शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट):सुशील कुमार भारद्वाज


वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध (रपट)

सुशील कुमार भारद्वाज


डॉ० चतुर्भुज की स्मृति में आयोजित 9वीं अखिल भारतीय ऐतिहासिक नाट्य महोत्सव 2018 के चौथे दिन 20  फरवरी 2018 को अभियान सांस्कृतिक मंच के दल ने बृजेश द्वारा लिखित और राजू कुमार द्वारा निर्देशित नाटक शम्बूक वध का मंचन किया.


नाटक अपने सारगर्भित कथ्य और कलाकारों के दमदार अभिनय से दर्शकों को लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादे समय तक बांधे रखा. दर्शक न सिर्फ हास्य दृश्य पर हंसते, और दमदार अभिनय एवं संवाद पर ताली पीटते रहे बल्कि कथा को नए दृष्टिकोण के साथ देखते, समझते और विचारते भी रहे.
नाटक ऐतिहासिक व पौराणिक कथा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. सर्वप्रथम नाटक शम्बूक वध के पृष्ठभूमि को चित्रित करने की कोशिश करता है. इसी क्रम में यह स्पष्ट होता है कि जब चौदह वर्षों के वनबास के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं तो सत्ता संचालन के लिए वे क्या-क्या कदम उठाते हैं? सबों की सुख-शांति के लिए किस प्रकार की राज्यव्यवस्था करते हैं? सबों को एक साथ समेटने के लिए किस तरह निषादराज और शबरी की कहानी को प्रचारित किया जाता है? किस प्रकार से चातुर्य वर्णव्यवस्था के कट्टर समर्थक अपनी असहजता के बीच छटपटाते रहते हैं और किस-किस तरह की साजिश रचते रहते हैं?



एक तरफ राज्य में शूद्रों के लिए विद्यालय, जलाशय और कहवाघर खोलने की बातें होती हैं तो दूसरी तरफ छुआछूत का प्रपंच भी बदस्तूर जारी रहता है. राज्य के भद्र लोग, वणिक आदि ही नहीं बल्कि आलाअधिकारी सुशर्मा और गुरू वशिष्ठ की भवें भी इस व्यवस्था से तनी रहती हैं. जबकि गुरू वशिष्ठ की पत्नी देवी अरुंधती भी शूद्र, अन्त्यज रहती है. फिर भी वे वर्ण सामंजस्य और वर्णभेद की महीन रेखा के बीच अर्थ तलाशते नज़र आते हैं.ये लोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिए श्रीराम को भी इस्तेमाल करते रहते हैं. राज्य-प्रशासन के लिए नियम-उपनियम और शास्त्र की बात कर श्रीराम को गुमराह करते रहते हैं. शूद्रों को ही नियंत्रित करने की कोशिश ये लोग नहीं करते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं शासन करने की भी कोशिश करते रहते हैं. गुरू वशिष्ठ पूरे वर्ण व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए व्रत जैसे पात्रों का भी इस्तेमाल करते हैं जो शम्बूक और उनके बीच एक कड़ी के रूप में भी काम करता है. व्रत गुरू वशिष्ठ के परामर्श पर प्रलोभन देकर शम्बूक को अपने पथ से विचलित कर अपने पक्ष में कर राम को सबल करने की असफल कोशिश भी करता है.
नाटक में धोबनें, पुक्कस और सिपाही हैं तो भट्टारक भी हैं.  बढ़ई वृदु कलिंग के राजपुरोहित की बेटी वलया से भागकर अंतरजातीय विवाह करता है तो गोत्रविहीन सत्यकाम जाबाला भी महर्षि गौतम से मिले जनेऊ के धागे के बीच छटपटा रहा है लेकिन मानवीय हानि को देखते हुए शूद्रों के सामूहिक वेदपाठ का विरोध करता है. वह सीधी लड़ाई की बात करता है.
लेकिन विषम परिस्थिति में वशिष्ठ आदि के परामर्श पर श्रीराम शम्बूक का वध कर देते हैं. नाटक में कथा को एक नए दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की गई है. जिस तरह नाटक में श्रीराम अप्रस्तुत होकर भी प्रस्तुत हैं वैसे ही संवादों के माध्यम से बहुत सारे सारगर्भित प्रश्नों व विचारों को प्रक्षेपित करने की भी कोशिश की गई है.
राजू कुमार निर्देशित इस नाटक में गौतम गुलाल (शम्बूक), अनीश अंकुर (सुशर्मा), जय प्रकाश (सत्यकाम), आशुतोष कुमार (वशिष्ठ), सुशील कुमार भारद्वाज (वीरावर्मन), आदर्श रंजन (धनगुप्त), संजय कुमार सिंह (भट्टारक, विरोचन), राजू कुमार (वृदु), अनुप्रिया (वलया), अंजली शर्मा(धोबन, जाबाला), सुशील कुमार देव(पंडित), मयंक कुमार शर्मा (पुण्डरीक), इन्द्रजीत (कन्हाई), अभिषेक (सिपाही), राज कुमार (वसंतक), सुधांशु शांडिल्य (व्रत), सौरभ कुमार, कृष्णा, अभिषेक, लक्ष्मी राजपूत, पिंकी, मुस्कान आदि ने अपनी दमदार अभिनय से नाटक को सफल बनाया. वहीं नवलेश शर्मा की संगीत परिकल्पना से भी नाटक को मजबूती प्रदान की.
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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में (आलेख): अनीश अंकुर



  विमर्श का दौर लौट रहा है हिंदी रंगमंच में
                                                                                                                   अनीश अंकुर



हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं मसलन कविता, कहानी में कई किस्म के आंदोलन चले, नये-नये ‘वाद’ का जन्म हुआ। लेकिन नाटक में वैचारिक बहसों की केाई वैसी निरंतर परिपाटी नहीं रही। आजादी के पहले जन नाट्य संघ की जब  स्थापना हुई तो तो नारा ही था ‘ हमारी नायक जनता है’’।  इसके प्रदर्शित प्रस्तुति ‘नवान्न’ में पहली बार किसान को नायक के रूप में मंच पर अवतरित हुआ।

सत्तर के दशक में नाटकों में ‘बैक टू द रूट्स’ यानी अपनी ‘जड़ों की ओर लौटो’ की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ लिया। इसके तहत नाटकों में भारतीयता’ व परंपरागत विरासत की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। जिसे देखों वो ‘लोक’ व ‘फोक’ की बात करने लगा।

‘भारतीयता की खोज’ की ये पूरी प्रक्रिया बदनाम अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन द्वारा समर्थित था। ‘फोक’ की प्रधानता वाली इस परिघटना ने  इसने निर्देशक को ताकतवर तथा  नाटककारों को कमजोर बना दिया।   रंगमंच में प्रदर्शनकारी तत्वों की प्रधानता होने लगी फलतः ‘टेक्सट’ का महत्व कमजोर होने लगा।

 मजबूत निर्देशक ने  पहले चरण में नाटककारों को पृष्ठभूमि में धकेला वही दूसरे  चरण में अभिनेताओं को अप्रासंगिक बनाना शुरू कर दिया। रंगमंच में  अभिनेता अब डिजायन का निष्क्रिय तत्व में तब्दील होता जा रहा है।  एक्टर अब आब्जेक्ट में बदल गया है।

एक समय नुक्कड़ नाटकों ने प्रोसेनियम पर होने वाले थियेटर केा  बेहद सशक्त चुनौती दी थी। नुक्कड़ नाटकों के एक बड़े हिस्से के एन.जी.ओ करण की प्रक्रिया ने  भी उसकी वैचारिक वैधता को कमजोर कर डाला है।

 बिहार का रंगमंच मुख्यतः प्रयोगधर्मी माना जाता रहा है। चॅुंकि बिहार प्रारंभ से ही विभिन्न आंदोलनों व संघर्षों की भूमि रहा है। साथ  रंगमंच की जनपक्षधर धारा ने वैचारिक बहसों से जीवंत संपर्क बनाए रखा फलतः नये-नये प्रयोग होते रहे हैं। बिहार के रंगमंच के  प्रयोगधर्मी होने का यह प्रमुख कारण है।

लेकिन फिर भी वैचारिक बहसें नयी-नयी शक्लों में सामने आ रहे हैं। अभी थियेटर ओलंपिक को लेकर रंगमंच दो हिस्सों में विभाजित है । सतह पर दिखने पर भले ही रंगकर्मियों के दो समूहों के मध्य का संघर्ष दिख रहा है।  दरअसल यह विचाराधात्मक प्रश्न है।
 सत्ता की सरपरस्ती में होने वाले चलने वाले  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे संस्थानों द्वारा आयोजित महोत्सवों  के रंगमंचविरोधी चरित्र पर सवाल उठने लगे हैं। एन.एस.डी से प्रशिक्षित रंगकर्मियों के संकटग्रस्त  रंगमंच होने की पहचान हैं , ये सवाल। अभी हिंदी रंगमंच अपने संकटों की पहचान कर रहा है। यही बात वैचारिक विमर्श की दृष्टि से बेहद उम्मीद  पैदा करने वाली है।

बिहार नुक्कड़ नाटकों को लेकर भी काफ़ी  चर्चित रहे हैं।   सफदर हाशमी की हत्या के पश्चात बिहार के नुक्कड़ नाटको की बाढ़ आ गयी। नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई कि जब बिहार के सौ साल  हुए  तो रंगमंच की मुख्य पहचान के रूप में नुक्कड़ नाटकों को रखना पड़ा।
बिहार  के रंगमंच की सबसे बड़ी चुनौती है कि अपनी प्रयोगधर्मिता  को बचाये रखते हुए उसे आगे विकसित करने का काम करे।

  इसके अलावा बिहार की उभरती  सामाजिक  शक्तियों एवं उनसे जुड़े बिहार के लोकनाटकों यथा सलहेस, रेशमा चौहरमल, हिरनी बिरनी, सती बिहुला, दीना भद्री, बहुला गढ़िन आदि के साथ को आधुनिक रंग चेतना के साथ   तालमेल बनाना एक ऐसा कार्यभार है जिसे आगे आने वाले दिनों में सम्पन्न होना है।

बिहार के रंगमंच को यहां के सामाजिक राजनीतिक जीवन में हस्तक्षेप करना है। उसे विवादों से भी घबराना नही है। जैसा कि गिरीश कर्नाड कहते हैं '' जो रंगमंच विवाद से बचता है वो अपना कफ़न खुद तैयार कर रहा है।"

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

प्रलेस की गतिविधियां इन दिनों (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक
सुशील कुमार भारद्वाज

वर्तमान परिदृश्य को देखकर लगता है कि यदि बिहार प्रगतिशील लेखक संघ निष्क्रिय नहीं है तो कम-से-कम अपने आप को जन्मशताब्दी और शोकसभा तक ही जरूर सिमटाते जा रही है. विस्तार की तो बात ही जुदा है. बिहार इकाई से तात्पर्य राज्य के अड़तीस जिलों से होना चाहिए. लेकिन देखा जाए तो इसकी सक्रिय गतिविधि पटना, गया, बेगूसराय, लखीसराय, समस्तीपुर, आरा, भागलपुर और बक्सर आदि तक ही नज़र आती है.
बिहार प्रलेस के महासचिव रवीन्द्रनाथ राय कहते हैं –“पिछले दो-तीन वर्षों में लगभग पन्द्रह कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. भीष्म सहनी का शताब्दी वर्ष मनाया गया. जिसमें अन्य गणमान्य साहित्यकारों के साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी मुख्य वक्ता थे. फिर मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी मनाया गया जिसमें अवधेश प्रीत, संतोष दीक्षित, रमेश कुमार, राजेंद्र राजन समेत दर्जन भर वक्ता थे. लगभग सभी वक्ता बिहार से ही थे.”
इसके आलावा वे गोदार्गमा, मटिहानी, सिमरिया (बेगूसराय), गया, आरा , भागलपुर, बक्सर, लखीसराय , समस्तीपुर में होने वाली छोटी-बड़ी कविता-पाठ, गजल और विमर्श गोष्ठियों की चर्चा करते हैं. राजधानी पटना की गतिविधि पर रबिन्द्रनाथ राय कम बोलते हैं. पटना की गतिविधि पर कहते हैं किपिछले दिनों रानी श्रीवास्तव के नेतृत्व में दिवंगत साहित्यकार सुरेन्द्र स्निग्ध को श्रद्धांजलि दी गई और काव्य पाठ किया गया.

जबकि बताता चलूँ कि सुरेन्द्रजी को  श्रद्धांजलिसुमन अर्पित करने का कार्यक्रम रानी श्रीवास्तव के निजी आवास पर किया गया था जिसमें शिवनारायण, अनिल विभाकर, रबीन्द्र कुमार दास, समीर परिमल समेत दर्जन भर साहित्यकार उपस्थित हुए. और वहीं पर पहली बार सुनने को मिला कि प्रलेस की ओर से मौखिक रूप में कहा गया कि कोई कार्यक्रम करने की क्या जरूरत है? बस एक प्रेस विज्ञप्ति बना दिया जाय.  वैसी स्थिति में रानी श्रीवास्तव ने अपने आवास पर कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसी गोष्ठी में ज्ञात हुआ कि केदार भवन में स्थित प्रलेस के कार्यालय को किसी प्रलेस पदाधिकारी के इशारे पर ही निजी आवास में तब्दील कर दिया गया है. जहां कोई भी साहित्यिक गतिविधि करा पाना असंभव है. प्रलेस कार्यालय में साहित्यिक गतिविधि नहीं करा पाने आदि अन्य कारणों से ही पटना इकाई के सचिव शहंशाह आलम ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.

गौरतलब है कि केदार भवन में पिछले पांच वर्ष पहले राजेंद्र राजन आदि के प्रयास से कन्हैया लाल मुंशी के नाम पर एक कमरा प्रलेस कार्यालय को आवंटित किया गया था जिसका उद्घाटन प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने किया था. और तब से उसमें अक्सर छोटी-छोटी गतिविधियां होती रहीं हैंजबकि बड़े-बड़े आयोजन शिक्षक संघ के भवन में अमूमन आयोजित होते हैं. लेकिन पिछले कुछ महीने सेदफ्तर का यह कमरा निजी आवास बन चुका है.

जबकि रबीन्द्रनाथ राय कहते हैं-पटना इकाई लचर हो गई है और कोई भी ढंग का कार्यक्रम करने में असफल रही है. जल्द ही नई टीमगठित  की जाएगी.

जबकि प्रलेस पटना इकाई के बैनर तले शहंशाह आलम के नेतृत्व में मदन कश्यप समेत कई प्रतिष्ठित कवियों की काव्य-गोष्ठियां टेक्नो-हेराल्ड के दफ्तर में विगत कई महीनों से आयोजित होते रहे हैं.

आश्चर्य यह भी है कि बिहार प्रलेस के सदस्यों में हृषिकेश सुलभ, संतोष दीक्षित, कर्मेन्दु शिशिर जैसे कई लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार शामिल हैं. तो क्या ये साहित्यकार पटना में रहकर भी इन सब गतिविधियों से अनभिग्य हैं? क्या वे प्रलेस के दफ्तर कभी नहीं जाते या सबकुछ जान कर भी चुप हैं? या ये सब फिजूल की बातें हैं? क्या हिन्दी के साहित्यकार प्रलेस के प्रति अभी भी वही नजरिया रखते हैं जो स्थापना के वक्त थी? प्रेमचंद की तरह दर्शक दीर्घा में बैठने वाले?

जबकि एक तरफ प्रलेस के नेतृत्व में जयपुर में पूंजीवादी लिट फेस्ट के विरुद्ध समानांतर लिट फेस्ट आयोजित किया जा रहा है. और बिहार प्रलेस आगामी महीनों में राहुल सांस्कृत्यायन पर एक आयोजन की तैयारी में है. जिसमें इतिहास, दर्शन आदि पर बातचीत करने के लिए रोमिला थापर, केदारनाथ सिंह, और विजय चौधरी आदि को आमंत्रित किया जाना है.

प्रलेस के इतिहास पर किताब लिखने वाले ब्रज कुमार पांडे कहते हैं-1935 में प्रलेस का जब घोषणा-पत्र तैयार किया जा रहा था तो दो ही लक्ष्य रखे गए थे. पहला था फासिज्म का विरोध और दूसरा था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
1936 ई० में स्थापित प्रलेस का लक्ष्य सिर्फ इसी से पूर्ण हो जाता है कि कल्बुर्गी, पन्सारे, और गौरी लंकेश आदि के हत्या की विरुद्ध प्रदर्शन कर दिया और शोक सभाएं आयोजित कर दीं? क्या साहित्य का इतना ही महत्त्व रह गया है? प्रलेस खुद किस स्थिति में है?

रबीन्द्रनाथ राय स्वीकारते हैं कि पाठकीयता घटी है. इंटरनेट भी एक कारण है लेकिन लेखक भी कहीं दोषी हैं. लेखक प्रलेस के सिद्धांत के अनुरूप जनता के बीच जाकर, जनता की समस्या से रूबरू होकर लिखने की बजाय बंद कमरे में लिखेंगें तो वो भाव, वो जुड़ाव कहां से आएगा?” आगे राय कहते हैं-इसी परंपरा को बनाए रखने के लिए कुछ समय पहले किसान सभा और प्रलेस के तत्वावधान में सिवान में एक आयोजन किया गया था. जिसमें खगेन्द्र ठाकुर भी शरीक हुए थे. लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि जो वाजिब माहौल चाहिए वो बन नहीं पा रहा है.  जो सक्रियता होनी चाहिए उसमें कहीं न कहीं चूक हो रही है. समाज में लोगों को उतरना पड़ेगा. उनके बीच से लेखन करना पड़ेगा. तभी पाठकीयता को विस्तार दिया जा सकता है.

ब्रज कुमार पांडे भी कहते हैं-अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवाज उठाई जा रही है. प्रलेस में महान साहित्यकारों के जन्मदिन और वर्षगांठ मनाएं जा रहे हैं.
तो सवाल उठता है कि क्या अब प्रलेस की अहमियत महज जयंती और वर्षगांठ मनाने तक रह गई है? स्थापना के 81 वर्ष देख चुकने के बाबजूद प्रलेस इतने तक ही सिमट कर रह गया है? जरूरी है समय के साथ बदलने की. अपनी अहमियत साबित करने की.


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