रविवार, 5 जून 2016

शिवमूर्ति की रचना 'कुच्ची का कानून' और मनु का विधान

शिवमूर्ति उन चंद वरिष्ठ कथाकारों में से एक हैं जिनकी रचनाएं साहित्य की दुनियां में आते ही हलचल मचा देती है, बहसों की एक लंबी श्रृखंला शुरू कर देती है. और यही हुआ इस बार भी जब शिवमूर्ति की नई लम्बी कहानी या लघु –उपन्यास “कुच्ची का कानूनअखिलेश के संपादन में निकलने वाली पत्रिका “तद्भव” के 32 वें अंक में प्रकाशित हुई. किसी ने इसकी मौलिकता पर सवाल किया तो किसी ने इसकी विश्वसनीयता पर. किसी ने हंगामे को ही साजिश करार दिया तो किसी ने कुछ और. जबकि शिवमूर्ति जी के सच्चाई के प्रति अपनी वफ़ादारी के दावे हैं. बहस की इसी कड़ी में पढ़ते हैं युवा साहित्यकार नरेंद्र कुमार के विचार को जिसने इसे एक अलग नजरिये से देखने की कोशिश की है, जो कि पत्रिका लहक के मई –जून 2016 में प्रकाशित भी है. साभार!
नरेंद्र कुमार


कुच्ची का कानून या मनु का विधान
शुरू में ही स्पष्ट कर दूं कि यह प्रसिद्ध कहानीकार शिवमूर्ति रचित लघु उपन्यास कुच्चीका कानूनकी तो आलोचना है ही समीक्षा।बस इसकी कथावस्तु में समाहित विचार एवं दर्शन को आज की प्रगतिशीलता एवं उत्तर आधुनिकता के मानक पर ठीक‌‌-ठीक रखकर देखना ही प्रमुख उद्देश्य है।मैंने इसके पूर्व शिवमूर्ति की कोई रचना नहीं पढी है, इस कारण उनके संबंध में कोई पूर्वाग्रह या विशेष लगाव नहीं है।
इस रचना का मुख्य उद्देश्य स्त्री की अस्मिता एवं अधिकार पर लगा प्रश्नचिह्न्हटाना है, जिसका पता कहानी के आरम्भ में ही चल जाता है।कहानी कुच्ची के कोख की जानकारी से ही आगे बढती है, जिसकी वैधता उसे साबित करनी है क्योंकि उसका पति बजरंगी दो वर्ष पूर्व ही जहरीली शराब के सेवन से मर चुका है।कुच्ची के सामने चुनौतियों का पहाङ खङा है।जाहिर है पुराणों एवं स्मृतियों द्वारा निर्धारित विवाह एवं अन्य संस्थाओं तथा रुढियों का भार अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में स्त्रियां ही उठाती रहीं हैं।उन्हें वस्तुमात्र बनाकर पुरुषों के भरोसे सारा जीवन गुजार देने का विधान इन्हीं स्मृतियों द्वारा बनाया गया है।प्राचीन काल से चली आ रही रुढियों को ढोने के लिये आज भी उन्हें समाज द्वारा बाध्य किया जाता है।तभी तो कुच्ची संघर्षशील होने के बावजूद कहती है---“मैं अपने कोख का उद्धार करना चाहती थी।बचपन से सुनती आ रही हूं कि कोख का उद्धार तभी होता है जब कोख फले।अपने जन्मेको दूध पीलाकर मैं माँ के दूध से उरिनहोना चाहती थी।
कुच्ची अपनी सुरक्षा एवं सास-ससुर की सेवा के खातिर अपने कोख में पल रहे बच्चे को जन्म देना चाहती है, पर इसमें कुछ कम बाधा नहीं है।पंचायत में बलई बाबा कुच्ची के कोख में पल रहे बच्चे को कानूनी वारिस मानने से इंकार कर देते हैं।वे कहते हैं‌‌--“नाजायज संतान को प्रापर्टी में धेला भी नहीं मिलेगा।इसके लिये वे पुराणों एवं स्मृतियों के कानून का सहारा लेते हैं।वे कहते हैं—“अरे मूरख, कानून रोज-रोज थोङे लिखा जाता है।विरासत का कानून याज्ञवल्क्य मुनि हजारों साल पहले लिख गये हैं।हजार साल पहले तो उसकी टीकायें लिखीं गयींमिताक्षरा, दायभाग, एकाध और।अपने यहाँ विज्ञानेश्वर की लिखी मिताक्षरा चलती है।बिहार में जीमूतवाहन की लिखी दायभाग।खैर, यह तेरी समझ में क्या आयेगा।इस गांव में ही किसी ने याज्ञवल्क्य मुनि का नाम नहीं सुना होगा।तब कोख पर अपने हक के संबंध में कुच्ची कहती है—“जब मेरे हाथ,पैर,आँख,कान पर मेरा हक है, इन पर मेरी मर्जी चलती है तो कोख पर किसका होगा, उस पर किसकी मर्जी चलेगी, इसे जाननेके लिये कौन-सा कानून पढने की जरूरत है।वह पलटकर पंचायत से ही पूछती है, “बात से कायल कर दीजिये या कायल हो जाइये।मेरी कोख पर मेरा हक है कि नहीं?”
यहाँ तक कहानी अपनी सही राह चलती है।इसके बाद खुद रचनाकार कुच्ची के सवाल का जवाब अपनी मौलिकता में खोज नहीं पाते हैं।लगताहै कि पंचायत की चुप्पी उनकी ही चुप्पी है।इस चुप्पी को कुच्ची ही तोङती है।
“----मेरे सवाल का जवाब आप सबके मन में है।आप देना नहीं चाहते।अब मैं दूसरा सवालपेश करती हूं।मेरे इस सवाल के पेट से ही चौधरी बाबा के सवाल का जवाब निकलेगा।मेरा सवाल है कि फसल पर पहला हक किसका है? खेत का कि बीज का? अगर पंच फैसला करते हैं कि फसल पर खेत का हक है तो पंच मुझसे बच्चे के पिता का नाम पूछने का हकदार नहीं बनते।अगर फैसला बीज के हक में होता है तो मैं बच्चे के पिता का नाम पेश कर दूंगी।
कुच्ची का यह सवाल लेखक का मौलिक सवाल नहीं है। इसके लिये वे मनुस्मृति की शरण में चले जाते हैं। अब कुच्ची के सवाल के में निहित मनु के विधानों की संगतता पर नजर डालते हैं जो मनुस्मृति के नवम्अध्याय से उद्धृत हैं।इस अध्याय में स्त्री-पुरूष के संबंधों एवं उत्तराधिकार के नियमों की व्याख्या की गयीं है।मनुस्मृति के नवम्अध्याय के 33वें श्लोक को देखते हैं जहाँ से यह सवाल शुरू होता है---
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान्
क्षेत्रबीजसमायोगात्संभवः सर्वदेहिनाम्।।३३।।
अर्थात्स्त्री खेतरूप और पुरुष बीजरूप होता है।खेत और बीज के संयोग से ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अब सवाल यह उठता है कि रचनाकार स्त्री की संवेदना को दरकिनार कर बीज और खेत का वह सिद्धांत क्यों चुनते हैं जो मनु द्वारा दिया गया है? क्या उनकी प्रगतिशीलता एवं मौलिकता इतनी कमजोर हो चली थी कि उन्हें मनुस्मृति का सहारा लेना पङा।...या फिर वे मनु के विधान को आज के आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज में भी तर्क-वितर्क द्वारा प्रासंगिक ठहराना चाहते हैं।अब कुच्ची के सवालों का जवाब देखिए।
लछिमन चौधरी कहते हैं---“मेरे विचार से तो बीज ही परधान है।खेत किसी का हो, जो बोया जायेगा, वही पैदा होगा।आम के बीज से आम।बबूल के बीज से बबूल।बोया बीज बबूल का, आम कहाँ से होय?”
अब मनुस्मृति के उस अंश को देखते हैं जिसपर लछिमन चौधरी का संवाद आश्रित है---
बीजस्यचैवयोन्याश्चबीजंउत्कृष्टंउच्यते।
सर्वभूतप्रसूतिर्हिबीजलक्षणलक्षिता।।३५।।
यादृशंतूप्यतेबीजंक्षेत्रेकालोपपादिते।
तादृग्रोहतितत्तस्मिन्बीजंस्वैर्व्यञ्जितंगुणैः।।३६।।
अर्थात् बीज और खेत में बीज प्रधान है,क्योंकि सभी जीवों की उत्पत्ति बीजों के लक्षणानुसार ही होती है।जिसप्रकार का बीज उचित समय पर खेत में बोया जाता है, उसके गुण जैसा ही पौधा खेत में उत्पन्न होता है।
इयंभूमिर्हिभूतानांशाश्वतीयोनिरुच्यते।
नचयोनिगुणान्कांश्चिद्बीजंपुष्यतिपुष्टिषु।।३७।।
भूमावप्येककेदारेकालोप्तानिकृषीवलैः।
नानारूपाणिजायन्तेबीजानीहस्वभावतः।।३८।।
अर्थात् यह भूमि सभी प्राणियों का शाश्वत् उत्पत्ति स्थान है, परंतु भूमि के गुण से बीज पुष्ट नहीं होता है|एक समय में एक ही खेत में किसान अनेक बीज बोते हैं, परंतु सभी बीजों से अपने-अपने स्वभावानुसार अनेक प्रकार के पौधे उत्पन्न होते हैं।
व्रीहयःशालयोमुद्गास्तिलामाषास्तथायवाः।
यथाबीजंप्ररोहन्तिलशुनानीक्षवस्तथा।।३९।।
अन्यदुप्तंजातंअन्यदित्येतन्नोपपद्यते।
उप्यतेयद्धियद्बीजंतत्तदेवप्ररोहति।।४०
अर्थात् धान, मूंग, तिल, उङद, यव, लहसुन और ईख---सभी अपने बीज के अनुसार ही उत्पन्न होते हैं।ऐसा कभी नहीं होता कि बोया कुछ हो और उत्पन्न कुछ हो जाये।जो बीज बोया जाता है वही उत्पन्न होता है।
रचनाकार लछिमन चौधरी का जवाब सुघरा से दिवाते हैं जो गाँव की एक विधवा ठकुराईन है।
----सवाल यह नहीं है कि बोने से क्या पैदा होगा।इसे तो पीछे बैठकर हँस रहा वह बग्गङ भी जानता है।फिर सुघरा बोलती है-----सवाल यह है कि फसल पर हक किसका होगा? एक आदमी अपने खेत में गेहूं बो रहा है।उसके बीज के कुछ दाने बगल के जौ के खेत में छिटक कर चले गये।फसल तैयार होने पर साफ पता चल रहा है कि गेहूं के पौधे बगल वाले के बीज से पैदा हुये हैं।तो क्या गेहूं के खेत वाला जौ के खेत में उगे गेहूं के उन पौधों पर अपना हक जता सकता है?
बिल्कुल नहीं।कई आवाजें आती हैं---जिसके खेत में पैदा होता है, वही काटता है।
अब सुघरा के संवाद की संगतता मनुस्मृति के साथ देखते हैं---
येऽक्षेत्रिणोबीजवन्तःपरक्षेत्रप्रवापिणः
तेवैसस्यस्यजातस्यनलभन्तेफलंक्वचित्।।४९।।
अर्थात् जिसके पास अपना खेत नहीं है, यदि वह दूसरों के खेत में बीज बोता है तो वे उस खेत में उत्पन्न हुए अनाज के हकदार नहीं होते हैं।
यदन्यगोषुवृषभोवत्सानांजनयेच्छतम्।
गोमिनांएवतेवत्सामोघंस्कन्दितंआर्षभम्।।५०।।
तथैवाक्षेत्रिणोबीजंपरक्षेत्रप्रवापिणः।
कुर्वन्तिक्षेत्रिणांअर्थंनबीजीलभतेफलम् ।।५१।।
अर्थात् यदि दूसरों की गायों से सांङ सौ बछङे भी पैदा करे तो भी वे बछङे गाय वालों के होते हैं।सांङ का यह वीर्यसंचन निष्फल होता है।उसी प्रकार बिना खेत वाले का बीज दूसरे के खेत में बोने पर निष्फल जाता है।बीज वाला फल नहीं पाता।
फलंत्वनभिसंधायक्षेत्रिणांबीजिनांतथा
प्रत्यक्षंक्षेत्रिणांअर्थोबीजाद्योनिर्गलीयसी।।५२।।
अर्थात् जहाँ पर खेत के मालिक और बीज बोने वालों में कोई बात निश्चित नहीं हुई हो तो फल खेत के मालिक का होता है क्योंकि बीज से श्रेष्ठ खेत है।
क्रियाभ्युपगमात्त्वेतद्बीजार्थंयत्प्रदीयते।
तस्येहभागिनौदृष्टौबीजीक्षेत्रिकएवच।५३।।
ओघवाताहृतंबीजंयस्यक्षेत्रेप्ररोहति।
क्षेत्रिकस्यैवतद्बीजंनवप्तालभतेफलम्।।५४।।
अर्थात् जिस व्यक्ति का खेत है, फल भी उसीका है।जिस व्यक्ति ने बीज डाला है, फल उसका नहीं माना जाता।जिस खेत की उपज के विषय में खेत और बीज के मालिक के बीच आपस में तय हो गया है, उस खेत के फल में दोनों लोग भागी होते हैं।जो बीज जल या वायु के प्रवाह में दूसरे खेत में गिर कर उत्पन्न होते हैं, उसके फल का भागी खेत वाला ही होता है कि बीज बोने वाला।
इस तरह हम देखते हैं कि मनु के विधान को जिस तरह प्रगतिशील विचारों में बदलने की जो साजिश की गयी है यह पाठकों के साथ धोखा ही नहीं है वरन रचानाकार के रचनाकर्म पर ही सवालिया निशान लगा देती है।अब मनु का वह विधान देखा जाय जो स्त्रियों को पशु की श्रेणी में रखती है।
एषधर्मोगवाश्वस्यदास्युष्ट्राजाविकस्यच।
विहंगमहिषीणांचविज्ञेयःप्रसवंप्रति।।५५।।
इसमें कहा गया है कि बीज एवं खेत संबंधी यही व्यवस्था गाय, घोङा, दासी, ऊंट, बकरी, भेङ, पक्षी और भैंस की संतति के लिये भी मानना चाहिये।
क्या हम स्त्रियों के लिये यही व्यवस्था चाहेंगे जो उन्हें पशु की श्रेणी में रखे।उनकी संवेदनाओं का क्या कोई मूल्य नहीं?यहाँ हम देखते हैं कि रचना अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गयी है।एक तरफ लेखक स्त्री कि अस्मिता एवं अधिकार के लिये संघर्ष मेंस्मृतियों और पुराणों को मृत मनते हुए स्त्रियों के संघर्ष को तार्किकता एवं आधुनिकता की कसौती पर कसना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ इस हेतु मनुस्मृतिके विधान को सामने लानेजैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।फिर अंत में वे स्मृतियों के विधान को झूठा एवं अप्रासंगिक ठहरानेका दिखावा भी करते हैं जिसका पता निम्न उद्धरण से चलता है---
बाजार से आयी महिलाओं के बीच से एक लङकी खङी होती है-----याज्ञवल्क्य कबके मर मरा गये लेकिन उनका बनाया फंदा अभी भी औरतों के गले में फंसा हुआ है।वक्त आ गया है कि मरे हुओं का कानून मरे हुओं के साथ दफन कर दिया जाये।ऐसा कानून बने जिससे हम भी जिंदा लोगों की तरह जिंदा रह सकें।
सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि नगरों एवं शहरों कि स्त्रियाँ गाँव की स्त्रियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील एवं आधुनिक होती हैं, पर रचनाकार उनके माध्यम से कोई आधुनिक कानून-व्यवस्था की व्याख्या नहीं करवाते हैं जबकि तीन-तीन औरत वकील पंचों की बराबरी में बैठती हैं।क्या उनका चुप रहना लेखक की चुप्पी की ओर ईशारा नहीं करता है? आँगनबाङी कार्यकर्ताओं, ग्राम सेविकाओं, स्वास्थ्य केंद्र की दाईयों, बैंक एवं ब्लॉक की कर्मचारियों और अध्यापकों की संख्या पंचायत में झुंड बनाकर बैठती हैं।परंतु ये सब बैठे-बैठे मोबाईल में फोटो खींचने के अलावा बहस में कोई योगदान नहीं दे पाती हैं।वे आम मध्यमवर्गीयलोगों की तरह मात्र नैतिक समर्थन दे पाती हैं, जबकि उनके साथ एक प्रशासनिक अधिकारी एडीओ पंचायत भी आयी है।आखिर रचनाकार क्या दिखाना चाहतेहैं?यही कि हमारे शहरों की आधुनिक एवं प्रगतिशील स्त्रियाँ केवल सेल्फी खींचने एवं तमाशा देखने के ही काबिल हैं।आजकल नगरों में आईवीएफ क्लिनिक, सरोगेसी, स्पर्म डोनर की चर्चा आम है।ऐसे आधुनिक समय में महिला मोर्चा की सदस्या मनोरमा कुच्ची द्वारा कोख के मुद्दे के सवाल पर कहती है---“दरअसल यह बहुत आगे का मुद्दा है, लेकिन गाँव में रहकर जब तुम्हारे जैसी औरत इसकी जरूरत महसूस कर रही है, इस मुद्दे को उठा रही है तो देरसबेर इसे वक्त की आवाज बनना होगा।जबकि बाजार की ही नर्स कुट्टी के बिना शादी एक बच्चा बनाने की बात लेखक इससे पहले कह चुके हैं जिसे वह गिफ्ट लेना कहती है।इसी तरह के और किस्से वह कुच्ची को बतलाती है।लगता है लेखक अपने ही पूर्वकथनों से तारतम्यता बना नहीं पाये हैं।
आखिर क्या कारण है कि वे आधुनिक शहरी समाज की महिलाओं को पिछङा दिखाते हैं जबकि गाँव की पिछङी महिला को संघर्षशील एवं जागरूक? चूंकि उनके पास कोख के अधिकार संबंधी कोई मौलिक तर्क नहीं है, जो आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज के जीवन-दर्शन के अनुकूल हो। इक्कीसवीं सदी में भी इसका समाधान वे मनुस्मृति में ही पाते हैं।वह मनुस्मृति जो पुरुषों के सामने स्त्रियों की संवेदना को कोई महत्व नहीं देती है बल्कि सारी जिंदगी उन्हें पुरुषों के नियंत्रण में जीने का विधान रचती है।मेरी समझ से कोख पर प्राथमिक क्या...संपूर्ण अधिकार स्त्री का ही है।उसकी संवेदना ही आखिरी तर्क है चाहे वह कोख विवाह नामक संस्था से अलग या बलात्कार का ही परिणाम क्यों न हो।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कुच्ची का कानून’‘मनु के विधानका ही आधुनिक रुपांतरण है क्योंकि इस रचना में मनु के विधान के आधार पर ही कुच्ची को कोख का अधिकार मिल पाता है।कुच्ची की संवेदना को दरकिनार कर याँत्रिक तर्क-वितर्क को लेखक महत्व देते हैं तथा इनके सहारे ही स्वयं को प्रगतिशील एवं नारीवादी दिखाने की कोशिश करते हैं।इस प्रसंग में गोदान की चर्चा न हो तो बात पूरी नहीं होगी।प्रेमचंद ने अपने उपन्यास में धनिया और सिलिया के संघर्ष को अधिक जीवंतता से दिखाया है।वे सीधे-सीधे सामंतवादियों एवं मनुवादियों से टकाराती हैं।सिलिया भी बिना विवाह किये बच्चे को जन्म देती है और धनिया उसे अपने घर में पनाह देती है।वे दोनों कभी भी झुकना पसंद नहीं करती हैं।प्रेमचंद अपनी रचना में पुराणों एवं स्मृतियों के विधानों द्वारा दलितों एवं स्त्रियों को अधिकार दिलाने की चेष्टा नहीं करते हैं।वे अपने तर्क मानवता एवं पात्रों की संवेदना में ढूंढते हैं।परंतु कुच्चीका कानूनमें उनकी परंपरा का पालन नहीं हुआ है।
अब आता हूं अपने इस आलेख की प्रासंगिकता पर...।अक्सर बहुत-से रचनाकारों की ऐसी रचनायें देखने को मिलती हैं जिनमें वे पाठकों की जागरूकता एवं बुद्धिमता को दरकिनार कर चालाकी दिखाने की कोशिश करते हैं।वे पाठकों की पठनीयता को ध्यान में नहीं रखते हैंऔर वे यही मात खा जाते हैं।अगर लेखक इस बात का ध्यान रखते तो कभी ऐसा आत्मघाती प्रयोग नहीं करते और न ही उनके रचनाकर्म पर सवालखङा होता।

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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

माया एंजेलो की कविता मणि मोहन मेहता के हिन्दी शब्दों में।

आज समाज में हर इंसान एक वस्तु अथवा उत्पाद बनता जा रहा है जिसका उपयोगिता तक ही महत्व है लेकिन स्त्रियां सदियों से उसी जीवन को जीती आ रही है। जहां उनकी इच्छाओं का दमन इस हद तक किया जाता है कि उनकी अंतर्आत्मा तक कराह उठती है। लेकिन उनमें कुछ ऐसी भी होती हैं जो अपने शिकारी अथवा पुरूष को कङी चुनौती प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। सच है कि ये उनके ह्रदय की चित्कार है जो एक संकल्प के रूप में आती है कि तुम मुझे कुचल डालो जितनी तुममें शक्ति है लेकिन मैं उठूंगी जरूर। जलो तुम जितना जल सकते हो, लेकिन मुझे अब तेरी परवाह नहीं। अब अपने तरीके से जिंदगी को आगे ले जाऊंगी। जबकि दूसरी कविता में दिखलाने की कोशिश की गई है कि औरतें किस तरह घर को संभालने में व्यस्त रहती है कि उनका खुद का अस्तित्व ही खतरे में पङ जाता है। जहां वह अपने सपनों और इच्छाओं को पूरा करने की चाह रखती हैं। जिंदगी के कुछ रोमांचकारी क्षणों को महसूस करना चाहती है। तीसरी कविता वे घर गए उस स्त्री की दारूण व्यथा है जिसके पास सबकुछ है, सबकी प्यारी और दुलारी है लेकिन उसके पास इज्जत नहीं है। दूसरी कविता में जिस तरह अपना कहने की चाह है लेकिन अपना है कुछ भी नहीं है वही दर्द यहां भी है। सारे गुण होने के बाबजूद वह महज एक बाजार की वस्तु ही है। औरतों के जिस दारूण स्थिति को कवयित्री ने बेहद खूबसूरती से रचा -बसा है उसकी आत्मा को आत्मसात करते हुए अनुवादक मणि जी से उसी खूबसूरती के साथ हमलोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिसके लिए वे विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं क्योंकि अनुवाद में सारी सीमाओं एवं मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए मूल रचना की गरिमानुसार कार्य करना बहुत ही श्रमसाध्य है। माया एंजेलो की कविताओं का मणि मोहन मेहता जी ने जिस तरह से अनुवाद किया है उसे आप स्वयं भी पढकर महसूस करें।
सुशील कुमार भारद्वाज


कवयित्री का परिचय : 4 अप्रैल , सन 1928 को सेन्ट लुइस में जन्मीं माया एंजेलो अमेरिका की सर्वाधिक चर्चित कवियत्री और रचनाकार हैं । वे एक अफ्रीकन अमेरिकन लेखिका के रूप में जानी जाती हैं , उन्होंने नस्लवाद और रंगभेद के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद की है । वे अपनी सात आत्मकथाओं seven autobiographies के लिए प्रसिद्ध हैं । इसके अलावा उनके हिस्से में पांच निबन्ध संग्रह , अनेक कविता संग्रह , नाटक तथा फिल्म और टेलिविजन शो हैं ।

🕵अनुवादक का परिचय – 2 मई 1967 को जन्मे मणि मोहन अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर व डॉक्टरेट हैं । उनके कविता संग्रह ' कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ ' पर उन्हें वागीश्वरी पुरस्कार मिला है । एक और कविता संग्रह ‘ शायद ‘ प्रकाशित है इसके अलावा  " भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास " , " आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता " तथा " सुर्ख़ सवेरा " आलोचना पुस्तकों का संपादन उन्होंने किया है । रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए ' भी प्रकाशित है ।

🚹मैं फिर उठती हूँ🚹
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तुम दर्ज कर सकते हो मुझे इतिहास में
अपने कड़वे और विद्रूप झूठ के साथ
कुचल सकते हो मुझे
इसी गन्दगी में
परन्तु फिर भी, धूल की तरह , मैं उठूंगी ।

क्या तुम मेरे अक्खड़पन से परेशान हो ?
तुम इतने निराश क्यों हो ?
क्या इसलिए कि मैं चलती हूँ इस तरह
मानों तेल के कुँए हों
मेरी बैठक में ।

चन्द्रमाओं और सूर्यों की तरह
ज्वार भाटों की निश्चितता के साथ
ऊपर उठती उम्मीद की तरह
मैं फिर उठूंगी ।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे ?
झुका हुआ सिर और झुकी नज़रें ?
नीचे गिरे कन्धे , आंसुओं की तरह ...
अपने रुदन में कमजोर ।

क्या मेरी हेकड़ी से तुम्हे चोट पहुंचती है ?
क्या बहुत बुरा लगता है ?
क्योंकि मैं हंसती हूँ जैसे मेरे पास
सोने की खदाने हों
घर के पिछवाड़े ।

अपने शब्दों से तुम मुझे शूट कर सकते हो
काट सकते हो अपनी नज़रों से
मार सकते हो मुझे अपनी घृणा से
पर फिर भी , हवा की तरह
मैं उठूंगी ।

क्या मेरा कामाकर्षण तुम्हे विचलित करता है?
क्या यह एक विस्मय की तरह
तुम्हारे सामने आता है
कि मैं नृत्य करती हूँ
जैसे मेरे पास हीरे हैं
जहां मिलती हैं मेरी दोनों जांघे ?

इतिहास की शर्म वाली झोंपड़ियों से बाहर निकलकर
मैं उठती हूँ
उस अतीत से ऊपर
जिसकी जड़ें दर्द से वाबस्ता हैं
मैं उठती हूँ ...
मैं एक काला समुद्र हूँ
उछलता - कूदता
बहता - उफनता
अपने भीतर लहरों को समाये ।

भय और आतंक की रातों को पीछे छोड़ते हुए
मैं उठती हूँ
लाती हूँ
वे तमाम तोहफे जो मेरे पूर्वजों ने दिए थे
मैं एक स्वप्न हूँ
और एक उम्मीद गुलामों की
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ ।

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🚺काम करती स्त्री🚺

मुझे बच्चों की देखभाल करनी है
कपड़े सिलना है
पोंछा लगाना है
बाजार से सामान लाना है
फिर चिकन फ्राई करना है
पोंछना है बच्चे का गीला बदन
पूरे कुनबे को खाना खिलाना है
बगीचे से खरपतवार हटाना है
कमीजों पर इस्त्री करनी है
कनस्तर काटना है
साफ करना है यह झोंपड़ी
बीमार लोगों की देखभाल करनी है
और कपास चुनना है ।

धुप , बिखर जाओ मुझ पर
बारिश, बरस जाओ मुझ पर
ओस की बूंदों , धीरे-धीरे गिरो मुझ पर
ठंडा करो मेरे माथे को ।

तूफ़ान , उड़ा ले चलो मुझे यहाँ से
अपनी प्रचंड हवा के साथ
तैरने दो मुझे आकाश में
जब तक पूरा न हो मेरा विश्राम ।

हिम-कण , धीरे-धीरे गिरो
छा जाओ मुझ पर
भर दो मुझे सफेद शीतल चुम्बनों से
और आराम करने दो मुझे
आज की रात ।

सूर्य , बारिश , सर्पिल आकाश
पहाड़ , समुद्र , पत्तियों और पत्थर
तारों की चमक , चंद्रमा की आभा
सिर्फ तुम हो
जिन्हें मैं अपना कह सकती हूँ ।

🚺वे घर गए 🚺
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वे घर गए और अपनी पत्नियों से कहा
कि अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक बार भी
मेरे जैसी लड़की नहीं देखी
फिर भी ...वे अपने घर गए .

उन्होंने कहा के मेरा घर चमचमा रहा था
जो कुछ कहा मैंने उसमे एक भी शब्द भद्दा नहीं था
एक रहस्य था मेरे व्यक्तित्व में
फिर भी... वे अपने घर गए .

मेरी तारीफ सभी पुरुषों के लबों पर थी
उन्हें मेरी मुस्कान , मेरी हाजिरजवाबी
मेरे नितम्ब पसंद थे
उन्होंने रात गुजारी - एक , दो या फिर तीन
फिर भी ...............


✳माया एंजेलो✳

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन  
सुशील कुमार भारद्वाज
लघुकथा पाठ सत्र में मंचासीन ख्याति प्राप्त साहित्यकार


भागदौड़ भरी जिन्दगीं में जब लोगों के पास अपने निजी काम के लिए समय का अभाव होता जा रहा है तब लंबी –लंबी कहानियों एवं उपन्यास रूपी प्रचलित साहित्यों से उनका दूर होते चला जाना लाजिमी ही लगता है. लेकिन लघुकथा एक ऐसी विधा है जो राह चलते और फेसबुक एवं व्हाट्सअप्प के माध्यम से भी सामान्य जनों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल है. लघुकथा ऐसी विधा है जिनमें शक्ति है कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक एवं हास्य –व्यंग्य के साथ धीर –गंभीर बातों को भी  कह गुजरने की. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस फटाफट जिंदगी में आसानी से लोगों के बीच पैठ बनाती यह लघुकथा अभी भी अपने यथोचित सम्मान से दूर है. जो कहीं ना कहीं झलक ही जाता है.
जी हां, 17 अप्रैल 2016 को जब पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर के एमपीसीसी सभागार में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के तत्वावधान में आयोजित 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन के दूसरे सत्र (आलेख पाठ सत्र) में लघुकथा के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी, तब न सिर्फ इस पर चर्चा हुई कि लघुकथा क्या है? इसके आवश्यक तत्व क्या हैं? वर्तमान में इसकी स्थिति क्या है? और इसके लिए भविष्य में क्या संभावनाएं हैं? बल्कि इस पर भी चर्च हुई कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए क्या किया जाय? और जब विभिन्न कलाओं के लिए सम्मान सरकारों द्वारा ससमय दिया जा रहा है तो लघुकथा ही उपेक्षित क्यों रहें?


जबकि उद्घाटन सत्र में बिहार के कला संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम ने अपनी बातों को रखते हुए कहा कि जब शहर में जब नाटक, नृत्य के केंद्र बने हैं तो साहित्य के केंद्र क्यों नहीं बनेगें? जबकि मंच पर ही आसीन विधान पार्षद श्री नवल किशोर यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि मंत्रीजी साहित्य भवन बनाने की बात करते हैं और राजधानी में पहले से बने हिन्दी भवन पर दूसरे लोगों का कब्ज़ा ऐसा है कि साहित्यकार वहां घुस भी नहीं सकते.
इन राजनीतिक बयानों से इतर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के अध्यक्ष सतीशराज पुष्करणा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जल्द ही दिशा प्रकाशन की ओर से लघुकथा कोश प्रकाशित होने जा रहा है. साथ ही साथ उन्होंने लघुकथा के इतिहास लिखने की योजना की भी जानकारी दी. बंगलुरू से आई व्ही ललिताम्बा ने कहानी के बढ़ते दायरे की बात कहीं, तो मेजर बलबीर सिंह भसीन ने सलाह देते हुए कहा कि लघुकथा में दर्द भी उभरे और अनुशासन भी बना रहे. जबकि रामदेव प्रसाद ने लघुकथा में संवेदनशीलता, संक्षिप्तता और समाज सापेक्ष मूल्यों पर बल देने की बात कही. नागपुर से आए डा मिथिलेश अवस्थी ने भाषा के साथ साथ लघुकथा में शब्द सीमा और अनुशासन पर ध्यान देने की बात कही. जबकि नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने लघुकथा में पुनार्चनावाद की सम्भावना पर अपनी बातों को रखा.



तीसरे सत्र में जहां तकनीकी सत्र में रखी गई बातों पर ही डा शंकर प्रसाद, कांता रॉय, पुष्पा जमुआर समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विविध विचार रखे वहीं चौथे सत्र में जीवन के विविध क्षेत्रों के पृष्ठभूमि में रची गई 34 लघुकथाओं का पाठ किया गया. इन लघुकथाकारों में न सिर्फ सतीशराज पुष्करणा, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, सिद्धेश्वर, ध्रुव कुमार, मिथिलेश अवस्थी, पुष्पा जमुआर, सुशील कुमार भारद्वाज, अनीता राकेश, देवेन्द्र नाथ साह,  कांता रॉय, रेखा रश्मि, पूनम आनंद, मेहता नागेन्द्र, आलोक भारती भगवान सिंह भास्कर आदि शामिल रहे बल्कि किलकारी के प्रियांतरा भारती और प्रवीण कुमार समेत अन्य भी रहे. और इन लघुकथा पाठों पर अपने समीक्षात्मक वक्तव्य दिए प्रतिष्ठित साहित्यकार नागेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश प्रीत, एवं संतोष कुमार ने.
सम्मलेन में जहां फूलों की माला के बदले, फलों की टोकरी देकर अतिथियों का स्वागत किया गया, वहीं देश के विभिन्न राज्यों से आए अथिति लघुकथाकार डा सच्चिदानंद सिंह साथी, डा मिथिलेश अवस्थी, डा शरद नारायण खरे, मिथिलेश कुमारी मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा देवेन्द्र नाथ साह, पुष्पा जमुआर, तथा आलोक भारती को लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया, जबकि राघवेन्द्र कुमार कौशल को लघुकथा सम्भावना सम्मान से सम्मानित किया गया. किलकारी के प्रियांतरा भारती एवं प्रवीण कुमारत को लघुकथा अंकुर सम्मान दिया गया.
सम्मलेन में सन्नाटा बोल उठा (डा मिथिलेश कुमारी मिश्र), आस पास कि बातें (डा पुष्प जमुआर), वृक्ष ने कहा (डा मेहता नागेन्द्र), परदेस का पंछी (बीरेंद्र कुमार भारद्वाज), बंद मुट्ठी में सूरज (आलोक भारती), और साहित्य प्रहरी (लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका –भगवान सिंह भास्कर) का लोकार्पण भी किया गया. और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समारोह का समापन हो गया .

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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सनातन धर्म संकट के दौर में (आलेख)

शर्म आनी चाहिए उनलोगों को जो सनातन धर्म में जन्म लेकर भी कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर खुद को बर्बाद करने में दिन रात लगे हुए हैं। एक विशाल परिवार में सबों को एक समान ही प्रेम मिल जाए कोई जरूरी नहीं। यह एक सामान्य व मानवीय चुक है जो हमारे दैनिक जीवन में अक्सर दिख जाते हैं। इस सनातन धर्म में समय के साथ परिवर्तन हुए, फिर भी कुछ व्यवहारिक बाह्य आडंबर शेष है जो कि हमारे शिक्षित एवं जागरूक बंधुओं के प्रयास से दूर किया जा रहा है। मैं स्वयं कर्मकांडो का विरोधी हूं और सर्वधर्म समभाव की भावना से जीवन व्यतीत करता हूं लेकिन जिस प्रकार से इस धर्म पर हाल के महीने में हमला हुआ है, उससे व्यथित हूं। ऐसा जान पङता है कि सनातन धर्म संकट में है। भारत जैसे देश में ही जब यह अपनों के द्वारा ही अपमानित किया जा रहा है तो शेष की क्या बात की जाए? क्या यह इसकी उदारता नहीं है कि अनेक धर्म इसी से अलग हुए हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि आज मौजूद कुछ धर्म हाल के वर्षों की उपज है जिसमें कट्टरता इससे कहीं अधिक और कूट कूट कर भरी है? आप किसी भी धर्म को अपना लें लेकिन कोई भी धर्म आपको मुफ्त की रोटी नहीं दे सकता। आपके दुख दर्द का आपके धर्म से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आपको सिर्फ एक रास्ता दिखलाता है। संस्कार सिखलाता है। आप आस्तिक की बजाय नास्तिक ही हो जाऐंगें तो कौन आपका क्या बिगाङ लेगा? सामान्य जीवन में धर्म पर बहुत चर्चा करने की भी तो कोई बजह नहीं? फिर आप क्यों पुरानी बातों व ग्रंथों की बातों में उलझते हैं? ग्रंथ व्यक्ति विशेष द्वारा लिखी गई है जहाँ साहित्यिक सुविधा के अनुसार छूट लेने से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर आज के शिक्षित समाज में इन पोंगा पंथियों की सुनता ही कौन है? आपके धर्म परिवर्तित कर लेने से देश समाज का कुछ घट जाएगा ऐसा भी कुछ नहीं है लेकिन कहा जाता है न कि जो तुम्हें बदल कर प्यार करे वह प्यार नहीं। बस इतना ही कहूंगा विद्वान बनना गुनाह नहीं लेकिन बहकावे में आकर खुद का घर जला लेना जरूर अपराध है। अभी जो अपराध आप खुशी खुशी कर रहे हैं कहीं उसके विनाश होने पर कहीं पछताना न पङे। वैश्वीकरण के इस दौर में कब कौन कैसी राजनीति कर जाए कहना मुश्किल है।