रविवार, 27 जनवरी 2019

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" (आलेख)- सुशील कुमार भारद्वाज


     अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां"
-    सुशील कुमार भारद्वाज



गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वो पुरूषों के खिलाफ नहीं हैं। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जों देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।
गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकर उसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे लोकसंस्कृति में बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता और मानवता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है। और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही खुद से ही लिख कर मुस्कुरा रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर गर्वान्वित हो रहे हैं।
प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और सभी समस्याओं से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र है, शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर मुक्ति की आस में अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय, माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके, करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से अपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?
दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं है। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई गुलिया के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?
मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके जमीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।
ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं, लिखित दस्तावेज सुरक्षित करने लगे हैं स्वार्थ अब लोकजीवन में इस हद तक धंस गया है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये दिखलाने की कोशिश की गई है।
गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसक कोशिश की है कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और वह स्पष्ट करती हैं कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक शेष रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो, क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।
लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक सामंती बंधनों के टूटने की वजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बाबजूद अपनी-अपनी दुनियां में अलमस्त हैंऔर उसी में वे अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर जब इस भयावह माहौल में जीवन ही मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।
संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से ही अपने पास रखता हो, या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गए। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी? फिर किसकी इच्छा पूरी हुई? रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की ही कशमकश में एक दूसरे को बेआबरू कर रहे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज की नजर में और ऊपर उठ जाती यदि जो सम्पूर्ण आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती। अस्पताल आदि के कुछ खर्च अपनी तरफ से देने की पेशकश करती, यदि जो खुद से माँ की सेवा कभी नहीं कर सकी लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में जा गिरी। और यदि जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हंकपड़वा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बो रहे थे जो इंसानियत और मानवता को शर्मसार किए जा रही थी

हालांकि इस कहानी में स्त्री-पुरुष पात्रों के विविध रूपों को भी निरूपित करने की कोशिश की गई है पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली गुलिया भी माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं
पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि  यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं आपसी फूट देखते हैं कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं, जमीन के कागजात को फाड़कर फ़ेंक देते हैं, तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा हां, मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है यदि जो वह, यह काम अपने जीते जी करतीं, तो कहीं ज्यादा सार्थक होता
इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को लोकरंग भरे इस कहानी में प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल ही नहीं है बल्कि पाठकीयता को भी सरल और सहज बनाती है शेष कहानी की शिल्पविधा न्यायसंगत है और संभवतः लेखिका अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में भी काफी हद तक सफल रही है



मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अनश्वर तोहफा : सुशील कुमार भारद्वाज (कहानी)

अनश्वर तोहफा
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चित्र साभार

गंगा किनारे बसे पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन का यह वही गलियारा है। जिसके सामने छात्रावास है तो गलियारे के दक्षिणी भाग में पटना वाणिज्य कॉलेज और निर्मल कलकल करती बहती गंगा की धारा। और उत्तर में खुला पूरा क्रिकेट मैदान और सामने से कॉलेज के मुख्य द्वार से झाँकता अशोक राजपथ। गलियारा का यह हिस्सा प्रशासनिक भवन की दीवार से सटी होने की वजह से इतनी शांत और उपेक्षित है या सुरक्षित पनाहगाह कह नहीं सकता। लेकिन जब कोई जल्दी मेंं होता या स्टैंड में साईकिल लगाने की फुर्सत नहीं होती। या यूँ ही नयन मटका करने कोई कॉलेज में आ जाता तो इसी गलियारे की दीवार के सहारे साईकिल छोड़ जाता है।
खैर, याद दिलाता चलूँ कि इस प्रशासनिक भवन को डचों ने बनवाना शुरू किया था अफीम के गोदाम के रूप में। गंगा के किनारे होने से परिवहन की सुविधा को देखते हुए लेकिन बदलते कालचक्र में डच भी पटना समेत भारत छोड़ कर चले गए और ये अफीम का गोदाम भी शिक्षा का ऐसा केंद्र बना कि पूरब का ऑक्सफोर्ड कहलाने लगा। सत्यजीत राय जैसे दिग्गज फिल्मकार ने भी अपने एक फिल्म की शूटिंग यहीं की।
लेकिन अफसोस कि इस प्रांगण में कोई ऐतिहासिक प्रेम कहानी उस तरह की नहीं बन पाई। समाज कहें या संस्कार! - किसी ने प्यार को उन्मुक्त होने ही नहीं दिया। नयन मिल गए। होठों पर हँसी लहर गई और प्यार हो गया। हिम्मत वाले निकले तो चिट्ठी की अदला-बदली कर ली और बहुत हुआ तो गंगा घाट पर बैठकर एक-दूसरे को निहार लिए। गंगा के जल में पैर डालकर थोड़ी देर तक अजीब और अनजान अनुभव को महसूसते रहे और यादगार पलों को ताजन्म गुनते रहे।
अफसोस कि अब वो गंगा भी कॉलेज घाट से दूर चली गई है। सुशासन बाबू ने मैरिन ड्राइव के नाम पर कोई तैंतीस सौ करोड़ रुपये का कोई प्रोजेक्ट तैयार करवाया है। घाटों की खूबसूरती भी बढ़ गई है। लेकिन अब घाट ही घाट ना रहे तो उस घाट में अब प्रेम की बात कौन पूछे?
प्रेम का फूल खिलने से पहले ही मुरझाने लगा था। एक तो परिवार से मिला संस्कार जो अपने गिरफ्त से आजाद करने को तैयार नहीं। और दूसरा कि कॉलेज छोड़कर कहीं और मिल नहीं सकते थे। और तीसरा ईकबाल हॉस्टल का वह खौफ, जहाँ प्रेमी जोड़े पर किसी की नजर गई नहीं कि तमाशा शुरू।
इन सब बातों को ध्यान में रखने के बाबजूद हमने तय किया था कि हमलोग कॉलेज के आखिरी दिन अंतिम बार मिलेंगें जरूर। हमलोग कॉलेज को अंतिम साल में अलविदा कह रहे थे अनजाने भविष्य की राहों पर चलने के लिए। उन राहों में एक राह दिल का भी था। सोफिया को एक तोहफा देना चाहता था अपनी इस आखिरी मुलाकात मेंं। चाहता था कि वो मुझे इस तोहफे के जरिए ही शायद कुछ अधिक दिन तक याद रख सके। लेकिन मैं अंत अंत तक फैसला नहीं कर पाया कि मैं उसे गिफ्ट में क्या दूँ?
 दिन चढ़ते जा रहे थे और भावनाएं उफान मार रही थी। फिर भी अपनी साईकिल पर सवार होकर कॉलेज की ओर निकल गया रास्ते में कुछ -न-कुछ गिफ्ट खरीदने के इरादे के साथ।
अजीब संयोग रहा कि पटना मार्केट के जिस गिफ्ट कार्नर पर मैं पहुंचा उसी जगह पर वह भी उसी समय आ गई। मैं सोच में पड़ गया कि आखिर अब इसके लिए सामने में ही कौन-सा गिफ्ट लूँ और क्या मोलजोल करूँ? और जो सामने में ही पैक करवाया गिफ्ट तो क्या मतलब रह जाएगा उसका? और क्या शेष रह जाएगा रोमांच!
बस बातचीत का सिलसिला शुरू कर मैं उसके साथ पैदल ही साईकिल को लुढ़काते हुए कॉलेज की तरफ बढ़ गया। रास्ते मेंं जूस की दुकान पर हमदोनों ने जूस पी और जबतक मैं पर्स से पैसे निकालता वो दुकानदार को रूपये दे चुकी थी। मैं हारी हुई मुस्कुराहट के साथ पर्स को वापस पॉकेट में रखकर उसके साथ फिर चल पड़ा।
सीधे पटना कॉलेज के घाट पर कुछ समय बिताने के बाद हमलोग लौटने लगे। मन में भावनाएं भरी हुई थीं लेकिन शब्द बेकार और बेवश हो गए थे। पैर वापसी में इतने भारी हो गए थे कि प्रशासनिक भवन के गलियारे के उपेक्षित हिस्से में ही अपनी साईकिल खड़ी कर दी। और मैं सिर्फ उसका चेहरा देखता रहा। थोड़ी देर में वो बोली- "क्या देख रहे हैं? कुछ बोलोंगें नहीं?"
-"मैं क्या बोलूँ? .... एक इच्छा थी कि तुम्हें एक यादगार तोहफा दूँ जो तुम्हें  हमेशा मेरी दिलाए लेकिन अफसोस कि..... "
वो मुस्कुराते हुए मेरे करीब आई और आँखों मेंं आँखें डालकर बोली - "तो जनाब को कोई यादगार तोहफा नहीं मिला हूँह! ....." मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही वो अपने दोनों हाथ मेरे गर्दन की ओर बढ़ा दी। मैं ठीक-ठीक कुछ समझ पाता उससे पहले ही हमलोग एक चुम्बन की मुद्रा में जमा हो गए थे। उस समय कुछ भी याद न रहा। न संस्कार, न आसपड़ोस का शरम और न ही ईकबाल हॉस्टल का डर। याद रहा तो सिर्फ एक यादगार तोहफा था। विदाई का तोहफा था। एक ऐसा तोहफा तो अनश्वर था। जो हमदोनों ही ले और दे रहे थे। कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहने के बाद वो धीरे से मुझसे अलग हुई। एक अजीब खुशी और संतुष्टि दोनों के चेहरे पर तैर रही थी।
वो आगे बढ़ने लगी तो मैंनें भी अपनी साईकिल उठाई और उसके साथ चहल-कदमी करते हुए कॉलेज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। अशोक राजपथ पर पहुँचते ही गाड़ियों के चें-पों के बीच वो एक ऑटो में बैठकर पूरब की ओर चली गई और मैं मुस्कुराता हुआ साईकिल पर बैठ पश्चिम दिशा में अशोक राजपथ के भीड़ का हिस्सा बन गया।
सुशील कुमार भारद्वाज