सोमवार, 21 नवंबर 2022

रांगेय राघव की कब तक पुकारूँ

कब तक पुकारूँ प्रसिद्ध साहित्यकार, कहानीकार और उपन्यासकार रांगेय राघव द्वारा लिखा गया उपन्यास है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़ा 'बैर' एक ग्रामीण क्षेत्र है। वहाँ नटों की भी बस्ती है। तत्कालीन जरायम पेशा करनटों की संस्कृति पर आधारित एक सफल आँचलिक उपन्यास है। सुखराम करनट अवैध सम्बन्ध से उत्पन्न नायक है। नट खेल-तमाशे दिखाते हैं और नटनियाँ तमाशों के साथ-साथ दर्शकों को यौन-संतुष्टि देकर आजीविका में इजाफा करती हैं। करनटों की युवा लड़कियाँ प्रायः ठाकुरों के पास जाया करती थीं। नैतिकता क्या है, इसका ज्ञान उन्हें नहीं था। थोड़े से पैसों की खातिर वे कहीं भी चलने को तैयार हो जाती थीं।

पात्र परिचय

सुखराम इस उपन्यास का बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति है। सामाजिक विसंगतियों के बीच वह जूझता रहता है। निर्बलों के ऊपर होने वाले अत्याचार वह सह नहीं पाता है। कुछ पात्र तो महज कुप्रवृत्तियों में फँसे रहने के लिए ही रचे गए हैं। नारी पात्रों में प्यारी और कजरी प्रमुख हैं। प्यारी स्वच्छंद जीवन जीने वाली युवती है। कई व्यक्तियों के साथ उसके शारीरिक सम्बन्ध हैं जिन्हें वह अन्यथा नहीं मानती। यह तो शरीर की एक भूख है। खाते रहो, फिर लग जाती है। इसी प्रकार कजरी का चरित्र भी ऐसे ही जन-जीवन में ढला हुआ है। वह प्यारी की सौत बनकर सुखराम के साथ रहने लगती है और तरह-तरह के षड्यंत्र रचते हुए सौतिया डाह दिखाती है। अन्य स्त्री पात्र भी ऐसे ही हैं। भाषा-शैली करनटों के बीच व्यवहार की है। सभ्य समाज में जिस शब्दावली का उपयोग नहीं होता, वह भी इस उपन्यास में है। कुल मिलाकर यह बहुत सफल उपन्यास माना गया है।

समाजवादी-यथार्थवादी चित्रण

रांगेय राघव के ‘कब तक पुकारूँ’ उपन्यास में करनट कबिलों के जीवन यथार्थ का अनेक पक्षों में अंकन हुआ है। इसमें उन्होंने समाज में सर्वथा उपेक्षित उस वर्ग का चित्रण अत्यन्त सरल और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है, जिसे सभ्य समाज ‘नट’ या ‘करनट’ कहकर पुकारता है। इन कबिलों की कोई नैतिकता नहीं होती। इनमें मर्द, औरत को वेश्या बनाकर उसके द्वारा धन कमाते हैं। करनटों में यह छूट है। वहाँ कोई बुराई ‘सेक्स’ के आधार पर नहीं मानी जाती। उपन्यासकार इस भाव को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं, "औरत का काम औरत का काम है। उसमें बुरा–भला क्या? कौन नहीं करती? नहीं तो मार–मार कर खाल उड़ा देगा दरोगा और तेरे बाप और खसम दोनों को जेल भेज देगा। फिर कमरा न रहेगा तो क्या करेगी? फिर भी तो पेट भरने को यही करना होगा?" उपन्यास में अभिव्यक्त करनट समाज खानाबदोश, घोर उत्पीड़ित एवं शोषित है। यह उपन्यास संपूर्ण भारतीय ग्रामीण परिवेश को अपने साथ लेकर चलता हुआ प्रतीत होता है। जिसमें करनटों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को जीवन्त रूप में प्रस्तुत किया गया है।[

कथानक

'कब तक पुकारुं’ में जरायम पेशा समझी जाने वाली नटों की करनट जाति का चित्रण हुआ है। इसमें ऐसे ही एक करनट सुखराम अपनी जीवनगाथा इस उपन्‍यास में कहता है। करनट सुखराम अपने को ठाकुर समझता है। उसका विवाह करनट जाति की प्‍यारी से होता है, जो पहले एक दरोगा द्वारा भ्रष्‍ट की जाती है और फिर एक सिपाही की रखैल बन यौन कुण्ठाओं का शिकार बन जाती है। कजरी भी अपने पति को छोडकर सुखराम के साथ रहती है। कजरी इस संसार को छोड देती है। उस बच्‍ची का वह कोमल कान्‍त रुदन वह रुदन जिसमें इतिहास की विभीषिकाएं खो गई है, वह बच्‍ची जिसके पवित्र नयनों में नया जागरण ऐसे दैदीप्‍यमान हो रहा है, जैसे आदि महान् में जीवन कुलबुलाया था। चन्‍दा अंग्रेज युवती सूसन की कन्‍या होती है, जिसे सुखराम पालता है। वह लड़की चन्‍दा ठाकुर नरेश से प्रेम करती है और वह भी ठकुराइन बनने का स्‍वप्‍न देखती है। अन्‍त में मानसिक आवेग की अवस्‍था में ही चन्‍दा की मृत्‍यु हो जाती है।

वस्‍तु विधान

‘कब तक पुकारुं ’ में सुखराम की कथा मुख्‍यकथा है और प्रासंगिक कथाओं में कजरी और प्‍यारी की कथा है। सुखराम, कजरी और प्‍यारी के चारों ओर उपन्‍यास की कथा घूमती है। अन्‍य कथाओं में चंदा सूसन और लारेंस आदि की कथाएं है। उपन्‍यास को लेखक ने मनोवैज्ञानिक धरातल पर स्‍थापित करते हुए इतिवृत्‍तात्‍मक बना दिया है और वह जासूसी और अय्यारी उपन्‍यासों की तरह किस्‍सागोई से कम नहीं है। लेखक ने कई पीढ़ियों को एक साथ गूंथने का प्रयास किया है, इसलिए इसका वस्‍तु विधान बोझिल हो गया है। जिस प्रकार ‘भूले बिखरे चित्र’ मे ज्‍वालाप्रसाद की चार पीढ़ियों के कथानक को जोड़ने का प्रयत्‍न किया गया है, वही कार्य सुखराम यहाँ करता है किन्‍तु यहाँ बिखराव आ गया है। चन्‍दा की विस्‍तृत कथा को उपन्‍यासकार उपन्‍यास का अंग नहीं बना सका है। अनेकानेक स्‍थलों पर अनावश्‍यक विस्‍तार है। यह अनावश्‍यक विस्‍तार आंचलिक चित्रण की प्रवृत्ति अचल के रीति-रिवाजों, लोकाचारों, वातावरण-चित्रण प्रकृति-चित्रण और नैतिक-सामाजिक मान्‍यताओं की स्‍थापना के फलस्‍वरुप हुआ है। लेखक अधिक कष्‍टों के जीवन चित्रण करना चाहता है, इसलिए अनावश्‍यक प्रसंगों को उपन्‍यास में स्‍थान मिल गया है। अत: समाजशास्‍त्रीय दृष्टिकोण के फलस्‍वरुप उपन्‍यास की वस्‍तु अंविति मे बाधा पहुँची है।

चरित्र वर्णन

सुखराम, कजरी और प्‍यारी इस उपन्‍यास के मूल्‍य पात्र है इसलिए इनके चारों ओर इसकी कथा घूमती है और अन्‍य पात्रों में चन्‍दा, सूसन और लारेंस आदि है किन्‍तु चन्‍दा को छोडकर अन्‍य पात्र गौण है। सुखराम ही उपन्‍यास का केन्‍द्रबिंदु है, इसलिए उसे उपन्‍यास का नायक मानना चाहिये। सुखराम में आभिजात्‍य वर्ग की महत्‍वाकांक्षाएँ है। ‘अधूरा क़िला’ उसकी महत्‍वाकांक्षाओं का प्रतीक है। शोषण के प्रति उसके हदय में विद्रोह है। पुलिस और समाज के शोषण वर्गो के प्रति उसके हदय में विद्रोह की भावना है। उसकी पत्‍नी प्‍यारी रुग्‍तमखा की रखैल बन जाती है, किन्‍तु वह पत्‍नी का ग़ुलाम बनना नहीं चाहता। लेखक की मानवतावादी भावनाओं को सुखराम ही अभिव्‍यक्‍त करता है। वह अभावों, कमियों, बुर्बलताओं और शक्तियों का पुंज है। प्‍यारी अपने वर्ग की नारियों की दुर्बलताओं और अभावों को अभिव्‍यक्‍त करती है। प्‍यारी का चित्रण लेखक ने करनटों के नारी जीवन की दुर्दशाओं और भोग्‍या नारी के चित्रण करने के लिए किया है। प्‍यारी, अपनी परिस्थितियों से पीडित होकर, करनटी के नारी समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन की अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम बन कर रह जाती है, किन्‍तु कजरी परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपने को अभिव्‍यक्‍त करती है। कजरी भी भोग्‍या है किन्‍तु उसमें प्रतिष्‍ठा के साथ-साथ नारी सुलभ ईर्ष्‍या भी है और नारी का ममत्‍व भी। नारी की संवेदनशीलता और करुणा भी उसमें कम नहीं है। प्‍यारी के समान परिस्थितियों से पीड़ित बनकर उपन्‍यास में अभिव्‍यक्‍त होती है। पात्रों के सृजन में लेखक पूर्ण रुप से निर्वैक्तिक नहीं रहा है, क्‍योंकि वह समाजशास्‍त्रीय दृष्टिकोण के पूर्वाग्रह से मुक्‍त नहीं हो सका है। इतना होने पर भी सुखराम, प्‍यारी और कजरी हास्‍य और अश्रु, आशाओं और निराशाओं में झुलते हुए अपना जीवन जीते हैं। सुखराम और कजरी बदलती परिस्थितियों के साथ उठते गिरते आगे बढ़ते हैं किन्तु प्‍यारी में विकास की सम्‍भावनायें नहीं है। नि:स्‍सदेह सुखराम, कजरी और प्‍यारी उपन्यास के प्राणवान पात्र है।

उद्देश्‍य

करनटों के नैतिक जीवन को प्रस्‍तुत करना ही उपन्यासकार का उद्देश्‍य है। लेखक का कथन है, ‘मैंने इनकी नैतिकता को समाज का आदर्श बनाकर प्रस्‍तुत नहीं किया है।’ बल्कि पाठकों को इसमें मैक्‍स की ऐसी जानकारी के रुप में हासिल करना चाहिये कि यह इनमें होता है। यह सारा समाज खानाबदोश है, उत्‍पीडित है, शोषित है। न इनके सामाजिक नियम शाश्वत है। न हमारी नैतिकता के बन्‍धन ही शाश्‍वत है। सुखराम के शब्‍दों में लेखक उपन्‍यास के आशय को स्‍पष्‍ट कर रहा है, ‘यह कमीने, नीच ही आज इन्‍सान है। इनके अतिरिक्‍त सबमें पाप घुस गया है क्‍योंकि इन सबके स्‍थार्थ और अहंकारों ने इनकी आत्मा को दास बना दिया है। ये कमीने और ग़रीब अशिक्षा और अंधकार में छटपटा रहे हैं। जब तक ये शिक्षित नहीं होते, तब तक इन पर अत्‍याचार होता ही रहेगा। जब तक ये शिक्षित नहीं होते, तब तक इनके अज्ञान, फूट और घृणा पर संसार में जघन्‍यता का केन्‍द्र बना रहेगा। तब तक इनके पुत्र धरती की मिट्टी में पैदा होते रहेंगे। शोषण की घुटन सदा नहीं रहेगी। वह मिट जायेगी, सदा के लिए मिट जायेगी।' इस उपन्‍यास में लेखक ने जीवन के प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रस्‍तुत किया है।

यह समाजवादी चेतना का उपन्‍यास है। इस उपन्‍यास में लेखक ने समाजवादी-यथार्थवाद का सफल चित्रांकन किया है। शोषण, सामाजिक अन्‍याय, बुर्जुआ मनोवृत्ति एवं असमानता के विरुद्ध आवाज़ उठाई है। प्रगतिशील चेतना के फलस्‍वरुप इसको समाजवादी चेतना का उपन्‍यास कह सकते है क्‍योंकि करनटी के जीवन का चित्रण कर, शोषित वर्ग पर होने वाले शोषण का चित्र खींचकर जनवादी परम्‍परा में अपना स्‍थान बना दिया है। वर्ग संघर्ष की कहानी होने के कारण समाजवादी उपन्‍यासों की श्रेणी में इस उपन्‍यास को स्‍थान मिलना चाहिये।

शनिवार, 19 नवंबर 2022

मानवता की कहानी है कमलेश की पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां - सुशील कुमार भारद्वाज

 मानवता की कहानी है पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

- सुशील कुमार भारद्वाज 



“दक्खिन टोला” जैसी कहानी संग्रह के बाद कमलेश ने "पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां" के साथ अपनी महत्वपूर्ण  उपस्थिति साहित्यिक परिदृश्य में सक्रियता से दर्ज की है। कमलेश की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वे कहानियों को गुनने और उसे रोमांचक तरीके से कहने में माहिर हैं। इनकी कहानी आपको आकर्षित नहीं करती है बल्कि कहानी अपने परिवेश में आपको अवशोषित कर लेती है। कहानी की एक ऐसी दुनिया जिसमें कोरी कल्पना या ढकोसला या बनावटीपन नहीं दिखता। दिखता है तो आपका, हमारा या हमारे परिवेश के किसी व्यक्ति का दर्द और संघर्ष। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था का ऐसा ताना-बाना जिसमें इंसान अपने अस्तित्व के लिए जूझता नजर आता है। 

कथाकार के पहले संग्रह का नाम “दक्खिन टोला” है तो इस दूसरे संग्रह को सांकेतिक रूप से उत्तर टोला भी कहा जा सकता है. दरअसल कमलेश के इस दूसरे संग्रह को देखा जाय तो, स्पष्ट रूप में यह दो भाग में विभक्त नज़र आता है। एक तरफ तिवारी जी हैं, जो जिन्दगी के झंझावातों का सामना विभिन्न रूप में विविध जगह पर कर रहे हैं। और दूसरी तरफ आदिवासी लोग हैं जो अपनी जमीन, पेड़, पहाड़ और संस्कृति को बचाने के लिए पत्थलगड़ी जैसी परम्परा का सहारा ले रहे हैं। चूँकि कथाकार गत वर्षों से रांची में ही पदस्थापित हैं और हाल के वर्षों में इस पत्थलगड़ी प्रकरण की वजह से झारखण्ड काफी चर्चा में भी रहा, जिसे उन्होंने करीब से जाना–समझा और कहानी के माध्यम से लोगों को इसके बारे में जागरूक करने की कोशिश की। दूसरी महत्वपूर्ण बात कि संग्रह की अधिकांश कहानियों का उद्गम स्थल कहें या लोकेल कहें वह बिहार का बक्सर जिला है जिसका चारित्रिक उभार भी कुछ कहानियों में नज़र आता है। 

संग्रह की कहानियों को संक्षिप्त रूप में देखा जाय तो पहली कहानी अघोरी में तिवारीजी का अजीब दर्द उभरता है। एक इंसान जो अपनी नामर्दगी की वजह से कुंठाग्रस्त है। जो जीवन से पलायन करते करते अपना घर-परिवार सबकुछ खो कर लगभग विक्षिप्त-सा व्यवहार करता है। उसे हमारा समाज सिद्ध पुरूष-अघोरी के रूप में विख्यात किये हुये रहता है। तिवारीजी के दुःख-दर्द को समझने-बूझने और इलाज कराने की बजाय अंधविश्वास में डूबे इंसान उसी से अपना इलाज कराने चले आते हैं जो कुंठा में आकंठ डूबा हुआ है। दूसरी कहानी पत्थलगड़ी विगत वर्ष में झारखंड की चर्चित पत्थलगड़ी प्रकरण को विशेष रूप से खोलती नज़र आती है। यह कहानी आदिवासी समाज के जीवन संघर्ष को बयां करती है। आलसाराम, बिसराम बेदिया और सोगराम जैसे धुनी लोगों के बहाने उस निरीह आदिवासी समाज की पड़ताल करती है यह कहानी, जिनकी जमीन, जंगल और जीवन सरकार एवं पूंजीपतियों के षड्यंत्रकारी हवस की शिकार हो जाती है।

संग्रह की तीसरी कहानी "बाबा साहब की बांह" जातिवाद के जंजाल में फंसे समाज की खबर लेती है। जहां रवि, सुनील, इम्तियाज और राघव जैसे किताबी इम्तिहान में फेल आवारा टाईप के लड़के अपने मानवीय और सामाजिक समरसता के गुण के बदौलत समाज में फैलते दंगा-फसाद को रोकने की एक सफल कोशिश करते हैं। भले ही राजनेता अपनी वोट की राजनीति के लिए आरक्षण और जातिवाद को अपनी सुविधानुसार विभिन्न रंगों में रंगने की कोशिश करते हों।

आदिवासी समाज पर केन्द्रित दूसरी और इस संग्रह की चौथी कहानी है  "खिड़की"। पूंजीवाद का शिकार व्यवस्था किस कदर भोलेभाले आदिवासी को मानसिक, शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है?  सच को जानते हुए भी झूठ को सच बना देने की जद्दोजहद से परिचय कराती है यह कहानी। 

"लालकोट" एक पारिवारिक ज़िम्मेदारी की पृष्ठभूमि पर लिखी गई संग्रह की पांचवीं कहानी है। जहां तिवारीजी को लव एट फर्स्ट साइट का भ्रम होता है लेकिन ज्योंही उन्हें एक बेटी का दिल पिता के लिए धड़कता हुआ महसूस होता है उन्हें अपनी बेटी की याद आने लगती है। कह सकते हैं कि पिता-पुत्री के प्रेम पर केंद्रित यह संग्रह की दूसरी कहानी है।

छोटन तिवारी का कला के प्रति अगाध लगाव और स्वयं घर-परिवार, समाज और जाति-धर्म से परे व्यवसाय को शौक के लिए अपनाकर लवण्डा बन जाने की कहानी है "प्रेम अगिन में"।

"बोक्का" कहानी के बहाने कथाकार कमलेश ने कामरेडों के कथनी और करनी के अंतर को निशाने पर लेने की कोशिश की है। कहें कि कम्युनिस्टों की छल-क्षदम को बेनकाब करने की कोशिश की है। सुदर्शन तिवारी जाति-धर्म का नारा लगाते हुए कहते हैं कि गरीबों का जाति-धर्म सिर्फ गरीबी है। सभी मजदूर एक हो जाएं। लेकिन वे अपनी बेटी गीता की शादी उसके प्रेमी कालिका ठाकुर से करवाने की बजाय उसके प्रेमी को ही दुनिया से ही रूखसत करने की कोशिश करते हैं।

"कर्ज़" कहानी भी तिवारीजी से ही शुरू होती है लेकिन कथाकार ने इसमें वैसे लोगों की बदहाली को बयां किया है जो महाजनी प्रथा के शिकार हो तन-मन-धन से सबकुछ खो चुके हैं और सरकारी व्यवस्था भी उन सूदखोर या दलाल का ही साथ देती नज़र आती है। जबकि "परिणाम" कहानी में कथाकार ने परिवार के भावनात्मक पहलू को छूने की कोशिश की है जहां पिता और पुत्र के भावनात्मक रूप से समन्वय नहीं हो पाने की वजह से परिवार बिखर जाता है। शायद बदलते समय की ही यह परिणति है।

संग्रह की अंतिम कहानी "भाई" एक ऐसे मुसहर पोस्टमास्टर की कहानी बयां करती है जो खुद इज्ज़त और स्वाभिमान की खातिर अपने घर की नौकरी से झारखंड के खूंटी जिले के अनिगड़ा में स्थानांतरण करा लेता है। लेकिन उसकी पहचान और उसका बीता हुआ समय उसका पीछा नहीं छोड़ता है। सुभरन मुंडा में उसे अपने भाई की ही छवि नज़र नहीं आती है बल्कि उसका गुण, संघर्ष और विचार भी एकाकार होता नज़र आता है। विषम परिस्थितियों की वजह से राघव सदा चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर पाता है। लेकिन सुभरन के इनकॉनटर की खबर से वह इस कदर भावावेश हो जाता है कि वह हिम्मत करके पत्थलगड़ी गांव घाघरा की ओर अपनी बाईक बढ़ा ही देता है। 

संग्रह में प्रस्तुत भाषा सामान्य परिवेशगत है तो बोली पात्रानुकूल और कहानी को विश्वनीयता प्रदान करने में सहायक है। कहीं भी क्लिष्ट शब्द या वाक्य का प्रयोग नहीं किया गया है जो कि कहानी की पठनीयता को सहज और सुगम बनाता है। कथाकार कहीं भी हड़बड़ी में नहीं दिखता है बल्कि बहुत ही धैर्य के साथ कहानी को धीमी आंच पर पकाते हुए धीरे धीरे परिणति की ओर बढ़ता है। यूँ कहें की कमलेश एक सामान्य इन्सान की असामान्य जिन्दगी बहुत ही सहजता और पठनीयता के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत करने की सफल कोशिश करते हैं। पात्रों को धीरे धीरे कहानी के अनुसार प्याज के छिलके की तरह अलग अलग परत में दिखाने की कोशिश करते हैं। व्यक्ति ही नहीं बल्कि स्थान को भी एक चरित्र के रूप में उभारने की कोशिश करते हैं। समग्रता में संग्रह की कहानियां मानवता की कहानी है। 

 

पुस्तक:- पत्थलगड़ी और अन्य कहानियां

कथाकार:- कमलेश 

प्रकाशक:- सेतु प्रकाशन प्रा. लि.

पृष्ठ:- 190

मूल्य:- 250/- 


सुशील कुमार भारद्वाज 



संपर्क:- 

मो- 8210229414

Email- sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

अवधेश प्रीत की रूई लपेटी आग की समीक्षा

 

उपन्यास 'रुई लपेटी आग'

परमाणु बमों की होड़ के बरक्स मनुष्यता को बचाने का आह्वान


-   
सुशील कुमार भारद्वाज

 

फिलवक्त जब एक तरफ रूस-यूक्रेन के बीच लम्बे अरसे से युद्ध चल रहा है तो दूसरी तरफ चीन-ताइवान आमने –सामने की स्थिति में हैं और स युद्धोन्माद में सम्पूर्ण विश्व गोलबंद हो रहा है. ऐसी स्थिति में कब तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाए या किसी सनक के पल में कोई सत्ताकांक्षी राष्ट्राध्यक्ष परमाणु शक्ति का प्रयोग कर बैठे, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.इससे पूर्व हम हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु शक्ति के प्रयोग से पैदा हुई भीषण मानवीय तबाही को देख चुके हैं. इस परिप्रेक्ष्य में अवधेश प्रीत का नया उपन्यास “रुई लपेटी आग” परमाणु परीक्षणों की होड़, उनसे उपजी त्रासदी और मनुष्यता के सामने उपस्थित संकट को सम्बोधित करता हुआ कहीं ज़्यादा प्रासंगिक है और विनाश बनाम सृजन के विमर्श पर ज़ोर देता है.

पोखरण की पृष्ठभूमि में परमाणु परीक्षण के जरिये मानवता के सबसे बड़े दुश्मन, परमाणु हथियारों की संहारक शक्ति की याद दिलाते हुए उपन्यास पोखरण रेंज के निकटवर्ती गांवों में उत्पन्न मानवीय संकट का जो वीभत्स चित्र प्रस्तुत करता है, वह ऐसे विस्फोटों और कथित उपलब्धियों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है.  परमाणु-परीक्षण के समय निकले विकिरण की वजह से आसपास के कई गांव गंभीर बीमारियों का शिकार हो गये हैं. इन ग्रामीणों की स्थिति यह है कि दुश्मन तो बाद में मारेगा पहले स्वयं के परीक्षण से मर रहे हैं. पोखरण के आस-पास के इलाके के समर्थ लोग अपने गांवों से पलायन कर चुके हैं .लेकिन निसहाय लोग उसी अभिशप्त भूमि में अपना घर-बार, खेत-खलिहान और बची-खुची सम्पत्ति के साथ रहने को मजबूर हैं, जिनकी आँखों में न तो सुकून की नींद है, सुकून की ज़िन्दगी.

उपन्यास परमाणु परीक्षण की डरावनी फैंटेसी से शुरू होता है और अंत एक खुशनुमा पखावज वादन के कार्यक्रम से होता है. इसी ओर छोर में बुनी उपन्यास की कथा वैज्ञानिक कल्लू उर्फ़ कलीमुद्दीन अंसारी, पखावज की विदुषी अरुंधती उर्फ़ अरु उसकी शोध छात्रा बया और उसके दोस्त दीप के माध्यम से विस्तार पाती है. कलीमुद्दीन अंसारी के नेतृत्व में देश सफल परमाणु परीक्षण को अंज़ाम देता है, लेकिन उसके नेपथ्य में जो मानवीय संकट पैदा होती है, उसे सभी नज़रअंदाज़ करते हैं, यह उपन्यास उसी  संकट को सामने लाता है और परमाणु बमों के औचित्य को कठघरे में खड़ा करता है. इस प्रश्न के इर्द गिर्द वे बुनियादी प्रश्न भी उजागर होते हैं, जो एक गरीब मुल्क, उसकी बुनियादी ज़रूरतों और उसके हासिल -ज़मा का पर सोचने को विवश करता है. यह उपन्यास न्यूक्लियर बमों के औचित्य और उसके बरक्स मनुष्य समाज के विनाश के ख़तरे पर विमर्श के लिए आधार प्रस्तुत करता है. लेकिन यह उपन्यास का अगर केंद्रीय भाव है, तो कल्लू और अरु का मौन प्रेम तथा बया और दीप का अनकहा प्रेम उपन्यास के पात्रों के संबंधों को मज़बूती देता है, उदात्तता प्रदान करता है. बाबा रामरतन पखावजी और अंसारी चा के रिश्तों के माध्यम से लेखक ने उस समाज की बुनावट पर गहन और अंतरंग दृष्टि डाली है, जो ख़ालिस और पुरखुलूस हुआ करते थे. यह भारतीयता के उदार चरित्र का खूबसूरत चित्र है. अरुंधती पखावज की विदुषी है, परमाणु वैज्ञानिक कलीमुद्दीन अंसारी की बचपन की दोस्त है, वह ऐसे विस्फोट के विरुद्ध है. यह खूबसूरत कंट्रास्ट इस उपन्यास को गति देता है. और कथा में अनेक शेड्स रचता है.परमाणु के बरक्स पखावज के महत्व को उपन्यास की कथा में एक किंवदंती के ज़रिये प्रतीकित किया गया है,शिव के तांडव को लयबद्ध करने के लिए ब्रह्मा ने इसकी रचना की थी ताकि सृष्टि को विनाश से रोका जा सके. अरुंधति के शब्दों में कहें तो, “यह एक विचित्र संयोग है कि इसी राजस्थान में नाथद्वारा है, जहाँ पखावजवादन की परम्परा समृद्ध हुई. जहाँ सृजन की जड़ें मजबूत हुई. उसी राजस्थान के इस पोखरण क्षेत्र में विनाश की व्यवस्था की गई है. परमाणु बमों का परीक्षण किया गया. जहाँ से भगवान श्रीनाथजी के मंदिर में वात्सल्य, शांति, और भक्ति की रसधार बही, उसी धरती के इस छोर पर जिन्दा लोगों को जिन्दा-जी मार देने का उपक्रम किया जाना एक भयावह विडम्बना है.” (पृष्ठ -273, अवधेश प्रीत, रुई लपेटी आग)

“रुई लपेटी आग” सामाजिक सरोकारों के बड़े सवालों के साथ-साथ शेरों, कविताओं से अनेक अनकहे को संजीदगी से व्यक्त करता है, तो पूर्वकथा,अंतर्कथा, कथान्तर, परिकथा, उपकथा, अनुकथा, एवं इतिकथा शीर्षकों के अंतर्गत पूरे वितान को खड़ा करता है.उपन्यास बया, अरुंधती, कल्लू, चन्दन, गुनी, दीप, पंडितजी, और अंसारी चा के सहारे ही मुख्य रूप से खुलता है और देश-समाज के विभन्न जनसरोकारों के मुद्दों के साथ-साथ भारतीय जीवन शैली का प्रमाणिकता पक्ष प्रस्तुत करता है.

उपन्यास 1974 के पहले परमाणु परीक्षण की याद दिलाता हुआ 1998 में हुए परमाणु परीक्षण के समानांतर उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सामरिक एवं वैज्ञानिक तर्क-वितर्क के बीच राष्ट्रवादी सरकार की परमाणु नीति का विहंगावलोकन के साथ-साथ परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की सीटीबीटी पर हस्ताक्षर सम्बन्धी नीति की भी  ख़बर लेता है. 

लेखक ने बया और दीप के नाथद्वारा परम्परा पर शोध के बहाने पखावज की उत्पत्ति एवं विकास के विविध आयामों को लौकिक एवं मिथकीय उदाहरणों के साथ, उसके तकनीकी पक्ष को इस तरह गूंथा है कि वह कहीं से बोझिल नहीं हुआ. इसीके पार्श्व में बया और दीप का प्रेम पनपता है, जो कारगिल युद्ध की भेंट चढ़ जाता है. उपन्यास में कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू और अरुंधती उर्फ़ अरु का ख़ामोश प्रेम पाठकों के मन प्राण को बांधता है, हरदेव प्रताप बच्चू और मोनीषा चटर्जी का प्रेम जाति और झूठी सामंती शानो-शौकत को ठुकरा कर अपनी उच्च गरिमा के साथ स्थापित होता है. उपन्यास में जो एक चरित्र अपनी उपस्थिति से पाठकों की स्मृति को आंदोलित करता है वह है गुनी. सामाजिक रूप से उपेक्षित, आर्थिक रूप से कमज़ोर गुनी सामंती शोषण, अत्याचार और उठकर खड़ी हो जानेवाली यह स्त्री भारतीय समाज के वीभत्स चेहरे को उसकी पूरी विद्रुपता के साथ निर्वसन करती है और पूछती है, बम फोड़े से पेट भर जात हौ का

अवधेश प्रीत एक सिद्धहस्त कथाकार है, उनकी भाषा देशकाल के अनुरूप पात्रानुकूल हिंदी, उर्दू,अवधी और अन्य स्थानीय भाषाओं, बोलियों के प्रयोग से समृद्ध होती है.इस उपन्यास में भी हिंदी, उर्दू के अलावा उन्होंने अवधी एवं राजस्थानी आदि का बखूबी इस्तेमाल किया है, जो स्थानीयता और पात्रों की बनावट को विश्वसनीयता प्रदान करती है.  

उपन्यास के कवर पृष्ठ पर जो पंच लाइन है, वह घोषणा करती है,“परमाणु हथियारों की संहार-शक्ति बनाम संगीत की सृजन-शक्ति एक विचारोत्तेजक उपन्यास”. यह पंक्ति इस उपन्यास के केंद्रीय भाव को रेखांकित करती है और यह विमर्श आमंत्रित करती है कि बतौर नागरिक हम किस ओर खड़े हैं?  संगीत के बहाने जीवन की रचनात्मकता के पक्ष में हैं या राष्ट्रवाद के उन्माद में अपने विनाश का चयन करते हैं.

उपन्यास : रुई लपेटी आग

उपन्यासकार: अवधेश प्रीत

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली

पृष्ठ: 280

मूल्य: 299/-