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| उषा किरण खान |
बाबा नागार्जुन के मार्गदर्शन में बहुत ही छोटी उम्र से कविता लिखने वाली लड़की, हिंदी और मैथिली में सामान रूप से नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में लिखते हुए, अब साहित्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान के रूप में मशहूर है| साहित्य का एक लम्बा सफर तय करने के बाद भी वह लगातार लिख रही हैं| उनकी नयी किताब ‘अगनहिंडोला’ के बहाने पेश है सुशील कुमार भारद्वाज से हुई उनकी कुछ बातें:
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आपका नया उपन्यास अगनहिंडोला आया है? अगनहिंडोला का क्या मतलब है|
अगनहिंडोला ब्रजभाषा का एक शब्द है| जो दो शब्दों से बना है- अगन और हिंडोला |जिसमे अगन का अर्थ है “आग”, जबकि हिंडोला का मतलब है “झूला” यानि आग का झूला|
दरअसल में अगनहिंडोला शेरशाह सूरी के जीवन पर आधारित उपन्यास है| और सभी जानते हैं कि शेरशाह
सूरी युद्ध में मरे नहीं थे, बल्कि आग में जले थे|
मतलब आग के झूले में चढ कर चले गये|
‘अगनहिंडोला’ को आपने उपन्यास के शीर्षक
के रूप में क्यों पसंद किया?
मैं शीर्षक के रूप में देशी शब्द को रखना पसंद करती हूँ और अगनहिंडोला देशी शब्द के रूप में मुझे सही लगा| इसीलिए शेरशाह सूरी को ध्यान में रखकर, इसका नाम अगनहिंडोला रखा| ठीक वैसे ही जैसे विद्यापति के लिए सिरजनहार|
शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखने की कोई खास वजह?
शेरशाह सूरी पर लिखने की लालसा लगभग पन्द्रह वर्षों से थी| मैं उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित थी| वे बिहार के थे| बहुत बड़े विद्वान थे| उन्होंने हिंदी में पहला फरमान जारी किया था| घोड़ों का व्यापर करने वाले साधारण से परिवार में जन्म लेकर इस ऊँचाई तक पहुंचना कोई साधारण बात तो नही है| फिर शेरशाह के ही कार्यों को आगे बढाकर अकबर महान बन गया| ऐसी ही बहुत सी बातें थीं जो मेरे मन को छू रही थी| सिरजनहार लिखने के साथ ही मैंने सोच लिया था कि शेरशाह पर लिखकर ही अपने ऐतिहासिक उपन्यास लेखन का अंत करुँगी|
शेरशाह सूरी के जीवन पर लिखे कुछ उपन्यास के नाम स्मृति में है?
मुझे शेरशाह सूरी पर लिखी सुधाकर अदीब की उपन्यास –“शान– ऐ – तारीक” याद है| लेकिन मेरे और उनके उपन्यास में एक बहुत बड़ा फर्क है कि उनके लेखन में इतिहास अधिक है जबकि मेरे लेखन में सामाजिकता| इसी चर्चा के सम्बन्ध में इलाहाबाद विस्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एक प्रोफेसर का फोन आया था| जिसमें उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक दृष्टि से कहीं भी चूक नहीं हुई है, लेकिन संवाद पर थोडा भ्रम है| तो मैंने उन्हें कहा – “चतुर्वेदी जी आप उपन्यास पढ़ रहे हैं, ये तो किसी किताब में नहीं लिखा है कि कौन से शहंशाह अपनी किस बेगम से क्या बात करते थे? ये तो हम उपन्यासकार रोचकता को ध्यान में रखते हुए संवाद को लिखते हैं| यह पूरी तरीके से इतिहास बन जाये तो इसे पढ़ेगा कौन?”........ संभव है सूरी के जीवन पर किसी और भाषा में कोई और उपन्यास हो, लेकिन उसकी जानकारी अभी मेरे पास नहीं है|
इस ऐतिहासिक उपन्यास लिखने का अनुभव कैसा रहा?
समाज में रहते हुए अलग – अलग विचार के लोगों से मेल जोल होता है| बहुत सी बातों को जानने का मौका मिलता है| आसपास के माहौल से प्राप्त अनुभव से सामाजिक विषयों पर आसानी से लिखती हूँ| फिर भी इतिहास से सम्बन्ध होने की वजह से प्रमाणिकता पर ध्यान देती हूँ| लेकिन ऐतिहासिक विषयों पर लेखन से पूर्व काफी तैयारी करनी पड़ती है| प्रमाणिकता के दृष्टिकोण से बहुत सारी चीजों को ध्यान में रखना पड़ता है| कोशिश होती है कि हर संभव उपलब्ध ग्रन्थ, शोध, नाटक, कहानी, लेख आदि सम्बंधित चीजों का गहन अध्ययन कर जाऊँ| मौलिक किताबों की खोज करती हूँ| उसमें भी शेरशाह सूरी मेरे काल के विषय ठीक वैसे हीं नहीं थे, जैसे विद्यापति| लेकिन शेरशाह के बारें में कुछ छूटे नहीं, इसके लिए गुल बदन बेगम आदि तक की रचनाओं को पढ़ी| उसके अनुसार समय और सन्दर्भ को ठीक से समायोजित कर अपने साहित्यिक शैली में प्रस्तुत की जो कि बहुत ही श्रमसाध्य कार्य था|
इस तरह के ऐतिहासिक विषयों पर लिखे उपन्यासों के पाठकों के बारें में आप क्या सोचते हैं?
इतिहास को पढ़ने वाले लोग कुछ खास होते हैं| जबकि सामाजिक विषय पर लिखे उपन्यासों के पाठकों का वर्ग बड़ा है| कोई यह जान ले कि यह किताब विद्यापति या शेरशाह सूरी पर है तो कोई नहीं पढ़ेगा, जबतक कि उसे उनके बारे में जानने की लालसा न हो| लेकिन यदि उसे सामाजिकता के चासनी में एक अच्छी शैली में प्रस्तुत किया जाय तो कोई भी इसे पढ़ सकता है| जैसे कि कुछ लोगों ने अगनहिंडोला को बेमन से उठाया लेकिन एक ही बैठकी में पढकर संतुष्टि के भाव से उठे|
यूँ तो आप काफी छोटी उम्र से कविता का लेखन और पाठ करती रही हैं, लेकिन 1977 से आपने गद्य लेखन शुरू किया| तो 1977 से 2015 तक के सफर को आप किस रूप में देखती हैं?
हाँ, 1977 से 2015 तक का सफर एक लंबा साहित्यिक सफर रहा| उसके पहले कविता लिखती और पढ़ती थी, जो कि अब, सब इधर–उधर हो गया है इसलिए अब उसका कोई खास मतलब नहीं रह गया है| कहानी, उपन्यास, नाटक, आदि विभिन्न विधाओं में लिखते हुए थोडा संतुष्ट तो हूँ| लेकिन कभी कभी लगता है – मैं न तो पूर्ण रूप से लेखिका हूँ, न ही समाज-सेविका और न ही गृहिणी| इच्छा है कि किसी चीज में पूर्णता हासिल करूँ| मेरे साथ के लेखक – लेखिकाओं ने कितना अधिक लिखा है? मेरी भी कोशिश होगी कि अंत–अंत तक अधिक से अधिक सार्थक रचना दे सकूँ|
बाबा नागार्जुन का साथ आपको काफी मिला| उन्होंने आपके साहित्यिक जीवन और विचार पर कितना प्रभाव डाला?
बाबा नागार्जुन का प्रभाव हमारे विचारों पर नहीं पड़ा| वे तो कम्युनिस्ट विचारधारा के थे, लेकिन उनका प्रभाव मुझ पर बहुत अधिक पड़ा| वे मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे, साथ में कविता पाठ करने के लिए ले जाते थे| कभी –कभी किसी विवशता में इस तरह के आयोजनों में जाने से कतराती थी तो अक्सर वे प्रोत्साहित करते हुए कहते थे- “अधिक से अधिक लोगों से मिलो, उनके जीवन शैली को करीब से देखो| बहुत कुछ सीखने को मिलेगा|” मेरे घर पर रहते हुए एक घरेलू सदस्य की तरह हमेशा मार्गदर्शन करते रहे| बाद के दिनों में जब पढाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझते चली गयी तो सब छूटने लगा| एक दिन बाबा ने कहा- “काफी दिनों से कुछ लिखी नहीं हो, कुछ कुछ लिखते रहना चाहिए|” तब मैंने अपनी रूचि कहानी लिखने में बतायी| तब बाबा ने कहा – “कहानी के साथ-साथ उपन्यास भी लिखो| साथ ही उन्होंने सलाह दी कि गद्य लेखन से पहले अज्ञेय को पढ़ना चाहिए| भाषा कि रवानी अज्ञेय में है|” और अज्ञेय जी हँसते हुए कहते थे बाबा से बढ़कर कौन है? खैर, बाबा से मुझे हमेशा मार्गदर्शन मिलता रहा|
बाबा के अलावे और किन साहित्यकारों ने आपको प्रभावित किया?
हमारे यहाँ तो साहित्यकारों का आना – जाना काफी अरसे से रहा है| इसलिए बाबा के अलावे कई लोग प्रेरणा के रूप में सामने आये| लेकिन धर्मवीर भारती जी ने काफी प्रभावित किया| परंतु उनसे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई| होगी भी क्यों? कहीं बाहर जाने का मौका ही नही मिला| खासकर उनकी “गुलकी बन्नो” मुझे काफी पसंद आयी| गद्य लेखन की ओर तभी से मुड़ने की इच्छा हुई| वैसे तो प्रेरणा के रूप में क्या नही है? कालिदास कम हैं क्या?
विद्यार्थी जीवन में कविता करने वाली छोटी – सी किशोरी और पद्मश्री उषाकिरण खान में क्या अंतर है?
जब पद्मश्री मिला तो सोचने लगी कि – मैंने क्या किया है? जो यह मुझे मिला है| लेकिन जब स्कूल में थी| या आईएससी में पढते हुए बाबा के साथ कविता पाठ करने जाती थी, तो अजीब खुशी मिलती थी| लगता था कि कुछ खुद से लिखकर पढ़ी| कुछ खास काम किया| अज्ञेय जी, नामवर जी, काशीनाथ जी और धूमिल जी आदि के बीच मंच से कुछ भी प्रस्तुत करने पर लगता था कि बहुत कुछ हासिल हुआ| समय के साथ ज्यों –ज्यों ये लोग जितने प्रसिद्ध होते गए, उनके कहे शब्द हमारे अंदर उतने ही ऊर्जा भरते चले गए| लेकिन अब उस तरह का उल्लास – उमंग मन में नहीं भर पाता है|
आलोचना के बीच अपने साहित्यिक जीवन को कैसे बढाती हैं?
जीवन का इतना लंबा अनुभव हो गया है कि अब आलोचनाओं से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता है| और भी बहुत सारी बातें हैं जिंदगी में| अधिकांश समय स्वयं को इससे दूर कर लेती हूँ| और साहित्य का कार्य तो मैं निर्बिघ्न होकर करती हूँ|
इन दिनों नया क्या
चल रहा है?
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