शनिवार, 15 अगस्त 2015

सुशील कुमार भारद्वाज की लघुकथाएं



१. पगली का तौलिया (लघुकथा)

            सुशील कुमार भारद्वाज 

बाघ एक्सप्रेस के समस्तीपुर जंक्शन पहुंचते ही, भीड़ के साथ एक पगली भी उसमें चढ आयी| गर्मी में भी मलिन स्वेटर पहने, गंदे व उलझे बालों में सबके आकर्षण का केंद्र बनी वह सीट-दर–सीट घूमती रही| कभी कोई प्रेम से कहता –“नीचे उतार जाओ|” कभी दूर करने के लिए –“उधर चली जाओ|” और कभी सख्त आवाज कान से टकराती – “भागो|“

और वह सुना – अनसुना करते प्रवेश द्वार के पास पालथी मारकर बैठ गई|

एक आवाज आयी –“पागलों को कोई देखने वाला नही है| जहाँ देखो वहीँ नज़र आ जाएं|”

दूसरी आवाज आयी –“कैसे हैं, इसके नाते – रिश्तेदार|”

तभी पीछे से आवाज आयी – “स्वार्थी दुनिया में नाता –रिश्ता क्या होता है, भाई?”

आवाज अचानक रुक गई| जींस – टॉप पहने एक युवती बर्थ नम्बर १ से उठी और उसने अपने बैग से एक नया तौलिया निकालकर पगली को ओढा दिया| उसमें क्लिप भी लगा दिया, ताकि कहीं गिरे नहीं| उसके बालों को कंघी किया और फिर अपनी जगह पर लौटकर कान में ईयरफोन लगा कर बैठ गई| शांति के माहौल में सभी की निगाहें कभी उस युवती की तरफ जातीं तो कभी पगली की तरफ| लेकिन युवती की इस हरकत ने सबके अंदर हलचल मचा दी थी| इन सबसे बेफिक्र वह युवती कभी अपनी डायरी में कुछ लिखती, तो कभी कोई चित्रकारी करती रही| अंग्रेजी का कोई उपन्यास उसके बैग से झांक रहा था| ट्रेन अपनी गति में थी और वह पगली अपने आप में खोयी कभी आंख मटकाती तो कभी मुस्कुरा रही थी|

अचानक हलचल हुई जब गाड़ी ढोली स्टेशन पर पहुंची और भीड़ उतरने को आतुर हुई| भीड़ से एक आवाज आयी – वाह! पगली का तौलिया तो एकदम नया है|”

और जब भीड़ छंटी तो सबके मुंह खुले के खुले रह गए| पगली का तौलिया गायब हो चुका था और पगली पूर्ववत हालत में बाहर की ओर देख रही थी| 

सुशील कुमार भारद्वाज            




.कामवाली की जाति  
                   सुशील कुमार भारद्वाज            



सारिका बहुत परेशान थीं |घर के सारे काम  खुद ही करने पड़ते थे | अंत में उसने पडोसी के घर काम  करने वाली रागिनी से मदद मांगने की सोचीं |और अगली शाम ज्योंही उनकी नज़र रागिनी पर पड़ी उन्होंने लपक कर खुद को उसके  आगे करते हुए बोली - "अरे रागिनी ! क्या मुझे भी अपने जैसी काम  करने वाली को बुला दोगी ? .... अब क्या बताऊँ ? खुद से सारा काम  हो नहीं पाता है | सुबह से शाम तक में क्या क्या करती रहूँ ? "

मुस्कुराते हुए रागिनी जबाब दी  -" आदमी की भी कोई कमी होती है ? बस अच्छे लोग मिलने चाहिए | मैडम के यहाँ काम  से फुर्सत ही नहीं मिलती वर्ना मैं ही कर देती |"

आशा की किरण मिलते ही बोली - " सच पूछो तो मेरी भी यही इच्छा थी, पर सीधे कैसे कहती ? खैर किसी वैसी को देखना जो घर के साफ़ सफाई के साथ साथ रसोई में भी कभी कभी मदद कर दे |"

"मैडम ये भी कोई कहने की बात है |"

"रागिनी तब तो लगता है की मेरा काम जल्दी ही हो जायेगा | पैसे की कोई बात नहीं है जो उचित होगा दूंगी | बस एक बात का ध्यान रखना की वो किस जाति धर्म की है? तुम सब कुछ समझ  रही हो मैं क्या कहना चाह रही हूँ ?"

गौर से रागिनी सारिका के चेहरे पर देख रही थी और बात खत्म होते ही बोली -" मैडम एक बात पुछूं ?"

"हाँ हाँ पूछो , क्या पूछना चाहती हो ? " - सारिका हुलस कर बोली |

रागिनी सारिका के चेहरे पर नज़र गडाये हुए  ही बोली - "मैडम सिर्फ काम करने वाली की  जाति - धर्म पर ही ध्यान देना चाहिए? या जिसके यहाँ काम करना है उसके जाति - धर्म का भी ध्यान रखना चाहिए ?"

सारिका इस सवाल के  जबाब में सिर्फ रागिनी को फटी आँखों से देखती रह गयी
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बुधवार, 12 अगस्त 2015

रसीद न० ग्यारह : क्रांति लाने की एक कोशिश(सुशील कुमार भारद्वाज)



 रसीद न० ग्यारह : क्रांति लाने की एक कोशिश
                                सुशील कुमार भारद्वाज 


हनीफ मदार
संभव है कि आप, मो० हनीफ मदार की कहानी “रसीद न ० ग्यारह” का शीर्षक देखकर दिग्भ्रमित हो जाएँ| आप सोचने लगें कि कहीं यह कहानी किसी धोखाधड़ी या व्यापार आदि के बारें में तो नहीं है| लेकिन सच यह है कि कहानी आपको एक धोखे से बाहर लाने की कोशिश करती है| यह व्यापार है शिक्षा का, जहाँ आगे बढ़ने के तरीके को बताया गया है| एक तरफ कौम को आगे बढाने वाली शिक्षा है, मदरसे की शिक्षा, जहाँ हिंदी, उर्दू और अरबी पढाई जाती है| लोगों को रोजगारोन्मुखी शिक्षा के नाम पर टेलरिंग जैसी पारम्परिक पेशे में धकेलने की तैयारी है| जहाँ हाफिज तक इस महंगाई के युग में महज दो-तीन हज़ार की आमदनी पर अपने घर-परिवार को चलाते हैं| सच भी है कि मस्जिद के नाम पर आस – पास के गांव –घर से जमा होने वाले सीमित चंदे  से क्या – क्या और कितना किया जाय? जबकि गौर करने वाली बात है कि सरकारी अनुदान प्राप्त यानि मदरसा बोर्डों से संबद्ध या अरब आदि विदेशों से प्राप्त चंदे से संचालित शिक्षण संस्थानों में भी शिक्षा व्यवस्था इन मदरसों की तुलना में बेहतर है| यहाँ तक कि समय – समय पर जारी होने वाली विभिन्न सरकारी रपटें भी मुस्लिम संप्रदाय के पिछड़ेपन का कारण शिक्षा को ही मानती हैं| 

लेकिन इन्हीं लोगों के बीच लियाकत अली जैसे जूनियर स्कूल के प्रधानाध्याक भी हैं, जो कि सच्चाई के लिए किसी भी हद तक लड़ने को तैयार हैं, संप्रदाय के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर संघर्ष करते नज़र आते हैं| एक तरफ वे अधिक बच्चों के लिए जिम्मेदार और आतंकवाद के पर्याय बनते अपने संप्रदाय को बेदाग दिखाने की कोशिश करते हैं| वहीँ वे जाति, धर्म की बजाय अशिक्षा को इस पिछडेपन का कारण मानते हैं| सनकी का तमगा पाने के बाबजूद सत्य और कर्तव्य के लिए शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों के चूल हिलाते रहते हैं| व्यवस्था को दुरुस्त कर देश सेवा में लगे रहते हैं| साथ ही वे अपने संप्रदाय के लोगों की नासमझी पर भी खीझ उतारते रहते हैं| मस्जिद के नाम पर चंदा लेने आये लोगों को देख कर उन्हें क्षोभ होने लगता है| ऐसा नहीं है कि लियाकत अली अपनों के बीच नही हैं, या फिर अपनी जड़ों से पूरी तरह से कट गये हैं, लेकिन रसीद में छपी उर्दू भाषा को काला अक्षर भैंस बराबर मानना, कहीं –न –कहीं कुछ कहता जरुर है| शायद इसे समय की जरुरत कह लें या कुछ और| कुछ लोग तो इसे भी अलग तरह से देख सकते हैं कि बेटी की पढाई की समस्या पर चर्चा की बजाय मुल्लों से चल रही बहस किस कदर छोटे को गुस्सा दिला रही है| साथ ही धर्म और सेवा की बात करने वाले गंदे कपडे में मेहमानों का यूँ पान मसाला चबाते हुए खीसे निपोरना, और उनके धूल भरे पैर उनलोगों को किस कदर नागवार गुजरता है? 

लियाकत अली के शिक्षित परिवार में उच्च शिक्षा या इंजीनियरिंग की पढाई पर ही चर्चा नही होती है; बल्कि लड़कियां आधुनिक परिवेश और परिधान में भी नज़र आती हैं| लियाकत या उनके छोटे भाई भी रुढिवादी परंपरा के विरोधी तेवर में ही नज़र आते हैं| घर आये मेहमान का नकाब आदि पहनने की सलाह, आधुनिक या पाश्चात्य सोच में जीने की आदि लड़की को नागवार गुजरती है| मेहमानों का परवीन को घूरना परिजनों को असहज करता है जबकि परवीन के लिए यह एक सहज भाव है| 

यूँ तो कहानी चंदा लेने आये लोगों से लियाकत अली और उनके छोटे भाई के बीच तार्किक बातचीत से आगे बढती है| जहाँ बदले हुए माहौल में न सिर्फ खुद को बदलने की जरुरत पर बहस होती है, बल्कि बेहतर जीवन यापन के लिए बेहतर शिक्षा व्यवस्था पर भवें चढाने वाली बातें भी होती है| जीवन की मूलभूत जरूरतों के अनुसार समाज को मोड़ने की कोशिश की जाती है| मेहमानों को वाजिब हकीकत से वाकिफ कराने के बाबजूद वे नाराज न हो जाएँ; या फिर इधर – उधर की फालतू बात न सोचने लगें| इस ख्यालात से वे चंदा देने की बात करते हैं, लेकिन चंदा लेने वाले अब उनसे चंदा की नहीं, बल्कि सलाह की दरकार रखते हैं| और यही कहानी की सफलता है|

भाषा के लिहाज से इसमें कुछ शब्दों को छोड़ दें, तो पूरी कहानी हिंदी में है| वैसे परिवेश के अनुसार यदि उर्दू के कुछ और अल्फाजों को तरजीह दी जाती तो संभव था कि भाषा में कुछ और रवानी आती| परिवेश में स्वाभाविकता झलकती| हनीफ जी की शैली पाठकों को अंत अंत तो बांधे रखती है, लेकिन गंभीर विषयों में कुछ घटनाओं का समावेश भी उसे विशेष बनाता है|  

समय के साथ मुस्लिम समाज में भी पुरानी बंदिशें टूटने लगीं हैं| जलसे आदि में भी शिक्षा व्यवस्था में बदलाब पर बहस की शुरुआत हो चुकी है| लेकिन हनीफ मदार जैसे कलमकार इन विषयों पर कहानी लिखने की एक नयी परम्परा की शुरुआत कर क्रांति लाने की कोशिश कर रहे हैं|