गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

माया एंजेलो की कविता मणि मोहन मेहता के हिन्दी शब्दों में।

आज समाज में हर इंसान एक वस्तु अथवा उत्पाद बनता जा रहा है जिसका उपयोगिता तक ही महत्व है लेकिन स्त्रियां सदियों से उसी जीवन को जीती आ रही है। जहां उनकी इच्छाओं का दमन इस हद तक किया जाता है कि उनकी अंतर्आत्मा तक कराह उठती है। लेकिन उनमें कुछ ऐसी भी होती हैं जो अपने शिकारी अथवा पुरूष को कङी चुनौती प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। सच है कि ये उनके ह्रदय की चित्कार है जो एक संकल्प के रूप में आती है कि तुम मुझे कुचल डालो जितनी तुममें शक्ति है लेकिन मैं उठूंगी जरूर। जलो तुम जितना जल सकते हो, लेकिन मुझे अब तेरी परवाह नहीं। अब अपने तरीके से जिंदगी को आगे ले जाऊंगी। जबकि दूसरी कविता में दिखलाने की कोशिश की गई है कि औरतें किस तरह घर को संभालने में व्यस्त रहती है कि उनका खुद का अस्तित्व ही खतरे में पङ जाता है। जहां वह अपने सपनों और इच्छाओं को पूरा करने की चाह रखती हैं। जिंदगी के कुछ रोमांचकारी क्षणों को महसूस करना चाहती है। तीसरी कविता वे घर गए उस स्त्री की दारूण व्यथा है जिसके पास सबकुछ है, सबकी प्यारी और दुलारी है लेकिन उसके पास इज्जत नहीं है। दूसरी कविता में जिस तरह अपना कहने की चाह है लेकिन अपना है कुछ भी नहीं है वही दर्द यहां भी है। सारे गुण होने के बाबजूद वह महज एक बाजार की वस्तु ही है। औरतों के जिस दारूण स्थिति को कवयित्री ने बेहद खूबसूरती से रचा -बसा है उसकी आत्मा को आत्मसात करते हुए अनुवादक मणि जी से उसी खूबसूरती के साथ हमलोगों के समक्ष प्रस्तुत किया है जिसके लिए वे विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं क्योंकि अनुवाद में सारी सीमाओं एवं मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए मूल रचना की गरिमानुसार कार्य करना बहुत ही श्रमसाध्य है। माया एंजेलो की कविताओं का मणि मोहन मेहता जी ने जिस तरह से अनुवाद किया है उसे आप स्वयं भी पढकर महसूस करें।
सुशील कुमार भारद्वाज


कवयित्री का परिचय : 4 अप्रैल , सन 1928 को सेन्ट लुइस में जन्मीं माया एंजेलो अमेरिका की सर्वाधिक चर्चित कवियत्री और रचनाकार हैं । वे एक अफ्रीकन अमेरिकन लेखिका के रूप में जानी जाती हैं , उन्होंने नस्लवाद और रंगभेद के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद की है । वे अपनी सात आत्मकथाओं seven autobiographies के लिए प्रसिद्ध हैं । इसके अलावा उनके हिस्से में पांच निबन्ध संग्रह , अनेक कविता संग्रह , नाटक तथा फिल्म और टेलिविजन शो हैं ।

🕵अनुवादक का परिचय – 2 मई 1967 को जन्मे मणि मोहन अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर व डॉक्टरेट हैं । उनके कविता संग्रह ' कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ ' पर उन्हें वागीश्वरी पुरस्कार मिला है । एक और कविता संग्रह ‘ शायद ‘ प्रकाशित है इसके अलावा  " भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास " , " आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता " तथा " सुर्ख़ सवेरा " आलोचना पुस्तकों का संपादन उन्होंने किया है । रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए ' भी प्रकाशित है ।

🚹मैं फिर उठती हूँ🚹
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तुम दर्ज कर सकते हो मुझे इतिहास में
अपने कड़वे और विद्रूप झूठ के साथ
कुचल सकते हो मुझे
इसी गन्दगी में
परन्तु फिर भी, धूल की तरह , मैं उठूंगी ।

क्या तुम मेरे अक्खड़पन से परेशान हो ?
तुम इतने निराश क्यों हो ?
क्या इसलिए कि मैं चलती हूँ इस तरह
मानों तेल के कुँए हों
मेरी बैठक में ।

चन्द्रमाओं और सूर्यों की तरह
ज्वार भाटों की निश्चितता के साथ
ऊपर उठती उम्मीद की तरह
मैं फिर उठूंगी ।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे ?
झुका हुआ सिर और झुकी नज़रें ?
नीचे गिरे कन्धे , आंसुओं की तरह ...
अपने रुदन में कमजोर ।

क्या मेरी हेकड़ी से तुम्हे चोट पहुंचती है ?
क्या बहुत बुरा लगता है ?
क्योंकि मैं हंसती हूँ जैसे मेरे पास
सोने की खदाने हों
घर के पिछवाड़े ।

अपने शब्दों से तुम मुझे शूट कर सकते हो
काट सकते हो अपनी नज़रों से
मार सकते हो मुझे अपनी घृणा से
पर फिर भी , हवा की तरह
मैं उठूंगी ।

क्या मेरा कामाकर्षण तुम्हे विचलित करता है?
क्या यह एक विस्मय की तरह
तुम्हारे सामने आता है
कि मैं नृत्य करती हूँ
जैसे मेरे पास हीरे हैं
जहां मिलती हैं मेरी दोनों जांघे ?

इतिहास की शर्म वाली झोंपड़ियों से बाहर निकलकर
मैं उठती हूँ
उस अतीत से ऊपर
जिसकी जड़ें दर्द से वाबस्ता हैं
मैं उठती हूँ ...
मैं एक काला समुद्र हूँ
उछलता - कूदता
बहता - उफनता
अपने भीतर लहरों को समाये ।

भय और आतंक की रातों को पीछे छोड़ते हुए
मैं उठती हूँ
लाती हूँ
वे तमाम तोहफे जो मेरे पूर्वजों ने दिए थे
मैं एक स्वप्न हूँ
और एक उम्मीद गुलामों की
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ
मैं उठती हूँ ।

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🚺काम करती स्त्री🚺

मुझे बच्चों की देखभाल करनी है
कपड़े सिलना है
पोंछा लगाना है
बाजार से सामान लाना है
फिर चिकन फ्राई करना है
पोंछना है बच्चे का गीला बदन
पूरे कुनबे को खाना खिलाना है
बगीचे से खरपतवार हटाना है
कमीजों पर इस्त्री करनी है
कनस्तर काटना है
साफ करना है यह झोंपड़ी
बीमार लोगों की देखभाल करनी है
और कपास चुनना है ।

धुप , बिखर जाओ मुझ पर
बारिश, बरस जाओ मुझ पर
ओस की बूंदों , धीरे-धीरे गिरो मुझ पर
ठंडा करो मेरे माथे को ।

तूफ़ान , उड़ा ले चलो मुझे यहाँ से
अपनी प्रचंड हवा के साथ
तैरने दो मुझे आकाश में
जब तक पूरा न हो मेरा विश्राम ।

हिम-कण , धीरे-धीरे गिरो
छा जाओ मुझ पर
भर दो मुझे सफेद शीतल चुम्बनों से
और आराम करने दो मुझे
आज की रात ।

सूर्य , बारिश , सर्पिल आकाश
पहाड़ , समुद्र , पत्तियों और पत्थर
तारों की चमक , चंद्रमा की आभा
सिर्फ तुम हो
जिन्हें मैं अपना कह सकती हूँ ।

🚺वे घर गए 🚺
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वे घर गए और अपनी पत्नियों से कहा
कि अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक बार भी
मेरे जैसी लड़की नहीं देखी
फिर भी ...वे अपने घर गए .

उन्होंने कहा के मेरा घर चमचमा रहा था
जो कुछ कहा मैंने उसमे एक भी शब्द भद्दा नहीं था
एक रहस्य था मेरे व्यक्तित्व में
फिर भी... वे अपने घर गए .

मेरी तारीफ सभी पुरुषों के लबों पर थी
उन्हें मेरी मुस्कान , मेरी हाजिरजवाबी
मेरे नितम्ब पसंद थे
उन्होंने रात गुजारी - एक , दो या फिर तीन
फिर भी ...............


✳माया एंजेलो✳

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन

फिर मिलने के वादे के साथ समाप्त हो गया 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन  
सुशील कुमार भारद्वाज
लघुकथा पाठ सत्र में मंचासीन ख्याति प्राप्त साहित्यकार


भागदौड़ भरी जिन्दगीं में जब लोगों के पास अपने निजी काम के लिए समय का अभाव होता जा रहा है तब लंबी –लंबी कहानियों एवं उपन्यास रूपी प्रचलित साहित्यों से उनका दूर होते चला जाना लाजिमी ही लगता है. लेकिन लघुकथा एक ऐसी विधा है जो राह चलते और फेसबुक एवं व्हाट्सअप्प के माध्यम से भी सामान्य जनों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल है. लघुकथा ऐसी विधा है जिनमें शक्ति है कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक एवं हास्य –व्यंग्य के साथ धीर –गंभीर बातों को भी  कह गुजरने की. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस फटाफट जिंदगी में आसानी से लोगों के बीच पैठ बनाती यह लघुकथा अभी भी अपने यथोचित सम्मान से दूर है. जो कहीं ना कहीं झलक ही जाता है.
जी हां, 17 अप्रैल 2016 को जब पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर के एमपीसीसी सभागार में अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के तत्वावधान में आयोजित 28 वाँ लघुकथा सम्मेलन के दूसरे सत्र (आलेख पाठ सत्र) में लघुकथा के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी, तब न सिर्फ इस पर चर्चा हुई कि लघुकथा क्या है? इसके आवश्यक तत्व क्या हैं? वर्तमान में इसकी स्थिति क्या है? और इसके लिए भविष्य में क्या संभावनाएं हैं? बल्कि इस पर भी चर्च हुई कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए क्या किया जाय? और जब विभिन्न कलाओं के लिए सम्मान सरकारों द्वारा ससमय दिया जा रहा है तो लघुकथा ही उपेक्षित क्यों रहें?


जबकि उद्घाटन सत्र में बिहार के कला संस्कृति मंत्री श्री शिवचंद्र राम ने अपनी बातों को रखते हुए कहा कि जब शहर में जब नाटक, नृत्य के केंद्र बने हैं तो साहित्य के केंद्र क्यों नहीं बनेगें? जबकि मंच पर ही आसीन विधान पार्षद श्री नवल किशोर यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि मंत्रीजी साहित्य भवन बनाने की बात करते हैं और राजधानी में पहले से बने हिन्दी भवन पर दूसरे लोगों का कब्ज़ा ऐसा है कि साहित्यकार वहां घुस भी नहीं सकते.
इन राजनीतिक बयानों से इतर अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के अध्यक्ष सतीशराज पुष्करणा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जल्द ही दिशा प्रकाशन की ओर से लघुकथा कोश प्रकाशित होने जा रहा है. साथ ही साथ उन्होंने लघुकथा के इतिहास लिखने की योजना की भी जानकारी दी. बंगलुरू से आई व्ही ललिताम्बा ने कहानी के बढ़ते दायरे की बात कहीं, तो मेजर बलबीर सिंह भसीन ने सलाह देते हुए कहा कि लघुकथा में दर्द भी उभरे और अनुशासन भी बना रहे. जबकि रामदेव प्रसाद ने लघुकथा में संवेदनशीलता, संक्षिप्तता और समाज सापेक्ष मूल्यों पर बल देने की बात कही. नागपुर से आए डा मिथिलेश अवस्थी ने भाषा के साथ साथ लघुकथा में शब्द सीमा और अनुशासन पर ध्यान देने की बात कही. जबकि नागेन्द्र प्रसाद सिंह ने लघुकथा में पुनार्चनावाद की सम्भावना पर अपनी बातों को रखा.



तीसरे सत्र में जहां तकनीकी सत्र में रखी गई बातों पर ही डा शंकर प्रसाद, कांता रॉय, पुष्पा जमुआर समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विविध विचार रखे वहीं चौथे सत्र में जीवन के विविध क्षेत्रों के पृष्ठभूमि में रची गई 34 लघुकथाओं का पाठ किया गया. इन लघुकथाकारों में न सिर्फ सतीशराज पुष्करणा, वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज, सिद्धेश्वर, ध्रुव कुमार, मिथिलेश अवस्थी, पुष्पा जमुआर, सुशील कुमार भारद्वाज, अनीता राकेश, देवेन्द्र नाथ साह,  कांता रॉय, रेखा रश्मि, पूनम आनंद, मेहता नागेन्द्र, आलोक भारती भगवान सिंह भास्कर आदि शामिल रहे बल्कि किलकारी के प्रियांतरा भारती और प्रवीण कुमार समेत अन्य भी रहे. और इन लघुकथा पाठों पर अपने समीक्षात्मक वक्तव्य दिए प्रतिष्ठित साहित्यकार नागेन्द्र प्रसाद सिंह, अवधेश प्रीत, एवं संतोष कुमार ने.
सम्मलेन में जहां फूलों की माला के बदले, फलों की टोकरी देकर अतिथियों का स्वागत किया गया, वहीं देश के विभिन्न राज्यों से आए अथिति लघुकथाकार डा सच्चिदानंद सिंह साथी, डा मिथिलेश अवस्थी, डा शरद नारायण खरे, मिथिलेश कुमारी मिश्र, नागेन्द्र प्रसाद सिंह, डा देवेन्द्र नाथ साह, पुष्पा जमुआर, तथा आलोक भारती को लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया, जबकि राघवेन्द्र कुमार कौशल को लघुकथा सम्भावना सम्मान से सम्मानित किया गया. किलकारी के प्रियांतरा भारती एवं प्रवीण कुमारत को लघुकथा अंकुर सम्मान दिया गया.
सम्मलेन में सन्नाटा बोल उठा (डा मिथिलेश कुमारी मिश्र), आस पास कि बातें (डा पुष्प जमुआर), वृक्ष ने कहा (डा मेहता नागेन्द्र), परदेस का पंछी (बीरेंद्र कुमार भारद्वाज), बंद मुट्ठी में सूरज (आलोक भारती), और साहित्य प्रहरी (लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका –भगवान सिंह भास्कर) का लोकार्पण भी किया गया. और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ समारोह का समापन हो गया .

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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

सनातन धर्म संकट के दौर में (आलेख)

शर्म आनी चाहिए उनलोगों को जो सनातन धर्म में जन्म लेकर भी कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर खुद को बर्बाद करने में दिन रात लगे हुए हैं। एक विशाल परिवार में सबों को एक समान ही प्रेम मिल जाए कोई जरूरी नहीं। यह एक सामान्य व मानवीय चुक है जो हमारे दैनिक जीवन में अक्सर दिख जाते हैं। इस सनातन धर्म में समय के साथ परिवर्तन हुए, फिर भी कुछ व्यवहारिक बाह्य आडंबर शेष है जो कि हमारे शिक्षित एवं जागरूक बंधुओं के प्रयास से दूर किया जा रहा है। मैं स्वयं कर्मकांडो का विरोधी हूं और सर्वधर्म समभाव की भावना से जीवन व्यतीत करता हूं लेकिन जिस प्रकार से इस धर्म पर हाल के महीने में हमला हुआ है, उससे व्यथित हूं। ऐसा जान पङता है कि सनातन धर्म संकट में है। भारत जैसे देश में ही जब यह अपनों के द्वारा ही अपमानित किया जा रहा है तो शेष की क्या बात की जाए? क्या यह इसकी उदारता नहीं है कि अनेक धर्म इसी से अलग हुए हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि आज मौजूद कुछ धर्म हाल के वर्षों की उपज है जिसमें कट्टरता इससे कहीं अधिक और कूट कूट कर भरी है? आप किसी भी धर्म को अपना लें लेकिन कोई भी धर्म आपको मुफ्त की रोटी नहीं दे सकता। आपके दुख दर्द का आपके धर्म से कोई लेना देना नहीं है। धर्म आपको सिर्फ एक रास्ता दिखलाता है। संस्कार सिखलाता है। आप आस्तिक की बजाय नास्तिक ही हो जाऐंगें तो कौन आपका क्या बिगाङ लेगा? सामान्य जीवन में धर्म पर बहुत चर्चा करने की भी तो कोई बजह नहीं? फिर आप क्यों पुरानी बातों व ग्रंथों की बातों में उलझते हैं? ग्रंथ व्यक्ति विशेष द्वारा लिखी गई है जहाँ साहित्यिक सुविधा के अनुसार छूट लेने से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर आज के शिक्षित समाज में इन पोंगा पंथियों की सुनता ही कौन है? आपके धर्म परिवर्तित कर लेने से देश समाज का कुछ घट जाएगा ऐसा भी कुछ नहीं है लेकिन कहा जाता है न कि जो तुम्हें बदल कर प्यार करे वह प्यार नहीं। बस इतना ही कहूंगा विद्वान बनना गुनाह नहीं लेकिन बहकावे में आकर खुद का घर जला लेना जरूर अपराध है। अभी जो अपराध आप खुशी खुशी कर रहे हैं कहीं उसके विनाश होने पर कहीं पछताना न पङे। वैश्वीकरण के इस दौर में कब कौन कैसी राजनीति कर जाए कहना मुश्किल है।