शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को (कविता): सुशील कुमार भारद्वाज

मैंने आह्वान किया था पागल बनने को
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-सुशील कुमार भारद्वाज


नहीं मानता तूझे अपना प्रधान,
नहीं मानता मैं तेरा फरमान।
तू कहेगा पूरब जिसे,
पश्चिम कहूँगा मैं उसे।
तू करेगा स्वच्छता की बात,
मैं करूँगा गंदगी की बात।
तू पूजेगा राम को,
मैं पूजूँगा रावण को।
तू कहेगा प्रगति की बात,
मैं करूँगा जड़त्व की बात।
तू कहेगा अनुशासन की बात,
मैं करूँगा अभिव्यक्ति की बात।
तू कहेगा कुऐं में मत कूद,
मैं कहूँगा जल्दी से कूद।
तू पूजता है गोडसे को,
मैं पूजता हूँ गाँधी को।
तू कहेगा अहिंसा ही धर्म है,
मैं कहूँगा देश को जलाना ही कर्म है।
बस इतना समझ ले तू,
आजीवन का मेरा वैर है तू।
जिस दिन तू कहेगा जिंदा रहने को,
उस दिन कहूँगा खुद को जिंदा जलाने को।
तू कहेगा इंसान बनने को,
मैं आह्वान करूँगा हैवान बनने को।
क्योंकि तूने कहा पागल नहीं बनने को,
इसलिए मैंने आह्वान किया था पागल बनने को।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★
#सुकुभा

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

मुस्लिमों के लिए बुद्धिजीवियों का नकली प्रेम

यह भी किसी क्रूर सच्चाई से कम नहीं है कि भारत के अधिकांश राजनीतिक दल और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग #मुस्लिम शब्द सुनते ही इतने दरियादिल हो जाते हैं कि लगता है कि सहानुभूति में वे अपना सर्वस्व न्योछावर कर देंगें। लेकिन उनके दिल में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए व्यवहार या फिर 1984 के सिख दंगे के पीड़ितों के लिए कोई दर्द नहीं झलकता है। जबकि उन्हें या तो सबकी बात करनी चाहिए या किसी की भी बात नहीं करनी चाहिए।
कितने आश्चर्य की बात है कि तत्कालीन जम्मू कश्मीर में पाक के साथ दोहरी नागरिकता का खेल वर्षों से चलता रहा लेकिन कभी उनके लिए आवाज उठाने की फुर्सत किसी को नहीं मिली। चीन बार-बार जम्मू कश्मीर के लिए नत्थी करके वीजा जारी करता रहा लेकिन प्रकांड विद्वान सब कान में तेल डालकर सोते रहे।
जिस देश में स्वजातीय और स्वधर्मियों के लिए कभी मदद के लिए आगे नहीं आए वे आज धर्मनिरपेक्षता का राग अलाप रहे हैं। भाई, अपना घर (घर व्यापक संदर्भ में) सँभाल लीजिए बाद बाँकी तो संविधान संशोधन कभी भी कर सकते हैं। ये तो आपके हाथ का खिलौना है। इतना शोर मचाने से आप किसी का भला नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी राजनीतिक बुद्धि या कुंठा को उजागर कर रहे हैं। आपलोगों की विचारधारा ने भारत को नियतिवादी बनाकर छोड़ दिया है। कम से कम अब तो इसे प्रगति के पथ पर बढ़ने दीजिए। फिर आपलोगों ने #असहिष्णुता का कितना गंदा खेल खेला उसे सम्पूर्ण विश्व ने देखा। आखिर आपने आजादी के बाद कैसे भारत (धर्मनिरपेक्ष माहौल) को तैयार किया कि मुस्लिम आज तक भयभीत हैं? क्या किसी को साल-दो-साल में डर लग सकता है? कदापि नहीं। जिस देश में मुस्लिम राष्ट्रपति की कुर्सी तक बड़ी सहजता के साथ पहुँचे उस देश में यदि कोई उप-राष्ट्रपति तक असहजता और असहिष्णुता की बात करें। तो ऐसे देश में आखिर कोई मुस्लिम शरण लेने क्यों आएगा? यकीनन वो आतंकवाद और आईएसआई का एजेंट बनकर अशांति फैलाने के ख्याल से ही आएगा। तो क्या आप इन आतंकवादियों और मानवता के दुश्मनों को प्रश्रय देकर देश को ही नहीं बल्कि अपनी पीढ़ी को ही बर्बाद करना चाहते हैं?
यदि आप सच में मुस्लिम के हिमायती हैं तो देश में रह रहे मुस्लिमों के पक्ष में काम करें। उनके शिक्षा और जीवनशैली में सुधार करें। सच्चर कमेटी की बताई कमियों को दूर करने की कोशिश करें जो आपकी धर्मनिरपेक्ष सरकार द्वारा छोड़ी गई सौगात है।
★★★★★★★★★★★★★
सुशील कुमार भारद्वाज

रविवार, 1 दिसंबर 2019

हत्यारा (कविता) : सुशील कुमार भारद्वाज

                                                   
हत्यारा
★★★★★★★

आँखों के भ्रम को यूँ न दिल से लगाइए कि
दिल और दिमाग काम करना ही कर दे बंद सही में।
आखिर किस बेजा पर एक हत्यारे को सही
और दूसरे को गलत करार देते हो?
हत्यारा तो केवल हत्यारा होता है।
वह जिस्म का हत्यारा है तो
मानवता और इंसानियत कहाँ शेष बची है?
ढ़ूंढ़ रहे हो तुम हत्यारे की जाति-धर्म?
कहाँ ढ़ूढ़ पाओगे तुम संस्कार और रिश्ते?
सभी यहीं पले-बढ़े हैं, हमसब के बीच!
हत्यारे को तो तुम पैदा कर रहे हो हर रोज
अपनी स्वार्थपरता की अँधी दौड़ में।
किसी हत्यारे को पूजते हो घर- मंदिर में,
और किसी हत्यारे को देते हो गाली!
तुम ही तो हत्यारों के लिए आते हो अदालतों में,
और देते हो मानवाधिकार की दलील।
कौन कहता है कि नहीं बैठा है हत्यारा
घर से बाहर तक अपने घात में?
जरा-सी गुस्ताखी तो करो
हत्यारे की विरोध की।

★★★★★★★★★★★★★
सुकुभा