मालिनी गौतम के गजल में भाषा की रवानी है तो भावों में संवेदना की अभिव्यक्ति. इनके भाव –संसार में करूणा और चित्कार का समावेश है तो आक्रोश की गूंज भी. शब्दों का संयोजन भी काबिलेगौर है. पढ़ते हैं मालिनी गौतम की कुछ गजलों को:-
ग़ज़ल 1
कभी आँखें दिखाते हो कभी ख़जर
चलाते हो
गरीबों पर बताओ इस तरह क्यों
जुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारखानों में हैं मरते
लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी
बहाते हो
रखोगे कैद कब तक रौशनी को अपने
महलों में
उजालों को भी तुम अपना-पराया
क्यों सिखाते हो
दवा-दारू, मिठाई, तेल-घी की छोड़
दो बातें
महब्बत में भी तुम तो ज़हर नफरत
का मिलाते हो
पढ़ाते पाठ लोगों को सचाई और नेकी
का
स्वयं बाजार में ईमान की बोली
लगाते हो
वो चीखें जो उड़ा देतीं तुम्हारी
नींद रातों की
उन्हें गूँगा बनाने का हुनर
क्यों आजमाते हो
ग़ज़ल
2
चाय की कुछ चुस्कियों में जिंदगी
को पी गये
घिसते-घिसते एड़ियाँ वे उम्र पूरी
जी गये
नोट बरसाने लगे नेताजी अपनी जीत
पर
लूटने उनको गली के चन्द बच्चे ही
गये
रेल औ’ बस में मिले हमको नये चहरे कई
कुछ हँसे अपना समझकर कुछ लबों को
सी गये
खिलखिलाती धूप जैसे जब मिले कुछ
पल उन्हें
भूल कर अपनी थकन वे उन पलों को
जी गये
हर तरफ से मार मौसम की पड़ी कुछ
इस क़दर
चंद लमहे थे खुशी के हाथ से वो
भी गये
ग़ज़ल
3
झूठ है जिनकी नस-नस में
सत्य नहीं उनके बस में
बाहर उजियारा दिखता
घोर अँधेरा अंतस में
चाहे जितना खौफ बढ़े
हो न कमी कुछ साहस में
वे ही गुण अपनाओ तुम
जो गुण होते पारस में
अँधियारों से लड़ने को
तीर न कोई तरकस में
ग़ज़ल 4
वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ जुल्म
ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को
खिलाती है
नशे में धुत्त अपने आदमी से मार
खाकर भी
बहुत जिन्दादिली से दर्द को वो
भूल जाती है
वो बहती इक नदी है तुम उसे पोखर
समझना मत
है इतना वेग उसमे राह का पत्थर
हटाती है
समुन्दर दे नहीं सकता किसी को
बूँदभर पानी
वो मीठी-सी नदी फिर भी समुन्दर
में समाती है
उठाकर रेत-मिट्टी की तगारी साधती
है लय
पसीने में नहाकर जिंदगी को
गुनगुनाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले
मार देते तुम
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हे
दुनिया मे लाती है
ग़ज़ल
5
कहीं घर-बार जलता है कहीं संसार
जलता है
सुलगता दौर है इसमें न कोई ख्वाब
पलता है
उठाकर बोझ काँधों पर जो पाते
रोटियाँ अपनी
वो जब भी ठान लेते हैं ज़माना ये
बदलता है
थके तन औ’ थके मन को जगाकर तो जरा देखो
अँधेरी रात के पीछे सुनहरा दिन
मचलता है
अगर चाहो तो करवा दो मुनादी आज
गलियों में
न आये राह में कोई यहाँ दरिया
उछलता है
ज़माना देवियाँ कहकर तुम्हें है
पूजता अक्सर
मगर तुम जान लो इतना ज़माना तुम
को छलता है
मालिनी गौतम
मंगल ज्योत
सोसाइटी
संतरामपुर-389260
गुजरात
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