रविवार, 21 जनवरी 2018

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच (आलेख): सुशील कुमार भारद्वाज

नई हिन्दी वाले लेखकों की सोच
सुशील कुमार भारद्वाज



पिछले कुछ वर्षों से बाज़ार मेंकुछ किताबें आ रही हैं जो नई वाली हिंदी के नाम से बिक ही नहीं रही है बल्कि  बेस्ट सेलर जैसे टैगलाइन के साथ भी धूम मचा रही है. और इन किताबों के लेखक चाहे निखिल सचानहों या सत्य व्यास या कोई और सभी के सभी ये नए लेखकचेतन भगत की लोकप्रियता से अभिभूत होकर ही लेखन के क्षेत्र में आए हैं.

लेकिन जैसे चेतन भगत को लोगों ने धीर-गंभीर साहित्यकार मानने से इंकार कर दिया है वैसे ही हिंदी के इन लोकप्रिय साहित्य के रचनाकारों को भी विभिन्न वजहों से लोग खारिज कर रहे हैं. और सबसे बड़ी बाततो ये है कि ये रचनाकार ना तोखुद को प्रेमचंद आदि की परंपरा की मानते हैं और ना हीवेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्रमोहन पाठक आदि की श्रेणी का. ये खुद का एक अलग ब्रांडिंग करते हैं. खुद की एक नई श्रेणी मानते हैं जो दोनों के बींच है. ये खुद को  क्लासिकल साहित्य की सीढ़ी मानते हैं. ये सोचते हैं कि ये बिखरते हुए पाठकों को किताबों से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और इन पाठकों को वे असली साहित्य की ओर मोड़ने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. ये रचनाकार खुद को आज की जरूरत का लेखक मानते हैं. वे मानते हैं कि वे  आज के युवाओं की जीवनशैली और जरूरत को देखते हुए उनकी रुचि के अनुसार लिखते हैं. ये लेखक ये नहीं मानते कि कोई इनकी किताबों को पढ़कर कोई बड़ी बौद्धिकता हासिल कर लेंगें. वे अपने साहित्य से पाठकों के रूचि परिमार्जन की बात भी नहीं सोचते हैं. कुछ लेखक तो शुद्ध व्यापारी की भाषा में बात करते हैं कि प्रकाशक जितने शब्द की किताब कहते हैं उसी के हिसाब से लिखते हैं. और उसी के अनुसार कहानी में भी काट-छांट करते हैं. हां, कीमत कम रहे इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं ताकि किताब अधिक से अधिक हाथों तक पहुँच सके. वे इसलिए नहीं लिखते हैं कि उनकी किताबें पुस्तकालयों की शोभा बने. वे तो  साफ साफ शब्दों में कहते हैं कि अकादमिक लेखन वाले ही धीर गंभीर लिखकर पाठकों की रुचियों का परिमार्जन कर सकते हैं जबकि वे  भूल जाते हैं कि प्रेमचंद और रेणु आदि कोई अकादमिक लेखक नहीं थे.
अपनी ही बातों पर अड़ते हुए नई हिन्दी वाले ये लेखक  कहते हैं कि आज के पाठक  ना तोखुद को प्रेमचंद आदि से जोड़ पाते हैं और ना ही वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के साहित्य से इसलिए वे नई आबोहवा में पल बढ़ रहे युवाओं के मनोरंजन के लिए उन्हीं की भाषा में उन्हीं की पसंद की चीजों को लिख रहे हैं.
इन साहित्य में उद्देश्य क्या होता है? तो सत्य व्यास जैसे लेखकअपनी किताब “बनारसटॉकीज का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि आई कार्ड खो गया मोबाइल खो गया तो पुलिस में तुरंत रपट लिखवानी चाहिए वरना आप कभी भी बड़ी से बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.”

आपको इन उद्देश्यों को सुनकर ठहाका लगाने की इच्छा हो रही हो लेकिन इन लेखकों को लगता है कि पहले से परिभाषित साहित्य के उद्देश्य को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है. क्योंकि हमारा समय बदल गया है समाज बदल गया है तकनीक के साथ साथ परिस्थितियां बदल गई हैं.इसलिए इन चीजों को बदलने की जरूरत हैक्योंकि समय के साथ चीजे बदल जाती हैं. जो नहीं बदलती हैं वह सड़ –गल के एक दिन खत्म हो जाती है. अपनी प्रासंगिकता खो देती है.  

और सबसे बड़ी बात कि  इन साहित्यकारों को लगता है कि बिक्री के पैमाने पर ही लेखकों की लोकप्रियता ही नहीं आंकी जाय  बल्कि उन्हें मान्यता और स्थापना भी दी जाए. पिछले दिनों पटना में सत्य व्यास ने तो एक कार्यक्रम में बनारसटॉकीज को नोबेल पुरस्कार का हकदार” भी खुलेआम बता दिया.

ये नए लेखक क्या लिखते हैं जो लोगों को लुभाता है? वे  जरूरी बातें लिखते हैं या गैरजरूरी यह मायने नहीं रखता. क्योंकि हर लेखक अपनी अपनी कहानियों पर अपने अपने तरीके से काम करता है. लेकिन इतना तो तय है कि ये लोग पूरा का पूरा मनोरंजन का मसाला तैयार जरूर करते हैं. अब चाहे उसे आप चुटकुले के रूप में स्वीकार करें या दैनिक जीवन में घटने वाली घटनाओं के रूप में.

यह भी एक सच है कि नकी लेखनी में एक प्रवाह है जो अंत तक पाठकों को बांधे रखने में सक्षम होता है. अब यह उनके लिखने की शैली कहें या भाषा कौशल. लेकिन इतना तो तय मानें कि  इनके किताबों में आपको एक दो लाइन नहींबल्कि पैराग्राफ के पैराग्राफऔर पूरे पेज अंग्रेजी के शब्द वो भी रोमन लिपि में छपे हुए मिल जाएंगे और लोगों की सबसे बड़ी शिकायत उनकी अंग्रेजी के शब्दों के रोमन में छपने से ही है.जबकि किताब में प्रयोग किए गए रोमन लिपि के शब्द कोई ऐसे नहीं होते, जिनके लिए आपको कोई शब्दकोश पलटना पड़े. और इसीलिए वरिष्ठ लेखक तक स्पष्ट शब्दों में कहते हैं किया तो अंग्रेजी में लिखो या फिरहिंदी मेंदोनों का घालमेल मत करो.’ तब ये  लेखक अपने बचाव में दो ही बात कहते हैं.पहले तो यह कि “ये  किताबें ही इसलिए इतनी बिक रही है क्योंकि इसे इस रूप में लिखाही गया है. और आज का पाठक खुद को इस से जोड़ पाता है.” दूसरी बात वे  कहते हैं कि मेरी भी यह सीमा है कि मैं अपनी बातों को इसी रूप मेंसहजता के साथ अभिव्यक्त कर पाता हूं.” तब  लोगों की एक ही आवाज उठती है कि भारत के हिंदी पट्टी का पला-बढ़ा इंसान अपने हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषामें खुद को अभिव्यक्त करने की बजाय अधकचरी अंग्रेजी में कैसे अभिव्यक्त कर सकता  है? ये हमारी शिक्षा –व्यवस्था का दोष है या व्यक्ति विशेष का?
जबकि ये लेखक स्पष्ट शब्दों मेंकहते हैं कि मैं इन शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने कीकोशिश करता तो या तो सही शब्दों को नहीं लिख पाता या फिर वह प्रभाव नहीं पड़ता जो अभी है.” यदि थोड़ी देर के लिए इन लेखकों की बातों को सच मान भी लें तो क्या इन लेखकों के पाठक अधकचरा ज्ञान वाले ही हैं? जिनके पास ना तो हिंदी की सही-सही समझ है और ना ही अंग्रेजी की? यह तो सबसे बड़ा सवाल है पाठकों पर भी बनता है?  जबकि  शुद्ध अंग्रेजी में लिखी गई किताबें जिस अनुपात में बिक रही है और पढ़ी जा रही है उसी अनुपात मेंहिंदी की भी किताबें. अब भलेही संख्या कमोबेश जो भी हो.

अब रह गई बात किताबों मेंबिलो द बेल्ट भाषा का इस्तेमाल करने का, तो ये लेखक स्पष्ट कहते हैं कि ऐसास्थापित एवं सम्मानित रचनाकार भी कभी-कभी करते हैंलेकिन इसे पूरी तरीके से सच नहीं माना जा सकता है.क्योंकि जो स्थापित रचनाकारहैं वे यदि ऐसे दृश्यों  या शब्दों का प्रयोग करते हैं तो अमूमन वैसी परिस्थिति होती है यावातावरण होता है. या फिर वे विभिन्न प्रतिबिंब से अपनीबातों को अभिव्यक्त कर देते हैं.लेकिन इन लेखकों का चित्रणपूर्णतः मसाला के रूप में ही प्रयोग किया जाता है.

इन सबके बावजूद सवाल यह उठता है कि आखिर नई हिंदी वाले ये नए लेखक नए पाठकभी बना रहे हैं? या पहले से ही वर्गीकृत पाठकों को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.पहले से ही साहित्यकारों के तैयार जमीन में ही कहीं सेंधमारी कर अपनी नई जमीन तैयार कर रहे हैं? आखिर यहसच प्रकाशकों की ईमानदारी के बगैर कैसे पता चलेगा? लेकिन इतना तो तय है कि आप इन्हें खारिज करें या स्वीकार करें. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. और दिन -प्रतिदिन ये खुद को स्थापित ही करते जा रहे हैं.  

संपर्क :-sushilkumarbhardwaj8@gmail.com