सोमवार, 12 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की गजलें

मालिनी गौतम के गजल में भाषा की रवानी है तो भावों में संवेदना की अभिव्यक्ति. इनके भाव –संसार में करूणा और चित्कार का समावेश है तो आक्रोश की गूंज भी. शब्दों का संयोजन भी काबिलेगौर है. पढ़ते हैं मालिनी गौतम की कुछ गजलों को:-   

मालिनी गौतम


ग़ज़ल  1




कभी आँखें दिखाते हो कभी ख़जर चलाते हो
गरीबों पर बताओ इस तरह क्यों जुल्म ढाते हो
तुम्हारे कारखानों में हैं मरते लोग आये दिन
तुम उनकी मौत पर आँसू मगरमच्छी बहाते हो

रखोगे कैद कब तक रौशनी को अपने महलों में
उजालों को भी तुम अपना-पराया क्यों सिखाते हो
दवा-दारू, मिठाई, तेल-घी की छोड़ दो बातें
महब्बत में भी तुम तो ज़हर नफरत का मिलाते हो
पढ़ाते पाठ लोगों को सचाई और नेकी का
स्वयं बाजार में ईमान की बोली लगाते हो
वो चीखें जो उड़ा देतीं तुम्हारी नींद रातों की
उन्हें गूँगा बनाने का हुनर क्यों आजमाते हो




                                                        ग़ज़ल  2



चाय की कुछ चुस्कियों में जिंदगी को पी गये
घिसते-घिसते एड़ियाँ वे उम्र पूरी जी गये
नोट बरसाने लगे नेताजी अपनी जीत पर
लूटने उनको गली के चन्द बच्चे ही गये

रेल औ बस में मिले हमको नये चहरे कई
कुछ हँसे अपना समझकर कुछ लबों को सी गये
खिलखिलाती धूप जैसे जब मिले कुछ पल उन्हें
भूल कर अपनी थकन वे उन पलों को जी गये
हर तरफ से मार मौसम की पड़ी कुछ इस क़दर
चंद लमहे थे खुशी के हाथ से वो भी गये


                                                              ग़ज़ल  3



झूठ है जिनकी नस-नस में
सत्य नहीं उनके बस में
बाहर उजियारा दिखता
घोर अँधेरा अंतस में
चाहे जितना खौफ बढ़े
हो न कमी कुछ साहस में
वे ही गुण अपनाओ तुम
जो गुण होते पारस में

अँधियारों से लड़ने को
तीर न कोई तरकस में



                                                                 ग़ज़ल  4



वो औरत रोज़ अपने आप पर यूँ जुल्म ढाती है
स्वयं भूखी रहे पर रोटियाँ घर को खिलाती है

नशे में धुत्त अपने आदमी से मार खाकर भी
बहुत जिन्दादिली से दर्द को वो भूल जाती है
वो बहती इक नदी है तुम उसे पोखर समझना मत
है इतना वेग उसमे राह का पत्थर हटाती है
समुन्दर दे नहीं सकता किसी को बूँदभर पानी
वो मीठी-सी नदी फिर भी समुन्दर में समाती है
उठाकर रेत-मिट्टी की तगारी साधती है लय
पसीने में नहाकर जिंदगी को गुनगुनाती है
जिसे दुनिया में आने से ही पहले मार देते तुम
गलाकर जिस्म अपना वो तुम्हे दुनिया मे लाती है

ग़ज़ल  5



कहीं घर-बार जलता है कहीं संसार जलता है
सुलगता दौर है इसमें न कोई ख्वाब पलता है
उठाकर बोझ काँधों पर जो पाते रोटियाँ अपनी
वो जब भी ठान लेते हैं ज़माना ये बदलता है
थके तन औ थके मन को जगाकर तो जरा देखो
अँधेरी रात के पीछे सुनहरा दिन मचलता है
अगर चाहो तो करवा दो मुनादी आज गलियों में
न आये राह में कोई यहाँ दरिया उछलता है
ज़माना देवियाँ कहकर तुम्हें है पूजता अक्सर
मगर तुम जान लो इतना ज़माना तुम को छलता है

मालिनी गौतम
  मंगल ज्योत सोसाइटी
संतरामपुर-389260
          गुजरात
मो. 09427078711












शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-

परंपरा ऋतुराज सम्मान 2015 से सम्मानित मालिनी गौतम की किताब "एक नदी जामुनी सी" पर राजकिशोर राजन की एक टिप्पणी:-
:-

घनीभूत संवेदनाओं की प्रवहमान धारा
----------------------------------------------
एक नदी जामुनी सी-मालिनी गौतम
----------------------------------------------

मालिनी गौतम हिंदी कविता के क्षेत्र में एक परिचित  नाम हैं।इनकी कविताएँ अपनी सहजता और सादगी के कारण सहज ही आकर्षित करती हैं।आलोच्य संग्रह 'एक नदी जामुनी सी'व्यापक सामाजिक सरोकार और प्रेम के विस्तृत संसार की कविताएँ हैं।इस संग्रह के पूर्व'बूँद बूँद एहसास' कवितासंग्रह और'दर्द का कारवां' (ग़ज़ल संग्रह)प्रकाशित हैं।

इस संग्रह की कविताओं में स्त्री अस्मिता के यक्ष प्रश्नों से मुठभेड़ है ।इस संसार में प्रेम है,ख़ुशी है,दुःख है,अफ़सोस है,पीड़ा है और इन सबके बीच एक स्त्री का अपनी स्वतंत्र पहचान रचने की पटकथा है।पहली ही कविता 'छतरियां' स्त्री के त्याग, बलिदान और जीवन में हासिल का मर्मस्पर्शी कथा कहती है कि किस प्रकार घर परिवार और बच्चों पर छतरी की तरह तनी रहती है पर उसकी किस्मत में छतरियां नहीं है-----

औरतें------------
लाल,पीली,, नीली,सफ़ेद छतरियों सी
हर दम तनी हुई
अपने घर परिवार और बच्चों पर
---------------
पर अफ़सोस
उनके नसीब में नहीं होती
कोई लाल,पीली,नीली,या सफ़ेद छतरी

एक नदी जामुनी सी एक प्रेम कविता है।सीधी-सहज यह कविता ह्रदय के तार को झंकृत कर देती है।'उफनती आदिवासी नदी' एक बेहतर प्रेम कविता है ,इसमें प्रेम के ख़ूबसूरत पलों को सहेज लेने का प्रस्ताव है।'अनंतकाल के लिए'प्रेम को व्यापकता और सम्पूर्णता में देखती है,जहां दैहिक स्तर से  ऊपर उठ कर अस्तित्व के स्वीकार की बात है साथ ही जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश भी बनी रहे।'चाँद के साथ'कविता देर तक साथ रहती है,इसमें कवयित्री ने संसार में सर्वाधिक प्रिय चीजों को गिनाते हुए बताया है कि सबका अपना अपना चाँद होता है।अपनी कहन के कारण यह कविता बहुत प्रभावित करती है।इस संग्रह की प्रेम कविताओं का संसार भी व्यापक है वह मात्र रूमानी कार्य व्यापार  नहीं है।इन कविताओं में प्रेम का उच्चतर स्वरुप  है।इस संग्रह में प्रेमविषयक और स्त्रीविमर्श की जो कविताएँ हैं वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रांत नहीं हैं।प्राकृतिक रूप से वे जड़ों तक पहुंच स्त्री के दुःखों और विडंबनाओं की पहचान करती हैं।स्त्री विमर्श के अभ्यस्त चलन को लाँघ कर कवयित्री ने अपनी बात कही है और हर बात पर और बात बात पर पुरुषों को कटघरे में खड़ा नहीं किया है और सारे दुखों के लिए पुरुषों को जिम्मेदार मान अपने कर्तव्यों की इतिश्री नहीं कर लेतीं।इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता'प्रेम में होना'में उनके विचारों को देखा जा सकता है।यह कविता बताती है कि एज औरत, पुरुष के प्रेम से पल भर उबरना नहीं चाहती,वह पुरुष के प्रेम में इस कदर डूब जाती है  और उस गहराई तक डूब जाती है जहाँ पहुंचकर उसका स्वयं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।जबकि पुरुष स्वयं के अस्तित्व को बचा लेता है और अपनी दुनिया में लौट आता है।कवयित्री की इस स्थापना को गंभीरता से समझने की जरुरत है।इससे भले कुछ लोग असहमत हो सकते हैं,पर इसमें सच्चाई है।इस कविता मैं'नमकीन सा फ़्लर्ट' जैसे प्रयोग भी है जो एक उदाहरण है कि उनके पास पर्याप्त शब्द भंडार हैं और शब्दों का बेहतर प्रयोग उन्हें भली भाँती ज्ञात है साथ ही काव्यतत्व की समझ भी------

पर पुरुष----
जिस तीव्रता से चढ़ता है
प्रेम की सीढियाँ
उतनी ही तेजी से वापस
उतरना भी चाहता है
इस भंवर में गोता लगाकर
अपनी दुनिया में

सर्द रिश्ते,जर्द पत्ते,कमबख्त दूरियां,लकीरें,बरसात,मिलान एक पल का,टूटता तारा,एक और एक ग्यारह,होने से न होने तक,जैसी प्रेम कविताएँ विभिन्न कोणों से प्रेम की अंतर्यात्रा करती हैं।ये कविताएँ जमीन से जुडी हुई कविताएँ हैं।'जर्द पत्ते'  आकार में छोटी पर एक खूबसूरत कविता है, जो पाठक से बार बार पाठ की मांग करती है-----

जरा ध्यान से
झांककर देखो
इन पीली निस्तेज आँखों में
मोहब्बत के सुर्ख पत्ते
अब यहाँ नहीं रहते
यह तो घर है
पीले जर्द पत्तों का
जिन्हें मैंने बरसों से रखा है
सहेजकर!

समाज में स्त्रियों के प्रति अत्याचार,भेदभाव,शोषण का विरोध मालिनी गौतम की कविताओं के मुख्य स्वर हैं।'सजा एक अपराध की' कविता की पहली ही दो पंक्तियाँ ही समाज में स्त्रियों की दुर्दशा को प्रभावपूर्ण तरीके से कहने में समर्थ है-------

लड़कियां कटती हैं
खेत में खड़ी फसलों की तरह
खटती हैं
मशीनों के कलपुर्जों की तरह
कच्चे सूत सी
काती जाती हैं चरखों पर
कच्ची हांड़ी सी
चढ़ाई जाती हैं आंच पर

राजकिशोर राजन


यह कविता लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव को गहराई तक जा बारीक़ चित्रण करती है और प्रकारांतर से प्रश्न पूछती है कि यह कैसा सभ्य समाज है! जहां लड़कियां मालगाड़ी सी दौड़ती हैं और हाथ पोंछे नैपकिन की भांति डस्टबिन में फेंक दी जाती हैं! कवयित्री अपनी कविताओं में कागज की लेखी नहीं, आँखन देखी कहती हैं इसीलिए इनकी कविताएँ जीवंत लगती हैं।इनकी कविताओं का सपना है कि यह संसार उस लायक बने जहां लड़कियों के लिए,स्त्रियों के लिए एक सुरक्षित कोना हो।इनकी कविताएँ उम्मीद की कविताएँ हैं।तमाम जड़ताओं के बाद भी दुनिया बदल रही है।स्त्रियों की लड़ाई रंग ला रही है,अपनी दुनिया के नवनिर्माण का उनका सपना रंग ला रहा है।कुछ इसी प्रकार की ध्वनि'लड़कियां बदली बदली सी' में सुनाई पड़ती है जहां वे अपनी स्कूलों और कालेजों में स्वतंत्रता का अनुभव तो कर रही हैं पर घर पहुँचते पहुँचते उनके पैरों में बेड़ियां पद जाती हैं ।यह कविता शिल्प की दृष्टि से भी संग्रह की बेहतरीन कविताओं में से एक है।उसी प्रकार 'औरत' कविता है जहां आज भी एक औरत सुबह के इंतजार में है।कविताएँ लयात्मक हैं जिसका मुख्य कारण कवयित्री का गीतकार होना है और कविता भी तो अंततः यही चाहती है कि वह किसी के होठों  पर थिरके ,गीत बन जाये----

आज मैंने फिर ढूंढ उसे
माथे पर लगे सिंदूर में
ऊँन के गोलों में
बिस्तर पर बिछी चादरों में
कर रही थी वह इंतजार
एक और सुबह का

संग्रह की कविताओं की भाषा सहज और तरल है,कहीं भी अमूर्तन या अबूझ पन नहीं है।कहन का सलीका और सादगी इन कविताओं को एक अलग आस्वाद प्रदान करता है और सबसे बड़ी बात की मालिनी गौतम का कवि सब कुछ खोकर भी कविता को बचाना चाहता है----

अपना अब कुछ खोकर भी
मैं बचाना चाहती हूँ
मेरी कविता --मेरी कविताई
                         (मैं और कविता)