मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

हिंदी कथा-आलोचना पर एक जरूरी किताब:- प्रेमकुमार मणि

 हिंदी कथा-आलोचना पर  एक जरूरी किताब 


प्रेमकुमार मणि 


 पिछले तीन रोज मेरे साथ एक किताब बनी रही, जिसे मैं रुक-रुक कर पढता रहा. मेरे शहर पटना में सर्दी बढ़ गई है और ऐसे में  लगातार देर तक सक्रिय रहना मेरे लिए मुश्किल होता है. इसलिए रुक-रुक कर पढ़ना मेरी मजबूरी भी थी. लेकिन इस धीमी रफ़्तार से पढ़ने का एक लाभ भी है. कुछ वैसा ही  जैसा चबा-चबा कर भोजन करने से होता है. 

 

किताब है  ' उपन्यास और देस,' जिसके लेखक हैं वीरेंद्र यादव. अभी पिछले महीने दो रोज हमलोग दिल्ली में एक साहित्यिक जलसे में साथ थे. वहाँ भी उपरांत बैठकी में दुनिया भर की खूब बातें हुई थीं. मौजूदा कामकाजी संसार में बातें करने वाले लोग तेजी से कम हो रहे हैं. दरअसल यह हमारी सभ्यता की समस्या है. इसी अनुपात में हमारा पढ़ना भी कम हो रहा है. लोग इतने लक्ष्यप्रिय होते जा रहे हैं कि लाभ रहित कामों से परहेज करते हैं. शुभ-लाभ की मौजूदा सभ्यता में पुरानी दुनिया की कई अलाभकारी चीजें फालतू मान ली गई हैं. कोई चीज है तो उसका मूल्य होना चाहिए. मुझे एहसास होता है उपन्यास विधा भी इस सोच का शिकार हो गई है. दुनिया भर की जुबानों की बात नहीं कह सकता, लेकिन हिंदी में उपन्यासों की स्थिति उदास करने वाली है. उपन्यासकार भी इस विधा को ठीक से समझ नहीं रहे हैं. उन्नीसवीं सदी में दुनिया भर के आधुनिक जुबानों में उपन्यास एक खास कारण से आए थे. वह साहित्यिक विकासवाद की खास मंजिल तय कर रहे थे. सामंतवाद अवसान पर था. नया सामाजिक ढांचा आकार लेने केलिए आकुल था. संस्थागत धर्म हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थे और लोकतंत्र अभी शैशव-काल में था. काव्य विधा को अभी कविता के कलेवर में आना था. ऐसे में उपन्यास ने सामाजिक संवाद और विमर्श की एक पृष्ठभूमि तैयार की थी. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उपन्यास साहित्य का केंद्र बना रहा. इसके अनेक कारण थे,जिन पर विस्तार से विमर्श होना अभी शेष है. 


यह किताब हमें कायदे से इसी समस्या पर सोचने केलिए उत्साहित करती है. अपने कलेवर में यह आलोचना पुस्तक है, जिस में  हिंदी उपन्यासों पर विमर्श किया गया है. इस विषय पर सोचने और काम करने वालों केलिए यह एक जरूरी किताब बन जाती है. हिंदी भाषी समाज में बहुतेरे लेखकों को भी साहित्य के समकालीन सरोकारों का अभिज्ञान नहीं है. वे आज भी देहाती दुनिया, गोदान या फिर मैला आँचल की प्रतिलिपि तैयार करना चाहते हैं. उपन्यास या साहित्य पूरी दुनिया में नए सरोकारों से जुड़ रहा है और रूप व विषय दोनों स्तरों पर निरंतर नवीन बना रहना चाहता है. इस किताब में ही लेखक रूसी लेखक स्वेतलाना अलेक्सेविच की एक उक्ति उद्धृत करते हैं,जिस में वह कहती हैं  -' यदि मैं उन्नीसवीं सदी में लिख रही होती तो टॉलस्टॉय या चेखब की तरह फिक्शन ही लिखती, लेकिन आज के समय को लिखने केलिए विशुद्ध कथा विधा अपर्याप्त है. लोगों को समझने में कथा विधा विफल रही है,' ( पृष्ठ 191 ) यह प्रसंग अरुंधति राय के उपन्यास पर विमर्श के दौरान आया है. जाहिर है अरुंधति फिक्शन के तय दायरे को तोड़ती भी हैं क्योंकि  यथार्थ के समग्र उद्घाटन के लिए  फिक्शन के पारम्परिक व्याकरण को तोडना  जरूरी था. 


' उपन्यास और देस ' चार अध्यायों में विभक्त कुल जमा बाईस लेखों का संकलन है. पहला अध्याय है 'उपन्यास और देस ' जिसमें रेणु के मैला आँचल, शिवपूजन सहाय के देहाती दुनिया, नागार्जुन के बलचनमा, अखिलेश के निर्वासन, पंकज विष्ट के लेकिन दरवाजा और गिरिराज किशोर के पहला गिरमिटिया जैसे कुल तेरह उपन्यासों पर आलोचकीय विमर्श है. इसमें ' मैला आँचल ' पर केंद्रित लेख मुझे बहुत खास लगा. यह इसलिए भी कि वीरेंद्र मूलतः मार्क्सवादी आलोचक हैं और मार्क्सवादी आलोचकों ने मैला आँचल और उसके लेखक फणीश्वरनाथ रेणु को एक तरह से मार्क्सवादी दुनिया का कुजात लेखक घोषित किया हुआ था. रेणु समाजवादी राजनीति से भी सक्रिय तौर पर जुड़े हुए थे. शीतयुद्ध दौर में स्तालिनवादी मार्क्सवादी प्रवृत्तियों में एक खास तरह का कठमुल्लापन विकसित हुआ था, जिस के शिकार उस दौर के ज्यादातर शीर्ष मार्क्सवादी आलोचक थे. जार्ज लूकाच जैसे विलक्षण आलोचक भी इससे मुक्त नहीं थे. हिंदी मार्क्सवादी आलोचकों का कठमुल्ला न होना ही अस्वाभाविक होता. वह इसके लिए तैयार बैठे थे. यही कारण था  रेणु के साहित्यिक विवेक को समझने में उस दौर की ' प्रगतिशील आलोचना ' विफल रही थी. ऐसे में वीरेंद्र द्वारा उदार नजरिये से 'मैला आँचल ' का पाठ प्रस्तुत करना अपने आप में प्रगतिशील आलोचना की भी समीक्षा बन जाती है. 


अपने इस उदार दृष्टिकोण को वीरेंद्र पूरी किताब में बनाए रहते हैं और यही उनकी विशिष्टता है. किताब में संकलित कुछ लेख निश्चित ही पत्रिकाओं और मित्र लेखकों की मांग ( आग्रह ) पर लिखे प्रतीत होते हैं और इन लेखों को यदि इस संकलन से अलग रखा जाता तो यह अधिक मूल्यवान  होता, बावजूद इसके कोई पाठक इस किताब के महत्वपूर्ण लेखों को अपने पाठकीय विवेक से अलगा सकता है. अरुंधति राय के उपन्यास ' दि मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस ' की गंभीर समीक्षा, ' उपन्यास दृष्टि और उपन्यास ', ' कथा आलोचना और रामविलास शर्मा ' तथा ' प्रेमचंद पर नामवर सिंह ' शीर्षक लेख इस पुस्तक को खास और पठनीय बनाते हैं. मेरी दृष्टि में कोई किताब इसलिए महत्वपूर्ण होती है कि वह पाठक को नए विमर्श केलिए उत्साहित करती है  और उसमें समझ के नए गवाक्ष विकसित करती है. इस नजरिए से यह किताब पठनीय प्रतीत हुई है. यह हमें आलोचना के एक अनछुए -अनजाने देस में ले जाने की कोशिश करती हैं.


हिंदी आलोचना में रामविलास शर्मा एक ऐसा नाम है,जिन से टकराए बिना आप शायद नहीं रह सकते. उन्होंने यथेष्ट काम भी किया है. निराला और प्रेमचंद पर उनका आलोचना कार्य ऐसा है जिसके कारण हिंदी कविता और  कथा विधा में उन्हें नजरअंदाज कर आप आगे नहीं बढ़ सकते. वीरेंद्र जी ने ' कथा -आलोचना और रामविलास शर्मा ' शीर्षक अपने विस्तृत लेख में विस्तार पूर्वक शर्माजी के अंतर्विरोधों और उनके दृष्टिकोण की पड़ताल की है. रामविलास जी का बांग्ला भाषा पर अधिकार था, निराला की तरह. लेकिन अपने कविगुरु निराला की ही तरह वह बांग्ला साहित्य की चेतना से असम्पृक्त रहने के अभिलाषी थे. बांग्ला नवजागरण की परंपरा से हिंदी साहित्य चेतना को हरसंभव अलग-थलग रखने की कोशिश भी उन्होंने की. इसलिए ही वह रवीन्द्र पर चुप और शरत पर आक्रामक दीखते हैं. शरत के उपन्यासलेखन के चार मुख्य पड़ाव हैं. देवदास, चरित्रहीन, पथेरदाबी और शेषप्रश्न. स्वयं शरत देवदास को चरित्रहीन से और पथेरदाबी को शेषप्रश्न से ख़ारिज करते हैं. रवीन्द्रनाथ का 'गोरा' और शरत का शेषप्रश्न बांग्ला नवजागरण का दर्पण है. लेकिन रामविलास शर्मा को वर्ग-संघर्ष की चिंता है,जिसे शरत-साहित्य से कोई सहयोग नहीं मिलता दिखाई देता. ऐसे में वह उन्हें प्रेमचंद की उस किसान चेतना से ध्वस्त कर देते हैं जिस के बीच से वर्ग-संघर्ष उझकता दिखाई पड़ जाता है. अपने इन्ही औजारों से वह बांग्ला नवजागरण के समान्तर एक हिंदी नवजागरण का भी जैसा-तैसा ठाट तैयार कर देते हैं और सावरकर प्रणीत 1857 के तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम को कुछ आगे बढ़ कर फ़्रांसिसी राज्यक्रांति जैसा दर्जा दे डालते हैं. वीरेंद्र अपने इस लेख में रामविलास जी के अंतर्विरोधों को रेखांकित करते हुए उनकी सीमा रेखा बताते हैं. इस लेख को कोई पाठक पूरा पढ़ कर ही इसका आनंद ले सकता है. 

लोग जानते हैं कि रामविलास जी ने अज्ञेय और जैनेन्द्र के साथ समाजवादी तबियत के यशपाल, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन , रेणु, मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को ख़ारिज किया है. इसकी लम्बी और दिलचस्प पृष्ठभूमि है. समाजवादी लेखकों की जगह उन्होंने वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे उपन्यासकारों और कविता में मुक्तिबोध की जगह केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों को महत्वपूर्ण माना. आश्चर्य तो यह है कि जिस लोकचेतना को साहित्य में मूर्त करने केलिए वह वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर या फिर कुछ दूसरे कथाकारों की प्रशंसा करते हैं, उसी लोकचेतना को अंगीकार करने केलिए रेणु की आलोचना करते हैं. इन सब तथ्यों को उदाहरण के साथ रख कर वीरेंद्र ने जिस तरह रामविलास जी की कथा-आलोचना को बेनकाब किया है वह निश्चय ही उल्लेखनीय है. विशेषता यह है कि रामविलास जी की मेधा के प्रति उन्होंने हर जगह संभव सम्मान बनाये रखा है. लेकिन वह कोई कुहेलिका भी नहीं गढ़ते. इस लेख के समापन में वह लिखते हैं- ' अमृतलाल नागर और वृन्दावनलाल वर्मा के प्रति रामविलास शर्मा की अतिरिक्त सहृदयता और मैत्री-भाव तथा राहुल, यशपाल, और रांगेय राघव के प्रति शत्रुता की सीमा तक आलोचकीय कठोरता उन्हें राग-द्वेष से मुक्त आलोचकों की पांत में नहीं खड़ा करती. राहुल व राघव के मुकाबले शिवसागर मिश्र व हिमांशु श्रीवास्तव का महिमामंडन उस संकीर्णतावादी दृष्टि का हिंदी कुसंस्करण है, जिसका इस्तेमाल कर स्टालिन काल में रूस के संस्कृति मंत्री ज़्दानोव ने लेखकों की बड़ी जमात को कुजात घोषित कर दण्डित किया था. " (पृष्ठ 291 ) 

कहना न होगा, वीरेंद्र यादव ने मार्क्सवादी अतिवाद को सूक्ष्मता से समझने की कोशिश की है और हिंदी कथा-आलोचना के अवरोधों से हमें परिचित कराया है. हम उम्मीद करेंगे वीरेंद्र जी अपनी आलोचना दृष्टि को इसी तरह निरंतर परिमार्जित करते रहेंगे. प्रकृति और प्रज्ञा के स्तर पर हर चीज निरन्तर परिवर्तित होती रहती है. रूढ़ि अथवा गतिरोध केवल विकार पैदा कर सकता है. मार्क्सवाद के साथ भी यही हुआ. रूढ़िवादी मार्क्सवादियों ने उसे बोल्शेविक दौर में रोक रखने की कोशिश की. नतीजा हुआ वहाँ विकार पैदा हुआ, जिस से पूरी विचारधारा पर ही संकट आ गया. हिंदी आलोचना में इसी रूढ़ि ने प्रगतिशील चेतना को विनष्ट अथवा दिग्भ्रमित किया. दलित और स्त्री-विमर्श प्रगतिशील चेतना के ही विषय थे. इनकी अलग से जरुरत इसलिए महसूस हुई कि कुछ लोग प्रगतिशील चेतना पर कुंडली मार कर बैठ गए और फतवे जारी करने लगे. आज दलित और स्त्री विमर्श को भी नए दृषिकोण से देखने की जरूरत है.  कठमुल्लापन कहीं भी विकसित हो सकता है,यदि सतत परिमार्जन न हुआ तो. 

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उपन्यास और देस 

वीरेन्द्र यादव 

सेतु प्रकाशन ,दिल्ली 

पृष्ठ 327