मंगलवार, 27 अगस्त 2019

प्रेमचंद की कहानी कफन और उसकी कमियाँ

प्रेमचंद का कफ़न एक अतार्किक कहानी
 -    सुशील कुमार भारद्वाज



गत दिनों यूँ ही बैठा हुआ था कि प्रेमचंद की कहानियों को पढ़ने की इच्छा हुई. किताब में पहली कहानी “कफ़न” को देखकर पहले तो पन्ना उलटते हुए आगे बढ़ गया लेकिन पुनः उसी कहानी पर आकर अटक गया. और अटका तो कहानी में एक ऐसा सूत्र मिल गया जिसने एहसास करा दिया कि प्रेमचंद की यह कहानी अपनी कमियों से भरी हुई है. संभव है कि पत्रिका में छपने के लिए जल्दबाजी में कहानी वे लिख गए और त्रुटियों पर उनका ध्यान गया ही नहीं. आखिर प्रेमचंद ने घीसू के एक मात्र पुत्र माधव का ही जिक्र क्यों किया है जबकि उसके नौ पुत्र थे? और जिस पिता के नौ पुत्र हों, उस पिता का ऐसा फक्कड़ जीवन संभव है क्या? क्या प्रेमचंद का कफ़न एक अतार्किक कहानी है?
 
कफ़न प्रेमचंद की सबसे अंतिम और सबसे चर्चित कहानी है. इस कहानी में पात्रों के मनोविज्ञान के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और मानवीय पक्ष को भी प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है. इस कहानी को रंगमच पर ही सिर्फ सम्मान नहीं मिला बल्कि अनुवाद के साथ साथ इस पर टेलीफिल्म भी बनी. सबसे मनोरंजक बात है कि सर्वप्रथम कफ़न को उर्दू में लिखा गया था जो कि 1935 ई० में जामिया मिलिया इस्लामियां के पत्रिका “जामिया” में प्रकाशित हुई थी. जिसका हिंदी रूपांतरण 1936  ई० में “चाँद” में प्रकाशित हुई थी. साथ ही स्पष्ट करता चलूँ कि कहानी के आधिकारिक अनुवाद की प्रति अनुपलब्ध होने की बात कई विद्वान करते हैं. लेकिन इस बात में कोई दोमत नहीं है कि प्रेमचंद जब जामिया मिलिया इस्लामियां में भाषण देने गए थे तो ‘जामिया’ पत्रिका के लिए वहां के लोगों ने एक कहानी लिखने की अपील की थी.
तीन सौ से अधिक कहानी लिखने वाले, 31जुलाई 1880 ई० में जन्में प्रेमचंद 08 अक्टूबर1936 को इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए अपने जीवन के सारे संघर्षों के बीच चले गए. लेकिन उनकी सारी चर्चित सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक और मानवीय कहानियों में से सिर्फ अंतिम कहानी “कफ़न” को ही उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी मानी गई और यह कहानी सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कहानी मानी जाती है. प्रेमचंद के सम्पूर्ण कथा जीवन को कुछ विद्वान तीन तो कुछ विद्वान चार भागों में बांटकर प्रारंभ से परिपक्वता के क्रम में अध्ययन करते हैं, जबकि वे अपने सम्पूर्ण जीवन में आस्तिकता से नास्तिकता की ओर बढ़ते रहे. और अपने जीवन संघर्ष के बीच अपनी रचनाओं में आदर्शवाद पर यथार्थवाद को तवज्जो देते चले गए. बाद की कहानियों में तो यथार्थ की सिर्फ खुरदुरी सतहें ही दिखती हैं. वे कहानी –कला में कोरी –कल्पना को नकारने की बात करते हैं. जीवन और साहित्य के संबंध में जो बातें वो कहते हैं उसी में उनकी कहानी कभी कभी उलझने लगती है. कई बिंदु पर तो गोदान और कफ़न के बीच ही विरोधाभास सिर उठाने लगता है.
कफ़न विवादरहित भी नहीं है. इस कहानी पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा तो कई बार बहुत कुछ छिपा लेने की भी. कई बार दलित पात्र में सवर्ण मन को आरोपित करने की बात उठी तो कई बार गलत नियत से कहानी लिखने की बात भी.
खैर, कफ़न पढ़ते हुए पहला सवाल मन में उठा कि माधव जैसे बेगैरत आलसी की शादी बुधिया जैसे कमासुत के साथ कैसे हो गई? जो कि ना सिर्फ घर-गृहस्थी की रस्सी खींचने के लिए घर के बाहर भी देह्तोड़ मेहनत करती है और इन कामचोरों को खाना भी बनाकर खिलाती है! बल्कि सामाजिक और पारिवारिक वजह से जमींदारों या औरों के गिद्धदृष्टि का भी शिकार बनती है.
इसमें कोई शक दोमत नहीं कि 1935 के आसपास बालविवाह का ही प्रचलन सामान्य रूप से था तो बुधिया की उम्र कम ही रही होगी लेकिन माधव की उम्र का अंदाजा लगाना आसान नहीं क्योंकि घीसू अपने जीवन के साठ वर्ष आकाशवृत्ति में गुजार चुका है और माधव कितने नम्बर पर पैदा हुआ इसका कहीं कोई जिक्र ही नहीं है. अलबत्ता घीसू की पत्नी पहले ही मर चुकी है और माधव-बुधिया की जोड़ी लगभग साल भर से है.
गौतलब है कि शादी के बाद पटफेरन में भी बुधिया मायके-ससुराल के बीच आवाजाही की कि नहीं- यह भी प्रश्न के घेरे में है क्योंकि गर्भावस्था में भी कोई मायके से सुध लेने वाला नहीं आया. और मरने के बाद भी नहीं. क्या बुधिया के माता-पिता भी निष्ठुर प्राणी ही थे? कोई भी माता-पिता इतना क्रूर कैसे हो सकता है? उसमें भी तब जब सास जैसे किसी सहारा का भी नामोनिशान घर में नहीं था. क्या बुधिया माता-पिता के लिए भी बोझ के सिवाय कुछ नहीं थी?
कैसा था यह रिश्ता कि माधव को भी अपने ससुराल का कोई सुख नहीं मिला. जब घीसू ठाकुर की बारात में मिले भोजन का बखान कर रहा था तो माधव अपनी शादी या ससुराल में हुए मेहमानबाजी का भी तो जिक्र कम से कम कर ही सकता था?
अगला सवाल उठता है कि क्या बुधिया खरीद कर लायी गई थी? कोई भी माता-पिता अपने कर्मठ बेटी की शादी निठल्ले माधव से मुफ्त में क्यों करेगा वो भी ऐसे दरिद्र घर में? जिस घर (झोपड़ी) में दो-चार मिट्टी के बर्तन के सिवा कुछ भी नहीं है? और फिर घीसू-माधव ने शादी के लिए रूपये कहाँ से लाए होंगें? यह इसलिए भी कि गोदान में ही शादी में बेटी को बेचने की भी चर्चा है.
और थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि घीसू-माधव जो थे सो थे लेकिन ये भी किसी आश्चर्य से कम नहीं कि कहानी ठण्ड की रात की है और चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है. और बुधिया की प्रसवपीड़ा की तीक्ष्ण कराह झोपड़ी के बाहर गरमागरम पके आलू खाने के लोभ में बैठे घीसू –माधव के अलावे किसी को सुनाई नहीं पड़ती है. जबकि कहानी में स्पष्ट है कि यह – “चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम”. मतलब कि आसपास में चमारों के कई और घर थे. आखिर वे लोग बुधिया को क्यों नज़रंदाज़ कर रहे थे जबकि वो कमासुत थी तो स्वाभाविक है कि उसका आसपड़ोस की महिलाओं से तालमेल ठीकठाक ही रहा होगा और समय-असमय एक-दूसरे की मदद भी करते होंगें. और बुधिया तो कम से कम मधुर संबंध बनाने की कोशिश करती ही होगी ताकि सास विहीन घर में मुसीबत में कोई उसकी मदद को आगे आए? एक बात और कि गर्भावस्था जैसी नारी-कुतूहल के बीच भी उसके समाज के लोग उसमें रूचि क्यों नहीं ले रहे थे जबकि स्त्रियों का एक अलग संसार होता है जहां स्त्री-सुलभ केंद्रित बातें ही होतीं हैं और लाख दुश्मनी के बाबजूद स्त्रियां पुरूषों का निषेध कर स्वतः आगे बढ़ जाती हैं. और जिस समाज के लोग घीसू-माधव को बिना वसूली की उम्मीद के बिना भी रूपये उधार देने को तैयार रहते हैं उस समाज के लोग मानवीय मदद को भी आगे नहीं आ सकते?
माना कि सम्पूर्ण समाज ही कर्तव्यहीन और संवेदनहीन था. लेकिन घीसू के जो नौ बेटे थे वे कहाँ चले गए इस संकट की घड़ी में? आखिर प्रेमचंद ने यह सपष्ट क्यों नहीं किया कि घीसू का अपने नौ बेटों के साथ कैसा संबंध था? वे जिन्दा हैं तो कहाँ हैं? उनकी शादी हुई थी कि नहीं? उनके बच्चे थे कि नहीं? घीसू खुद स्वीकारता है कि- “मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया.”
क्या यह संभव है कि नौ बेटों का पिता अपनी साठ वर्ष की उम्र बेफिक्री में गुजार दे? उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आए? और वो मार व गालियाँ खाकर भी दूसरे के खेत से ही आलू, मटर और ऊख उखाड़ कर पेट भरता रहे? उसमें भी तब जब यह कहानी में स्पष्ट है कि- “जबसे यह औरत आई थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी.” फिर शेष बेटे और उनकी पत्नियां क्या कर रहीं थीं?
कुछ विद्वान मानते हैं कि बुधिया के पेट में पलने वाला बच्चा किसी जमींदार या अन्य का है इसलिए घीसू निष्ठुर बना उसके मरने का इंतज़ार करता रहता है. मतलब कि घीसू स्वाभिमानी है. तो फिर उसने अपने इज्ज़त को बचाने के लिए कौन-सा उपाय किया? खुद बाप-बेटा तो अक्सर मार खाता और गालियाँ सुनता ही जान पड़ता है. फिर बुधिया की अस्मत कैसे सुरक्षित रह सकता है ऐसे माहौल में? और बुधिया भी कितनी सत्यवती या पतिव्रता थी कि वह इस अमानवीय माहौल में, कठिन मेहनत और बदहाली के बीच भी जिंदगी गुजारती रही जबकि प्रेमचंद के स्त्री पात्र प्रेम में विजातीय साथी के साथ भी फरार होते रहे हैं?
मैत्रेयी पुष्पा मानती हैं कि बुधिया के पेट में पलने वाला शिशु माधव का है. संभव है कि ऐसा ही हो, क्योंकि माधव के मन में भावी संतान व पत्नी के प्रति ममत्व और अपनत्व है. वह अपने पिता की तरह संवेदनहीन होने की बजाय रोता भी है और कहता भी है- “मैं सोचता हूँ कि कोई बाल-बच्चा हुआ तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में?”
लेकिन सवाल यह भी उठता है कि प्रसव के बाद की आवश्यक सामग्री के बारे में माधव कैसे जाना? जबकि वह किसी काम का आदमी नहीं है और वह पहली बार पिता बनने जा रहा है. और दूसरी बात कि यदि उसे इसकी जानकारी थी तो वह पहले से इसकी व्यवस्था क्यों नहीं करता है जबकि- “वसूली की बिल्कुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न कुछ कर्ज दे देते थे.”
माधव घीसू की तुलना में कुछ संवेदनशील है, जिसे अपने कर्तव्य व जिम्मेदारी का अहसास है लेकिन घीसू का दुनयावी सामाजिक अनुभव उसे अपने जैसा बनने को प्रेरित करता है. बाबजूद इसके, कहानी में स्वाभाविकता से अधिक कृत्रिमता है. जब घीसू साठ वर्षों से दूसरे के खेतों से चोरी करके ही अपना पेट भरने को अभ्यस्त है तो उसके लिए नया क्या था जो गरमागरम आलू को मुंह में डालने के लालच को रोक नहीं पाता है? यदि जो लालच उसे बांधे भी रखता है तो वह पड़ोस की औरतों को बैठे-बैठे ही आवाज देने की कोशिश क्यों नहीं करता है? यहाँ तो बुधिया का कराहना ही संवाद के जरिये कहानी को आगे बढ़ाने का एक तरीका मात्र साबित होता है.
घीसू भी आलसी, निकम्मा या आरामतलबी या व्यवस्था का विद्रोही नहीं है बल्कि एक अवसादग्रस्त पात्र है, जो नकारात्मकता के बीच अपने परिवेश में भी सिर्फ नकारात्मकता को ही महसूस करता है. और अपने ही जैसे माधव को भी बनाना चाहता है. मेहनत के मूल्य को मलूकदास के सिद्धांत पर ही माधव को भी देखने के लिए प्रेरित करता है अपने मानसिक संकीर्णता में. हालांकि यहाँ सामंतों द्वारा कराये जाने वाला बेगारी और गालीगलौज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
गौरतलब यह भी है कि प्रेमचंद दलितों की अमानवीयता के विरुद्ध सामंतों के सामाजिक, नैतिक व मानवीय पक्ष को उजागर करते हुए घीसू से कहलवाते हैं- “मैं कहता हूँ, उसे कफ़न मिलेगा, तू मानता क्यों नहीं?.... वही लोग देंगें, जिन्होंने अबकी दिया. हाँ, अबकी रूपये हमारे हाथ न आयेंगें.”
कफ़न में पूंजीवाद का भी असर दिखने लगा है. लोग हर मामले में किफायती होने लगे हैं. कर्मकांड आदि में होने वाले खर्च को भी कम करने की तरकीबें खोजी जा रहीं हैं तो क्या यह माना जा सकता है कि कर्मकांड का विरोध करनेवाले घोर पूंजीवादी हैं भले ही उनके बोलने का तरीका प्रगतिशील वाला हो? लेकिन घीसू गरीबी में भी दर्शन को महसूसता है – “कफ़न लगाने से क्या मिलता है?” और तर्क भी क्या खूब देता है – “जिसे जीते जी तन ढांकने को चिथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न क्यों चाहिए?”
क्या यह माना जा सकता है कि प्रेमचंद ने सहानुभूति पाने के लिए पाठकों के भावना का दोहन करते हुए पिता-पुत्र की संवेदनहीन कोरी कल्पना को देश-काल से पूरी तरह से काटकर जल्दबाजी में बिना विशेष विचार के प्रस्तुत कर दिया? क्या यह माना जा सकता है कि कहानी को जामिया में छपने के लिए लिखा गया इसलिए हर तरीके के कर्मकांड पर तंज कसने की कोशिश की गई?

 

संपर्क –sushilkumarbhardwaj8@gmail.com