा है वे अपने अनुसार लोगों को काम पर रखेंगें| फिर तो सबके चेहरे का रंग ही उड़ गया| कोई नयी नौकरी की तलाश में जुट गया तो कोई फिर से आगे की पढाई करने कॉलेज की ओर चल पड़ा| जीवन में आगे बढते रहने के सिवाय कुछ है नहीं और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हमेशा कुछ न कुछ डिग्री या अनुभव हासिल कर सबसे अलग दिखने की कोशिश न की तो बेरोजगारों के लाइन में आ कर सरकार और सिस्टम को गाली देकर भरास निकालते रहिए| उससे मिलेगा तो कुछ नहीं बस अपनी जिंदगी को बर्बाद करते रहिए. खैर कुछ दिनों तक, लोग मोबाइल और फेसबुक से संपर्क में रहे, लेकिन धीरे – धीरे दूरी बढ़ता ही चला गया| फुर्सत नहीं है भैया| रोजी –रोटी है तो हँसी-मजाक, प्रेम सब अच्छा लगता है और लोग भी मिल जाते हैं वर्ना....  वैसे निठ्ठलों की जमात चाहिए तो बात अलग है|  
अरसे बाद यूँ ही एक बार उससे फेसबुक पर बात – बात में पूछ लिया – “मुझे क्योंकर कोई याद रखेगा?” झट से जबाब दी –“अपनों को भी कोई भूलता है क्या?” दिल को सुकून मिला| चलो कम से कम अपनेपन का एहसास तो है| फिर भी दिल के एक कोने में कुछ कचोटते रहता था| और एक बार यह सोचकर फोन किया कि अब बेबजह में उसे क्यों तंग करूँ? अंतिम बार साफ़ – साफ़ बता देता हूँ कि  -“मैं आपको पसंद करने लगा इसलिए बात कर लेता था| फिर न  कभी फोन करूँगा न ही दिखूंगा और न ही फेसबुक पर मैसेज करूँगा|” अंतिम बार मिलने के इरादे से हिम्मत कर मिलने की बात कहीं तो पटना कॉलेज में ही आ जाने की बात कही|
पर शायद वो मुझसे वास्तव में मिलना ही नहीं चाहती हो| फेसबुक पर प्यार के इजहार और और इंकार में वक्त ही कितना लगता है? शब्दों में थोड़ी सख्ती आयी नहीं कि कब आपका परवान चढ़ता प्रेम ब्लाक हो जाय कहा नहीं जा सकता| इसके चक्कर में कम लोगों ने जान गँवाई है जो इस पर विश्वास किया जाय? क्या पता? उसकी नज़र मुझ पर पड़ी हो और चुपके से घर चली गयी हो? या फिर आयी ही न हो? दिल में एक ही इच्छा बार – बार हो रही थी – काश! एक बार दिख जाती| दिल को मनाने की हर संभव कोशिश करता रहा| पर दिल उसे देखने को बेक़रार था| दिन के दो बज चुके| दरवाजे में तालें लटकने लगे| फिर भी आँख और पैर कॉलेज की ओर ही बढे जा रहे थे| मिलने की सारी उम्मीदें समाप्त हो रही थी| कंठ भर आया| आंसू निकलने को ही थे, तभी आंसू को पीछे धकेल मन से धिक्कार की एक लपट उठी– “कैसा बदनसीब हूँ कि किसी से मिलने के लिए इतना बेक़रार हूँ| और वो है कि दिख ही नहीं रही है| मन बार – बार ईश्वर से प्रार्थना करने लगा – “हे भगवान! आज तक मैंने यदि एक भी अच्छा काम किया है तो उससे मिलवा दे| मैं कुछ अनुचित तो नहीं मांग रहा? दूर से ही सही उसकी एक झलक दिखला दे|”
निराशा में भाषा भवन के कोरिडोर के पास वाली पायदान पर बैठकर क्रिकेट देखने लगा| लेकिन क्रिकेट का कोलाहल भी मन को अपनी ओर नहीं खीच पा रहा था| कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कौन आउट हुआ और किसने बौलर की छक्के –चौके से बखिया उधेड़ दी| अचानक एक विचार दिमाग में आते ही होठों पर थिरकन होने लगी| यही वह कॉरिडोर है जहाँ फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय ने अपने फिल्म “अभियान” की शूटिंग की थी| जहाँ मैं बैठा हूँ, यहीं कहीं पर नायक की मुलाकात नायिका से हुई थी| कितना विचित्र है न? फिल्म में नायक एवं नायिका की मुलाकात हो जाती है, लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता है|
 तभी एक आवाज ने ध्यान भंग किया| लगा किसी के सैंडिल के चलने की खट – खट की आवाज है, शायद पीछे से कोई गुजर रही थी| आवाज धीरे धीरे तेज होती जा रही थी, और उस आवाज के साथ बढती जा रही थी मेरी धडकन| खुद को रोक न सका तो पीछे मुड़ा, एक लड़की जा रही थी| लगा शायद नंदिता ही जा रही है| आवाज देना चाहा पर डर गया कि कहीं कोई दूसरी लड़की हुई तो बेमतलब का बबाल हो जाएगा| पर ज्यों – ज्यों वह आगे बढती जा रही थी त्यों – त्यों दिल भारी होता जा रहा था| ऐसा लगा जैसे कि नंदिता पास होकर भी दूर होती जा रही थी| यदि इसे रोका नहीं तो शायद बहुत देर हो जाएगी| खुद को बहुत जब्त करते हुए बोला – “हल्लो!”

पर वह लड़की मेरी आवाज से अनजानी आगे बढती रही| कोई उपाय नहीं सूझ रहा था| इच्छा हुई दौड कर उसे रोक लूँ लेकिन हाथ मलने और आँख भीचने के सिवा कुछ न कर पा   रहा था| हमेशा भागने को तैयार रहने वाले पैर हिलने को तैयार नहीं थे| अचानक मेरे मुँह से एक जोर की आवाज निकली – “नंदिता”| समझ में नहीं आया क्या हो गया? अंदर तक डर गया| इस बार वो लड़की रुक गयी, और अपने लंबे बालों को झटकते हुए पीछे मुड गई| मैं अवाक् रह गया, काटो तो खून नहीं| गुलाबी सलवार सूट में खुले बालों वाली वो लड़की कोई और नहीं नंदिता ही थी| वो सिर्फ मुस्कुराये जा रही थी| वह मेरे पास आ गयी| मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? मैं पागल की तरह उसे सिर्फ एक टक देखता रहा| उसके कहने पर फिर मैं वहीं पायदान पर उसके साथ बैठ गया, और वह इधर उधर के सवाल मुझसे पूछे जा रही थी| मैं उत्तर दिए जा रहा था लेकिन मेरी नज़रें उसके चेहरे पर जमी हुई थी| उसके चेहरे पर छाई खुशी को तलाशने की कोशिश करता रहा ताकि यह जान सकूँ कि दोनों तरफ एक ही भावना संचारित हो रही है या बस यूँ ही ..... | लेकिन मेरा ध्यान तभी भंग हुआ जब हाथ में किसी चीज के छुअन का एहसास हुआ| नंदिता मेरे हाथों को अपनी हथेली से कसने की कोशिश कर रही थी| थोड़ी देर के बाद एहसास हुआ कि लोगों की निगाहें हमलोगों पर जमनी शुरू हो गई| तो खुद को संभालते हुए वहां से हटने के इरादे से बोला – “आपको देर हो रही होगी चलिए, आपको आगे तक छोड़ आता हूँ| इधर – उधर देखने के बाद वह अपनी हाथ पीछे खीच ली, नज़रें नीची की ओर झुकी हुई थी| फिर हम लोग बाहर कि ओर चल पड़े| गप्प करते हुए लोगों के कारण अलग – अलग चलने की कोशिश कर रहे थे| लेकिन बार बार नजदीक आ ही जा रहे थे| चलते चलते मेरे मुँह से निकला- “आपके शादी की तैयारी चल रही होगी ना?” वह झटके से मेरी ओर देखने लगी| मैं थोडा डर गया| थोड़ी देर बाद वह कुछ बोले बगैर चुपचाप चलने लगी| ऑटो के आते ही वह उसमें मुस्कुराते हुए बैठकर चली गई और मैं उसे जाते हुए देखता रह गया कि उसके मुस्कुराहट में इजहार था या इंतज़ार करने का जबाब?