रविवार, 19 अगस्त 2018

लेखक बनने की शर्त: सुशील कुमार भारद्वाज






वे कहते हैं कि लेखक बनना है तो वामपंथी बनना होगा और चरमपंथी तो आप अपनेआप बन जाएंगे। दोहरे चरित्र को जीने की आदत डालिए। सुविधानुसार विरोध-प्रदर्शन में शरीक रहिए। दिनभर खुद को गाली देते रहिए मने गाली देने का नाटक करते रहिए। दलित-महादलित और अन्य उत्पीड़न के नाम पर आठ-आठ आँसू बहाते रहिए।

और जातिगत भावना को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने के लिए आरक्षण का माला जपते रहिए। आरक्षण में भी आरक्षण की संभावना को तलाशते रहिए। और फिर सामने वाले को मनुवादी-मनुवादी कह कर गरियाते रहिए। और स्वयं न सिर्फ सामंतवादी व्यवहार में समायोजित होते रहिए बल्कि जमकर पूजा-पाठ भी करते रहिए। कभी कोई तस्वीर पूजा करते हुए वायरल हो जाए तो पत्नी या घरवालों की इच्छा का सम्मान कहकर चुपके से निकल लीजिए और दूसरे पर ताना मारते रहिए।

भाई, इतना आसान नहीं है लेखक बनना! आपको सिर्फ गुटबाजी करना ही नहीं आना चाहिए बल्कि गुट के लेखकों की घटिया-से-घटिया रचना पर भी वाह -वाह करते रहना आना चाहिए। और गुट के सच्चे सिपाही की ही तरह प्रचार प्रसार में ही महारत हासिल मत कीजिए बल्कि गालीगलौज करने के लिए भी तैयार रहिए।

कविता-कहानी के लिए विषयों को कौन पूछता है? कुछ भी लिख डालो। बस ख्याल सिर्फ इतना रहे कि उसमें उत्पीड़न की भावना दिखनी चाहिए। और यदि आप इसमें सफल रहे तो आप सबसे चर्चित और सबसे अच्छे साहित्यकार के रूप में जल्द ही स्थापित हो जाएंगे।

हाँ, कुछ लोगों को जाति-धर्म, समाज और सुंदरता का तड़का भी चाहिए। और भी बहुत कुछ लेकिन शेष बातें फिर कभी......

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सुशील कुमार भारद्वाज